श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १६७
सब सृष्टिके मूलतत्त्व हैं सही; परंतु उनमेंसे पुरुष शब्दमें सांख्यवादियोंके मता- नुसार "असंख्य पुरुषोंके समुदाय" का समावेश होता है। इन असंख्य पुरुषोंके और त्रिगुणात्मक प्रकृतिके संयोगसे सृष्टिका सब व्यवहार हो रहा है। प्रत्येक पुरुष और प्रकृतिका जब संयोग होता है, तब प्रकृति अपने गुणोंका जाला उस पुरुषके सामने फैलाती है; और पुरुष उसका उपभोग करता रहता है। ऐसा होते होते जिस पुरुषके चारों ओरकी प्रकृतिके खेल सात्त्विक हो जाते हैं, उस पुरुषकोही (सब पुरुषोंको नहीं) सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है; और उस पुरुषके लिये ही प्रकृतिके सब खेल बंद हो जाते हैं; एवं वह अपने मूल कैवल्यपदको पहुँच जाता है। परंतु यद्यपि उस पुरुषको मोक्ष मिल गया, तोभी शेष सब पुरुषोंको संसारमें फँसेही रहना पड़ता है। कदाचित् कोई यह समझे, कि ज्योंहि पुरुष इस प्रकार कैवल्यपदको पहुँच जाता है, त्योंही वह एकदम प्रकृतिके जालेसे छूट जाता होगा। परंतु सांख्यमतके अनुसार यह समझ गलत है। देह और इंद्रियरूपी प्रकृतिके विचार उस मनुष्यकी मृत्युतक उसे नहीं छोड़ते। सांख्यवादी इसका यह कारण बतलाते हैं, कि "जिस प्रकार कुम्हारका पहिया - ऊपरका घड़ा बन कर निकाल लिया जानेपरभी - पूर्वसंस्कारके कारण कुछ देर तक घूमताही रहता है, उसी प्रकार कैवल्यपदकी प्राप्ति हो जाने परभी इस मनुष्यका शरीर कुछ समयतक शेष रहता है" (सां. का. ६७)। तथापि उस शरीरसे, कैवल्यपदपर आरूढ़ होनेवाले पुरुषको कुछभी अडचन या सुखदुःखकी बाधा नहीं होती। क्योंकि, यह शरीर जड़ प्रकृतिका विकार होनेके कारण स्वयं जड़ही है। इसलिये इसे सुखदुःख दोनों समानही हैं; और यदि कहा जाय, कि पुरुषको सुखदुःखकी बाधा होती हो, तो यहभी ठीक नहीं। क्योंकि उसे मालूम है, कि मैं प्रकृतिके व्यवहारमें भिन्न हूँ, सब कर्तृत्व प्रकृतिका है, मेरा नहीं। ऐसी अवस्थामें प्रकृतिके मनमाने खेल हुआ करते हैं, परंतु उसे सुखदुःख नहीं होता; और वह सदा उदासीनही रहता है। जो पुरुष प्रकृतिके तीनों गुणोंसे छूट कर यह ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेता, वह जन्म- मरणसे छुट्टी नहीं पा सकता। फिर चाहे वह सत्त्वगुणके उत्कर्षके कारण देवयोनिमें जन्म ले, या रजोगुणके कारण मानवयोनिमें जन्म ले, या तमोगुणकी प्रबलताके कारण पशु-कोटिमें जन्म ले। (सां. का. ४४. ५४) जन्ममरणरूपी चक्रके ये फल प्रत्येक मनुष्यको उसके चारों ओरकी प्रकृति अर्थात् उसकी बुद्धिके सत्त्व-रज-तम गुणोंके उत्कर्षापकर्षके कारण प्राप्त हुआ करते हैं। गीतामेंभी कहा है, कि "ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्थाः" - सात्त्विक वृत्तिके पुरुष स्वर्ग जाते हैं; और तामस पुरुषोंको अधोगति प्राप्त होती है (गीता १४. १८)। परंतु ये स्वर्गादि फल अनित्य हैं। जिसे जन्म-मरणसे छुट्टी पाना है, या सांख्योंकी परिभाषाके अनुसार जिसे प्रकृतिसे अपनी भिन्नता अर्थात् कैवल्य चिरस्थायी रखना है, उसे त्रिगुणातीत हो कर विरक्त (संन्यस्त) होनेके सिवा दूसरा मार्ग नहीं है। कपिलाचार्यको यह