श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
विश्वकी रचना और संहार १७१
१३.३०) है; और इसमें न केवल क्षर-अक्षर-विचारहीका समावेश होता है, किंतु क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-ज्ञान और अध्यात्म विषयोंकाभी समावेश हो जाता है। भगवद्गीताके मतानुसार प्रकृति अपना संसारशकट चलाने या सृष्टिका कार्य चलानेके लिये स्वतंत्र नहीं है; किंतु उसे यह काम ईश्वरकी इच्छा के अनुसार करना पड़ता है (गीता ९.१०)। परंतु, पहले बतलाया जा चुका है, कि कपिलाचार्यने प्रकृतिको स्वतंत्र माना है। सांख्यशास्त्रके अनुसार, प्रकृतिके संसारका आरंभ होनेके लिये 'पुरुषका संयोग' इतनाही निमित्त कारण बस हो जाता है। इस विषयमें प्रकृति और किसीकी अपेक्षा नहीं करती। सांख्योंका यह कथन है, कि ज्योंही पुरुष और प्रकृतिका संयोग होता है, त्योंही उसकी टकसाल जारी हो जाती है और जिस प्रकार वसंत ऋतुमें वृक्षोंमें नये पत्ते दीख पड़ते हैं; और क्रमशः फूल और फल लगते हैं (मभा. शां. २३१.७३; मनु. १.३०), उसी प्रकार प्रकृतिकी मूल साम्यावस्था नष्ट हो जाती है; और उसके गुणोंका विस्तार होने लगता है। इसके विरुद्ध वेदसंहिता, उपनिषद् और स्मृतिग्रंथोंमें प्रकृतिको मूल न मान कर परब्रह्मको मूल माना है; और परब्रह्मसे सृष्टिकी उत्पत्ति होनेके विषयमें भिन्न भिन्न वर्णन किये गये हैं—"हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्" —पहले हिरण्यगर्भ (ऋ. १०.१२१.१) और इस हिरण्यगर्भसे अथवा सत्यसे सब सृष्टि उत्पन्न हुई (ऋ. १०.७२; १०.१९०); अथवा पहले पानी उत्पन्न हुआ (ऋ. १०.८२.६; तै. ब्रा. १.१.३.७; ऐ. उ. १.१.२) और फिर उससे सृष्टि उत्पन्न हुई। अथवा इस पानीमें एक अंडा उत्पन्न हुआ और उससे ब्रह्मा उत्पन्न हुआ; ब्रह्मासे अथवा उस मूल अंडेसेही सारा जगत् उत्पन्न हुआ; (मनु. १.८-१३; छां. ३.१९) अथवा वही ब्रह्मा (पुरुष) आधे हिस्सेसे स्त्री हो गया (बृ. १.४, ३; मनु १.३२); अथवा पानी उत्पन्न होनेके पहलेही पुरुष था (कठ. ४.६) अथवा परब्रह्मसे पहले तेज, पानी और पृथिवी (अन्न) येही तीन तत्त्व उत्पन्न हुए और पश्चात् उनके मिश्रणसे सब पदार्थ बने (छां. ६.२-६)। यद्यपि उक्त वर्णनोंमें बहुत भिन्नता है; तथापि वेदान्तसूत्रोंमें (वे. सू. २.३.१-१५) अन्तिम निर्णय यह किया गया है, कि आत्मरूपी मूलब्रह्मसे ही आकाश आदि पंच- महाभूत क्रमशः उत्पन्न हुए हैं (तै. उ. २.१)। प्रकृति, महत् आदि तत्त्वोंकाभी उल्लेख (कठ. ३.११), मैत्रायणी (६.१०), श्वेताश्वतर (४.१०; ६.१६), आदि उपनिषदोंमें स्पष्ट रीतिसे किया गया है। इससे दीख पड़ेगा, कि यद्यपि वेदान्तमतवाले प्रकृतिको स्वतंत्र न मानते हों, तथापि जब एक बार शुद्ध ब्रह्महीमें मायात्मक प्रकृतिरूप विकार दृग्गोचर होने लगता है, तब आगे सृष्टिके उत्पत्तिक्रमके संबंधमें उनका और सांख्यमतवालोंका अंतमें मेल हो गया था; और इसी कारण महाभारतमें कहा है, कि "इतिहास, पुराण, अर्थशास्त्र आदिमें जो कुछ ज्ञान भरा है, वह सब सांख्योंसे प्राप्त हुआ है" (शां. ३०१.१०८, १०९)। उसका यह मतलब
१७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नहीं है, कि वेदान्तियोंने अथवा पौराणिकोंने यह ज्ञान कपिलसे प्राप्त किया है; किंतु यहाँ पर केवल इतनाही अर्थ अभिप्रेत है, कि सृष्टिके उत्पत्तिक्रमका ज्ञान सर्वत्र एक-सा दीख पड़ता है। इतनाही नहीं; किंतु यहभी कहा जा सकता है, कि यहाँ पर 'सांख्य' शब्द प्रयोग 'ज्ञान'के व्यापक अर्थहीमें किया गया है। तथापि कपिलाचार्यने सृष्टिके उत्पत्तिक्रमका वर्णन शास्त्रीय दृष्टिसे विशेष पद्धतिपूर्वक किया है; और भगवद्गीतामेंभी विशेष करके इसी सांख्यक्रमका स्वीकार किया गया है, इस कारण उसीका विवेचन इस प्रकरणमें किया जायगा। सांख्योंका सिद्धान्त है, कि इंद्रियोंको अगोचर अर्थात् अव्यक्त, सूक्ष्म और चारों ओर अखंडित भरे हुए एकही निरवयव मूलद्रव्यसे सारी व्यक्त सृष्टि उत्पन्न हुई है। यह सिद्धान्त पश्चिमी देशोंके अर्वाचीन आधिभौतिक शास्त्रज्ञोंको ग्राह्य है। ग्राह्यही क्यों, अब तो उन्होंने यहभी निश्चित किया है, कि इसी मूलद्रव्य की शक्तिका क्रमशः विकास होता आया है; और इस पूर्वापार क्रमको छोड़ बीचमें अचानक या निरर्थक कुछभी निर्माण नहीं हुआ है। इसी मतको उत्क्रांतिवाद या विकास सिद्धान्त कहते हैं। जब यह सिद्धान्त पश्चिमी राष्ट्रोंमें, गतशताब्दीमें, पहले पहल ढूंढ निकाला गया, तब वहाँ बड़ी खलबली मच गई थी। ईसाई धर्म-पुस्तकोंमें यह वर्णन है, कि ईश्वरने पंचमहाभूतोंको और जंगमवर्गके प्रत्येक प्राणीकी जातिको भिन्न भिन्न समयपर पृथक् पृथक् और स्वतंत्र निर्माण किया है; और उत्क्रांतिवादके पहले इसी मतको सब ईसाई लोक सत्य मानते थे। अतएव, जब ईसाई धर्मका उक्त सिद्धान्त उत्क्रांतिवादसे असत्य ठहराया जाने लगा, तब उत्क्रांति- वादियोंपर खूब जोरसे आक्रमण और कटाक्ष होने लगे। ये कटाक्ष आजकलभी न्यूनाधिक होतेही रहते हैं। तथापि, शास्त्रीय सत्यमें अधिक शक्ति होनेके कारण सृष्ट्युत्पत्तिके संबंधमें सब विद्वानोंको उत्क्रांतिमतही आजकल अधिक ग्राह्य होने लगा है। इस मतका सारांश यह है – सूर्यमालामें पहले एक सूक्ष्म द्रव्यही भरा हुआ था। उसकी मूल गति अथवा उष्णताका परिमाण घटता गया। तब उस द्रव्यका अधिकाधिक संकोच होने लगा; और पृथ्वी समवेत सब ग्रह क्रमशः उत्पन्न हुए। अंतमें जो शेष अंश बचा, वही सूर्य है। पृथ्वीभी सूर्यके सदृश पहले एक उष्ण गोला थी। परंतु ज्यों ज्यों उसकी उष्णता कम होती गई, त्यों त्यों मूलद्रव्योंमेंसे कुछ द्रव्य पतले और कुछ घने हो गये। इस प्रकार पृथ्वीके ऊपरकी हवा और पानी तथा उसके नीचेका पृथ्वीका जड़ गोला, ये तीन पदार्थ बने; और इसके बाद, इन तीनोंके मिश्रण अथवा संयोगसे सब सजीव तथा निर्जीव सृष्टि उत्पन्न हुई है। डार्विन प्रभृति पंडितोंने तो यह प्रतिपादन किया है, कि इसी तरह मनुष्यभी छोटे कीड़ेसे बढ़ते बढ़ते अपनी वर्तमान अवस्थामें आ पहुँचा है। परंतु अबतक आधिभौतिकवादियोंमें और अध्यात्मवादियोंमें इस बातपर बहुत मतभेद है, कि सारी सृष्टिके मूलमें आत्मा जैसे किसी भिन्न और स्वतंत्र तत्त्वको मानना चाहिये
विश्वकी रचना और संहार १७३ या नही। हेकेलके सदृश कुछ पंडित यह मानकर, कि जड़ पदार्थोंसेही बढ़ते बढ़ते आत्मा और चैतन्यकी उत्पत्ति हुई, जड़ाद्वैतका प्रतिपादन करते हैं, और इसके विरुद्ध कांटसरीखे अध्यात्मज्ञानियोंका यह कथन है, कि हमें सृष्टिका जो ज्ञान होता है, वह हमारे आत्माके एकीकरण - व्यापारका फल है, इसलिये आत्माको एक स्वतंत्र तत्त्व माननाही पड़ता है। क्योंकि यह कहना - कि जो आत्मा बाह्य- सृष्टिका ज्ञाता है, वह उसी गोचर सृष्टिका एक भाग है अथवा उस सृष्टिहीसे वह उत्पन्न हुआ है - तर्कदृष्टिसे ठीक वैसेही असमंजस या भ्रामक प्रतीत होगा, जैसे यह उक्ति कि हम स्वयं अपनेही कंधेपर बैठ सकते हैं। यही कारण है, कि सांख्यशास्त्रमें प्रकृति और पुरुष, ये दो स्वतंत्र तत्त्व माने गये हैं। सारांश यह है, कि आधिभौतिक सृष्टिज्ञान चाहे जितनी उन्नति करे; तथापि अबतक पश्चिमी देशोंमें बहुतेरे बड़े बड़े पंडित यही प्रतिपादन किया करते हैं, कि सृष्टिके मूल तत्त्वके स्वरूपका विवेचन हमेशा भिन्न पद्धतिसे किया जाना चाहिये । परंतु, यदि केवल इतनाही विचार किया जाय, कि एक जड़ प्रकृतिसे आगे सब व्यक्त पदार्थ किस क्रमसे बने हैं, तो पाठकोंको मालूम हो जायगा, कि पश्चिमी उत्क्रांतिमतमें और सांख्यशास्त्रमें वर्णित प्रकृतिके कार्यसंबंधी तत्त्वोंमें कोई विशेष अंतर नहीं है। क्योंकि इस मुख्य सिद्धान्तसे दोनों सहमत हैं, कि अव्यक्त, सूक्ष्म और एक मूल रूप प्रकृतिहीसे क्रमशः ( सूक्ष्म और स्थूल ) विविध रूप व्यक्त सृष्टि निर्मित हुई है। परंतु अब आधिभौतिक शास्त्रोंके ज्ञानकी खूब वृद्धि हो जानेके कारण, सांख्य- वादियोंके “सत्त्व, रज, तम इन तीन गुणोंके बदले, आधुनिक सृष्टिशास्त्रज्ञोंने गति, उष्णता और आकर्षणशक्ति को प्रधानगुण मान रखा है। यह बात सच है, कि “सत्त्व, रज, तम ” गुणोंकी न्यूनाधिकताके परिमाणोंकी अपेक्षा, उष्णता अथवा आकर्षणशक्तिकी न्यूनाधिकताकी बात आधिभौतिकशास्त्रकी दृष्टिसे सरलतापूर्वक समझमें आ जाती है। तथापि गुणोंके विकास अथवा गुणोत्कर्षका जो यह तत्त्व है, कि “गुणा गुणेषु वर्तन्ते” (गीता ३. २८), वह दोनों ओर समानही है। सांख्यशास्त्रज्ञोंका कथन है, कि जिस तरह मोड़दार पंखेको धीरे धीरे खोलते हैं उसी तरह सत्त्व, रज, तमकी साम्यावस्थामें रहनेवाली प्रकृतिकी तह जब धीरे धीरे खुलने लगती है, तब सब व्यक्त सृष्टि निर्मित होती है - और इस कथनमें और उत्क्रांतिवादमें वस्तुतः कुछ भेद नहीं है। तथापि, यह भेद तात्त्विक धर्मदृष्टिसे ध्यानमें रखनेयोग्य है, कि ईसाई धर्मके समान गुणोत्कर्षतत्त्वका अनादर न करते हुए, गीतामें और अंशतः उपनिषद् आदि वैदिक ग्रंथोंमेंभी, अद्वैत वेदान्तके साथही साथ बिना किसी विरोधके गुणोत्कर्षवाद स्वीकार किया गया है। अब देखना चाहिये कि प्रकृतिके विकासक्रमके विषयमें सांख्यशास्त्रकारोंका क्या कथन है। इस क्रमहीको गुणोत्कर्ष अथवा गुणपरिणामवाद कहते हैं। यह बतलानेकी आवश्यकता नही, कि कोई काम आरंभ करनेके पहले मनुष्य उसे अपनी
१७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बुद्धिसे निश्चित कर लेता है, अथवा पहले वह काम करनेकी बुद्धि या इच्छा उसमें उत्पन्न हुआ करती है। उपनिषदोंमेंभी इस प्रकारका वर्णन है, कि आरंभमें मूल परमात्माको यह बुद्धि या इच्छा हुई, कि हमें अनेक होना चाहिये- “बहु स्यां प्रजायेय”- और इसके बाद सृष्टि उत्पन्न हुई (छां. ६. २. ३; तै. २. ६)। इसी न्यायके अनुसार अव्यक्त प्रकृतिभी अपनी साम्यावस्थाका भंग करके व्यक्त सृष्टिके निर्माण करनेका निश्चय पहले करलिया करती है। निश्चय-अर्थात् व्यवसाय-करना बुद्धिका लक्षण है। अतएव, सांख्योंने यह निश्चित किया है, प्रकृतिमें 'व्यवसाया- त्मिक बुद्धि'का गुण पहले उत्पन्न हुआ करता है। सारांश यह है, कि जिस प्रकार मनुष्यको पहले कुछ काम करनेकी इच्छा या बुद्धि हुआ करती है, उसी प्रकार प्रकृतिकोभी अपना विस्तार करने या पसारा पसारनेकी बुद्धि पहले हुआ करती है। परंतु इन दोनोंमें बड़ा भारी अंतर यह है, कि मनुष्यप्राणी सचेतन होनेके कारण -अर्थात् उसमें प्रकृतिकी बुद्धिके साथ सचेतन पुरुषका (आत्माका) संयोग होनेके कारण-वह स्वयं अपनी व्यवसायात्मिका बुद्धिको जान सकता है; और प्रकृति स्वयं अचेतन या जड़ है; इसलिये उसको अपनी बुद्धिका कुछ ज्ञान नहीं रहता। यह अंतर पुरुषके संयोगसे प्रकृतिमें उत्पन्न होनेवाले चैतन्यके कारण हुआ करता है; यह केवल जड़ या अचेतन प्रकृतिका गुण नहीं है। अर्वाचीन आधिभौतिक सृष्टि- शास्त्रज्ञभी अब कहने लगे हैं, कि इस बातको बिना माने कि मानवी इच्छाकी बराबरी करनेवाली किंतु अस्वयंवेद्य शक्ति जड़ पदार्थोंमेंभी रहती है, गुरुत्वाकर्षण अथवा रसायन-क्रियाका और लोहचुंबकका आकर्षण तथा अपसारण प्रभृति केवल जड़ सृष्टि- मेंही दृग्गोचर होनेवाले गुणोंका मूल कारण ठीक ठीक बतलाया नहीं जा सकता।* आधुनिक सृष्टिशास्त्रज्ञोंके उक्त मतपर ध्यान देनेसे सांख्योंका यह सिद्धान्त आश्चर्य- कारक नहीं प्रतीत होता, कि प्रकृतिमें पहले बुद्धि-गुणका प्रादुर्भाव होता है। प्रकृतिमें
- "Without the assumption of an atomic soul the commonest and the most general phenomena of Chemistry are inexplicable. Pleasure and pain, desire and aversion, attraction and repulsion must be common to all atoms of an aggregate; for the movements of atoms which must take place in the formation and dissolution of a chemical compound can be explained only by attributing to them Sensation and Will." - Haeckel in the Perigenesis of the Plastidule - cited in Martineau's Types of Ethical Theory, Vol. II, p. 399, 3rd Ed. Haeckel himself explains this statement as follows :- "I explicitly stated that I conceived the elementary psychic qualities of Sensation and will which may be attributed to atoms, to be unconscious - just as unconscious as the elementary memory, which I, in common with the distinguished psychologist Ewald Hering, consider to be a common function of all organised matter, or more correctly the living substances." - The Riddle of the Universe, Chap. IX, p. 63 (R. P. A. Cheap Ed.).
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प्रथम उत्पन्न होनेवाले इन गुणोंको यदि आप चाहें, तो अचेतन अथवा अस्वयंवेद्य अर्थात् अपने आपको ज्ञात न होनेवाली बुद्धि कह सकते हैं। परंतु, उसे चाहे जो कहें; इसमें संदेह नहीं, कि मनुष्यको होनेवाली बुद्धि और प्रकृतिको होनेवाली बुद्धि दोनों मूलमें एकही श्रेणीकी हैं; और इसी कारण दोनों स्थानोंपर उनकी व्याख्याएँभी एकही-सी की गई हैं। उस बुद्धिकेही "महत्, ज्ञान, मति, आसुरी, प्रजा, ख्याति" आदि अन्य नाम हैं। मालूम होता है, कि इसमेंसे 'महत्' (पुँल्लिङ्ग कर्ताका एकवचन महानबड़ा) नाम इस गुणकी श्रेष्ठताके कारण दिया गया होगा; अथवा इसलिये दिया गया होगा, कि अब प्रकृति बढ़ने लगती है। प्रकृतिमें पहले उत्पन्न होनेवाला महान् अथवा बुद्धि-गुण 'सत्त्व-रज-तम'के मिश्रणहीका परिणाम है। इसलिये प्रकृतिकी यह बुद्धि यद्यपि देखनेमें एकही प्रतीत होती हो, तथापि यह आगे कई प्रकारकी हो सकती है। क्योंकि ये गुण - सत्त्व, रज और तम - प्रथम दृष्टिसे यद्यपि तीन हैं, तथापि विचार-दृष्टिसे प्रकट हो जाता है, कि इनके मिश्रणमें प्रत्येक गुणका परिमाण अनंत रीतिसे भिन्न भिन्न हुआ करता है, और इसी लिये इन तीनोंमेंसे प्रत्येक गुणके अनंत भिन्न परिमाणसे उत्पन्न होनेवाली बुद्धिके प्रकारभी त्रिघात अनंत हो सकते हैं। अव्यक्त प्रकृतिसे निर्मित होनेवाली यह बुद्धिभी प्रकृतिकेही सदृश सूक्ष्म होती है। परंतु पिछले प्रकरणमें 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' तथा 'सूक्ष्म' और 'स्थूल'का जो अर्थ बतलाया गया है, उसके अनुसार यह बुद्धि प्रकृतिके समान सूक्ष्म होनेपरभी उसके समान अव्यक्त नहीं है - मनुष्यको इसका ज्ञान हो सकता है। अतएव, अब यह सिद्ध हो चुका, कि इस बुद्धिका समावेश व्यक्तमें (अर्थात् मनुष्यको गोचर होनेवाले पदार्थोंमें) होता है; और सांख्यशास्त्रमें न केवल बुद्धि किंतु बुद्धिके आगे प्रकृतिके बादके सब विकारभी व्यक्तही माने जाते हैं। एक मूल प्रकृतिके सिवा कोईभी अन्य तत्त्व अव्यक्त नहीं है। इस प्रकार, यद्यपि अव्यक्त प्रकृतिमें व्यक्त व्यवसायात्मिका - बुद्धि उत्पन्न हो जाती है, तथापि प्रकृति अबतक एकही बनी रहती है। इस एकरूपताका भंग होना और अनेकरूपता या विविधत्वका उत्पन्न होनाही पृथकत्व कहलाता है। उदाहरणार्थ, पारेका जमीनपर गिरना और उसकी अलग अलग छोटी छोटी गोलियाँ बन जाना। बुद्धिके बाद जब तक यह पृथकत्व या विविधरूपता उत्पन्न न हो, तब तक एकही प्रकृतिके अनेक पदार्थ हो जाना संभव नहीं। बुद्धिसे बादमें उत्पन्न होनेवाली पृथकताके गुणकोही 'अहंकार' कहते हैं। क्योंकि पृथकता, 'मैं-तू' शब्दोंसेही, प्रथम व्यक्त की जाती है; और 'मैं-तू'का अर्थही अहंकार, अथवा अहं-अहं (मैं-मैं) करना है। प्रकृतिमें उत्पन्न होनेवाले अहंकारके इस गुणको यदि आप चाहें, तो अस्वयंवेद्य अर्थात् अपने आपको ज्ञात न होनेवाला अहंकार कह सकते हैं। परंतु स्मरण रहे, कि मनुष्यमें प्रकट होनेवाला अहंकार, और वह अहंकार कि जिसके कारण पेड़, पत्थर, पानी अथवा भिन्न भिन्न मूल
१७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमाणु एकरूप प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं, ये दोनों एकही जातिके हैं। भेद केवल इतनाही है, कि पत्थरमें चैतन्य न होनेके कारण उसे 'अहं'का ज्ञान नहीं होता, और मुंह न होनेके कारण 'मैं-तू' कहकर स्वाभिमानपूर्वक अपनी किसीपर वह प्रकट नहीं कर सकता। सारांश यह है, कि दूसरोंसे पृथक् रहनेका - अर्थात् अभिमान या अहंकारका - तत्त्व सब जगह समानही है। इस अहंकारहीको तैजस, अभि- मान, भूतादि और धातुभी कहते हैं। अहंकार बुद्धिका एक भाग है। इसलिये पहले जबतक बुद्धि न होगी, तबतक अहंकार उत्पन्न होही नहीं सकता। अतएव सांख्योंने यह निश्चित किया है, कि 'अहंकार' यह दूसरा - अर्थात् बुद्धिके बादका - गुण है। अब यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि सात्त्विक, राजस और तामस भेदोंसे बुद्धिके समान अहंकारकेभी अनंत प्रकार हो जाते हैं। इसी तरह उनके बादके गुणोंकेभी प्रत्येकके त्रिघात अनंत भेद हैं। अथवा यह कहिये, कि व्यक्त सृष्टिमें प्रत्येक वस्तुके इसी प्रकार अनंत, सात्त्विक, राजस और तामस भेद हुआ करते हैं; और इसी सिद्धान्तको लक्ष्य करके गीतामें गुणत्रय-विभाग और श्रद्धात्रय- विभाग बतलाये गये हैं (गीता अ. १४ और १७)। व्यवसायात्मिका बुद्धि और अहंकार, ये दोनों व्यक्त गुण जब मूल साम्या- वस्थाकी प्रकृतिमें उत्पन्न हो जाते हैं, तब प्रकृतिकी एकरूपता भंग हो जाती है और उससे अनेक पदार्थ बनने लगते हैं। तथापि उसकी सूक्ष्मता अबतक कायम रहती है। अर्थात् यह कहना अयुक्त न होगा, कि अब नैयायिकोंके सूक्ष्म परमाणुओंका आरंभ होता है। क्योंकि अहंकार उत्पन्न होनेके पहले प्रकृति अखंडित और निरवयव थी। वस्तुतः देखनेसे तो प्रतीत होता है, कि निरी बुद्धि और निरा अहंकार केवल गुण हैं ! अतएव, उपर्युक्त सिद्धान्तोंसे यह मतलब नहीं लेना चाहिये, कि वे (बुद्धि और अहं- कार) प्रकृतिके द्रव्यसे पृथक् रहते हैं। वास्तवमें बात यह है, कि जब मूल एक और अवयवरहितही प्रकृतिमें इन गुणरूपोंका प्रादुर्भाव हो जाता है, तब उसीको विविध- रूप और अवयवसहित द्रव्यात्मक व्यक्त रूप प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार जब अहंकारसे मूलप्रकृतिमें भिन्न भिन्न पदार्थ बननेकी शक्ति आ जाती है, तब आगे उसकी वृद्धिकी दो शाखाएँ हो जाती हैं। एक - पेड़, मनुष्य आदि सेंद्रिय प्राणियोंकी सृष्टि और दूसरी, निरिंद्रिय पदार्थोंकी सृष्टि। यहाँ इंद्रिय शब्दसे केवल "इंद्रियवान् प्राणियोंकी इंद्रियोंकी शक्ति" इतनाही अर्थ लेना चाहिये। इसका कारण यह है, कि सेंद्रिय प्राणियोंकी जड़ देहका समावेश जड़ यानी निरिंद्रिय सृष्टिमें होता है; और इन प्राणियोंकी आत्मा 'पुरुष' नामक अन्य वर्गमें शामिल किया जाता है। इसीलिये सांख्यशास्त्रमें सेंद्रिय सृष्टिका विचार करते समय, देह और आत्माको छोड़ केवल इंद्रियोंकाही विचार किया गया है। इस जगत्में सेंद्रिय अथवा निरिंद्रिय पदार्थोंके अतिरिक्त किसी तीसरे पदार्थका होना संभव नहीं। इसलिये कहनेकी आवश्य- कता नहीं, कि अहंकारसे दोसे अधिक शाखाएँ निकलही नहीं सकतीं। इनमें
विश्वकी रचना और संहार १७७ निरिंद्रिय पदार्थोंकी अपेक्षा इंद्रियशक्ति श्रेष्ठ है। इसलिये इंद्रिय सृष्टिको सात्त्विक (अर्थात् सत्त्वगुणके उत्कर्षसे होनेवाली) कहते हैं; और निरिंद्रिय सृष्टिको तामस (अर्थात् तमोगुणके उत्कर्षसे होनेवाली) कहते हैं। सारांश यह है, कि जब अहंकार अपनी शक्तिसे भिन्न भिन्न पदार्थ उत्पन्न करने लगता है, तब उसीमें एक बार सत्त्वगुणका उत्कर्ष होकर एक ओर पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ और मन मिलकर इंद्रिय सृष्टिकी मूलभूत ग्यारह इंद्रियाँ उत्पन्न होती हैं; और दूसरी ओर, तमोगुणका उत्कर्ष होकर उससे निरिंद्रिय सृष्टिके मूलभूत पाँच तन्मात्रद्रव्य उत्पन्न होते हैं। परंतु प्रकृतिकी सूक्ष्मता अबतक कायम रही है; इसलिये अहंकारसे उत्पन्न होनेवाले ये सोलह तत्त्वभी सूक्ष्मही रहते हैं।* शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंधकी तन्मात्राएँ - अर्थात् बिना मिश्रण हुए प्रत्येक गुणके भिन्न भिन्न अति सूक्ष्म मूल स्वरूप - निरिंद्रिय - सृष्टिके मूलतत्त्व हैं; और मनसहित ग्यारह इंद्रियाँ-सृष्टिकी बीज हैं। इस विषयकी सांख्यशास्त्रकी उपपत्ति विचार करनेयोग्य है, कि निरिंद्रिय सृष्टिके मूल तत्त्व (तन्मात्र) पाँचही क्यों और सेंद्रिय सृष्टिके मूल तत्त्व ग्यारहही क्यों माने जाते हैं। अर्वाचीन सृष्टिशास्त्रज्ञोंने सृष्टिके पदार्थोंके तीन भेद - घन, द्रव और वायुरूपी - किये हैं; परंतु सांख्य- शास्त्रकारोंका पदार्थोंका वर्गीकरण इससे भिन्न है। उनका कथन है कि मनुष्यको सृष्टिके सब पदार्थोंका ज्ञान केवल पाँच ज्ञानेंद्रियोंसे हुआ करता है; और इन ज्ञानेंद्रियोंकी रचना कुछ ऐसी विलक्षण है, कि एक इंद्रियको सिर्फ़ एकही गुणका ज्ञान हुआ करता है। आँखोंसे सुगंध नहीं मालूम होती और न कानसे दीखता है; त्वचासे मीठा-कडुवा नहीं समझ पड़ता और न जिव्हासे शब्दज्ञान होता है; नाकसे सफ़ेद और काले रंगका भेदभी नहीं मालूम होता। जब इस प्रकार पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और उनके पाँच विषय - शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध - निश्चित हैं; तब यह प्रकट है, कि सृष्टिके सब गुणभी पाँचसे अधिक नहीं माने जा सकते। क्योंकि यदि हम कल्पनासे यह मानभी लें कि गुण पाँचसे अधिक हैं; तो कहना नहीं होगा, कि उनको जाननेके लिये हमारे पास कोई साधन या उपाय नहीं है। इन पाँच गुणोंमेंसे प्रत्येकके अनेक भेद हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, यद्यपि 'शब्द' - एकही गुण है, तथापि * संक्षेपमें यही अंग्रेजी भाषामें इस प्रकार कहा जा सकता है :- The Primeval matter (Prakriti) was at first homogeneous. It resolved (Buddhi) to unfold itself, and by the principle of differentiation (Ahamkara) became hetrogeneous. It then branched off into Two Sections - one organic (Sendriya) and the other inorganic (Nirindriya). There are eleven elements of the organic and five of the inorganic creation. Purusha or the observer is different from all these and falls under none of the above categories. गी. र. १२
१७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उसके छोटा, बड़ा, कर्कश, भद्दा, फटा हुआ, कोमल अथवा गायनशास्त्रके अनुसार निषाद, गांधार, षड्ज आदि; और व्याकरणशास्त्रके अनुसार कण्ठ्य, तालव्य, और औष्ठ्य आदि अनेक भेद हुआ करते हैं। इसी तरह यद्यपि 'रूप' एकही गुण है, तथापि उसकेभी अनेक भेद हुआ करते हैं; जैसे सफ़ेद, काला, नीला, पीला, हरा, लाल, आदि। इसी तरह यद्यपि 'रस' या 'रुचि' एकही गुण है, तथापि उसके खट्टा, मीठा, तीखा, कडुवा, खारा आदि अनेक भेद हो जाते हैं। और, 'मिठास' यद्यपि एक विशिष्ट रुचि है, तथापि हम देखते हैं, कि गन्नेकी मिठास, दूधकी मिठास, गुड़ की मिठास और शक्करकी मिठास भिन्न भिन्न होती है; तथा इस प्रकार उस एकही 'मिठास'के अनेक भेद हो जाते हैं। यदि भिन्न भिन्न गुणोंके भिन्न भिन्न मिश्रणोंपर विचार किया जाय, तो यह गुणवैचित्र्य अनंत प्रकारसे अनंत हो सकता है। परंतु चाहे जो हो; पदार्थोंके मूल गुण पाँचसे कभी अधिक हो नहीं सकते। क्योंकि इंद्रियां केवल पाँच हैं, और प्रत्ये- कको एकही एक गुणका बोध हुआ करता है। इसलिये सांख्योने यह निश्चित किया है, कि यद्यपि केवल शब्दगुणके अथवा केवल स्पर्शगुणके पृथक् पृथक् यानी दूसरे गुणोंके मिश्रणरहित पदार्थ हमें दीख न पड़ते हों, तथापि इसमें संदेह नहीं, कि मूल प्रकृतिमें निरा शब्द, निरा स्पर्श, निरा रूप, निरा रस और निरा गंध है - उस प्रकार शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र और गंधतन्मात्र ही हैं - अर्थात् मूल प्रकृतिके यही पाँच भिन्न भिन्न सूक्ष्म तन्मात्रविकार अथवा द्रव्य निःसंदेह हैं। आगे इस बातका विचार किया गया है, कि पंचतन्मात्राओं अथवा उनसे उत्पन्न होनेवाले पंचमहाभूतोंके संबंधमें उपनिषत्कारोंका कथन क्या है। निरिंद्रिय सृष्टिका इस प्रकार विचार करके यह निश्चित किया गया है, कि उसमें पाँचही मूलतत्त्व हैं। और जब हम सेंद्रिय सृष्टिपर दृष्टि डालते हैं, तबभी यही प्रतीत होता है, कि पाँच, ज्ञानेंद्रियाँ, पांच कर्मेंद्रियाँ और मन, इन ग्यारह इंद्रि- योंकी अपेक्षा अधिक इंद्रियाँ किसीकेभी नहीं हैं। स्थूल देहमें हाथ और पैर आदि इंद्रियाँ यद्यपि स्थूल प्रतीत होती हैं, तथापि इनमेंसे प्रत्येककी जड़में किसी मूल सूक्ष्म तत्त्वका अस्तित्व माने बिना इंद्रियोंकी भिन्नताका यथोचित कारण मालूम नहीं होता। पाश्चिमात्य आधिभौतिक उत्क्रांतिवादियोंमें इसपर बहुत विवाद हुआ है। अर्वाचीन सृष्टि-शास्त्रज्ञ कहते हैं, कि मूलके अत्यंत छोटे और गोलाकार जंतुओंमें सिर्फ़ 'त्वचा' ही एक इंद्रिय होती है; और इस त्वचासे अन्य इंद्रियाँ क्रमशः उत्पन्न हुई है। उदाहरणार्थ, मूल जंतुकी त्वचासे प्रकाशका संयोग होनेपर आँख उत्पन्न हुई, इत्यादि। आधिभौतिक-वादियोंका यह तत्त्व - कि प्रकाश आदिके संयोगसे स्थूल-इंद्रियोंका प्रादुर्भाव होता है - सांख्योंकोभी ग्राह्य है। महाभारत (महा. शां. २१३. १६) में, सांख्यप्रक्रियाके अनुसार इंद्रियोंके प्रादुर्भावका वर्णन इस प्रकार पाया जाता है :- शब्दरागात् श्रोत्रमस्य जायते भावितात्मनः । रूपरागात् तथा चक्षुः घ्राणं गंधजिघृक्षया ॥
अर्थात् "प्राणियोंके आत्माको जब सुननेकी भावना हुई, तब कान उत्पन्न हुआ; रूप पहचाननेकी इच्छासे आँख; सूंघनेकी इच्छासे नाक उत्पन्न हुई।" परंतु सांख्योंका यह कथन है, कि यद्यपि त्वचाका प्रादुर्भाव पहले होता हो, तथापि मूल प्रकृतिमेंही यदि भिन्न भिन्न इंद्रियोंके उत्पन्न होनेकी शक्तिका न हो, तो सजीव सृष्टिके अत्यंत छोटे कीड़ोंकी त्वचापर सूर्यप्रकाशका चाहे जितना आघात या संयोग होता रहे, तोभी उन्हें आँखें - और वेभी शरीरके एक विशिष्ट भागहीमें - कैसे प्राप्त हो सकती है ? डार्विनका सिद्धान्त सिर्फ यह आशय प्रकट करता है, कि दो प्राणियों - एक चक्षुवाला और दूसरा चक्षुरहितके - निर्मित होनेपर, इस जड़ सृष्टिके कलहमें चक्षुवाला अधिक समयतक टिक सकता है; और दूसरा शीघ्रही नष्ट हो जाता है। परंतु पश्चिमी आधिभौतिक सृष्टिशास्त्रज्ञ इस बातका मूल कारण नहीं बतला सकते, कि नेत्र आदि भिन्न भिन्न इंद्रियोंकी उत्पत्ति पहले हुईही क्यों। सांख्योंका मत यह है, कि ये सब इंद्रियाँ किसी एकही मूल इंद्रियसे क्रमशः उत्पन्न नहीं हुईं, किंतु जब अहंकारके कारण प्रकृतिमें विविधरूपता उत्पन्न होने लगती है, तब पहले उस अहंकारसे पाँच सूक्ष्म कर्मेंद्रियाँ, पाँच सूक्ष्म ज्ञानेंद्रियाँ और मन, इन सबको मिलाकर ग्यारह भिन्न भिन्न गुण (शक्ति) सबके सब एकसाथ (युगपत्) स्वतंत्र होकर मूलप्रकृतिमेंही उत्पन्न होते हैं; और फिर इसके बाद स्थूल सेंद्रिय सृष्टि उत्पन्न हुआ करती है। इन ग्यारह इंद्रियोंमेंसे मनके बारेमें पहलेही छठे प्रकरणमें बतला दिया गया है, कि वह ज्ञानेंद्रियोंके साथ संकल्पविकल्पात्मक होता है; अर्थात् ज्ञानेंद्रियोंसे ग्रहण किये गये संस्कारोंकी व्यवस्था करके वह उन्हें बुद्धिके सामने निर्णयार्थ उपस्थित करता है; और कर्मेंद्रियोंके साथ वह व्याकरणात्मक होता है; अर्थात् उसे बुद्धिके निर्णयको कर्मेंद्रियोंके द्वारा अमलमें लाना पड़ता है। इस प्रकार वह उभयविध, अर्थात् इंद्रियभेदके अनुसार भिन्न भिन्न प्रकारके काम करनेवाला होता है। उपनिषदोंमें इंद्रियोंकोही 'प्राण' कहा है; और सांख्योंके मतानुसार उपनिषत्कारोँकाभी यही मत है, कि ये प्राण पंचमहाभूतात्मक नहीं हैं; किंतु परमात्मासे पृथक् उत्पन्न हुए हैं (मुंड. २. १. ३) इन प्राणोंकी - अर्थात् इंद्रियोंकी - संख्या उपनिषदोंमें कहीं दस, ग्यारह, बारह और कहीं तेरह बतलाई गई है। परंतु वेदान्तसूत्रोंके आधारसे श्रीशंकराचार्यने निश्चित किया है, कि उपनिषदोंके सब वाक्योंकी एकरूपता करनेपर इंद्रियोंकी संख्या ग्यारहही सिद्ध होती है (वे. सू. शां. २. ४. ५. ६)। और गीतामें तो इस बातका स्पष्ट उल्लेख किया गया है, कि "इंद्रियाणि दशकं च" (गीता १३. ५)
- अर्थात् इंद्रियाँ 'दस और एक' अर्थात् ग्यारह हैं। अब इस विषयपर सांख्य और वेदान्त दोनोंमें कोई मतभेद नहीं रहा। सांख्योंके निश्चित किये हुए मतका सारांश यह है - सात्त्विक अहंकारसे सेंद्रिय सृष्टिकी मूलभूत ग्यारह इंद्रियशक्तियाँ (गुण) उत्पन्न होती हैं; और तामस अहंकारसे निरिंद्रिय सृष्टिके मूलभूत पाँच तन्मात्रद्रव्य निर्मित होते हैं। इसके बाद
१८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पंचतन्मात्रद्रव्योंसे क्रमशः स्थूल पंचमहाभूत ( जिन्हें 'विशेष' भी कहते हैं ) और स्थूल निरिंद्रिय पदार्थ बनने लगते हैं; तथा, यथासंभव इन पदार्थोंका संयोग ग्यारह सूक्ष्म इंद्रियोंके साथ हो जानेपर सेंद्रिय सृष्टि बन जाती है ! सांख्यमतानुसार प्रकृतिसे प्रादुर्भूत होनेवाले तत्त्वोंका क्रम, जिसका वर्णन अबतक किया गया है, निम्न लिखित वंशवृक्षसे अधिक स्पष्ट हो जायगा :- ब्रह्मांडका वंशवृक्ष पुरुष $\rightarrow$ (दोनों स्वयंभू और अनादि) $\leftarrow$ प्रकृति (अव्यक्त और सूक्ष्म) (निर्गुण; पर्यायशब्द :- ज्ञ द्रष्टा, इ. ) । (सत्त्व-रज-तमोगुणी; पर्यायशब्दः-प्रधान, अव्यक्त, माया, प्रसव-धर्मिणी आदि) | महान् अथवा बुद्धि ( व्यक्त और सूक्ष्म ) (पर्यायशब्द :- आसुरी, मति, ज्ञान ख्याति इ.) | अहंकार (व्यक्त और सूक्ष्म) (पर्यायशब्द :- अभिमान, तैजस आदि ) |
(सात्त्विक सृष्टि अर्थात् व्यक्त और सूक्ष्म इंद्रियाँ) (तामस अर्थात् निरिंद्रिय सृष्टि | | पाँच बुद्धीन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन, पंचतन्मात्राएँ (सूक्ष्म) विशेष या पंचमहाभूत (स्थूल) [दाहिनी ओर: ] अठारह तत्त्वोंका लिंगशरीर (सूक्ष्म) स्थूल पंचमहाभूत और पुरुषको मिलाकर कुल तत्त्वोंकी संख्या पचीस है। इनमेंसे महान् अथवा बुद्धिके बादके तेईस गुण मूलप्रकृतिके विकार हैं। किंतु उनमेंभी यह भेद है, कि सूक्ष्मतन्मात्राएँ और पाँच स्थूल महाभूत द्रव्यात्मक विकार हैं, और बुद्धि, अहंकार तथा इंद्रियाँ केवल शक्तियाँ या गुण हैं। ये तेईस तत्त्व व्यक्त हैं तो मूल प्रकृति अव्यक्त है। सांख्योंने इन तेईस तत्त्वोंमेंसे आकाशतत्त्वहीमें दिक् और काल- कोभी संमिलित कर दिया है। वे 'प्राण'को भिन्न तत्त्व नहीं मानते; किंतु जब जब इंद्रियोंके व्यापार आरंभ होने लगते हैं, तब उसीको वे प्राण कहते हैं (सां. का. २९)। परंतु वेदांतियोंको यह मत मान्य नहीं है। उन्होंने प्राणको स्वतंत्र तत्त्व माना है ( वे. सू. २. ४. ९ )। यह पहलेही बतलाया जा चुका है, कि वेदान्ती लोग प्रकृति पुरुषको स्वयंभू और स्वतंत्र नहीं मानते, जैसे कि सांख्यमतानुयायी मानते हैं; किंतु और उनका कथन है, कि ये दोनों ( प्रकृति और पुरुष ) एकही परमेश्वरकी दो विभूतियाँ हैं। सांख्य और वेदान्तके उक्त भेदोंको छोड़कर शेष सृष्ट्युत्पत्ति क्रम दोनों पक्षोंको ग्राह्य है। उदाहरणार्थ, महाभारतकी अनुगीतामें 'ब्रह्मवृक्ष' अथवा
'ब्रह्मवन'का जो दो बार वर्णन किया गया है ( मभा. अश्व. ३५. २०-२३ और ४७ १२-१५ ) वह सांख्यतत्त्वोंके अनुसारही है :- अव्यक्तबीजप्रभवो बुद्धिस्कन्धमयो महान् । महाहंकारविटपः इंद्रियान्तरकोटरः ॥ महाभूतविशाखश्च विशेषप्रतिशाखवान् । सदापर्णः सदापुष्पः शुभाशुभफलोदयः । आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः । एवं छित्त्वा च भित्त्वा च तत्त्वज्ञानासिना बुधः ॥ हित्वा संगमयान् पाशान् मृत्युजन्मजरोदयान् । निर्ममो निरहंकारो मुच्यते नात्र संशयः ॥ अर्थात् “ अव्यक्त (प्रकृति) जिसका बीज है, बुद्धि (महान्) जिसका तना या पिड़ है, अहंकार जिसका प्रधान पल्लव है, मन और दस इंद्रियाँ जिसकी अंतर्गत खोख- लियाँ या खोड़दे हैं, ( सूक्ष्म ) महाभूत ( पंचतन्मात्राएँ ) जिसकी बड़ी बड़ी शाखाएँ हैं, और विशेष अर्थात् स्थूल महाभूत जिसकी छोटी छोटी टहनियाँ हैं, इसी प्रकार सदा पत्र, पुष्प और शुभाशुभ फल धारण करनेवाला, समस्त प्राणिमात्रके लिये आधारभूत, यह सनातन बृहद् ब्रह्मवृक्ष है। ज्ञानी पुरुषको चाहिये कि वह इसे ज्ञानरूपी तलवारसे काट कर टूक टूक कर डाले; जन्म, जरा और मृत्यु उत्पन्न करनेवाले संगमय पाशोंको नष्ट करे और ममत्वबुद्धि तथा अहंकारका त्याग कर दे; तब वह निःसंशय मुक्त होता है।” संक्षेपमें, यही ब्रह्मवृक्ष प्रकृति अथवा मायाका 'खेल' 'जाला' या 'पसार' है। अत्यंत प्राचीन कालहीसे - ऋग्वेदकालहीसे - इसे 'वृक्ष' कहनेकी रीति पड़ गई है; और उपनिषदोंमेंभी इसको 'सनातन अश्वत्थ- वृक्ष' कहा है ( कठ. ६. १) । परंतु वेदोंमें इसका सिर्फ यही वर्णन किया गया है, कि इस वृक्षका मूल ( परब्रह्म ) ऊपर है; और शाखाएँ ( दृश्य-सृष्टिका फैलाव ) नीचे हैं। इस वैदिक वर्णनको और सांख्योंके तत्त्वोंको मिलाकर गीतामें अश्वत्थ वृक्षका वर्णन किया गया है। इसका स्पष्टीकरण हमने गीताके (गीता १५. १-२) श्लोकोंकी अपनी टीकामें कर दिया है। ऊपर ( वृक्षरूपसे ) बतलाये गये पचीस तत्त्वोंका वर्गीकरण सांख्य और वेदान्ती भिन्न भिन्न रीतिसे किया करते हैं। अतएव यहाँपर उस वर्गीकरणके विषयमें कुछ लिखना चाहिये। सांख्योंका यह कथन है, कि इन पचीस तत्त्वोंके चार वर्ग होते हैं-अर्थात् मूल प्रकृति प्रकृति-विकृति, विकृति और न-प्रकृति न-विकृति (१) प्रकृति- तत्त्व किसी दूसरेसे उत्पन्न नहीं हुआ है; अतएव उसे 'मूल प्रकृति' कहते हैं। मूल प्रकृतिसे आगे बढ़नेपर जब हम दूसरी सीढ़ीपर आते हैं, तब 'महान्' तत्त्वका पता लगता है। यह महान् तत्त्व प्रकृतिसे उत्पन्न हुआ है; इसलिये वह “प्रकृतिकी विकृति
१८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र या विकार" है। और इसके बाद महान् तत्त्वसे अहंकार निकला है; अतएव 'महान्' अहंकारकी प्रकृति अथवा मूल है। इस प्रकार महान् अथवा बुद्धि एक ओरसे अहंकारकी प्रकृति या मूल है और दूसरी ओरसे वह मूलप्रकृतिकी विकृति अथवा विकार है। इसीलिये सांख्योंने उसे 'प्रकृति-विकृति' नामक वर्गमें रखा; और इसी न्यायके अनुसार अहंकार तथा पंचतन्मात्राओंका समावेशभी 'प्रकृति-विकृति' वर्गहीमें किया जाता है। जो तत्त्व अथवा गुण स्वयं दूसरेसे उत्पन्न (विकृति) हो, और आगे वही स्वयं अन्य तत्त्वोंका मूलभूत (प्रकृति) हो जावे, उसे 'प्रकृति-विकृति' कहते हैं। इस वर्गके ये सात तत्त्व हैं :- महान् अहंकार और पंचतन्मात्राएं। (३) परंतु पाँच ज्ञानेंद्रियां, पाँच कर्मेंद्रियाँ, मन और स्थूल पंचमहाभूत, इन सोलह तत्त्वोंसे बादमें और अन्य तत्त्वोंकी उत्पत्ति नहीं हुई। किंतु ये स्वयं दूसरे तत्त्वोंसे प्रादुर्भूत हुए हैं। अतएव इन सोलह तत्त्वोंको 'प्रकृति-विकृति' न कह कर केवल 'विकृति' अथवा विकार कहते हैं। (४) 'पुरुष' न प्रकृति है; और न विकृति। वह स्वतंत्र और उदासीन द्रष्टा है। ईश्वरकृष्णने इस प्रकार वर्गीकरण करके फिर उसका स्पष्टी- करण यों किया है :- मूलप्रकृतिरविकृतिः महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥ अर्थात् "यह मूलप्रकृति अविकृति है - अर्थात् किसीकाभी विकार नहीं है; महदादि सात (अर्थात् महत्, अहंकार और पंचतन्मात्राएं) तत्त्व प्रकृति-विकृति हैं; और मनसहित ग्यारह इंद्रियाँ तथा स्थूल पंचमहाभूत मिलकर सोलह तत्त्वोंको केवल विकृति अथवा विकार कहते हैं। पुरुष न प्रकृति है न विकृति" (सां. का. ३)। आगे इन्हीं पचीस तत्त्वोंके और तीन भेद किये गये हैं - अव्यक्त, व्यक्त और ज्ञ। इनमेंसे केवल एक मूलप्रकृतिही अव्यक्त है; प्रकृतिसे उत्पन्न हुए तेईस तत्त्व व्यक्त हैं, और पुरुष 'ज्ञ' है। ये हुए सांख्योंके वर्गीकरणके भेद। पुराण, स्मृति, महाभारत आदि वैदिकमार्गीय ग्रंथोंमें प्रायः इन्हीं पचीस तत्त्वोंका उल्लेख पाया जाता है (मैत्र्यु. ६. १०; मनु. १. १४. १५)। परंतु, उपनिषदोंमें वर्णन किया गया है, कि ये सब तत्त्व परब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं और वहां इनका विशेष विवेचन या वर्गीकरणभी नहीं किया गया है। उपनिषदोंके बाद जो ग्रंथ हुए हैं, उनमें इनका वर्गीकरण किया हुआ दीख पड़ता है; परंतु वह उपर्युक्त सांख्योंके वर्गीकरणसे भिन्न है। कुल तत्त्व पचीस हैं। इनमेंसे सोलह तत्त्व तो सांख्यमतके अनुसारभी विकार अर्थात् दूसरे तत्त्वोंसे उत्पन्न हुए हैं। इस कारण उन्हें प्रकृतिमें अथवा मूलभूत पदार्थोंके वर्गमें संमिलित नहीं कर सकते। अब ये नौ तत्त्व शेष रहे - १ पुरुष, २ प्रकृति, ३-९ महत्, अहंकार, और पाँच तन्मात्राएं। इनमेंसे पुरुष और प्रकृतिको छोड़ शेष सात तत्त्वोंको सांख्योंने प्रकृति-विकृति कहा है। परंतु वेदान्तशास्त्रमें प्रकृतिको स्वतंत्र न मानकर यह सिद्धान्त निश्चित किया है, कि पुरुष और प्रकृति दोनों एकही परमेश्वरसे उत्पन्न होते हैं।
विश्वकी रचना और संहार १८३ इस सिद्धान्तको मान लेनेसे, सांख्योंके 'मूल-प्रकृति' और 'प्रकृति-विकृति' भेदोंके लिये स्थानही नहीं रह जाता । क्योंकि प्रकृतिभी परमेश्वरसे उत्पन्न होनेके कारण मूल नहीं कही जा सकती; किंतु वह प्रकृति-विकृतिकेही वर्गमें शामिल हो जाती है । अत- एव सृष्ट्युत्पत्तिका वर्णन करते समय वेदान्ती कहा करते हैं; कि एक परमेश्वरहीसे एक ओर जीव निर्माण हुआ; दूसरी ओर ( महदादि सात प्रकृति-विकृतिसहित ) अष्टधा अर्थात् आठ प्रकारकी प्रकृति निर्मित हुई (मभा. शां. ३०६. २९ और ३१०. १०) । अर्थात् , वेदान्तियोंके मतसे पचीस तत्त्वोंमेंसे सोलह तत्त्वोंको छोड़ शेष नौ तत्त्वोंके केवल दोही वर्ग किये जाते हैं - एक 'जीव' और 'दूसरा' ' अष्टधा प्रकृति' । भगवद्गीतामें वेदान्तियोंका यह वर्गीकरण स्वीकृत किया गया है । परंतु इसमेंभी अंतमें थोड़ासा फ़र्क हो गया है । सांख्यवादी जिसे पुरुष कहते हैं, उसेही गीतामें जीव कहा है; और यह बतलाया है, कि वह (जीव) ईश्वरकी 'परा प्रकृति' अर्थात् श्रेष्ठ स्वरूप है; और सांख्यवादी जिसे मूलप्रकृति कहते हैं, उसेही गीतामें परमेश्वरका 'अपर' अर्थात् कनिष्ठ स्वरूप कहा गया है (गीता ७. ४-५) इस प्रकार पहले दो बड़े वर्ग कर लेनेपर उनमेंसे दूसरे वर्गके अर्थात् कनिष्ठ स्वरूपके जब औरभी भेद या प्रकार बतलाने पड़ते हैं, तब इस कनिष्ठ स्वरूपके अतिरिक्त उससे उपजे हुए शेष तत्त्वों कोभी बतलाना आवश्यक होता है । क्यों कि यह कनिष्ठ स्वरूप (अर्थात् सांख्योंकी मूलप्रकृति) स्वयं अपनाही एक प्रकार या भेद हो नहीं सकता । उदाहरणार्थ, जब यह बतलाना पड़ता है, कि बापके लड़के कितने हैं; तब उन लड़कोंमेंही बापकी गणना नहीं की जा सकती । अतएव परमेश्वरके कनिष्ठ स्वरूपके अन्य भेदोंको बतलाते समय कहना पड़ता है, कि वेदान्तियोंकी अष्टधा प्रकृतिमेंसे मूलप्रकृतिको छोड़ शेष सात तत्त्वही ( अर्थात् महान्, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ ) उस मूलप्रकृतिके भेद या प्रकार हैं । परंतु ऐसा करनेसे कहना पड़ेगा, कि परमेश्वरका कनिष्ठ स्वरूप ( अर्थात् मूल प्रकृति ) सात प्रकारका है; और ऊपर कह आये हैं, कि वेदान्ती तो प्रकृति अष्टधा अर्थात् आठ प्रकारकी मानते हैं । अब इस स्थानपर यह विरोध दीख पड़ता है, कि जिस प्रकृतिको वेदान्ती अष्टधा या आठ प्रकारकी कहें, उसीको गीता सप्तधा या सात प्रकारकी कहे । परंतु गीताकारको अभीष्ट था, कि उक्त विरोध तो दूर हो जावे; और ' अष्टधा प्रकृति 'का वर्णन बना रहे । इसीलिये महान्, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ इन सातोंमेंही आठवें मनतत्त्वको संमिलित करके गीतामें वर्णन किया गया है, कि परमेश्वरका कनिष्ठ स्वरूप अर्थात् मूल प्रकृति अष्टधा है । ( गीता ७.५ ) इनमेंसे केवल मनहीमें दस इंद्रियों और पंचतन्मात्राओंमें पंचमहाभूतोंका समावेश किया गया है । अब यह प्रतीत हो जायगा, कि गीतामें किया गया वर्गीकरण सांख्यों और वेदान्तियोंके वर्गीकरणसे यद्यपि कुछ भिन्न है, तथापि इससे कुल तत्त्वोंकी संख्यामें कुछ न्यूनाधिकता नहीं हो जाती । सब जगह तत्त्व पचीसही
१८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र माने गये हैं। परंतु वर्गीकरणकी उक्त भिन्नताके कारण किसीके मनमें कुछ भ्रम न हो जाय, इसलिये ये तीनों वर्गीकरण कोष्टकके रूपमें एकत्र करके आगे दिये गये हैं। गीताके तेरहवें अध्याय (गीता १३.५) में वर्गीकरणके झगड़ेमें न पड़ कर, सांख्योंके पचीस तत्त्वोंका वर्णन ज्यों-का-त्यों पृथक् पृथक् किया गया है; और इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि चाहे वर्गीकरणमें कुछ भिन्नता हो; तथापि तत्त्वोंकी संख्या दोनों स्थानोंपर बराबरही है। पचीस मूलतत्त्वोंका वर्गीकरण सांख्योंका वर्गीकरण । तत्त्व । वेदान्तियोंका वर्गीकरण । गीताका वर्गीकरण न-प्रकृति न-विकृति १ पुरुष परब्रह्मका श्रेष्ठ स्वरूप परा प्रकृति मूल प्रकृति १ प्रकृति \ अपरा प्रकृति १ महान् परब्रह्मका कनिष्ठ } अपरा प्रकृतिके ७ प्रकृति-विकृति १ अहंकार स्वरूप } आठ प्रकार ५ तन्मात्राएँ (आठ प्रकारका) / १ मन \ विकार होनेके कारण \ विकार होनेके ५ बुद्धींद्रियाँ } इन सोलह तत्त्वोंको | कारण गीतामें इन १६ विकार ५ कर्मेंद्रियाँ } वेदान्ती मूल तत्त्व | पंद्रह तत्त्वोंकी ५ महाभूत / नहीं मानते। | गणना मूल तत्त्वोंमें २५ / नहीं की गई है। यहाँतक इस बातका विवेचन हो चुका, कि पहले मूलसाम्यावस्थामें रहने- वाली एकरूप अवयवरहित अव्यक्त जड़ प्रकृतिमें व्यक्तसृष्टि उत्पन्न करनेकी अस्वयंवेद्य 'बुद्धि' कैसे प्रकट हुई; फिर उसमें 'अहंकार'से अवयवसहित विविध समता कैसे उपजी; और इसके बाद 'गुणोंसे गुण' इस गुणपरिणामवादके अनुसार एक ओर सात्त्विक (अर्थात् सेंद्रिय) सृष्टिकी मूलभूत ग्यारह सूक्ष्म इंद्रियाँ तथा दूसरी ओर तामस (अर्थात् निरिंद्रिय) सृष्टिकी मूलभूत पांच सूक्ष्मतन्मात्राएँ कैसे निर्मित हुई। अब इसके बादकी सृष्टि (अर्थात् स्थूल पंचमहाभूतों या उनसे उत्पन्न होनेवाले अन्य जड़ पदार्थोंकी) उत्पत्तिके क्रमका वर्णन किया जावेगा। सांख्यशास्त्रमें सिर्फ़ यही कहा है, कि सूक्ष्मतन्मात्राओंसे 'स्थूल पंचमहाभूत' अथवा 'विशेष', गुणपरिणामके कारण, उत्पन्न हुए हैं। परंतु वेदान्तशास्त्रके ग्रंथोंमें इस विषयका अधिक विवेचन किया गया है; इसलिये प्रसंगानुसार उसकाभी संक्षिप्त वर्णन - इस सूचनाके साथ, कि यह वेदान्तशास्त्रका मत है, सांख्योंका नहीं
- यहाँ कह देना आवश्यक जान पड़ता है। "स्थूल पृथ्वी, पानी, तेज, वायु और आकाश" को पंचमहाभूत अथवा विशेष कहते हैं। इनका उत्पत्तिक्रम तैत्तिरी- योपनिषद्में इस प्रकार है :- "आत्मनः आकाशः संभूतः । आकाशाद्वायुः । बायो- रग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । पृथिव्या ओषधयः ।" इत्यादि (तै. उ. २. १)-
विश्वकी रचना और संहार १८५ अर्थात् पहले परमात्मासे (मूलजड़ प्रकृतिसे नहीं; जैसा कि सांख्यवादियोंका कथन है) आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे पानी और फिर पानीसे पृथ्वी उत्पन्न हुई है। तैत्तिरीयोपनिषद्में यह नहीं बतलाया गया, कि इस क्रमका कारण क्या है। परंतु प्रतीत होता है, कि उत्तर-वेदान्तग्रंथोंमें पंचमहाभूतोंके उत्पत्तिक्रमके कारणोंका विचार सांख्यशास्त्रोक्त गुणपरिणामके तत्त्वपरही किया गया है। इन उत्तर-वेदान्तियोंका यह कथन है, कि "गुणा गुणेषु वर्तन्ते" इस न्यायसे पहले एकही गुणका पदार्थ उत्पन्न हुआ। उससे दो गुणोंके और फिर तीन गुणोंके पदार्थ उत्पन्न हुए - इसी प्रकार वृद्धि होती गई। पंचमहाभूतोंमेंसे आकाशका केवल शब्दही एक गुण मुख्य है, इसलिये पहले आकाश उत्पन्न हुआ। इसके बाद वायुकी उत्पत्ति हुई, क्योंकि उसमें शब्द और स्पर्श दो गुण है। जब वायु जोरसे चलती है, तब उसकी आवाज सुन पड़ती है; और हमारी स्पर्शेंद्रियकोभी उसका ज्ञान होता है। वायुके बाद अग्निकी उत्पत्ति होती है। क्योंकि शब्द और स्पर्शके अतिरिक्त उसमें तीसरा गुण रूप है। इन तीनों गुणोंके साथही साथ पानीमें चौथा गुण रुचि या रस होता है। इसलिये उसका प्रादुर्भाव अग्निसेही होना चाहिये। और अंतमें, इन चारों गुणोंकी अपेक्षा पृथ्वीमें 'गंध' नामक विशेष गुण होनेसे यह सिद्धान्त किया गया है, कि पानीसे बादमें पृथ्वी उत्पन्न हुई है। यास्काचार्यका यही सिद्धान्त है (निरुक्त १४.४)। तैत्तिरीयोपनिषद्में आगे चल कर कहा गया है, कि उक्त क्रमसे स्थूल पंचमहाभूतोंकी उत्पत्ति हो चुकनेपर फिर - "पृथिव्या ओषधयः। ओषधिभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुषः।" पृथ्वीसे वनस्पति, वन- स्पतिसे अन्न और अन्नसे पुरुष उत्पन्न हुआ (तै. २.१)। यह सृष्टि पंचमहा- भूतोंके मिश्रणसे बनती है, इसलिये इस मिश्रणक्रियाको वेदान्तग्रंथोंमें 'पंचीकरण' कहते हैं। पंचीकरणका अर्थ "पंचमहाभूतोंमेंसे प्रत्येकका न्यूनाधिक भाग ले कर उन सबके मिश्रणसे किसी नये पदार्थका बनना" है। अतः यह पंचीकरण, स्वभा- वतः अनेक प्रकारका सकता है। श्रीसमर्थ रामदासस्वामीने अपने 'दासबोध'के नौवें तथा ग्यारहवें दशकमें जो वर्णन किया है, वहभी इसी बातको सिद्ध करता है। देखिये : "काला और सफ़ेद मिलानेसे नीला बनता है, और काला और पीला मिलानेसे हरा बनता है" (दा. ९.६.४०)। पृथ्वीमें अनंत कोटि बीजोंकी जातियां होती हैं। पृथ्वी और पानीका मेल होनेपर उन बीजोंसे अंकुर निकलते हैं। अनेक प्रकारकी बेलें होती हैं, पत्र-पुष्प होते हैं, और अनेक प्रकारके स्वादिष्ट फल होते हैं।... अण्डज, जरायुज, स्वेदज, उद्भिज, सबका बीज पृथ्वी और पानी है। यही सृष्टिरचनाका अद्भुत चमत्कार है। इस प्रकार चार खानियां, चार वाणियां, चौरासी लाख* जीवयोनियां, तीन लोक, पिंड, ब्रह्मांड सब निर्मित
- यह बात स्पष्ट है, कि चौरासी लाख योनियोंकी कल्पना पौराणिक है, और वह अंदाज़से की गई है। तथापि, वह निरी निराधारभी नहीं है। उत्क्रांति-
१८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र हुए हैं। (दा. १३. ३. १०-१५) परंतु पंचीकरणसे केवल जड़ पदार्थ अथवा जड़ शरीरही उत्पन्न होते हैं। ध्यान रहे, कि जब इस जड़ देहका संयोग प्रथम सूक्ष्म इंद्रियोंसे और फिर आत्मासे अर्थात् पुरुषसे होता है, तभी इस जड़ देहसे सचेतन प्राणी हो सकता है। यहाँ यहभी बतला देना चाहिये, कि उत्तर वेदान्त-ग्रंथोंमें वर्णित यह पंचीकरण प्राचीन उपनिषदोंमें नहीं है। छांदोग्योपनिषदमें पाँच तन्मात्राएँ या पाँच महाभूत नहीं माने गये हैं, किंतु कहा है, कि "तेज, आप (पानी) और अन्न (पृथ्वी)" इन्हीं तीन सूक्ष्म मूलतत्त्वोंके मिश्रणसे अर्थात् 'त्रिवृत्करण'से सब विविध सृष्टि बनी है। और, श्वेताश्वतरोपनिषद्में कहा है कि, "अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां स्वरूपाः" (श्वेता. ४. ५) अर्थात् लाल (तेजोरूप), सफ़ेद (जलरूप) और काले (पृथ्वीरूप) रंगोंकी (अर्थात् तीन तत्त्वोंकी) एक अजा (बकरी) से नामरूपात्मक प्रजा (सृष्टि) उत्पन्न हुई। छांदो- ग्योपनिषद्के छठे अध्यायमें श्वेतकेतु और उसके पिताका संवाद है। संवादके आरंभ- तत्त्वके अनुसार पश्चिमी आधिभौतिकशास्त्री यह मानते हैं, कि सृष्टिके आरंभमें उपस्थित एक छोटेसे सजीव सूक्ष्म गोल जंतुसे मनुष्यप्राणी उत्पन्न हुआ। इस कल्पनासे यह बात स्पष्ट है, कि सूक्ष्म गोल जंतुका स्थूल गोल जंतु बननेमें, स्थूल जंतुका पुनश्च छोटा छोटा कीड़ा होनेमें, छोटे कीड़ेके बाद उसका अन्य प्राणी होनेमें, प्रत्येक योनि अर्थात् जातिकी अनेक पीढ़ियाँ बीत गई होंगी। इससे एक आंग्ल जीवशास्त्रज्ञने गणितके द्वारा सिद्ध किया है, कि पानीमें रहनेवाली छोटी छोटी मछलियोंके गुण- धर्मोंका विकास होते होते उन्हींको अंतमें मनुष्यस्वरूप प्राप्त होनेमें, भिन्न भिन्न जाति- योंकी लगभग ५३ लाख ७५ हज़ार पीढ़ियाँ बीत चुकी हों; और संभव है, कि इन पीढ़ियोंकी संख्या कदाचित इसमे दस गुणाभी हो। ये हुई पानीमें रहनेवाले जल- चरोंसे लेकर मनुष्यतककी योनियाँ। अब यदि इनमेंही छोटे जलचरोंसे पहलेके सूक्ष्म जंतुओंका समावेश कर दिया जाय तो न मालूम और कितनी लाख पीढ़ियोंकी कल्पना करनी होगी। इससे मालूम हो जायगा, कि हमारे पुराणोंमें वर्णित चौरासी लाख योनियोंकी कल्पना की अपेक्षा आधिभौतिक शास्त्रज्ञोंके पुराणोंमें वर्णित पीढ़ी- यांकी कल्पना कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी है। कल्पनासंबंधी यह न्यायकाल (समय) कोभी उपयुक्त हो सकता है। भूगर्भगतजीव-शास्त्रज्ञोंका कथन है, कि इस बातका स्थूल दृष्टिसे निश्चय नहीं किया जा सकता कि, सजीवसृष्टिके सूक्ष्म जंतु इस पृथ्वीपर कब उत्पन्न हुए। और सूक्ष्म जलचरोंकी उत्पत्ति तो कई करोड़ वर्षोंके पहले हुई है। इस विषयका विवेचन The Last Link by Ernst Haeckel, with notes, etc. by Dr. H. Gadow (1898) नामक पुस्तकमें किया गया है। डॉक्टर गेडोने इस पुस्तकमें जो दो-तीन उपयोगी परिशिष्ट जोड़ें हैं, उनसेही उपर्युक्त बातें ली गई हैं। हमारे पुराणोंमें चौरासी योनियोंकी गिनती इस प्रकार की गई है- ९ लाख जलचर, १० लाख पक्षी, ११ लाख कृमि, २० लाख पशु, ३० लाख स्थावर और ४ लाख मनुष्य (दासबोध २०. ६)।
हीमें श्वेतकेतुके पिताने उससे स्पष्ट कह दिया है, कि "अरे, इस जगत्के आरंभमें 'एकमेवाद्वितीय सत्' के अतिरिक्त - अर्थात् जहाँ तहाँ रूप सब एक जगह और नित्य परब्रह्मके अतिरिक्त और कुछभी नहीं था। जो असत् (अर्थात्-हैही नहीं) उससे सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है? अतएव, आदिमें सर्वत्र सत्ही व्याप्त था। इसके बाद उसे अनेक अर्थात् विविध रूप होनेकी इच्छा हुई। और उससे क्रमशः सूक्ष्म तेज (अग्नि), आप (पानी) और अन्न (पृथ्वी) की उत्पत्ति हुई। पश्चात् इन तीन तत्त्वोंमेंही जीवरूपसे परब्रह्मका प्रवेश होनेपर उनके त्रिवृत्करणसे जगतकी अनेक नामरूपात्मक वस्तुएँ निर्मित हुईं। स्थूल अग्नि, सूर्य या विद्युल्लताकी ज्योतिमें, जो लाल (लोहित) रंग है, वह सूक्ष्म तेजोरूपी मूलतत्त्वका परिणाम है, जो सफ़ेद (शुक्ल) रंग है, वह सूक्ष्म आप-तत्त्वका परिणाम है; और जो काला (कृष्ण) रंग है, वह सूक्ष्म पृथ्वी-तत्त्वका परिणाम है। इसी प्रकार मनुष्य जिस अन्नका सेवन करता है, उसमेंभी सूक्ष्म तेज, सूक्ष्म आप और सूक्ष्म अन्न (पृथ्वी) येही तीन तत्त्व होते हैं। जैसे दहीको मथनेसे मक्खन ऊपर आ जाता है, वैसे ही उक्त तीन सूक्ष्म तत्त्वोंसे बना हुआ अन्न जब पेटमें जाता है, तब उसमेंसे तेज-तत्त्वके कारण मनुष्यके शरीरमें स्थूल, मध्यम और सूक्ष्म परिणाम - जिन्हें क्रमशः अस्थि, मज्जा, और वाणी कहते हैं - उत्पन्न हुआ करते हैं। इसी प्रकार आप अर्थात् जलतत्त्वसे मूत्र, रक्त और प्राण; तथा अन्न अर्थात् पृथ्वी-तत्त्वसे पुरीष, माँस और मन ये तीन द्रव्य निर्मित होते हैं, (छां. ६. २-६। छांदोग्योपनिषदकी यही पद्धति वेदान्तसूत्रोंमें (वे. सू. २. ४. २०) भी कही गई है, कि मूल महाभूतोंकी संख्या पाँच नहीं, केवल तीनही है; और उनके त्रिवृत्करणसे सब दृश्य पदार्थोंकी उत्पत्तिभी मालूम की जा सकती है। परंतु बादरायणाचार्य तो पंचीकरणका नाम तक नहीं लेते। तथापि तैत्तिरीय (२. १), प्रश्न (४. ८), बृहदारण्यक (४. ४. ५) आदि अन्य उप- निषदोंमें, और विशेषतः श्वेताश्वतर (२. १२), वेदान्तसूत्र (२२. ३. १-१४) तथा गीता (७. ४; १३. ५) मेंभी तीनके बदले पाँच महाभूतोंका वर्णन है। गर्भोपनिषदके आरंभहीमें कहा है, कि मनुष्य देह 'पंचात्मक' है; और महाभारत तथा पुराणोंमें तो पंचीकरणका वर्णन स्पष्ट तया किया गया है (महा. शां. १८४- १८६)। इससे यही सिद्ध होता है, कि यद्यपि त्रिवृत्करण प्राचीन है, तथापि जड़ महाभूतोंकी संख्या तीनके बदले पाँच मानी जाने लगी, तब त्रिवृत्करणके उदा- हरणहीसे पंचीकरणकी कल्पनाका प्रादुर्भाव हुआ; और त्रिवृत्करण पीछे रह गया। एवं अंतमें पंचीकरणकी कल्पना सब वेदान्तियोंको ग्राह्य हो गई। आगे चल कर इसी पंचीकरण शब्दके अर्थमें यह बातभी शामिल हो गई, कि मनुष्यका शरीर केवल पंचमहाभूतोंसे ही नहीं बना है; किंतु उन पंचमहाभूतोंमेंसे हर एक पाँच प्रकारसे शरीरमें विभाजितभी हो गया है। उदाहरणार्थ, त्वक्, माँस, अस्थि, मज्जा और स्नायु ये पाँच विभाग अन्नमय पृथ्वीतत्त्वके हैं,. इत्यादि (महा. शां. १८४.
१८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
२०-२५; और दासबोध १७. ८)। प्रतीत होता है, कि यह कल्पनाभी उपर्युक्त छांदोग्योपनिषदके त्रिवृत्करणके वर्णनसे सूझ पड़ी है। क्योंकि वहाँभी अंतिम वर्णन यही है, कि “तेज, आप और पृथ्वी” इन तीनोंमेंसे प्रत्येक, तीन-तीन प्रकारसे मनुष्यकी देहमें पाया जाता है। इस बातका विवेचन हो चुका, कि मूल अव्यक्त प्रकृतिसे अथवा वेदान्त- सिद्धान्तके अनुसार परब्रह्मसे अनेक नाम और रूप धारण करनेवाले सृष्टिके अचेतन अर्थात् निर्जीव या जड़ पदार्थ कैसे बने हैं। अब इसका विचार करना चाहिये, कि सृष्टिके सचेतन अर्थात् सजीव प्राणियोंकी उत्पत्तिके संबंधमें सांख्यशास्त्रका विशेष कथन क्या है, और फिर यह देखना चाहिये, कि वेदान्तशास्त्रके सिद्धान्तोंसे उसका कहाँतक मेल है। जब मूलप्रकृतिसे प्रादुर्भूत पृथ्वी आदि स्थूल पंचमहाभूतोंका संयोग सूक्ष्म इंद्रियोंके साथ होता है, तब उससे सजीव प्राणियोंका शरीर बनता है। परंतु यद्यपि यह शरीर सेंद्रिय हो, तथापि वह जड़ही रहता है। इन इंद्रियोंको प्रेरित करनेवाला तत्त्व जड़ प्रकृतिसे भिन्न होता है, जिसे 'पुरुष' कहते हैं। सांख्योंके इन सिद्धान्तोंका वर्णन पिछले प्रकरणमें किया जा चुका है, कि यद्यपि मूलतः 'पुरुष' अकर्ता है, तथापि प्रकृतिके साथ उसका संयोग होनेपर सजीव सृष्टिका आरंभ होता है; और “मैं प्रकृतिसे भिन्न हूँ” यह ज्ञान हो जानेपर पुरुषका प्रकृतिसे संयोग छूट जाता है; तथा वह मुक्त हो जाता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो जन्म-मरणके चक्करमें उसे घूमना पड़ता है। परंतु इस बातका विवेचन तब नहीं किया गया, कि जिस 'पुरुष'की 'प्रकृति' और 'पुरुष'की भिन्नताका ज्ञान हुए बिनाही मृत्यु हो जाती है, उसके आत्मा, अर्थात् सांख्य परिभाषाके अनुसार 'पुरुष'को ये नये जन्म कैसे प्राप्त होते हैं। अतएव यहाँ उस विषयका कुछ अधिक विवेचन करना आवश्यक जान पड़ता है। यह स्पष्ट है, कि जो मनुष्य बिना ज्ञान प्राप्त कियेही मर जाता है, उसकी आत्मा प्रकृतिके चक्रसे सदाके लिये छूट नहीं सकती। क्योंकि यदि ऐसा हो, तो ज्ञान अथवा पाप-पुण्यका कुछभी महत्त्व नहीं रह जायगा। और फिर चार्वाकके मतानुसार यह कहना पड़ेगा कि मृत्युके बाद हर एक मनुष्य प्रकृतिके फंदेसे छूट जाता है — अर्थात् वह मोक्ष पा जाता है। अच्छा; यदि यह कहें, कि मृत्युके बाद केवल आत्मा अर्थात् पुरुष बच जाता है; और वही स्वयं नये नये जन्म लिया करता है, तो यह मूलभूत सिद्धान्त - कि पुरुष अकर्ता और उदासीन है, और सब कर्तृत्व प्रकृतिकाही है — मिथ्या प्रतीत होने लगता है। इसके सिवा यदि हम यह मानते हैं, कि आत्मा स्वयंही नये नये जन्म लिया करती है, तो वह उसका गुण या धर्म हो जाता है; और तब तो ऐसी अनवस्था प्राप्त हो जाती है, कि वह जन्म-मरणके आवागमनसे कभी छूटही नहीं सकता। इसलिये यह सिद्ध होता है, कि यदि बिना ज्ञान प्राप्त किये कोई मनुष्य मर जाय तोभी उसकी आत्माको नया जन्म प्राप्त करा देनेके लिये उससे प्रकृतिका
विश्वकी रचना और संहार १८९
संबंध अवश्य रहनाही चाहिये। तथापि मृत्युके बाद स्थूल देहका नाश हो जाया करता है। इसलिये यह प्रकट है, कि अब उक्त संबंध स्थूल महाभूतात्मक प्रकृतिके साथ नहीं रह सकता। परंतु यह नहीं कहा जा सकता, कि प्रकृति केवल स्थूल पंचमहाभूतोंहीसे बनी है। प्रकृतिसे कुल तेईस तत्त्व उत्पन्न होते हैं; और स्थूल पंचमहाभूत उन तेईसोंमेंसे अंतिम पाँच हैं। इन अंतिम पाँच तत्त्वों ( स्थूल पंच- महाभूतों ) को तेईस तत्त्वोंमेंसे अलग करनेपर अठारह तत्त्व शेष रहते हैं। अतएव अब यह कहना चाहिये, कि जो पुरुष बिना ज्ञान प्राप्त कियेही मर जाता है; वह यद्यपि पंचमहाभूतात्मक स्थूल-शरीरसे - अर्थात् अंतिम पाँच तत्त्वोंसे - छूट जाता है, तथापि इस प्रकारकी मृत्युसे प्रकृतिके अठारह अन्य तत्त्वोंके साथ उसका संबंध कभी छूट नहीं सकता। वे अठारह तत्त्व ये हैं :- महान्, ( बुद्धि ), अहंकार, मन, दस इंद्रियाँ और पाँच तन्मात्राएँ ( इस प्रकरणमें दिया गया ब्रह्मांडका वृक्षवंश पृष्ठ १८० )। ये सब तत्त्व सूक्ष्म हैं। अतएव इन तत्त्वोंके साथ पुरुषका संयोग स्थिर होकर जो शरीर बनता है, उसे स्थूलशरीरके विरुद्ध सूक्ष्म अथवा लिंग-शरीर कहते हैं ( सां. का. ४० )। जब कोई मनुष्य बिना ज्ञान प्राप्त कियेही मर जाता है, तब मृत्युके समय उसको आत्माके साथही प्रकृतिके उक्त अठारह तत्त्वोंसे बना हुआ यह लिंग-शरीरभी स्थूल देहसे बाहर हो जाता है। और जबतक उस पुरुषको ज्ञानकी प्राप्ति हो नहीं जाती, तबतक उस लिंगशरीरहीके कारण उसको नये नये जन्म लेने पड़ते हैं। इसपर कुछ लोगोंका यह प्रश्न है, कि मनुष्यकी मृत्युके बाद जीवके साथ साथ इस जड़ देहमें बुद्धि, अहंकार, मन और दस इंद्रियोंके व्यापारभी नष्ट होते हुए, हमें प्रत्यक्ष दीख पड़ते हैं। इस कारण लिंगशरीरमें इन तेरह तत्त्वोंका समावेश किया जाना तो उचित है; परंतु इन तेरह तत्त्वोंके साथ पाँच सूक्ष्म तन्मात्राओंकाभी समावेश लिंगशरीरमें क्यों किया जाना चाहिये ? इसपर सांख्योंका उत्तर यह है, कि ये तेरह तत्त्व-निरी बुद्धि, निरा अहंकार, मन और दस इंद्रियाँ - प्रकृतिके केवल गुण हैं। और, जिस तरह छायाको किसी-न- किसी पदार्थका - तथा चित्रको दीवार, काग़ज आदिका - आश्रय आवश्यक है; उसी तरह इन गुणात्मक तेरह तत्त्वोंकोभी एकत्र रहनेके लिये किसी द्रव्यके आश्रयकी आवश्यकता होती है। अब आत्मा ( पुरुष ) स्वयं निर्गुण और अकर्ता है; इसलिये वह स्वयं किसीभी गुणका आश्रय हो नहीं सकता। मनुष्यकी जीविता- वस्थामें उसके शरीरके स्थूल पंचमहाभूतही इन तेरह तत्त्वोंके आश्रयस्थान हुआ करते हैं - परंतु मृत्युकेबाद अर्थात् स्थूल शरीरके नष्ट हो जाने पर स्थूल पंच- महाभूतोंका यह आधार छूट जाता है। तब उस अवस्थामें इन तेरह गुणात्मक तत्त्वोंके लिये किसी अन्य द्रव्यात्मक आश्रयकी आवश्यकता होती है। यदि मूल प्रकृतिहीको आश्रय मान लें, तो वह अव्यक्त और अविकृत अवस्थामें - अर्थात् अनंत और सर्वव्यापी - होनेके कारण एक छोटेसे लिंगशरीरके अहंकार, बुद्धि आदि
१९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गुणोंका आधार नहीं हो सकती। अतएव मूलप्रकृतिकेही द्रव्यात्मक विकारोंमेसे, स्थूल पंचमहाभूतोंके बदले उनके मूलभूत पाँच सूक्ष्म तन्मात्र द्रव्योंका समावेश उपर्युक्त तेरह गुणोंके साथ-ही-साथ उनके आश्रयस्थानकी दृष्टिसे लिंगशरीरमें करना पड़ता है (सां. का. ४१)। बहुतेरे सांख्य ग्रंथकार, लिंगशरीर और स्थूल शरीरके बीच एक और तीसरे शरीर (पंचतन्मात्राओंसे बने हुए) की कल्पना करके प्रतिपादन करते हैं, कि यह तीसरा शरीर लिंगशरीरका आधार है। परंतु हमारा मत यह है, कि सांख्यकारिकाकी इकतालीसवीं आर्याका यथार्थ भाव वैसा नहीं है, पर टीकाकारोंने भ्रमसे तीसरे शरीरकी कल्पना की है। हमारे मतानुसार उस आर्याका उद्देश्य सिर्फ इस बातका कारण बतलानाही है, कि बुद्धि आदि तेरह तत्त्वोंके साथ पंचतन्मात्राओंकाभी समावेश लिंगशरीरमे क्यों किया गया। इसके अतिरिक्त अन्य कोई हेतु नही है।* कुछ विचार करनेसे प्रतीत हो जायगा, कि सूक्ष्म अठारह तत्त्वोंके सांख्योक्त लिंगशरीरमें और उपनिषदोंमें वर्णित लिंगशरीरमें विशेष भेद नही है। बृहदा- रण्यकोपनिषद्में कहा है, कि - “जिस प्रकार जोंक (जलायुका) घासके तिनकेके छोरतक पहुँचनेपर दूसरे तिनकेपर (सामनेके पैरोंसे) अपने शरीरका अग्रभाग रखती है; और फिर पहले तिनके परसे अपने शरीरके अंतिम भागको खींच लेती है; उसी प्रकार आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है” (बृ. ४. ४. ३)। परंतु केवल इस दृष्टांतसे ये दोनों अनुमान सिद्ध नहीं होते, कि निरा आत्माही दूसरे शरीरमें जाता है और वहभी एक शरीरसे छूटतेही चला जाता है। क्योंकि बृह- दारण्यकोपनिषद् (बृ. ४. ४. ६) में आगे चलकर यह वर्णन किया गया है, कि आत्माके साथ साथ पाँच (सूक्ष्म) भूत, मन, इंद्रियाँ, प्राण और धर्माधर्मभी शरीरसे बाहर निकल जाते हैं। और यहभी कहा है, कि आत्माको अपने कर्मके अनुसार भिन्न भिन्न लोक प्राप्त होते हैं, एवं वहाँ उसे कुछ कालपर्यंत निवास करना पड़ता
- भट्ट कुमारिलकृत ‘मीमांसाश्लोकवार्तिक’ ग्रंथके एक श्लोकसे (आत्म- वाद, श्लोक ६२) देखी पड़ेगा, कि उन्होंने इस आर्याका अर्थ हमारे अनुसारही किया है। वह श्लोक यह है :— अंतराभवदेहो हि नेष्यते विंध्यवासिना । तदस्तित्वे प्रमाणं हि न किंचिदवगम्यते ॥ ६२ ॥ “अंतराभव अर्थात् लिंगशरीर और स्थूलशरीरके बीचवाले शरीरसे विंध्य- वासी सहमत नहीं है। यह माननेके लिये कोई प्रमाण नहीं है, कि उक्त प्रकारका कोई शरीर है।” ईश्वरकृष्ण विंध्याचलपर रहता था; इसलिये उसको विंध्यवासी कहा है। अंतराभवशरीरको ‘गंधर्व’ भी कहते हैं (अमरकोश ३. ३. १३२.) और उसपर श्री. कृष्णाजी गोविंद ओक द्वारा प्रकाशित क्षीरस्वामीकी टीका तथा उस ग्रंथकी प्रस्तावना पृष्ठ ८ देखो।