भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

आठवाँ प्रकरण विश्वकी रचना और संहार गुणा गुणेषु जायन्ते तत्रैव निविशन्ति च । *

  • महाभारत, शांति. ३०५.२३ इस बातका विवेचन हो चुका, कि कापिलसांख्यके अनुसार संसारमें जो दो स्वतंत्र मूलतत्त्व - प्रकृति और पुरुष - हैं, उनका स्वरूप क्या है, और जब इन दोनोंका संयोगही निमित्त कारण हो जाता है; तब पुरुषके सामने प्रकृति अपने गुणोंका जाला कैसे फैलाया करती है; और उस जालेसे हमको अपना छुटकारा किस प्रकार कर लेना चाहिये । परंतु अबतक इसका स्पष्टीकरण नहीं किया गया, कि प्रकृति अपने इस जालेको ( अथवा खेल, संसार या ज्ञानेश्वर महाराजके शब्दोंमें 'प्रकृतिकी टकसाल 'को ) किस क्रमसे पुरुषके सामने फैलाया करती है; और उसका लय किस प्रकार हुआ करता है। प्रकृतिके इस व्यापारहीको “विश्वकी रचना और संहार” कहते हैं; और इसी विषयका विवेचन प्रस्तुत प्रकरणमें किया जायगा। सांख्यमतके अनुसार प्रकृतिने इस जगत् या सृष्टिको असंख्य पुरुषोंके लाभके लियेही निर्माण किया है। 'दासबोध'में श्रीसमर्थ रामदासस्वामीनेभी प्रकृतिसे सारे ब्रह्मांडके निर्माण होनेका बहुत अच्छा वर्णन किया है। उसी वर्णनसे “विश्वकी रचना और संहार” शब्द इस प्रकरणमें लिये गये हैं। इसी प्रकार, भगवद्गीताके सातवें और आठवें अध्यायोंमें मुख्यतः इसी विषयका प्रतिपादन किया गया है। और, ग्यारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने श्रीकृष्णसे यह जो प्रार्थना की है, कि "भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया” (गीता ११.२) - भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलय (जो आपने) विस्तारपूर्वक (बतलाया, उसको) मैंने सुना। अब मुझे अपना विश्वरूप प्रत्यक्ष दिखलाकर कृतार्थ कीजिये - उससे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि विश्वकी रचना और संहार, क्षर-अक्षर-विचारहीका एक मुख्य भाग है। 'ज्ञान' वह है, जिससे यह बात मालूम हो जाती है, कि सृष्टिके अनेक (नाना) व्यक्त पदार्थोंमें एकही अव्यक्त मूलद्रव्य है (गीता १८.२०); और 'विज्ञान' उसे कहते हैं, जिससे यह मालूम हो, कि एकही मूलभूत अव्यक्त द्रव्यसे अनेक भिन्न भिन्न पदार्थ किस प्रकार अलग अलग निर्मित हुए (गीता
  • “गुणोंसेही गुणोंकी उत्पत्ति होती है और उन्हींमें उनका लय हो जाता है।”