श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वैराग्य और ज्ञान जन्मसेही प्राप्त हुआ था; परंतु यह स्थिति सब लोगोंको जन्महीसे प्राप्त नहीं हो सकती । इसलिये तत्त्व-विवेकरूप साधनसे प्रकृति और पुरुषकी भिन्नताको पहचान कर प्रत्येक पुरुषको अपनी बुद्धि शुद्ध कर लेनेका यत्न करना चाहिये । ऐसे प्रयत्नोंसे जब बुद्धि सात्त्विकही जाती है, तो फिर उसीमें ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य आदि गुण उत्पन्न होते हैं; और मनुष्यको अंतमें कैवल्यपद प्राप्त हो जाता है । जिस वस्तुको पानेकी मनुष्य इच्छा करता है, उसे प्राप्त कर लेनेके योग्य सामर्थ्यकोही यहाँ ऐश्वर्य कहा है । सांख्यमतके अनुसार धर्मकी गणना सात्त्विक गुणमेंही की जाती है। परंतु कपिलाचार्यने अंतमें यह भेद किया है, कि केवल धर्मसे स्वर्गही प्राप्त होता है; और ज्ञान तथा वैराग्य (संन्यास) से मोक्ष या कैवल्यपद प्राप्त होता है; तथा पुरुषके दुःखोंकी आत्यंतिक निवृत्ति हो जाती है । जब देहेंद्रियों और बुद्धिमें पहले सत्त्वगुणका उत्कर्ष होता है; और जब धीरे धीरे उन्नति होते होते अंतमें पुरुषको यह ज्ञान हो जाता है, कि मैं त्रिगुणात्मक प्रकृतिसे भिन्न हूँ तब उसे सांख्यवादी 'त्रिगुणातीत' अर्थात् सत्त्व-रज-तम गुणोंके परे पहुँचा हुआ कहते हैं । इस त्रिगुणातीत अवस्थामें सत्त्व-रज-तममेंसे कोईभी गुण शेष नहीं रहता । इसलिये कुछ सूक्ष्म विचार करनेसे मानना पड़ता हैं, कि यह त्रिगुणातीत अवस्था सात्त्विक, राजस और तामस इन तीनों अवस्थाओंसे भिन्न है । इसी अभिप्रायसे भागवतमें भक्तिके तामस, राजस और सात्त्विक भेद करनेके पश्चात् एक और चौथा भेद किया गया है। इन तीनों गुणोंके पार हो जानेवाला पुरुष, निर्हेतुक और अभेदभावने जो भक्ति करता है उसे 'निर्गुण भक्ति' कहते हैं' (भाग. ३. २९. ७-१४) । परंतु सात्त्विक, गजस और तामस इन तीन वर्गोंकी अपेक्षा वर्गीकरणके तत्त्वोंको व्यर्थ अधिक बढ़ाना उचित नहीं है। इसलिये सांख्य वादी कहते हैं, कि सत्त्वगुणके अत्यंत उत्कर्षसेही अंतमें त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त हुआ करती है; और इसलिये वे इस अवस्थाकी गणना सात्त्विक वर्गमेंही करते हैं। गीतामेंभी यह मत स्वीकार किया गया है। उदाहरणार्थ गीतामें कहा है, कि “जिस अभेदात्मक ज्ञानसे यह मालूम हो, कि सब कुछ एकही हैं उमीको सात्त्विक ज्ञान कहते हैं” (गीता १८. २०) । इसके सिवा मत्त्वगुणके वर्णनके बाद गीतामें १४ वें अध्यायके अंतमें, त्रिगुणातीत अवस्थाका वर्णन है। परंतु भगवद्- गीताको यह प्रकृति और पुरुषवाला द्वैत मान्य नहीं है। इसलिये ध्यान रखना चाहिये, कि गीतामें 'प्रकृति', 'पुरुष', 'त्रिगुणातीत' इत्यादि सांख्यवादियोंके पारि- भाषिक शब्दोंका उपयोग कुछ भिन्न अर्थमें किया गया है; अथवा यह कहिये, कि गीतामें सांख्यवादियोंके द्वैतपर अद्वैत परब्रह्मकी 'छाप' सर्वत्र लगी हुई है। उदा- हरणार्थ, सांख्यवादियोंके प्रकृति-पुरुष भेदकाही गीताके १३ वें अध्यायमें वर्णन है। (गीता १३. १९-३४) परंतु वहाँ 'प्रकृति' और 'पुरुष' शब्दोंका उपयोग क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अर्थमें हुआ है। इसी प्रकार १४ वें अध्यायमें त्रिगुणातीत अवस्थाका