श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वकी रचना और संहार १९१ है (बृ. ६. २. १४ और १५)। इसी प्रकार, छांदोग्योपनिषद्मेंभी आप (पानी) मूल तत्त्वके साथ जीवकी जिस गतिका वर्णन किया है (छांदो. ५. ३. ३; ५. ९. १), उससे और वेदान्तसूत्रोंमें उसके अर्थका जो निर्णय किया गया है (वे. सू. ३ १. १-७) उससे यह स्पष्ट हो जाता है, कि लिंग-शरीरमें - पानी, तेज और अन्न - इन तीनों मूलतत्त्वोंका समावेश किया जाना छांदोग्योपनिषदकोभी अभिप्रेत है। सारांश, यही दीख पड़ता है, कि महदादि अठारह सूक्ष्म तत्त्वोंसे बने हुए सांख्योंके 'लिंग- शरीर' मेंही प्राण और धर्माधर्म अर्थात् कर्मकोभी शामिल कर देनेसे वेदान्तमता- नुसार लिंग-शरीर हो जाता है। परंतु सांख्यशास्त्रके अनुसार प्राणका समावेश ग्यारह इंद्रियोंकी वृत्तियोंमेंही, और धर्म-अधर्मका समावेश बुद्धिंद्रियोंके व्यापारमेंही हुआ करता है। अतएव उक्त भेदके विषयमें यह कहा जा सकता है, कि वह केवल शाब्दिक है - वस्तुतः लिंगशरीरके घटकावयवके संबंधमें वेदान्त और सांख्यमतोंमें कुछभी भेद नहीं है। इसीलिये मैत्र्युपनिषद्में (मै. ६. १०) "महदादि सूक्ष्मपर्यन्त" यह सांख्योक्त लिंगशरीरका लक्षण 'महदाद्यविशेषास्तं' इस पर्यायसे ज्यों-का- त्यों रख दिया है * भगवद्गीतामें (गीता १५. ७) पहले यह बतलाकर, कि 'मनःषष्ठानीन्द्रियाणि' - मन और पाँच ज्ञानेंद्रियोंहीका सूक्ष्म शरीर होता है - आगे ऐसा वर्णन किया है, कि 'वायुर्गन्धानिवाशयात्' (गीता १५. ८) - जिस प्रकार हवा फूलोंकी सुगंध हर लेती है, उसी प्रकार जीव स्थूलशरीरका त्याग करते समय इस लिंग-शरीरको अपने साथ ले जाता है। तथापि, गीतामें जो अध्यात्मज्ञान है, वह उपनिषदोंहीमेंसे लिया गया है। इसलिये कहा जा सकता है, कि "मनसहित छः इंद्रियाँ" इन शब्दोंमेंही पांच कर्मेंद्रियाँ, पंचतन्मात्राएँ, प्राण और पाप-पुण्यका संग्रह भगवान्को अभिप्रेत है। मनुस्मृतिमेंभी (मनु. १२. १६, १७). यह वर्णन किया गया है, कि मरनेपर मनुष्यको, इस जन्ममें किये हुए पाप-पुण्यका फल भोगनेके लिये, पंचतन्मात्रात्मक सूक्ष्मशरीर प्राप्त होता है। गीताके 'वायुर्गन्धा-
- आनंदाश्रम, पूनाने प्रकाशित द्वात्रिंशदुपनिषदोंकी पोथी मैत्र्युपनिषद्में उपर्युक्त ग्रंथका "महदाद्यं विशेषान्तं" पाठ है; और उसीको टीकाकारनेभी माना है। यदि यह पाठ लिया जाय तो लिंग-शरीरमें आरंभके महत्तत्त्वका समावेश करके विशेषास्त पदसे सूचित विशेष अर्थात् पंचमहाभूतोंको ले लेना और विशेषान्त- मेंसे विशेषकों छोड़ देना चाहिये। परंतु जहाँ आद्यंतका उपयोग किया जाता है, वहाँ उन दोनोंको छोड़ना युक्त होता है। अतएव प्रो. डॉयसेनका कथन है, कि मह- दाद्यं पदके अंतिम अक्षरका अनुस्वार निकालकर 'महदाद्यविशेषान्तम्' (महदादि + अविशेषान्तम्) पाठ कर देना चाहिये। ऐसा करनेपर अविशेष पद बन जानेसे अहत् और अविशेष अर्थात् आदि और अंत दोनोंकोभी एकही न्याय पर्याप्त होगा; और लिंगशरीरमें दोनोंका समावेश किया जा सकेगा। यही इस पाठका विशेष गुण है। परंतु स्मरण रहे, कि पाठ कोईभी लिया जाय, अर्थमें भेद नहीं पड़ता।