भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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१६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ओंका एक दूसरेसे वियोग होता है, तब हम देखते हैं कि दोनो एक दूसरेको छोड़ देती हैं। इसलिये ऐसे प्रश्नका विचार करनेसे कुछ लाभ नहीं है, कि किसने किसको छोड़ दिया। परंतु कुछ अधिक सोचनेपर मालूम हो जायगा, कि सांख्य- वादियोंका उक्त प्रश्न उनकी दृष्टिसे अयोग्य नहीं है। सांख्यशास्त्रके अनुसार 'पुरुष' निर्गुण, अकर्ता और उदासीन है। इसलिये तत्त्वदृष्टिसे 'छोड़ना' या 'पकड़ना' क्रियाओंका कर्ता पुरुष नहीं हो सकता (गीता १३. ३१, ३२)। इसलिये सांख्य- वादी कहते हैं, कि प्रकृतिही 'पुरुष'को छोड़ दिया करती है। अर्थात् वही 'पुरुष'से अपना छुटकारा या मुक्ति कर लेती है। क्योंकि कर्तृत्व 'प्रकृति'हीका धर्म है। (सां. का. ६२ और गीता १३. १४) सारांश यह है, कि मुक्ति नामकी ऐसी कोई निराली अवस्था नहीं है, जो 'पुरुष'को कहीं बाहरसे प्राप्त हो जाती हो। अथवा यह कहिये, कि वह 'पुरुष'की मूल और स्वाभाविक स्थितिसे कोई भिन्न स्थितिभी नहीं है। प्रकृति और पुरुषमें वैसाही संबंध है, जैसा कि घासके बाहरी छिलके और अंदरके गूदेमें रहता है; या जैसा पानी और उसमें रहनेवाली मछलीमें। सामान्य पुरुष प्रकृतिके गुणोंसे मोहित हो जाते हैं; और यह स्वाभाविक भिन्नता पहचान नहीं सकते। इसी कारण वे संसार-चक्रमें फँसे रहते हैं। परंतु जो इस भिन्नताको पहचान लेता है, वह मुक्तही है। महाभारत (मभा. शां. १९४. ५८; २४८. ११; और ३०६-३०८) में लिखा है, कि ऐसेही पुरुषको 'ज्ञाता' या 'बुद्ध' और 'कृतकृत्य' कहते हैं। गीताके वचन "एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात्" (गीता १५. २०) में बुद्धिमान् शब्दकाभी यही अर्थ है। अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे मोक्षका सच्चा स्वरूपभी यही है (वे. सू. शां. भा. १. १. ४)। परंतु सांख्यवादियोंकी अपेक्षा अद्वैत वेदान्तियोंका विशेष कथन यह है, कि आत्माहीमें परब्रह्मस्वरूप है; और जब वह अपने मूलस्वरूपको अर्थात् परब्रह्मको पहचान लेता है, तब वही उसकी मुक्ति है। वे लोग यह कारण नहीं बतलाते, कि पुरुष निसर्गतः 'केवल' है। सांख्य और वेदान्तका यह भेद अगले प्रकरणमें स्पष्ट करके बतलाया जायगा। यद्यपि अद्वैत वेदान्तियोंको सांख्यवादियोंका यह मत मान्य है, कि पुरुष (आत्मा) निर्गुण, उदासीन और अकर्ता है; तथापि वे लोग सांख्यशास्त्रकी 'पुरुष' संबंधी इस दूसरी कल्पनाको नहीं मानते, कि एकही प्रकृतिको देखनेवाले (साक्षी) स्वतंत्र पुरुष मूलमेंही असंख्य हैं (गीता ८. ४; १३. २०-२२; मभा. शां. ३५१; और वे. सू. शां. भा. २, १. १)। वेदान्तियोंका कहना है, कि उपाधिभेदके कारण सब जीव भिन्न भिन्न मालूम होते हैं, परंतु वस्तुतः सब ब्रह्मही है। सांख्यवादियों- का मत है, कि जब हम देखते हैं, कि प्रत्येक मनुष्यका जन्म, मृत्यु और जीवन अलग अलग हैं; और जब इस जगत्में हम यह भेद पाते हैं कि कोई सुखी है तो कोई दुःखी है; तब मानना पड़ता है, कि प्रत्येक आत्मा या पुरुष मूलसेही भिन्न है, और उनकी संख्याभी अनंत है। (सां. का. १८) केवल प्रकृति और पुरुषही