भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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विश्वकी रचना और संहार १८९

संबंध अवश्य रहनाही चाहिये। तथापि मृत्युके बाद स्थूल देहका नाश हो जाया करता है। इसलिये यह प्रकट है, कि अब उक्त संबंध स्थूल महाभूतात्मक प्रकृतिके साथ नहीं रह सकता। परंतु यह नहीं कहा जा सकता, कि प्रकृति केवल स्थूल पंचमहाभूतोंहीसे बनी है। प्रकृतिसे कुल तेईस तत्त्व उत्पन्न होते हैं; और स्थूल पंचमहाभूत उन तेईसोंमेंसे अंतिम पाँच हैं। इन अंतिम पाँच तत्त्वों ( स्थूल पंच- महाभूतों ) को तेईस तत्त्वोंमेंसे अलग करनेपर अठारह तत्त्व शेष रहते हैं। अतएव अब यह कहना चाहिये, कि जो पुरुष बिना ज्ञान प्राप्त कियेही मर जाता है; वह यद्यपि पंचमहाभूतात्मक स्थूल-शरीरसे - अर्थात् अंतिम पाँच तत्त्वोंसे - छूट जाता है, तथापि इस प्रकारकी मृत्युसे प्रकृतिके अठारह अन्य तत्त्वोंके साथ उसका संबंध कभी छूट नहीं सकता। वे अठारह तत्त्व ये हैं :- महान्, ( बुद्धि ), अहंकार, मन, दस इंद्रियाँ और पाँच तन्मात्राएँ ( इस प्रकरणमें दिया गया ब्रह्मांडका वृक्षवंश पृष्ठ १८० )। ये सब तत्त्व सूक्ष्म हैं। अतएव इन तत्त्वोंके साथ पुरुषका संयोग स्थिर होकर जो शरीर बनता है, उसे स्थूलशरीरके विरुद्ध सूक्ष्म अथवा लिंग-शरीर कहते हैं ( सां. का. ४० )। जब कोई मनुष्य बिना ज्ञान प्राप्त कियेही मर जाता है, तब मृत्युके समय उसको आत्माके साथही प्रकृतिके उक्त अठारह तत्त्वोंसे बना हुआ यह लिंग-शरीरभी स्थूल देहसे बाहर हो जाता है। और जबतक उस पुरुषको ज्ञानकी प्राप्ति हो नहीं जाती, तबतक उस लिंगशरीरहीके कारण उसको नये नये जन्म लेने पड़ते हैं। इसपर कुछ लोगोंका यह प्रश्न है, कि मनुष्यकी मृत्युके बाद जीवके साथ साथ इस जड़ देहमें बुद्धि, अहंकार, मन और दस इंद्रियोंके व्यापारभी नष्ट होते हुए, हमें प्रत्यक्ष दीख पड़ते हैं। इस कारण लिंगशरीरमें इन तेरह तत्त्वोंका समावेश किया जाना तो उचित है; परंतु इन तेरह तत्त्वोंके साथ पाँच सूक्ष्म तन्मात्राओंकाभी समावेश लिंगशरीरमें क्यों किया जाना चाहिये ? इसपर सांख्योंका उत्तर यह है, कि ये तेरह तत्त्व-निरी बुद्धि, निरा अहंकार, मन और दस इंद्रियाँ - प्रकृतिके केवल गुण हैं। और, जिस तरह छायाको किसी-न- किसी पदार्थका - तथा चित्रको दीवार, काग़ज आदिका - आश्रय आवश्यक है; उसी तरह इन गुणात्मक तेरह तत्त्वोंकोभी एकत्र रहनेके लिये किसी द्रव्यके आश्रयकी आवश्यकता होती है। अब आत्मा ( पुरुष ) स्वयं निर्गुण और अकर्ता है; इसलिये वह स्वयं किसीभी गुणका आश्रय हो नहीं सकता। मनुष्यकी जीविता- वस्थामें उसके शरीरके स्थूल पंचमहाभूतही इन तेरह तत्त्वोंके आश्रयस्थान हुआ करते हैं - परंतु मृत्युकेबाद अर्थात् स्थूल शरीरके नष्ट हो जाने पर स्थूल पंच- महाभूतोंका यह आधार छूट जाता है। तब उस अवस्थामें इन तेरह गुणात्मक तत्त्वोंके लिये किसी अन्य द्रव्यात्मक आश्रयकी आवश्यकता होती है। यदि मूल प्रकृतिहीको आश्रय मान लें, तो वह अव्यक्त और अविकृत अवस्थामें - अर्थात् अनंत और सर्वव्यापी - होनेके कारण एक छोटेसे लिंगशरीरके अहंकार, बुद्धि आदि