श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गुणोंका आधार नहीं हो सकती। अतएव मूलप्रकृतिकेही द्रव्यात्मक विकारोंमेसे, स्थूल पंचमहाभूतोंके बदले उनके मूलभूत पाँच सूक्ष्म तन्मात्र द्रव्योंका समावेश उपर्युक्त तेरह गुणोंके साथ-ही-साथ उनके आश्रयस्थानकी दृष्टिसे लिंगशरीरमें करना पड़ता है (सां. का. ४१)। बहुतेरे सांख्य ग्रंथकार, लिंगशरीर और स्थूल शरीरके बीच एक और तीसरे शरीर (पंचतन्मात्राओंसे बने हुए) की कल्पना करके प्रतिपादन करते हैं, कि यह तीसरा शरीर लिंगशरीरका आधार है। परंतु हमारा मत यह है, कि सांख्यकारिकाकी इकतालीसवीं आर्याका यथार्थ भाव वैसा नहीं है, पर टीकाकारोंने भ्रमसे तीसरे शरीरकी कल्पना की है। हमारे मतानुसार उस आर्याका उद्देश्य सिर्फ इस बातका कारण बतलानाही है, कि बुद्धि आदि तेरह तत्त्वोंके साथ पंचतन्मात्राओंकाभी समावेश लिंगशरीरमे क्यों किया गया। इसके अतिरिक्त अन्य कोई हेतु नही है।* कुछ विचार करनेसे प्रतीत हो जायगा, कि सूक्ष्म अठारह तत्त्वोंके सांख्योक्त लिंगशरीरमें और उपनिषदोंमें वर्णित लिंगशरीरमें विशेष भेद नही है। बृहदा- रण्यकोपनिषद्में कहा है, कि - “जिस प्रकार जोंक (जलायुका) घासके तिनकेके छोरतक पहुँचनेपर दूसरे तिनकेपर (सामनेके पैरोंसे) अपने शरीरका अग्रभाग रखती है; और फिर पहले तिनके परसे अपने शरीरके अंतिम भागको खींच लेती है; उसी प्रकार आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है” (बृ. ४. ४. ३)। परंतु केवल इस दृष्टांतसे ये दोनों अनुमान सिद्ध नहीं होते, कि निरा आत्माही दूसरे शरीरमें जाता है और वहभी एक शरीरसे छूटतेही चला जाता है। क्योंकि बृह- दारण्यकोपनिषद् (बृ. ४. ४. ६) में आगे चलकर यह वर्णन किया गया है, कि आत्माके साथ साथ पाँच (सूक्ष्म) भूत, मन, इंद्रियाँ, प्राण और धर्माधर्मभी शरीरसे बाहर निकल जाते हैं। और यहभी कहा है, कि आत्माको अपने कर्मके अनुसार भिन्न भिन्न लोक प्राप्त होते हैं, एवं वहाँ उसे कुछ कालपर्यंत निवास करना पड़ता
- भट्ट कुमारिलकृत ‘मीमांसाश्लोकवार्तिक’ ग्रंथके एक श्लोकसे (आत्म- वाद, श्लोक ६२) देखी पड़ेगा, कि उन्होंने इस आर्याका अर्थ हमारे अनुसारही किया है। वह श्लोक यह है :— अंतराभवदेहो हि नेष्यते विंध्यवासिना । तदस्तित्वे प्रमाणं हि न किंचिदवगम्यते ॥ ६२ ॥ “अंतराभव अर्थात् लिंगशरीर और स्थूलशरीरके बीचवाले शरीरसे विंध्य- वासी सहमत नहीं है। यह माननेके लिये कोई प्रमाण नहीं है, कि उक्त प्रकारका कोई शरीर है।” ईश्वरकृष्ण विंध्याचलपर रहता था; इसलिये उसको विंध्यवासी कहा है। अंतराभवशरीरको ‘गंधर्व’ भी कहते हैं (अमरकोश ३. ३. १३२.) और उसपर श्री. कृष्णाजी गोविंद ओक द्वारा प्रकाशित क्षीरस्वामीकी टीका तथा उस ग्रंथकी प्रस्तावना पृष्ठ ८ देखो।