भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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कपिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १६९ वर्णन (गीता १४. २२-२७) भी उस सिद्ध पुरुषके विषयमें किया गया है; जो त्रिगुणात्मक मायाके फंदेसे छूटकर उस परमात्माको पहचानता है, जो कि प्रकृति और पुरुषकेभी परे है। यह वर्णन सांख्यवादियोंके उस सिद्धान्तके अनुसार नहीं है; जिसके द्वारा वे यह प्रतिपादन करते हैं, कि 'प्रकृति' और 'पुरुष', दोनों पृथक् पृथक् तत्त्व हैं; और पुरुषका 'कैवल्य' ही त्रिगुणातीत अवस्था है। यह भेद आगे अध्यात्म-प्रकरणमें अच्छी तरह समझा दिया गया है। परंतु गीतामें यद्यपि अध्यात्म पक्षहो प्रतिपादित किया गया है, तथापि आध्यात्मिक तत्त्वोंका वर्णन करते समय भगवान् श्रीकृष्णने सांख्यपरिभाषाका और युक्तिवादका हर जगह उपयोग किया है। इसलिये संभव है, कि गीता पढ़ते समय कोई यह समझ बैठे, कि गीताको सांख्यवादियोंकेही सिद्धान्त ग्राह्य हैं। इस भ्रमको हटानेके लियेही सांख्यशास्त्र और गीताके तत्सदृश सिद्धान्तोंका भेद फिरसे यहाँ बतलाया गया है। वेदान्तसूत्रोंके भाष्यमें श्रीशंकराचार्यने कहा है, कि उपनिषदोंके इस अद्वैत सिद्धान्तको न छोड़- कर-कि "प्रकृति और पुरुषके परे इस जगत्का परब्रह्मरूपी एकही मूलभूत तत्त्व है; और उसीसे प्रकृति, पुरुष आदि सब सृष्टिकी उत्पत्ति हुई है" - सांख्य- शास्त्रके शेष सिद्धान्त हमें अग्राह्य नहीं हैं। (वे. सू. शां. भा. २. १. ३) यही बात गीताके उपपादनके विषयमेंभी चरितार्थ होती है।