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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

१९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गुणोंका आधार नहीं हो सकती। अतएव मूलप्रकृतिकेही द्रव्यात्मक विकारोंमेसे, स्थूल पंचमहाभूतोंके बदले उनके मूलभूत पाँच सूक्ष्म तन्मात्र द्रव्योंका समावेश उपर्युक्त तेरह गुणोंके साथ-ही-साथ उनके आश्रयस्थानकी दृष्टिसे लिंगशरीरमें करना पड़ता है (सां. का. ४१)। बहुतेरे सांख्य ग्रंथकार, लिंगशरीर और स्थूल शरीरके बीच एक और तीसरे शरीर (पंचतन्मात्राओंसे बने हुए) की कल्पना करके प्रतिपादन करते हैं, कि यह तीसरा शरीर लिंगशरीरका आधार है। परंतु हमारा मत यह है, कि सांख्यकारिकाकी इकतालीसवीं आर्याका यथार्थ भाव वैसा नहीं है, पर टीकाकारोंने भ्रमसे तीसरे शरीरकी कल्पना की है। हमारे मतानुसार उस आर्याका उद्देश्य सिर्फ इस बातका कारण बतलानाही है, कि बुद्धि आदि तेरह तत्त्वोंके साथ पंचतन्मात्राओंकाभी समावेश लिंगशरीरमे क्यों किया गया। इसके अतिरिक्त अन्य कोई हेतु नही है।* कुछ विचार करनेसे प्रतीत हो जायगा, कि सूक्ष्म अठारह तत्त्वोंके सांख्योक्त लिंगशरीरमें और उपनिषदोंमें वर्णित लिंगशरीरमें विशेष भेद नही है। बृहदा- रण्यकोपनिषद्में कहा है, कि - “जिस प्रकार जोंक (जलायुका) घासके तिनकेके छोरतक पहुँचनेपर दूसरे तिनकेपर (सामनेके पैरोंसे) अपने शरीरका अग्रभाग रखती है; और फिर पहले तिनके परसे अपने शरीरके अंतिम भागको खींच लेती है; उसी प्रकार आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है” (बृ. ४. ४. ३)। परंतु केवल इस दृष्टांतसे ये दोनों अनुमान सिद्ध नहीं होते, कि निरा आत्माही दूसरे शरीरमें जाता है और वहभी एक शरीरसे छूटतेही चला जाता है। क्योंकि बृह- दारण्यकोपनिषद् (बृ. ४. ४. ६) में आगे चलकर यह वर्णन किया गया है, कि आत्माके साथ साथ पाँच (सूक्ष्म) भूत, मन, इंद्रियाँ, प्राण और धर्माधर्मभी शरीरसे बाहर निकल जाते हैं। और यहभी कहा है, कि आत्माको अपने कर्मके अनुसार भिन्न भिन्न लोक प्राप्त होते हैं, एवं वहाँ उसे कुछ कालपर्यंत निवास करना पड़ता

  • भट्ट कुमारिलकृत ‘मीमांसाश्लोकवार्तिक’ ग्रंथके एक श्लोकसे (आत्म- वाद, श्लोक ६२) देखी पड़ेगा, कि उन्होंने इस आर्याका अर्थ हमारे अनुसारही किया है। वह श्लोक यह है :— अंतराभवदेहो हि नेष्यते विंध्यवासिना । तदस्तित्वे प्रमाणं हि न किंचिदवगम्यते ॥ ६२ ॥ “अंतराभव अर्थात् लिंगशरीर और स्थूलशरीरके बीचवाले शरीरसे विंध्य- वासी सहमत नहीं है। यह माननेके लिये कोई प्रमाण नहीं है, कि उक्त प्रकारका कोई शरीर है।” ईश्वरकृष्ण विंध्याचलपर रहता था; इसलिये उसको विंध्यवासी कहा है। अंतराभवशरीरको ‘गंधर्व’ भी कहते हैं (अमरकोश ३. ३. १३२.) और उसपर श्री. कृष्णाजी गोविंद ओक द्वारा प्रकाशित क्षीरस्वामीकी टीका तथा उस ग्रंथकी प्रस्तावना पृष्ठ ८ देखो।

विश्वकी रचना और संहार १९१ है (बृ. ६. २. १४ और १५)। इसी प्रकार, छांदोग्योपनिषद्मेंभी आप (पानी) मूल तत्त्वके साथ जीवकी जिस गतिका वर्णन किया है (छांदो. ५. ३. ३; ५. ९. १), उससे और वेदान्तसूत्रोंमें उसके अर्थका जो निर्णय किया गया है (वे. सू. ३ १. १-७) उससे यह स्पष्ट हो जाता है, कि लिंग-शरीरमें - पानी, तेज और अन्न - इन तीनों मूलतत्त्वोंका समावेश किया जाना छांदोग्योपनिषदकोभी अभिप्रेत है। सारांश, यही दीख पड़ता है, कि महदादि अठारह सूक्ष्म तत्त्वोंसे बने हुए सांख्योंके 'लिंग- शरीर' मेंही प्राण और धर्माधर्म अर्थात् कर्मकोभी शामिल कर देनेसे वेदान्तमता- नुसार लिंग-शरीर हो जाता है। परंतु सांख्यशास्त्रके अनुसार प्राणका समावेश ग्यारह इंद्रियोंकी वृत्तियोंमेंही, और धर्म-अधर्मका समावेश बुद्धिंद्रियोंके व्यापारमेंही हुआ करता है। अतएव उक्त भेदके विषयमें यह कहा जा सकता है, कि वह केवल शाब्दिक है - वस्तुतः लिंगशरीरके घटकावयवके संबंधमें वेदान्त और सांख्यमतोंमें कुछभी भेद नहीं है। इसीलिये मैत्र्युपनिषद्में (मै. ६. १०) "महदादि सूक्ष्मपर्यन्त" यह सांख्योक्त लिंगशरीरका लक्षण 'महदाद्यविशेषास्तं' इस पर्यायसे ज्यों-का- त्यों रख दिया है * भगवद्गीतामें (गीता १५. ७) पहले यह बतलाकर, कि 'मनःषष्ठानीन्द्रियाणि' - मन और पाँच ज्ञानेंद्रियोंहीका सूक्ष्म शरीर होता है - आगे ऐसा वर्णन किया है, कि 'वायुर्गन्धानिवाशयात्' (गीता १५. ८) - जिस प्रकार हवा फूलोंकी सुगंध हर लेती है, उसी प्रकार जीव स्थूलशरीरका त्याग करते समय इस लिंग-शरीरको अपने साथ ले जाता है। तथापि, गीतामें जो अध्यात्मज्ञान है, वह उपनिषदोंहीमेंसे लिया गया है। इसलिये कहा जा सकता है, कि "मनसहित छः इंद्रियाँ" इन शब्दोंमेंही पांच कर्मेंद्रियाँ, पंचतन्मात्राएँ, प्राण और पाप-पुण्यका संग्रह भगवान्को अभिप्रेत है। मनुस्मृतिमेंभी (मनु. १२. १६, १७). यह वर्णन किया गया है, कि मरनेपर मनुष्यको, इस जन्ममें किये हुए पाप-पुण्यका फल भोगनेके लिये, पंचतन्मात्रात्मक सूक्ष्मशरीर प्राप्त होता है। गीताके 'वायुर्गन्धा-

  • आनंदाश्रम, पूनाने प्रकाशित द्वात्रिंशदुपनिषदोंकी पोथी मैत्र्युपनिषद्में उपर्युक्त ग्रंथका "महदाद्यं विशेषान्तं" पाठ है; और उसीको टीकाकारनेभी माना है। यदि यह पाठ लिया जाय तो लिंग-शरीरमें आरंभके महत्तत्त्वका समावेश करके विशेषास्त पदसे सूचित विशेष अर्थात् पंचमहाभूतोंको ले लेना और विशेषान्त- मेंसे विशेषकों छोड़ देना चाहिये। परंतु जहाँ आद्यंतका उपयोग किया जाता है, वहाँ उन दोनोंको छोड़ना युक्त होता है। अतएव प्रो. डॉयसेनका कथन है, कि मह- दाद्यं पदके अंतिम अक्षरका अनुस्वार निकालकर 'महदाद्यविशेषान्तम्' (महदादि + अविशेषान्तम्) पाठ कर देना चाहिये। ऐसा करनेपर अविशेष पद बन जानेसे अहत् और अविशेष अर्थात् आदि और अंत दोनोंकोभी एकही न्याय पर्याप्त होगा; और लिंगशरीरमें दोनोंका समावेश किया जा सकेगा। यही इस पाठका विशेष गुण है। परंतु स्मरण रहे, कि पाठ कोईभी लिया जाय, अर्थमें भेद नहीं पड़ता।

१९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र 'निवाशयात्' इस दृष्टान्तसे केवल इतनाही सिद्ध होता है, कि यह शरीर सूक्ष्म है। परंतु उससे यह नहीं मालूम होता, कि उसका आकार कितना बड़ा है। महाभारतके सावित्री-उपाख्यानमें यह वर्णन पाया जाता है, कि सत्यवान्‌के (स्थूल) शरीरमेंसे अंगूठेके बराबर एक पुरुषको यमराजने बाहर निकाला - "अंगुष्ठमात्रं पुरुषं निश्चकर्ष यमो बलात्" (मभा. वन. २९७. १६) । इससे प्रतीत होता है, कि दृष्टान्तके लियेही क्यों न हो, लिंगशरीर अंगूठेके आकारका माना जाता था। इस बातका विवेचन हो चुका, कि यद्यपि लिंगशरीर हमारे नेत्रोंको गोचर नहीं है, तथापि उसका अस्तित्व किन अनुमानोंसे सिद्ध हो सकता है, और उस शरीरके घटकावयव कौनसे हैं। परंतु केवल यह कह देनाही यथेष्ट प्रतीत नहीं होता, कि प्रकृति और पाँच स्थूल महाभूतोंके अतिरिक्त शेष अठारह तत्त्वोंके समुच्चयसे लिंगशरीर निर्माण होता है। इसमें कोई संदेह नहीं, कि जहाँ जहाँ लिंग-शरीर रहेगा, वहाँ वहाँ यह अठारह तत्त्वोंका समुच्चय अपने अपने गुणधर्मके अनुसार माता-पिताके स्थूलशरीरमेंसे तथा आगे स्थूलसृष्टिके अन्नसे, हस्तपाद आदि स्थूल अवयव या स्थूल इंद्रियाँ उत्पन्न करेगा; अथवा उनका पोषण करेगा। परंतु अबतक यह बतलाना है, कि अठारह तत्त्वोंके समुच्चयसे बना हुआ लिंगशरीर पशु, पक्षी, मनुष्य आदि भिन्न भिन्न देह क्यों उत्पन्न करता है। सजीव सृष्टिके सचेतन तत्त्वको सांख्यवादी 'पुरुष' कहते हैं; और सांख्यमतानुसार ये पुरुष चाहे असंख्यभी हों; तथापि प्रत्येक पुरुष स्वभावतः उदासीन तथा अकर्ता है। इसलिये पशु-पक्षी आदि प्राणियोंके भिन्न भिन्न शरीर उत्पन्न करनेका कर्तृत्व पुरुषके हिस्सेमें नहीं आ सकता। वेदान्तशास्त्रमें कहा है, कि पापपुण्य आदि कर्मोंके परिणामसे ये भेद उत्पन्न हुआ करते हैं। इस कर्म-विपाकका विवेचन आगे चलकर किया जायगा। सांख्यशास्त्रके अनुसार कर्मको - पुरुष और प्रकृतिसे भिन्न - तीसरा तत्त्व नहीं मान सकते; और जब कि पुरुष उदासीनही है, तब कहना पड़ता है, कि कर्म प्रकृतिके सत्त्व-रज- तमोगुणोंकाही विकार है। लिंगशरीरमें जिन अठारह तत्त्वोंका समुच्चय है, उनमेंसे बुद्धितत्त्व प्रधान है। इसका कारण यह है, कि बुद्धिहीसे आगे अहंकार आदि सत्रह तत्त्व उत्पन्न होते हैं। अर्थात् जिसे वेदान्तमें कर्म कहते हैं, उसीको सांख्यशास्त्रमें सत्त्व-रज-तम गुणोंके न्यूनाधिक परिमाणसे उत्पन्न होनेवाला बुद्धिका व्यापार, धर्म या विकार कहते हैं। बुद्धिके इस धर्मका नाम 'भाव' है और सत्त्व-रज-तम गुणोंके तारतम्यसे ये 'भाव' कई प्रकारके हो जाते हैं। जिस प्रकार फूलमें गंध या कपड़ेमें रंग लिपट रहता है, उसी प्रकार लिंगशरीरमें ये भावभी लिपटे रहते हैं। (सां. का. ४०)। इन भावोंके अनुसार, अथवा वेदान्त परिभाषा में कर्मके अनुसार, लिंगशरीर नये नये जन्म लिया करता है; और ये जन्म लेते समय, माता-पिताओंके शरीरोंमेंसे जिन द्रव्योंको वह आकर्षित किया करता है, उन द्रव्योंमेंभी दूसरे भाव आ जाया करते हैं। "देवयोनि, मनुष्ययोनि, पशुयोनि तथा वृक्षयोनि" ये सब

विश्वकी रचना और संहार १९३ भेद इन भावोंकी समुच्चयताकेही परिणाम हैं (सां. का. ४३-५५) । इन सब भावोंमें सात्त्विक गुणका उत्कर्ष कारण होनेसे जब मनुष्यको ज्ञान और वैराग्यकी प्राप्ति होती है, और उसके कारण प्रकृति और पुरुषकी भिन्नता समझमें आने लगती है, तब पुरुष अपने मूलस्वरूप अर्थात् कैवल्यपदको पहुँच जाता है; और तबतक लिंगशरीर छूट जाता है। एव मनुष्यके दुःखोंका पूर्णतया निवारण हो जाता है। परंतु प्रकृति और पुरुषकी भिन्नताका ज्ञान न होते हुए, यदि केवल सात्त्विक गुणहीका उत्कर्ष हो, तो लिंगशरीर देवयोनिमें अर्थात् स्वर्गमें जन्म लेता है; रजोगुणकी प्रबलता हो, तो मनुष्ययोनिमें अर्थात् पृथ्वीपर पैदा होता है; और तमोगुणकी अधिकता हो जानेसे उसे तिर्यग्योनिमें प्रवेश करना पड़ता है (गीता १४. १८) “गुणा गुणेषु जायन्ते” इस तत्त्वकेही आधारपर सांख्यशास्त्रमें वर्णन किया गया है, कि मानवयोनिमें जन्म होनेके बाद रेत-बिंदुमें क्रमानुसार कलल, बुद्बुद, मांस, पेशी और भिन्न भिन्न स्थूल इंद्रियाँ कैसे बनती जाती हैं। (सां. का. ४३; मभा. शां. ३२०) गर्भोपनिषदका वर्णन प्रायः सांख्यशास्त्रके उक्त वर्णनके समानही है। उपर्युक्त विवेचनसे यह बात मालूम हो जायगी. कि सांख्यशास्त्रमें 'भाव' शब्दका जो पारिभाषिक अर्थ बतलाया गया है, वह यद्यपि वेदान्त-ग्रंथोंमें विवक्षित नहीं है, तथापि भगवद्गीतामें (गीता १०. ४, ५; ७. १२) “बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः” इत्यादि गुणोंको (इसके आगेके श्लोकमें) जो 'भाव' नाम दिया है, वह प्रायः सांख्यशास्त्रकी परिभाषाको सोचकरही दिया गया होगा । इस प्रकार सांख्यशास्त्रके मूल अव्यक्त प्रकृतिसे अथवा वेदान्तके अनुसार मूल सद्ब्रह्मी परब्रह्ममे सृष्टिके सब सजीव और निर्जीव व्यक्त पदार्थ क्रमशः उत्पन्न हुए । और जब सृष्टिके संहारका समय आ पहुँचता है, तब सृष्टिरचनाका जो गुणपरिणामक्रम ऊपर बतलाया गया है, ठीक इसके विरुद्ध क्रमसे सब व्यक्त पदार्थ अव्यक्त प्रकृतिमें अथवा मूल ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। यह सिद्धान्त सांख्य और वेदान्त दोनों शास्त्रोंको मान्य है (वे. सू २. ३. १४; मभा. शां. २३२) । उदाहर- णार्थ, पंचमहाभूतोंमेंसे पृथ्वीका लय पानीमे, पानीका अग्निमें, अग्निका वायुमें, वायुका आकाशमें, आकाशका तन्मात्राओंमें, तन्मात्राओंका अहंकारमें, अहंकारका बुद्धिमें, और बुद्धि या महान् का लय प्रकृतिमें हो जाता है; तथा वेदान्तके अनुसार प्रकृतिका लय मूल ब्रह्ममें हो जाता है। सांख्यकारिकामें किमीभी स्थानपर यह नही बतलाया गया है, कि सृष्टिकी उत्पत्ति या रचना हो जानेपर उसका लय या संहार होनेतक बीचमें कितना समय बीत जाता है। तथापि, ऐसा प्रतीत होता है कि मनु- संहिता (१. ६६-७३), भगवद्गीता (८. १७) तथा महाभारत (शा. २३१) में णित कालगणना सांख्योंकोभी मान्य है। हमारा उत्तरायण देवताओंका दिन है व गी. र. १३

१९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

और हमारा दक्षिणायन उनकी रात है। क्योंकि, स्मृतिग्रंथोंमें और ज्योतिषशास्त्रकी संहिता (सूर्यसिद्धान्त १. ३३; १२. ३५, ६७) मेंभी यही वर्णन है, कि देवता मेरुपर्वतपर अर्थात् उत्तरध्रुवमें रहते हैं। अर्थात् दो अयनोंका हमारा एक वर्ष देवताओंके एक दिन-रातके बराबर है; और हमारे ३६० वर्ष देवताओंके ३६० दिन-रातें अथवा एक वर्षके बराबर हैं। कृत, त्रेता, द्वापर कलि, हमारे चार युग हैं। युगोंकी कालगणना इस प्रकार है- कृतयुगमें चार हज़ार वर्ष, त्रेतायुगमें तीन हज़ार, द्वापरमें दोन हज़ार और कलिमें एक हज़ार वर्ष। परंतु एक युग समाप्त होतेही दूसरा युग एकदम आरंभ नहीं हो जाता। बीचमें, दो युगोंके संधिकालमें कुछ वर्ष बीत जाते हैं। इस प्रकार कृतयुगके आदि और अंतमें, प्रत्येक ओर चार सौ वर्षका, त्रेतायुगके आगे और पीछे प्रत्येक ओर तीन सौ वर्षका, द्वापरके पहले और बाद प्रत्येक ओर दो सौ वर्षका, और कलियुगके पूर्व तथा अनंतर प्रत्येक ओर सौ वर्षका संधिकाल होता है। सब मिलाकर चारों युगोंका आदि-अंत-सहित संधिकाल दो हज़ार वर्षका होता है। ये दो हज़ार वर्ष पहले बतलाये हुए सांख्यमतानुसार चारों युगोंके दस हज़ार वर्ष मिलाकर कुल बारह हज़ार वर्ष होते हैं। ये बारह हज़ार वर्ष मनुष्योंके है या देवताओंके ? यदि मनुष्योंके माने जायें, तो कलियुगका आरंभ हुए पाँच हज़ारसे अधिक वर्ष बीत चुकनेके कारण यह कहना पड़ेगा, कि हज़ार मानवी वर्षोंका कलियुग पूरा हो चुका है। और उसके बाद फिरसे आनेवाला कृतयुगभी समाप्त हो गया; और हमने अब त्रेतायुगमें प्रवेश किया है ! यह विरोध मिटानेके लिये पुराणोंमें निश्चित किया है, कि ये बारह हज़ार वर्ष देवताओंके हैं। देवताओंके बारह हज़ार वर्ष, मनुष्योंके ३६० × १२ ००० = ४३२०,००० (पैंतालीस लाख बीस हज़ार) वर्ष होते हैं; वर्तमान पंचांगोंका युगपरिमाण इसी पद्धतिसे निश्चित किया जाता है। देवताओंके बारह हज़ार वर्ष मिलकर मनुष्योंका एक महायुग या देवताओंका युग होता है। देवताओंके इकहत्तर युगोंको मन्वंतर कहते हैं; और ऐसे मन्वंतर चौदह हैं। परंतु पहले मन्वंतरके आरंभ तथा अंतमें, और आगे चलकर प्रत्येक मन्वंतरके आखिरमें दोनों ओर कृतयुगकी बराबरीका एक एक ऐसे १५ संधिकाल जाते हैं। ये पंद्रह संधिकाल और चौदह मन्वन्तर मिलकर देवताओंके एक हज़ार युग अथवा ब्रह्मदेवका एक दिन होता है (सूर्यसिद्धान्त १. १९-२०); और मनुस्मृति तथा महाभारतमें लिखा है, कि ऐसेही हज़ार युग मिलकर ब्रह्मदेवकी रात होती है (मनु. १. ६९-७३ और ७९; मभा. शां. २३१. १८-३१ और यास्कका निरुक्त १४. ९)। इस गणनाके अनुसार ब्रह्मदेवका एक दिन मनुष्योंके चार अब्ज बत्तीस करोड़ वर्षके बराबर होता है; और इसीका नाम है कल्प। *

  • ज्योतिःशास्त्रके आधारपर युगादि गणनाका विचार स्वर्गीय शंकर बाळकृष्ण दीक्षितने अपने 'भारतीय ज्योतिःशास्त्र' नामक (मराठी) ग्रंथमें किया है, पृ. १०३-१०५; १९३ इत्यादि देखो।

विश्वकी रचना और संहार १९५ भगवद्गीता ( १. १८ ) और ( ९. ७ ) में कहा है, कि जब ब्रह्मदेवके इस दिन अर्थात् कल्पका आरंभ होता है तब :- अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ “अव्यक्तसे सृष्टिके सब व्यक्त पदार्थ उत्पन्न होने लगते हैं; और जब ब्रह्मदेवकी रात्रि आरंभ होती है, तब वे सब व्यक्त पदार्थ पुनश्च अव्यक्तमें लीन हो जाते हैं।” स्मृतिग्रंथ और महाभारतमेंभी यही बतलाया है। इसके अतिरिक्त पुराणादिकोंमें अन्य प्रलयोंकाभी वर्णन है; परंतु इन प्रलयोंमें सूर्य-चंद्र आदि सारी सृष्टिका नाश नहीं हो जाता; इसलिये ब्रह्मांडकी उत्पत्ति और संहारका विवेचन करते समय इनका विचार नहीं किया जाता। कल्प ब्रह्मदेवका एक दिन अथवा रात्रि है; और ऐसे ३६० दिन तथा ३६० रात्रियाँ मिलकर ब्रह्मदेवका एक वर्ष होता है। इसीसे पुराणादिकों (विष्णुपुराण १. ३) में यह वर्णन पाया जाता है, कि ब्रह्मदेवकी आयु उनके सौ वर्षकी है। उसमेंसे आधी बीत गई। शेष आयुके अर्थात् इक्यावनवें वर्षके पहले दिनका अथवा श्वेतवाराह नामक कल्पका अब आरंभ हुआ है; और इस कल्पके चौदह मन्वन्तरोंमेंसे छः मन्वन्तर बीत चुके हैं, तथा सातवें (अर्थात् वैवस्वत) मन्वन्तरके ७१ महायुगोंमेंसे २७ महायुग पूरे हो गये हैं। एवं अब २८वें महायुगके कलियुगका प्रथम चरण अर्थात् चतुर्थ भाग जारी है। संवत् १९५६ (शक १८२१) में इस कलियुगके ठीक ५००० वर्ष बीत चुके थे। इस प्रकार गणित करनेसे मालूम होगा, कि इस कलियुगका प्रलय होनेके लिये संवत् १९५६में मनुष्यके ४ लाख २७ हजार वर्ष शेष थे; फिर वर्तमान मन्वन्तरके अंतमें अथवा वर्तमान कल्पके अंतमें होनेवाले महाप्रलयकी बातही क्या ! मानवी चार अब्ज बत्तीस करोड वर्षका जो ब्रह्मदेवका दिन इस समय जारी है, उसका पूरा मध्याह्नभी नही हुआ। अर्थात् सात मन्वंतरभी अबतक नहीं बीते हैं। सृष्टिकी रचना और संहारका जो अबतक विवेचन किया गया, वह वेदान्तके और परब्रह्मको छोड़ देनेसे सांख्यशास्त्रके - तत्त्वज्ञानके आधारपर किया गया है। इसलिये सृष्टिके उत्पत्तिक्रमकी इसी परंपराको हमारे शास्त्रकार सदैव प्रमाण मानते हैं; और यही क्रम भगवद्गीतामेंभी दिया हुआ है। इस प्रकरणके आरंभहीमें बतला दिया गया है, कि सृष्ट्युत्पत्तिक्रमके बारेमें कुछ भिन्न भिन्न विचार पाये जाते हैं। जैसे श्रुतिस्मृतिपुराणोंमें कही कहीं कहा है, कि प्रथम ब्रह्मदेव या हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुआ; अथवा पहले पानी उत्पन्न हुआ और उसमें परमेश्वरके बीजसे एक सुवर्णमय अंडा निर्मित हुआ। परंतु इन सब विचारोंको गौण तथा उपलक्षणात्मक समझकर जब उनकी उपपत्ति बतलानेका समय आता है तब यही कहा जाता है, कि हिरण्यगर्भ अथवा ब्रह्मदेवही प्रकृति है। भगवद्गीता (गीता १४. ३) में त्रिगुणात्मक प्रकृतिहीको ब्रह्म कहा है - “मम योनिर्महत् ब्रह्म।” और भगवानने यहभी कहा है, कि हमारे

१९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बीजसे इस प्रकृतिमें त्रिगुणोंके द्वारा अनेक मूर्तियाँ उत्पन्न होती है। अन्य स्थानोंमें ऐसा वर्णन है, कि ब्रह्मदेवसे आरंभमें दक्षप्रभृति सात मानसपुत्र अथवा सात मनु उत्पन्न हुए; और उन्होंने आगे सब चर-अचर सृष्टिका निर्माण किया। (मभा. आ. ६५-६७; मभा. शां. २०. ७; मनु. १. ३४-६३); और इसीका गीतामेंभी एक- बार उल्लेख किया गया है (गीता. १०. ६)। परंतु वेदान्तग्रंथ यह प्रतिपादन करते हैं, कि इन सब भिन्न भिन्न वर्णनोंका, ब्रह्मदेवकोही प्रकृति मान लेनेसे, उपर्युक्त तात्त्विक सृष्ट्युत्पत्तिक्रमसे मेल हो जाता है; और यही न्याय अन्य स्थानोंमेंभी उप- योगी हो सकता है। उदाहरणार्थ, शैव अथवा पाशुपत दर्शनोंमे शिवको निमित्तकारण मानकर यह कहते हैं, कि उसीसे कार्यकारणादि पाँच पदार्थ उत्पन्न हुए। और नारा- यणीय या भागवतधर्ममें वासुदेवको प्रधान मानकर यह वर्णन किया है, कि पहले वासुदेवसे संकर्षण (जीव) उत्पन्न हुआ, संकर्षणसे प्रद्युम्न (मन), और प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध (अहंकार) उत्पन्न हुआ। परंतु वेदान्तशास्त्रके अनुसार जीव प्रत्येक समय नये सिरेसे उत्पन्न नहीं होता। वह नित्य और सनातन परमेश्वरका नित्य-अतएव अनादि-अंश है। इसलिये वेदान्तसूत्रके दूसरे अध्यायके दूसरे पाद (वे. सू. २. २. ४२-४५) में भागवतधर्ममें वर्णित जीवके उत्पत्तिविषयक उपर्युक्त मतका खंडन करके कहा है, कि वह वेदविरुद्ध अतएव त्याज्य है। गीता (गीता. १३. ४; १५.७) में वेदान्तसूत्रोंके इसी सिद्धान्तका अनुवाद किया गया है। इसी प्रकार सांख्यवादी प्रकृति और पुरुष दोनोंको स्वतंत्र तत्त्व मानते हैं; परंतु इस द्वैतको स्वीकार न कर वेदान्ति- योंने यह सिद्धान्त किया है, कि प्रकृति और पुरुष-दोनों तत्त्व एकही नित्य और निर्गुण परमात्माकी विभूतियाँ हैं। यही सिद्धान्त भगवद्गीताकोभी ग्राह्य है (गीता ९. १०)। परंतु इसका विस्तारपूर्वक विवेचन अगले प्रकरणमें किया जायगा। यहाँपर केवल इतनाही बतलाया है, कि भागवत या नारायणीय धर्ममें वर्णित वासु- देवभक्तिका और प्रवृत्तिप्रधान धर्मका तत्त्व यद्यपि भगवद्गीताको मान्य है, तथापि गीता भागवतधर्मकी इस कल्पनासे सहमत नहीं है, कि पहले वासुदेवसे संकर्षण या जीव उत्पन्न हुआ; और उससे आगे प्रद्युम्न (मन) तथा प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका (अहंकार) का प्रादुर्भाव हुआ। संकर्षण, प्रद्युम्न या अनिरुद्धका नाम तक गीतामें नहीं पाया जाता। पांचरात्रमें बतलाये हुए भागवतधर्ममें और गीता-प्रतिपादित भागवतधर्ममें यही महत्त्वका भेद है। इस बातका उल्लेख यहाँ जान-बूझकर किया गया है; क्योंकि केवल इतनेहीसे-कि "भगवद्गीतामें भागवतधर्म बतलाया गया है" -कोई यह न समझ लें, कि सृष्ट्युत्पत्ति-क्रम-विषयक अथवा जीव-परमेश्वर-स्वरूप- विषयक भागवत आदि भक्तिसंप्रदायके मतभी गीताको मान्य हैं। अब इस बातका विचार किया जायगा, कि सांख्यशास्त्रोक्त प्रकृति और पुरुषकेभी परे सब व्यक्ता- व्यक्त तथा क्षराक्षर जगतके मूलमें कोई और तत्त्व है या नहीं। इसीको अध्यात्म या वेदान्त कहते हैं।

नौवाँ प्रकरण अध्यात्म परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात् सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ * — गीता ८.२० पिछले दो प्रकरणोंका सारांश यही है, कि क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचारमें जिसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं, उसीको सांख्यशास्त्रमें पुरुष कहते हैं। सब क्षर-अक्षर या चर-अचर सृष्टिके संहार और उत्पत्तिका विचार करनेपर सांख्यशास्त्रके अनुसार अंतमें केवल प्रकृति और पुरुष यही दो स्वतंत्र तथा अनादि मूलतत्त्व रह जाते हैं; और पुरुषको अपने क्लेशोंकी निवृत्ति कर लेने तथा मोक्षानंद प्राप्त कर लेनेके लिये प्रकृतिसे अपना भिन्नत्व अर्थात् कैवल्य जानकर त्रिगुणातीत होना चाहिये । प्रकृति और पुरुषका संयोग होनेपर प्रकृति अपना बाजार पुरुषके सामने किस प्रकार लगाया करती है, इस विषयका क्रम अर्वाचीन सृष्टिशास्त्रवेत्ताओंने सांख्यशास्त्रसे कुछ निराला बतलाया है; और संभव है, कि आधिभौतिक शास्त्रोंकी ज्यों ज्यों उन्नति होगी, त्यों त्यों इस क्रममें औरभी सुधार होते जावेंगे ।। जोभी हो; इस मूलसिद्धान्तमें कभी कोई फ़र्क नहीं पड़ सकता, कि केवल एक अव्यक्त प्रकृतिसेही सारे व्यक्त पदार्थ गुणोत्कर्षके अनुसार क्रमक्रमसे निर्मित होते गये हैं। परंतु वेदान्तकेसरी इस विषयको अपना नही समझता — यह अन्य शास्त्रोंका विषय है; इसलिये वह इस विषयपर वादविवादभी नहीं करता । वह इन सब शास्त्रोंसे आगे बढ़कर यह बतलानेके लिये प्रवृत्त हुआ है, कि पिंड-ब्रह्मांडकी जड़में कौनसा श्रेष्ठ तत्त्व है; और मनुष्य उस श्रेष्ठ तत्त्वमें कैसे मिला जा सकता है – अर्थात् तद्रूप कैसे हो सकता है । वेदान्तकेसरी अपने इस विषयप्रदेशमें किसी और शास्त्रकी गर्जना नहीं होने देता । सिंहके आगे गीदड़की भाँति वेदान्तके सामने सारे शास्त्र चुप हो जाते हैं। अतएव किसी पुराने सुभाषित- कारने वेदान्तका यथार्थ वर्णन यों किया है :– तावत् गर्जन्ति शास्त्राणि जम्बुका विपिने यथा । न गर्जति महाशक्तिः यावद्वेदान्तकेसरी ॥ सांख्यशास्त्रका कथन है, कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका विचार करनेपर निष्पन्न होनेवाला

  • “ जो दूसरा अव्यक्त पदार्थ उस ( सांख्य ) अव्यक्तसेभी श्रेष्ठ तथा सनातन है; और सब प्राणियोंका नाश हो जानेपरभी जिसका नाश नहीं होता, वही अंतिम गति है।”

१९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र 'द्रष्टा' अर्थात् पुरुष या आत्मा, और क्षर-अक्षर-सृष्टिका विचार करनेपर निष्पन्न होनेवाली सत्त्व-रज-तम-गुणमयी अव्यक्त प्रकृति, ये दोनों स्वतंत्र हैं; और इस प्रकार जगत्के मूलतत्त्वको द्विधा मानना आवश्यक है। परंतु वेदान्त इसके आगे जा कर यों कहता है, कि सांख्योंके 'पुरुष' निर्गुण भलेही; तोभी वे असंख्य हैं। इसलिये यह मान लेना उचित नहीं, कि इन असंख्य पुरुषोंका लाभ जिस बातमें हो, उसे जानकर प्रत्येक पुरुषके साथ तदनुसार बर्ताव करनेकी सामर्थ्य प्रकृतिमें है। ऐसा माननेकी अपेक्षा सात्त्विक तर्कशास्त्रकी दृष्टिसे तो यही अधिक युक्तिसंगत होगा, कि जो एकीकरणकी ज्ञानक्रिया “अविभक्तं विभक्तेषु"के अनुसार नीचेसे ऊपर तककी श्रेणियोंमें दीख पड़ती है; ओर जिसकी सहायतासेही सृष्टिके अनेक व्यक्त पदार्थोंका एक अव्यक्त प्रकृतिमें समावेश किया जाता है उसी एकीकरणकी ज्ञान-क्रियाका अंत- तक निरपवाद उपयोग किया जावेः और प्रकृति तथा असंख्य पुरुषोंका एकही परमतत्त्वमें अविभक्तरूपसे समावेश किया जावेः। (गीता १८. २०-२२)। भिन्नता होना अहंकारका परिणाम है; और पुरुष यदि निर्गुण है, तो असंख्य पुरुषोंके अलग अलग रहनेका गुण उसमें रह नहीं सकता। अथवा यह कहना पड़ता है, कि वस्तुतः पुरुष असंख्य नहीं है और केवल प्रकृतिकी अहंकाररूपी उपाधिसे उनमें अनेकता दीख पड़ती है। दूसरा एक प्रश्न यह उठता है, कि स्वतंत्र पुरुषका स्वतंत्र पुरुषके साथ जो संयोग हुआ है, वह सत्य है या मिथ्या ? यदि सत्य मानें, तो वह संयोग कभीभी छूट नहीं सकता। अतएव सांख्यमतानुसार आत्माको मुक्ति कभी प्राप्त नहीं हो सकती। और यदि मिथ्या माने, तो यह सिद्धान्तही निर्मूल या निराधार हो जाता है कि पुरुषके संयोगसे प्रकृति अपना बाजार उसके आगे लगाया करती है। और यह दृष्टान्तभी ठीक नहीं, कि जिस प्रकार गाय अपने बछड़ेके लिये दूध देती है, उसी प्रकार पुरुषके लाभके लिये प्रकृति सदा कार्यरतपर रहती है। क्योंकि, बछड़ा गायके पेटसेही पैदा होता है, इसलिये उसपर पुत्रवात्सल्यके प्रेमका उदाहरण जैसे संगठित होता है, वैसे प्रकृति और पुरुषके विषयमें नहीं कहा जा सकता (वे. सू. शां. भा. २. २. ३)। सांख्यमतके अनुसार प्रकृति और पुरुष - दोनों तत्त्व मूलतः अत्यंत भिन्न हैं- एक जड़ है, दूसरा सचेतन। अच्छा; जब ये दोनों पदार्थ सृष्टिके उत्पत्तिकालसेही एक दूसरेसे अत्यंत भिन्न और स्वतंत्र हैं, तो फिर एककी प्रवृत्ति दूसरेके फायदेहीके लिये क्यों होनी चाहिये ? यह तो कोई समाधानकारक उत्तर नहीं कि उनका स्वभावही वैसा है। स्वभावही मानना हो, तो फिर उनमेंसे हेकेलका जड़ाद्वैतवाद क्यों बुरा है? हेकेलकाभी सिद्धान्त यही है न, कि मूलप्रकृतिके गुणोंकी वृद्धि होते होते उसी प्रकृतिमें अपने आपको देखनेकी और अपने विषयमें विचार करनेकी चैतन्यशक्ति उत्पन्न हो जाती है - अर्थात् यह प्रकृतिका स्वभावही है। परंतु इस मतका स्वीकार न कर सांख्यशास्त्रने यह भेद किया है, कि 'द्रष्टा' अलग है; और दृश्यसृष्टि अलग है। अब यह प्रश्न उपस्थित होता है, कि सांख्यवादी जिस न्यायका अवलंबन कर

अध्यात्म १९९ 'द्रष्टा पुरुष' और 'दृश्य सृष्टि' में भेद बतलाते हैं, उसी न्यायका उपयोग करते हुए और आगे क्यों न चलें ? दृश्य सृष्टिकी कोई कितनीही सूक्ष्मतासे परीक्षा करें; और यह जान लें, कि जिन नेत्रोंसे हम पदार्थोंको देखते परखते हैं, उनके मज्जातंतुओंमें अमुक अमुक गुण-धर्म हैं। तथापि इन सब बातोंको जाननेवाला (या 'द्रष्टा') भिन्नही रह जाता है, क्या उस 'द्रष्टा'के विषयमें - जो 'दृश्य सृष्टि' से भिन्न है - विचार करनेके लिये कोई साधन या उपाय नहीं है ? और यह जाननेके लियेभी कोई मार्ग है या नहीं, कि इस सृष्टिका सच्चा स्वरूप जैसा हम अपनी इंद्रियोंसे देखते हैं वैसाही है; या उससे भिन्न है ? सांख्यवादी कहते हैं, कि इन प्रश्नोंका निर्णय होना असंभव है। अतएव यह मान लेना पड़ता है, कि प्रकृति और पुरुष, दोनों तत्त्व मूलहीमें स्वतंत्र और भिन्न हैं। और यदि केवल आधिभौतिक शास्त्रोंकी प्रणालीसे विचार कर देखें, तो सांख्यवादियोंका यह मत अनुचित नहीं कहा जा सकता। कारण यह है, कि सृष्टिके अन्य पदार्थोंको जैसे हम अपनी इंद्रियोंसे देखभाल करके उनके गुणधर्मोंका विचार करते हैं, वैसे यह 'द्रष्टा पुरुष' या देखनेवाला - अर्थात् जिसे वेदान्तमें 'आत्मा' कहा है, वह - द्रष्टाकी ( अर्थात् अपनीही ) इंद्रियोंको भिन्न रूपमें कभी गोचर हो नहीं सकता। और जिस पदार्थका इस प्रकार इंद्रियगोचर होना असंभव है, यानी जो वस्तु इंद्रियातीत है उसकी परीक्षा मानवी इंद्रियोंसे कैसे हो सकती है? उस आत्माका वर्णन भगवान्ने गीतामें (गीता २. २३ ) इस प्रकार किया है :- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ अर्थात्, आत्मा ऐसा कोई पदार्थ नहीं कि यदि हम सृष्टिके अन्य पदार्थोंके समान उस- पर तेजाब आदि द्रव पदार्थ डालें तो वह द्रवरूप हो जाय, अथवा प्रयोगशालाके पैने शस्त्रोंसे काट-छांटकर उसका आंतरिक स्वरूप देख लें, या आगपर धर देनेसे उसका धुआँ हो जाय, अथवा हवामें रखनेसे वह सूख जाय ! सारांश, सृष्टिके पदार्थोंकी परीक्षा करनेके आधिभौतिक शास्त्रवेत्ताओंने जितने कुछ उपाय ढूंढ़े हैं, वे सब यहाँ निष्फल हो जाते हैं तो फिर आत्माका परीक्षण होगाभी तो कैसे ? प्रश्न है तो बिकट, पर विचार करनेसे कुछ कठिनाई दीख नहीं पड़ती। भला, सांख्यवादियोंनेभी 'पुरुष'- को निर्गुण और स्वतंत्र कैसे जाना ? केवल अपने अंतःकरणके अनुभवसेही जाना है न ? फिर उसी रीतिका उपयोग प्रकृति और पुरुषके सच्चे स्वरूपका निर्णय करनेके लिये क्यों न किया जावें ? आधिभौतिकशास्त्र और अध्यात्मशास्त्रमें जो बड़ा भारी भेद है, वह यही है। आधिभौतिकशास्त्रोंके विषय इंद्रियगोचर होते हैं; और अध्यात्म- शास्त्रका विषय इंद्रियातीत अर्थात् केवल स्वसंवेद्य है; यानी अपने आपही जानने योग्य है। कोई यह कहें, कि यदि 'आत्मा' स्वसंवेद्य है, तो प्रत्येक मनुष्यको उसके विषयमें जैसा ज्ञान होवे, वैसा होने दो; अध्यात्मशास्त्रकी आवश्यकताही क्या है ? हाँ; यदि प्रत्येक मनुष्यका मन या अंतःकरण समान रूपसे शुद्ध हो, तो फिर यह

२०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रश्न ठीक होगा । परंतु जब कि हमारा यह प्रत्यक्ष अनुभव है, कि प्रत्येक पुरुषके मन या अंतःकरणकी शुद्धि अथवा शक्ति एक-सी नहीं होती, तब जिन लोगोंके मन अत्यंत शुद्ध, पवित्र और विशाल हो गये हैं; उन्हींकी प्रतीति इस विषयमें हमारे लिये प्रमाणभूत होनी चाहिये । योंही 'मुझे ऐसा मालूम होता है' 'तुझे ऐसा मालूम होता है' कह कर निरर्थक वाद करनेसे कोई लाभ न होगा । वेदान्तशास्त्र तुम्हें युक्तिवादका उपयोग करनेसे बिलकुल नहीं रोकता । वह सिर्फ़ यही कहता है, कि अध्यात्मशास्त्रके विषयमें निरी युक्तियाँ वहीं तक मानी जावेंगी जहाँतक कि इन युक्तियोंसे अत्यंत विशाल, पवित्र और निर्मल अंतःकरणवाले महात्माओंके इस विषयसंबंधी साक्षात् अनुभवका विरोध न होता हो । क्योंकि अध्यात्मशास्त्रका विषय स्वसंवेद्य है - अर्थात् केवल आधिभौतिक युक्तियोंमें उसका निर्णय नहीं हो सकता । जिस प्रकार आधिभौतिक शास्त्रोंमें वे अनुमान त्याज्य माने जाते हैं, कि जो प्रत्यक्षके विरुद्ध हों, उसी प्रकार वेदान्तशास्त्रमें युक्तियोंकी अपेक्षा उपर्युक्त स्वानुभवकी अर्थात् आत्मप्रतीतिकी योग्यताही अधिक मानी जाती है। जो युक्ति इस अनुभवके अनुकूल हो, उसे वेदान्ती अवश्य मानते हैं। श्रीमान् शंकराचार्यने अपने वेदान्त- सूत्रोंके भाष्यमें यही सिद्धान्त दिया है। अध्यात्मशास्त्रका अभ्यास करनेवालोंको इसपर हमेशा ध्यान रखना चाहिये :- अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण साधयेत् । प्रकृतिभ्यः परं यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥ "जो पदार्थ इंद्रियातीत हैं और इसीलिये जिनका चिंतन नहीं किया जा सकता, उनका निर्णय केवल तर्क या अनुमानसे नहीं कर लेना चाहिये । सारी सृष्टिकी मूल प्रकृतिसेभी परे जो पदार्थ है, वह इस प्रकार अचिंत्य है" - यह एक पुराना श्लोक है, जो महाभारतमें (महा. भीष्म. ५. १२) पाया जाता है; और जो शंकराचार्यके वेदान्तभाष्यमेंभी 'साधयेत्'के बदले 'योजयेत्'के पाठभेदसे पाया जाता है (वे. सू. शां. भा. २. १. २७) । मुंडक और कठोपनिषद्मेंभी लिखा है, कि आत्मज्ञान केवल तर्कहीसे नहीं प्राप्त हो सकता (मुं. ३. २, ३; कठ. २. ८, ९ और २२) । अध्यात्मशास्त्रमें उपनिषद्-ग्रंथोंका विशेष महत्त्वभी इसीलिये है। मनको एकाग्र करनेके उपायोंके विषयमें प्राचीन कालमें हमारे हिंदुस्थानमें बहुत चर्चा हो चुकी है; और अंतमें इस विषयपर, (पातंजल) योगशास्त्र नामक एक स्वतंत्र शास्त्रही निर्मित हो गया है। जो बड़े बड़े ऋषि इस योगशास्त्रमें अत्यंत प्रवीण थे तथा जिनके मन स्वभावहीसे अत्यंत पवित्र और विशाल थे, उन महात्माओंने मनको अंतर्मुख करके आत्माके स्वरूपके विषयमें जो अनुभव प्राप्त किया - अथवा आत्माके विषयमें इनको शुद्ध और शांत बुद्धिमें जो स्फूर्ति हुई - उसका वर्णन उन्होंने उपनिषद्-ग्रंथोंमें किया है। इसलिये किसीभी अध्यात्म तत्त्वका निर्णय करनेमें इन श्रुतिग्रंथोंमें कहे गये अनुभविक ज्ञानका सहारा लेनेके अतिरिक्त कोई दूसरा

अध्यात्म २०१ उपाय नहीं है ( कठ. ४. १)। मनुष्य केवल अपनी बुद्धिकी तीव्रतासे उक्त आत्म प्रतीतिकी पोषक भिन्न भिन्न युक्तियाँ बतला सकेगा; परंतु इससे उस मूल प्रतीतिकी प्रामाणिकतामें रत्तीभरभी न्यूनाधिकता नहीं हो सकती। भगवद्गीताकी गणना स्मृतिग्रंथोंमें की जाती है सही; परंतु पहले प्रकरणके आरंभहीमें हम कह चुके हैं, कि इस विषयमें गीताकी योग्यता उपनिषदोंकी बराबरीकी मानी जाती है। अतएव इस प्रकरणमें अब आगे चल कर सिर्फ़ यह बतलाया जायगा, कि प्रकृतिके परे जो अचिंत्य पदार्थ है, उसके विषयमें गीता और उपनिषदोंमें कौन-कौनसे सिद्धान्त किये गये हैं; और उनके कारणोंका ( अर्थात् शास्त्ररीतिसे उनकी उपपत्तिका ) विचार पीछे किया जायगा। सांख्यवादियोंका द्वैत - प्रकृति और पुरुष - भगवद्गीताको मान्य नहीं है। भगवद्गीताके अध्यात्मज्ञानका और वेदान्तशास्त्रकाभी पहला सिद्धान्त यह है, कि प्रकृति और पुरुषसेभी परे एक सर्वव्यापक, अव्यक्त और अमृत तत्त्व है, जो चर-अचर सृष्टिका मूल है। सांख्योंकी प्रकृति यद्यपि अव्यक्त है, तथापि वह त्रिगुणात्मक अर्थात् सगुण है। परंतु प्रकृति और पुरुषका विचार करते समय भगवद्गीताके आठवें अध्यायके बीसवें श्लोकमें (इस प्रकरणके आरंभमेंभी यह श्लोक दिया गया है) कहा है, कि जो सगुण है वह नाशवान् है; इसलिये इस अव्यक्त और सगुण प्रकृति- काभी नाश हो जानेपर अंतमें जो कुछ अव्यक्त शेष रह जाता है, वही सारी सृष्टिका सच्चा और नित्य तत्त्व है। और आगे पन्द्रहवें अध्यायमें (गीता. १५. १६) क्षर और अक्षर - व्यक्त और अव्यक्त - इस भाँति सांख्यशास्त्रके अनुसार दो तत्त्व बतलाकर यह वर्णन किया है :- उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ अर्थात्, जो इन दोनोंसेभी भिन्न है, वही उत्तम पुरुष है; उसीको परमात्मा कहते हैं; वही अव्यय और सर्वशक्तिमान् है; और वही तीनों लोगोंमें व्याप्त हो कर उनकी रक्षा करता है। यह पुरुष क्षर और अक्षर (अर्थात् व्यक्त और अव्यक्त) इन दोनोंसेभी परे है। इसलिये इसे 'पुरुषोत्तम' कहा है (गीता. १५. १८)। महाभारतमेंभी भृगु ऋषिने भरद्वाजमे 'परमात्मा' शब्दकी व्याख्या बतलाते हुए कहाँ है :- आत्मा क्षेत्रज्ञ इत्युक्तः संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । तैरेव तु विनिर्मुक्तः परमात्मेत्युदाहृतः ॥ अर्थात् "जब आत्मा प्रकृतिमें या शरीरमें बद्ध रहता है, तब उसे क्षेत्रज्ञ या जीवात्मा कहते हैं; और वही प्राकृत गुणोंसे यानी प्रकृति या शरीरके गुणोंसे मुक्त होनेपर 'परमात्मा' कहलाता है" (मभा. शां. १८७. २४)। संभव है, कि 'परमात्मा' की उपर्युक्त दो व्याख्याएं भिन्न भिन्न जान पड़ें; परंतु वे भिन्न भिन्न नहीं हैं। क्षर-अक्षर सृष्टि और जीव (अथवा सांख्यशास्त्रके अनुसार अव्यक्त प्रकृति और पुरुष) इन

२०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

दोनोंसेभी परे एकही परमात्मा है। इसलिये यह कहा जाता है, कि वह क्षर-अक्षरके परे है; और कभी कहा जाता है, कि वह जीवके या जीवात्माके (पुरुषके) परे है। एवं एकही परमात्माकी ऐसी द्विविध व्याख्याएं कहनेमें वस्तुतः कोई भिन्नता नहीं हो जाती। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर कालिदासनेभी कुमारसंभवमें परमेश्वरका वर्णन इस प्रकार किया है - “पुरुषके लाभके लिये उद्युक्त होनेवाली प्रकृतिभी तूही है; और स्वयं उदासीन रह कर उस प्रकृतिका द्रष्टाभी तूही है” (कुमा. २. १३) इसी भाँति गीतामें भगवान् कहते हैं, कि “मम योनिर्महद्ब्रह्म” यह प्रकृति मेरी योनि या मेरा एक स्वरूप है (१४. ३) और जीव या आत्माभी मेराही अंश है (१५. ७) सातवें अध्यायमेंभी कहा गया है :- भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ अर्थात् “पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार - इस तरह आठ प्रकारकी मेरी प्रकृति है; और इसके सिवा (अपरेयमितस्त्वन्यां) सारे संसारका धारण जिसने किया है, वह जीवभी मेरीही दूसरी प्रकृति है” (गीता ७. ४. ५)। महाभारतके शांतिपर्वमें सांख्योंके पचीस तत्त्वोंका कई स्थलोंपर विवेचन है; परंतु वहीं अंतमें यहभी कह दिया गया है, कि इन पचीस तत्त्वोंके परे एक छब्बीसवाँ (षड्विंश) परमतत्त्व है; जिसे पहचाने बिना मनुष्य 'बुद्ध' नहीं हो सकता (मभा. शां. ३०८)। सृष्टिके पदार्थोंका जो ज्ञान हमें अपनी ज्ञानेंद्रियोंसे होता है, वही हमारी सारी सृष्टि है। अतएव प्रकृति या सृष्टीहीको कई स्थानोंपर 'ज्ञात' कहा है और इसी दृष्टिसे पुरुष 'ज्ञाता' कहा जाता है (मभा. शां. ३०६. ३५-४१)। परंतु जो सच्चा ज्ञेय है (गीता १३. १२) वह प्रकृति और पुरुष - ज्ञान और ज्ञातासेभी - परे है। इसलिये भगवद्गीतामें उसे परमपुरुष कहा है। तीनों लोकोंको व्याप्त कर उन्हें सदैव धारण करनेवाला जो यह परमपुरुष या परपुरुष है, उसे पहचानो; वह एक है, अव्यक्त है, नित्य है, अक्षर है - यह बात केवल भगवद्- गीताही नहीं, किंतु वेदान्तशास्त्रके सारे ग्रंथ एक स्वरसे कह रहे हैं। सांख्यशास्त्रमें 'अक्षर' और 'अव्यक्त' शब्दों या विशेषणोंका प्रयोग प्रकृतिके लिये किया जाता है। क्योंकि सांख्योंका सिद्धान्त है, कि प्रकृतिकी अपेक्षा अधिक सूक्ष्म और कोई भी मूलकारण इस जगत्‌का नहीं है (सां. का. ६१)। परंतु यदि वेदान्तकी दृष्टिसे देखें, तो परब्रह्मही एक अ-क्षर है, यानी उसका कभी नाश नहीं होता; और वही अव्यक्त है - अर्थात् इंद्रियगोचर नहीं है। अतएव इस भेदपर पाठक सदा ध्यान रखें, कि भगवद्गीतामें 'अक्षर' और 'अव्यक्त' शब्दोंका उपयोग प्रकृ- तिसे परेके परब्रह्मके स्वरूपको दिखलानेके लियेभी किया गया है (गीता ८. २०; ११. ३७; १२. १६, १७)। जब इस प्रकार वेदान्तकी दृष्टिका स्वीकार किया गया तब इसमें संदेह नहीं, कि प्रकृतिको 'अक्षर' कहना उचित नहीं है - चाहे

अध्यात्म २०३ वह प्रकृति अव्यक्त भलेही हो । सृष्टिके उत्पत्तिक्रमके विषयमें सांख्योंके सिद्धान्त गीताकोभी मान्य हैं। इसलिये उनकी निश्चित परिभाषामें कुछ अदलाबदल न कर, उन्हींके शब्दोंमें क्षर-अक्षर या व्यक्त-अव्यक्त-सृष्टिका वर्णन गीतामें किया गया है। परंतु स्मरण रहे, कि इस वर्णनसे प्रकृति और पुरुषके परे जो तीसरा उत्तम पुरुष है, उसके सर्वशक्तित्वमें कुछभी बाधा नहीं होने पाती। इसका परिणाम यह हुआ है, कि जहाँ भगवद्गीतामें परब्रह्मके स्वरूपका वर्णन किया गया है, वहाँ सांख्य और वेदान्तके मतान्तरका संदेह मिटानेके लिये (सांख्य) अव्यक्तकेभी परेका अव्यक्त और (सांख्य) अक्षरसेभी परेका अक्षर, इस प्रकारके शब्दोंका उपयोग करना पड़ा है। उदाहरणार्थ, इस प्रकरणके आरंभमें जो श्लोक दिया गया है, उसे देखो। सारांश, गीता पढ़ते समय इस बातका सदा ध्यान रखना चाहिये, कि 'अव्यक्त' और 'अक्षर' ये दोनों शब्द कभी सांख्योंकी प्रकृतिके लिये और कभी वेदान्तियोंके परब्रह्मके लिये अर्थात् दो प्रकारसे - गीतामें प्रयुक्त हुए हैं। वेदान्तकी दृष्टिसे, सांख्योंकी अव्यक्त प्रकृतिकेभी परेका दूसरा अव्यक्त तत्त्व जगतका मूलही है। जगत्के आदितत्त्वके विषयमें सांख्य और वेदान्तमें उपर्युक्त भेद है। आगे इस विषयका विवरण किया जायगा, कि इसी भेदसे अध्यात्मशास्त्रप्रतिपादित मोक्ष- स्वरूपभी सांख्योंके मोक्षस्वरूपसे कैसे भिन्न हो गया है। सांख्योंके द्वैत - प्रकृति और पुरुष - को न मानकर, जब यह मान लिया गया, कि इस जगतकी जड़में परमेश्वररूपी अथवा पुरुषोत्तमरूपी एक तीसराही नित्य तत्त्व है; और प्रकृति तथा पुरुष दोनों उसकी विभूतियाँ हैं; तब सहजही यह प्रश्न उत्पन्न होता है, कि उस तीसरे मूलभूत तत्त्वका स्वरूप क्या है: और प्रकृति तथा पुरुषसे उसका कौन-सा संबंध है ? प्रकृति, पुरुष और परमेश्वर इसी त्रयीको अध्यात्मशास्त्रमें क्रमसे जगत्, जीव और परब्रह्म कहते हैं, और इन तीनों वस्तुओंके स्वरूप तथा इनके पारस्परिक संबंधका निर्णय करनाही वेदान्तशास्त्रका प्रधान कार्य है। एवं उपनिषदोंमेंभी सर्वत्र यही चर्चा की गई है। परंतु सब वेदान्तियोंका मत इस त्रयीके विषयमें एक नहीं है। कोई कहते हैं, कि ये तीनों पदार्थ मूलमें एकही हैं, और कोई यह मानते हैं, कि जीव और जगत् परमेश्वरसे मूलहीमें थोड़े या अत्यंत भिन्न हैं। इसीसे वेदान्तियोंमें अद्वैती, विशिष्टाद्वैती, और द्वैती इस प्रकार भेद उत्पन्न हो गये हैं। यह सिद्धान्त सब लोगोंको एक-सा ग्राह्य है, कि जीव और जगतके सारे व्यवहार परमेश्वरकी इच्छासे होते हैं। परंतु कुछ लोग तो मानते हैं,' कि जीव, जगत् और परब्रह्म, इन तीनोंका मूलस्वरूप आकाशके समान एकरूप और अखंडित है, तथा दूसरे वेदान्ती कहते हैं, कि जड़ और चैतन्यका एक होना संभव नहीं। अतएव अनार या दाड़िमके फलमें यद्यपि अनेक दाने होते हैं, तोभी उससे जैसे फलकी एकता नष्ट नहीं होती, वैसेही जीव और जगत् यद्यपि परमेश्वरमें भरे हुए हैं, तथापि ये मूलमें उससे, भिन्न हैं; और उपनिषदोंमें जब ऐसा वर्णन आता है, कि तीनों 'एक' हैं; तब उसका

२०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अर्थ 'दाड़िमके फलके समान एक' जानना चाहिये । जब जीवके स्वरूपके विषयमें यह मतांतर उपस्थित हो गया, तब भिन्न भिन्न सांप्रदायिक टीकाकार अपने अपने मतके अनुसार उपनिषदों और गीताके शब्दोंकीभी खींचातानी करने लगे जिससे गीताका यथार्थ स्वरूप - उसमें प्रतिपादित सच्चा कर्मयोग विषय - तो एक ओर रह गया, और अनेक सांप्रदायिक टीकाकारोंके मतसे गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय यही हो गया, कि गीताप्रतिपादित वेदान्त द्वैतमतका है या अद्वैतमतका ! अस्तु, इसके बारेमें अधिक विचार करनेके पहले यह देखना चाहिये, कि जगत् ( प्रकृति ), जीव ( आत्मा अथवा पुरुष ), और परब्रह्मके ( परमात्मा अथवा पुरुषोत्तम ) परस्परसंबंधके विषयमें स्वयं भगवान् श्रीकृष्णही गीतामें क्या कहते हैं। आगेके विवेचनसे पाठकोंको विदित होगा कि इस विषयमें गीता और उपनिषदोंका एकही मत है, और गीतामें कहे गये सब विचार उपनिषदोंमें पहलेही आ चुके हैं। प्रकृति और पुरुषकेभी परे जो पुरुषोत्तम, परपुरुष, परमात्मा या परब्रह्म है, उसका वर्णन करते समय भगवद्गीतामें पहले उसके दो स्वरूप बतलाये गये हैं, यथा, व्यक्त और अव्यक्त ( आँखोंसे दिखनेवाला और आँखोंसे न दिखनेवाला ) । अब इसमें संदेह नहीं, कि व्यक्त स्वरूप अर्थात् इंद्रियगोचर रूप सगुणही होना चाहिये । अब शेष रहा अव्यक्त रूप । यह सच है, कि यह अव्यक्त रूप इंद्रियोंको अगोचर है। और अव्यक्त रूप यद्यपि इंद्रयोंको अगोचर है, तोभी इतनेहीसे यह नहीं कहा जा सकता, कि वह निर्गुणही हो । क्योंकि, यद्यपि वह हमारी आँखोंसे न दीख पड़े, तोभी उसमें सब प्रकारके गुण सूक्ष्म रूपसे रह सकते हैं। इसलिये अव्यक्तकेभी तीन भेद किये हैं, जैसे सगुण, सगुणनिर्गुण और निर्गुण । यहाँ 'गुण' शब्दमें उन सब गुणोंका समावेश किया गया है, कि जिनका ज्ञान मनुष्यको केवल उसकी बाह्येंद्रियोंसे नहीं होता, किंतु मनसेभी होता है। परमेश्वरके मूर्तिमान् अवतार भगवान् श्रीकृष्ण स्वयंसाक्षात् अर्जुनके सामने खड़े होकर उपदेश कर रहे थे । इसलिये गीतामें जगह- जगहपर अपने व्यक्तिस्वरूपको लक्ष करके उन्होंने अपने विषयमें प्रथम पुरुषका निर्देश इस प्रकार किया है - जैसे, "प्रकृति मेरा स्वरूप है" (गीता ९. ८), "जीव मेरा अंश है" ( गीता १५. ७ ), "सब भूतोंका अंतर्यामी आत्मा मैं हूँ" ( गीता १०. २० ), "संसारमें जितनी श्रीमान् या विभूतिमान् मूर्तियां हैं, वे सब मेरे अंशमे उत्पन्न हुई है" ( गीता १०. ४१ ), "मुझमें मन लगा कर मेरा भक्त हो" ( गीता. ९. ३४ ), "तो तू मुझीमें मिल जायगा," "तू मेरा प्रिय भक्त है, इसलिये मैं तुझे यह प्रतिज्ञापूर्वक बतलाता हूँ" (गीता १८. ६५)। और जब अपने विश्वरूपदर्शनसे अर्जुनको यह प्रत्यक्ष अनुभव करा दिया, कि सारी चराचर सृष्टि मेरे व्यक्त रूपमेंही साक्षात् भरी हुई है, तब भगवानने उसको यही उपदेश किया है, कि अव्यक्त रूपसे व्यक्त रूपकी उपासना करना अधिक सहज है । " इसलिये तू मुझमेंही अपना भक्तिभाव रख" (गीता १२. ८), "मैँही ब्रह्मका, अव्यक्त मोक्षका,

अध्यात्म २०५ शाश्वत धर्मका और अनंत सुखका मूल स्थान हूँ” (गीता १४. २७)। इससे विदित होगा, कि गीतामें आदिसे अंततक अधिकांशमें भगवानके व्यक्त स्वरूप- काही वर्णन किया गया है। इतनेहीसे केवल भक्तिके अभिमानी बहुतेरे पंडितों और टीकाकारोंने यह मत प्रकट किया है, कि गीतामें परमात्माका व्यक्त रूपही अंतिम साध्य माना गया है। परंतु उनका यह मत सच नहीं कहा जा सकता। क्योंकि उक्त वर्णनके साथही भगवानने स्पष्ट रूपसे कह दिया है, कि मेरा व्यक्त स्वरूप मायिक है, और उसके परेका जो अव्यक्त रूप - अर्थात् जो इंद्रियोंको अगोचर-है, वही मेरा सच्चा स्वरूप है। उदाहरणार्थ, भगवानने, सातवें अध्यायमें (गीता ७. २४) कहा है, कि :- अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ “यद्यपि मैं अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर हूँ, तोभी मूर्ख लोग मुझे व्यक्त समझते हैं, और व्यक्तसेभी परेके मेरे श्रेष्ठ तथा अव्यक्त रूपको नहीं पहचानते।” और इसके अगले श्लोकमें भगवान् कहते हैं, कि “मैं अपनी योगमायासे आच्छादित हूँ, इसलिये मूर्ख लोग मुझे नहीं पहचानते” (गीता ७. २५)। फिर चौथे अध्यायमें उन्होंने अपने व्यक्त रूपकी उत्पत्ति इस प्रकार बतलाई है, “मैं यद्यपि जन्मरहित और अव्यय हूँ, तथापि अपनीही प्रकृतिमें अधिष्ठित होकर मैं अपनी मायासे (स्वात्ममाया मे) जन्म लिया करता हूँ - अर्थात् व्यक्त होता रहता हूँ” (गीता ४. ६)। वे आगे सातवें अध्यायमें कहते हैं, “यह त्रिगुणात्मक प्रकृति मेरी दैवी माया है। इस मायाको जो पार कर जाते हैं, वे मुझमें समा जाते हैं, और इस मायासे जिनका ज्ञान नष्ट हो जाता है, वे मूढ नराधम मुझमें नहीं समा जा सकते।” (गीता ७. १४, १५)। अंतमें अठारहवें (गीता १८. ६१) अध्यायमें भगवानने उपदेश किया है, कि “हे अर्जुन ! सब प्राणियोंके हृदयमें जीवरूप परमात्माहीका निवास है; और वह अपनी मायासे यंत्रकी भांति सब प्राणियोंको घुमाता है।” भगवान्‌ने अर्जुनको जो विश्वरूप दिखाया है, वही नारदकोभी दिखलाया था। इसका वर्णन महाभारतके शांतिपर्वान्तर्गत नारायणीय प्रकरणमें (मभा. शां. ३३९) है; और हम पहलेही प्रकरणमें बतला चुके हैं, कि नारायणीय अर्थात् भागवतधर्मही गीतामें प्रतिपादित किया गया है। नारदको हजारों नेत्रों, रंगों, तथा अन्य गुणोंका विश्वरूप दिखलाकर भगवान्‌ने कहा :- माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद । सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि ॥ “तुम मेरा जो रूप देख रहे हो, वह मेरी उत्पन्न की हुई माया है। इससे तुम यह न समझो, कि मैं, सर्वभूतोंके गुणोंसे युक्त हूँ।” और यह फिरभी कहा है, कि “मेरा

२०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सच्चा स्वरूप सर्वव्यापी, अव्यक्त और नित्य है और उसे सिद्धपुरुषही पहचानते हैं" (मभा. शां. ३३९. ४४, ४८) । इससे कहना पड़ता है, कि गीतामें वर्णित भगवानका अर्जुनको दिखलाया हुआ विश्वरूपभी मायिक था ! सारांश, उपर्युक्त वचनोंसे इस विषयमें कुछ भी संदेह नहीं रह जाता, कि गीताका यही सिद्धान्त होना चाहिये, कि यद्यपि केवल उपासनाके लिये व्यक्त स्वरूपकी प्रशंसा गीतामें भगवान्‌ने की है; तथापि परमेश्वरका श्रेष्ठ स्वरूप अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचरही है; और अव्यक्तसे व्यक्त होनाही उसकी माया है। और इस मायासे पार होकर जब तक मनुष्यको मायाके परे परमात्माके, शुद्ध तथा अव्यक्त रूपका ज्ञान न हो, तबतक उसे मोक्ष नहीं मिल सकता। अब इसका अधिक विचार आगे करेंगे, कि माया क्या वस्तु है। ऊपर दिये गये वचनोंसे इतनी बात स्पष्ट है, कि यह मायावाद श्रीशंकराचार्यने नये सिरेसे नहीं उपस्थित किया है; किंतु उनके पहलेही भगवद्गीता, महाभारत और भागवतधर्ममेंभी वह ग्राह्य माना गया था। श्वेताश्वतरोपनिषद्‌मेंभी सृष्टिकी उत्पत्ति इस प्रकार कही गई है - "मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्" (श्वेता. ४. १०) - अर्थात् मायाही (सांख्योंकी) प्रकृति है और परमेश्वर उस मायाका अधिपति है, और वही अपनी मायासे विश्व निर्माण करता है। अब इतनी बात यद्यपि स्पष्ट हो चुकी, कि परमेश्वरका श्रेष्ठ स्वरूप व्यक्त नहीं, अव्यक्त है, तथापि यहाँ थोड़ा-सा विचार होनाभी आवश्यक है, कि परमात्माका यह श्रेष्ठ अव्यक्त स्वरूप सगुण है या निर्गुण। जब कि सगुण-अव्यक्तका हमारे सामने यह एक उदाहरण है, कि सांख्यशास्त्रकी प्रकृति अव्यक्त (अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर) होनेपरभी सगुण अर्थात् सत्त्व-रज-तम-गुणमय है; तब कुछ लोग यह कहते हैं, कि परमेश्वरका अव्यक्त और श्रेष्ठ रूपभी उसी प्रकार सगुण माना जावे। अपनी मायाहीसे क्यों न हो; परंतु जब कि वही अव्यक्त परमेश्वर व्यक्त सृष्टि निर्माण करता है (गीता ९. ८); और सब लोगोंके हृदयमें रहकर उनसे उनके सारे व्यापार करवाता है (गीता १८. ६१), जब की वह सब यज्ञोंका भोक्ता और प्रभु है (गीता ९. २४); जब कि प्राणियोंके सुखदुःख आदि सब 'भाव' उसीसे उत्पन्न होते हैं, (गीता १०. ५) और जब कि प्राणियोंके हृदयमें श्रद्धा उत्पन्न करनेवालाभी वही है; एवं "लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्" (गीता ७. २२) - प्राणियोंकी वासनाका फल देनेवालाभी वही है; तब तो यही बात सिद्ध होती है, कि वह अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर भलेही हो; तथापि वह दया, कर्तृत्व आदि गुणोंसे युक्त अर्थात् 'सगुण' अवश्यही होना चाहिये। परंतु इसके विरुद्ध भगवान् ऐसाभी कहते हैं, कि "न मां कर्माणि लिम्पन्ति" - मुझे कर्मोंका अर्थात् गुणोंकाभी कभी स्पर्श नहीं होता (गीता ४. १४), प्रकृतिके गुणोंसे मोहित होकर मूर्ख लोग आत्माहीको कर्ता मानते हैं (गीता ३. २७, १४. १९) अथवा, यह अव्यक्त और अकर्ता परमेश्वरही प्राणियोंके हृदयमें जीवरूपसे निवास करता है (गीता १३. ३१),

अध्यात्म २०७ और इसीलिये यद्यपि वह प्राणियोंके कर्तृत्व और कर्मसे वस्तुतः अलिप्त है, तथापि अज्ञानमें फँसे हुए लोग मोहित हो जाया करते हैं (गीता ५. १४, १५)। इस प्रकार अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर परमेश्वरके रूप - सगुण और निर्गुण - दोकेही तरह नहीं हैं किंतु इसके अतिरिक्त कही कही इन दोनोंको एकत्र मिलाकरभी अव्यक्त परमेश्वरका वर्णन किया गया है। उदाहरणार्थ, “भूतभृत् न च भूतस्थो” (गीता ९. ५) “मैं भूतोंका आधार होकरभी उनमें नहीं हूँ,” इस तरह नौवें और तेरहवें अध्यायमें “परब्रह्म न तो सत् है और न असत्” (गीता १३. १२), “सर्वेद्रियवान् होनेका जिसमें भास हो परंतु जो सर्वेद्रियरहित है, और निर्गुण हो कर गुणोंका उपभोग करनेवाला है” (गीता १३. १४), “दूर है और समीपभी है” (गीता १३. १५), “अविभक्त है और विभक्तभी दीख पड़ता है” (गीता १३. १६) - इस प्रकार परमेश्वरके स्वरूपका सगुण-निर्गुण-मिश्रित अर्थात् परस्पर- विरोधी वर्णनभी किया गया है। तथापि आरंभमें दूसरेही अध्यायमें कहा गया है, कि “यह आत्मा अव्यक्त, अचित्य और अविकार्य है” (गीता २. २५), और फिर तेरहवें अध्यायमें - “यह परमात्मा अनादि, निर्गुण और अव्यक्त है; इसलिये शरीरमें रहकरभी न तो यह कुछ करता है और न किसीमें लिप्त होता है” (गीता १३. ३१) - इस प्रकार परमात्माके शुद्ध, निर्गुण, निरवयव, निर्विकार, अचिंत्य अनादि और अव्यक्त रूपकी श्रेष्ठताका वर्णन गीतामें किया गया है। भगवद्गीताकी भाँति उपनिषदोंमेंभी अव्यक्त परमात्माका स्वरूप तीन प्रकारका पाया जाता है - अर्थात् कभी कभी उभयविध यानी सगुण-निर्गुण-मिश्रित और कभी सगुण, निर्गुण। इस बातकी कोई आवश्यकता नहीं, कि उपासनाके लिये सदा प्रत्यक्ष मूर्तिही नेत्रोंके सामने रहे। ऐसे स्वरूपकीभी उपासना हो सकती है, कि जो निराकार अर्थात् चक्षु आदि ज्ञानेंद्रियोंको गोचर भलेही न हो; तोभी मनको गोचर हुए बिना उसकी उपासना होना संभव नहीं है। उपासना कहते हैं, चिंतन, मनन, या ध्यानको और यदि चिंतित वस्तुका कोई रूप न हो, तो न सही; परंतु जब तक उसका अन्य कोईभी गुण मनको मालूम न हो जाय, तब तक मन चिंतन करेगाही किसका ? अतएव उपनिषदोंमें जहाँ जहाँ अव्यक्त अर्थात् नेत्रोंमें न दिखाई देनेवाले परमात्माकी उपासना (चिंतन, मनन, ध्यान) बतलाई गई है वहाँ वहाँ अव्यक्त परमेश्वर सगुणही कल्पित किया गया है। परमात्मामें कल्पित गुण उपासकके अधिकारानुसार न्यूनाधिक व्यापक या सात्त्विक होते हैं; और जिसकी जैसी निष्ठा हो, उसको वैसाही फलभी मिलता है। छांदोग्योपनिषद्में (छां. ३. १४. १) कहा है, कि “पुरुष ऋतुमय है। जिसका जैसा ऋतु (निश्चय) हो, उसे मृत्युके पश्चात् वैसाही फलभी मिलता है।” और भगवद्गीताभी कहती है, कि “देवताओंकी भक्ति करनेवाले देवताओंमें और पितरोंकी भक्ति करनेवाले पित- रोंमें जा मिलते हैं” (गीता ९. २५), अथवा “यो यच्छ्रद्धः स एव सः” - जिसकी

२०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जैसी श्रद्धा हो, उसे वैसी सिद्धि प्राप्त होती है (गीता १७. ३)। तात्पर्य यह है, कि उपासकके अधिकारभेदके अनुसार उपास्य अव्यक्त परमात्माके गुणभी उप- निषदोंमें भिन्न भिन्न कहे गये हैं। उपनिषदोंके इस प्रकरणको 'विद्या' कहते हैं। विद्या ईश्वरप्राप्तिका (उपासनारूप) मार्ग है; और यह मार्ग जिस प्रकरणमें बतलाया गया है, उसेभी 'विद्या'ही नाम अंतमें दिया जाता है। शांडिल्यविद्या (छां. ३. १४), पुरुषविद्या (छां. ३. १६, १७), पर्यंकविद्या (कौषी. १), प्राणोपासना (कौषी. २) इत्यादि अनेक प्रकारकी उपासनाओंका वर्णन उपनिषदोंमें किया गया है; और इस सबका विवेचन वेदान्तसूत्रोंके तृतीयाध्यायके तीसरे पादमें किया गया है। इस प्रकरणमें अव्यक्त परमात्माका सगुण वर्णन इस प्रकार है, कि वह मनोमय, प्राणशरीर, भारूप, सत्यसंकल्प, आकाशात्मा, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगंध और सर्वरस है (छां. ३. १४. २)। तैत्तिरीय उपनिषद्में तो अन्न, प्राण, मन, विज्ञान या आनंद

  • इन रूपोंमेंभी परमात्माकी बढ़ती हुई उपासना बतलाई गई है (तै. २. १-५; ३. २-६)। बृहदारण्यकमें (बृ. २. १) गार्ग्य बालाकीने अजातशत्रुको पहले पहल आदित्य, चंद्र, विद्युत्, आकाश, वायु, अग्नि, जल या दिशाओंमें रहनेवाले पुरुषोंकी ब्रह्मरूपसे उपासना बतलाई है; परंतु आगे अजातशत्रुने उससे यह कहा, कि सच्चा ब्रह्म इनकेभी परे है; और अंतमें प्राणोपासनाहीको मुख्य ठहराया है। इतनेहीसे यह परंपरा कुछ पूरी नहीं हो जाती। उपर्युक्त सब ब्रह्मरूपोंको प्रतीक, अर्थात् इन सबको उपासनाके लिये कल्पित गौण ब्रह्मस्वरूप अथवा ब्रह्मनिदर्शक चिन्ह कहते हैं; और जब यही गौणरूप किसी मूर्तिके रूपमें नेत्रोंके सामने रखा जाता है, तब उसीको 'प्रतिमा' कहते हैं। परंतु स्मरण रहे, कि सब उपनिषदोंका सिद्धांत यही है, कि सच्चा ब्रह्मरूप इनसे भिन्न है (केन. १. २-८)। इस ब्रह्मके लक्षणका वर्णन करते समय कई स्थानोंमें तो "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तैत्ति. २. १) या "विज्ञानमानंदं ब्रह्म" (बृ. ३. ९. २८) कहा है। अर्थात् ब्रह्म सत्य (सत्), ज्ञान (चित्) और आनंदरूप है - अर्थात् सच्चिदानंदस्वरूप है - इस प्रकार सब गुणोंका तीनही गुणोंमें समावेश करके वर्णन किया गया है। और अन्य स्थानोंमें भगवद्गीताके समानही परस्परविरुद्ध गुणोंको एकत्र करके ब्रह्मका वर्णन इस प्रकार किया गया है, कि "ब्रह्म सत् भी नहीं और असत्भी नहीं" (ऋ. १०. १२९. १) अथवा "अणोरणीयान्- महतो महीयान्" अर्थात् अणुसेभी छोटा और बड़ेसेभी बड़ा है (कठ. २. २०) "तदेजति तन्नैजति तत् दूरे तद्वन्तिके" अर्थात् वह हिलता है और हिलताभी नहीं; वह दूर है और समीपभी है (ईश. ५; मुं. ३. १. ७); अथवा "सर्वेन्द्रियगुणाभासं होकरभी 'सर्वेन्द्रियविवर्जित' है (श्वेता. ३. १३)। मृत्युने नचिकेताको यह उपदेश किया है, कि अंतमें उपर्युक्त सब लक्षणोंको छोड़ दो और जो धर्म और अधर्मके, कृत और अकृतके, अथवा भूत और भव्यकेभी परे है, उसेही ब्रह्म जानो (कठ. २.१४)। इसी प्रकार महाभारतके नारायणीय धर्ममें ब्रह्मा रुद्रसे (मभा. शां. ३५१. ११),

अध्यात्म २०९ और मोक्षधर्ममें नारद शुकसे कहते हैं (मभा. ३३१. ४४)। बृहदारण्यकोपनिषद्- (बृ. २. ३. २) मेंभी पहले पृथिवी, जल और अग्नि — इन तीनोंको ब्रह्मका मूर्त रूप कहा है। फिर वायु तथा आकाशको अमूर्त रूप कह कर दिखाया है, कि इन अमूर्तोंके सारभूत पुरुषके रूप या रंग बदल जाते हैं; और अंतमें यह उपदेश किया है, कि 'नेति' 'नेति' अर्थात् अबतक जो कहा गया है, वह 'वह' नहीं है; वह ब्रह्म नहीं है — इन सब नामरूपात्मक मूर्त या अमूर्त पदार्थोंके परे जो 'अग्राह्य' या 'अवर्णनीय' है, उसेही परब्रह्म समझो (बृह. २. ३. ६ और वे. सू. ३. २. २२)। अधिक क्या कहें; जिन जिन पदार्थोंको कुछ नाम दिया जा सकता है, उन सबसेभी परे जो है, वही ब्रह्म है; उस ब्रह्मका अव्यक्त तथा निर्गुण स्वरूप दिखलानेके लिये 'नेति' 'नेति' एक छोटा-सा निर्देश, आदेश या सूत्रही हो गया है; और बृहदारण्यक उपनिषद्‌मेंही पुनः उसका चार बार प्रयोग हुआ है (बृह. ४. ९. २६; ४. २. ४; ४. ४. २२; ४. ५. १५)। इसी प्रकार दूसरे उपनिषदोंमेंभी परब्रह्मके निर्गुण और अचिंत्य रूपके वर्णन पाये जाते हैं। जैसे “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” (तैत्ति. २. ९); अद्रेश्यं. (अदृश्य), अग्राह्यं' (मुं. १. १. ६) “न चक्षुषा गृह्यते नाऽपि वाचा” (मुं. ३. १. ८); नेत्रोंसे न दिखनेवाला अथवा वाणीमे कहा न जानेवाला अथवा —

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते॥

अर्थात् वह परब्रह्म पंचमहाभूतोंके शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध — इन पाँच गुणोंसे रहित, अनादि, अनंत और अव्यय है (कठ. ३. १५; वे. सू. ३. २. २२-३०)। महाभारतांतर्गत शांतिपर्वमें नारायणीय या भागवतधर्मके वर्णनमेंभी भगवानने नारदको अपना सच्चा स्वरूप “अदृश्य, अघ्रेय, अस्पृश्य, निर्गुण, निष्कल (निरव- यव), अज, नित्य, शाश्वत और निष्क्रिय” बतला कर कहा है, कि “वही सृष्टिकी उत्पत्ति तथा लय करनेवाला त्रिगुणातीत परमेश्वर है;” और इसीको “वासुदेव- परमात्मा” कहते हैं (मभा. शां. ३३९. २१-२८)।

उपर्युक्त वचनोंसे यह प्रकट होगा, कि न केवल भगवद्गीतामेंही, वरन् महा- भारतांतर्गत नारायणीय या भागवत धर्ममें और उपनिषदोंमेंभी परमात्माका अव्यक्त स्वरूपही व्यक्त स्वरूपसे श्रेष्ठ माना गया है; और यही अव्यक्त श्रेष्ठ स्वरूप वहाँ तीन प्रकारसे वर्णित है; अर्थात् सगुण, सगुण-निर्गुण ओर अंतमें केवल निर्गुण। प्रश्न यह है, कि अव्यक्त और श्रेष्ठ स्वरूपके उक्त तीन परस्परविरोधी रूपोंका मेल किस तरह किया जावे? यह कहा जा सकता है, कि इन तीनोंमेंसे जो सगुण- निर्गुण अर्थात् उभयात्मक रूप है, वह सगुणसे निर्गुणमें (अथवा अज्ञेयमें) जानेकी सीढ़ी या साधन है। क्योंकि, पहले सगुण रूपका ज्ञान होनेपरही, धीरे धीरे एक गी. र. १४