भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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१८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

२०-२५; और दासबोध १७. ८)। प्रतीत होता है, कि यह कल्पनाभी उपर्युक्त छांदोग्योपनिषदके त्रिवृत्करणके वर्णनसे सूझ पड़ी है। क्योंकि वहाँभी अंतिम वर्णन यही है, कि “तेज, आप और पृथ्वी” इन तीनोंमेंसे प्रत्येक, तीन-तीन प्रकारसे मनुष्यकी देहमें पाया जाता है। इस बातका विवेचन हो चुका, कि मूल अव्यक्त प्रकृतिसे अथवा वेदान्त- सिद्धान्तके अनुसार परब्रह्मसे अनेक नाम और रूप धारण करनेवाले सृष्टिके अचेतन अर्थात् निर्जीव या जड़ पदार्थ कैसे बने हैं। अब इसका विचार करना चाहिये, कि सृष्टिके सचेतन अर्थात् सजीव प्राणियोंकी उत्पत्तिके संबंधमें सांख्यशास्त्रका विशेष कथन क्या है, और फिर यह देखना चाहिये, कि वेदान्तशास्त्रके सिद्धान्तोंसे उसका कहाँतक मेल है। जब मूलप्रकृतिसे प्रादुर्भूत पृथ्वी आदि स्थूल पंचमहाभूतोंका संयोग सूक्ष्म इंद्रियोंके साथ होता है, तब उससे सजीव प्राणियोंका शरीर बनता है। परंतु यद्यपि यह शरीर सेंद्रिय हो, तथापि वह जड़ही रहता है। इन इंद्रियोंको प्रेरित करनेवाला तत्त्व जड़ प्रकृतिसे भिन्न होता है, जिसे 'पुरुष' कहते हैं। सांख्योंके इन सिद्धान्तोंका वर्णन पिछले प्रकरणमें किया जा चुका है, कि यद्यपि मूलतः 'पुरुष' अकर्ता है, तथापि प्रकृतिके साथ उसका संयोग होनेपर सजीव सृष्टिका आरंभ होता है; और “मैं प्रकृतिसे भिन्न हूँ” यह ज्ञान हो जानेपर पुरुषका प्रकृतिसे संयोग छूट जाता है; तथा वह मुक्त हो जाता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो जन्म-मरणके चक्करमें उसे घूमना पड़ता है। परंतु इस बातका विवेचन तब नहीं किया गया, कि जिस 'पुरुष'की 'प्रकृति' और 'पुरुष'की भिन्नताका ज्ञान हुए बिनाही मृत्यु हो जाती है, उसके आत्मा, अर्थात् सांख्य परिभाषाके अनुसार 'पुरुष'को ये नये जन्म कैसे प्राप्त होते हैं। अतएव यहाँ उस विषयका कुछ अधिक विवेचन करना आवश्यक जान पड़ता है। यह स्पष्ट है, कि जो मनुष्य बिना ज्ञान प्राप्त कियेही मर जाता है, उसकी आत्मा प्रकृतिके चक्रसे सदाके लिये छूट नहीं सकती। क्योंकि यदि ऐसा हो, तो ज्ञान अथवा पाप-पुण्यका कुछभी महत्त्व नहीं रह जायगा। और फिर चार्वाकके मतानुसार यह कहना पड़ेगा कि मृत्युके बाद हर एक मनुष्य प्रकृतिके फंदेसे छूट जाता है — अर्थात् वह मोक्ष पा जाता है। अच्छा; यदि यह कहें, कि मृत्युके बाद केवल आत्मा अर्थात् पुरुष बच जाता है; और वही स्वयं नये नये जन्म लिया करता है, तो यह मूलभूत सिद्धान्त - कि पुरुष अकर्ता और उदासीन है, और सब कर्तृत्व प्रकृतिकाही है — मिथ्या प्रतीत होने लगता है। इसके सिवा यदि हम यह मानते हैं, कि आत्मा स्वयंही नये नये जन्म लिया करती है, तो वह उसका गुण या धर्म हो जाता है; और तब तो ऐसी अनवस्था प्राप्त हो जाती है, कि वह जन्म-मरणके आवागमनसे कभी छूटही नहीं सकता। इसलिये यह सिद्ध होता है, कि यदि बिना ज्ञान प्राप्त किये कोई मनुष्य मर जाय तोभी उसकी आत्माको नया जन्म प्राप्त करा देनेके लिये उससे प्रकृतिका