भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

अध्यात्म २०१ उपाय नहीं है ( कठ. ४. १)। मनुष्य केवल अपनी बुद्धिकी तीव्रतासे उक्त आत्म प्रतीतिकी पोषक भिन्न भिन्न युक्तियाँ बतला सकेगा; परंतु इससे उस मूल प्रतीतिकी प्रामाणिकतामें रत्तीभरभी न्यूनाधिकता नहीं हो सकती। भगवद्गीताकी गणना स्मृतिग्रंथोंमें की जाती है सही; परंतु पहले प्रकरणके आरंभहीमें हम कह चुके हैं, कि इस विषयमें गीताकी योग्यता उपनिषदोंकी बराबरीकी मानी जाती है। अतएव इस प्रकरणमें अब आगे चल कर सिर्फ़ यह बतलाया जायगा, कि प्रकृतिके परे जो अचिंत्य पदार्थ है, उसके विषयमें गीता और उपनिषदोंमें कौन-कौनसे सिद्धान्त किये गये हैं; और उनके कारणोंका ( अर्थात् शास्त्ररीतिसे उनकी उपपत्तिका ) विचार पीछे किया जायगा। सांख्यवादियोंका द्वैत - प्रकृति और पुरुष - भगवद्गीताको मान्य नहीं है। भगवद्गीताके अध्यात्मज्ञानका और वेदान्तशास्त्रकाभी पहला सिद्धान्त यह है, कि प्रकृति और पुरुषसेभी परे एक सर्वव्यापक, अव्यक्त और अमृत तत्त्व है, जो चर-अचर सृष्टिका मूल है। सांख्योंकी प्रकृति यद्यपि अव्यक्त है, तथापि वह त्रिगुणात्मक अर्थात् सगुण है। परंतु प्रकृति और पुरुषका विचार करते समय भगवद्गीताके आठवें अध्यायके बीसवें श्लोकमें (इस प्रकरणके आरंभमेंभी यह श्लोक दिया गया है) कहा है, कि जो सगुण है वह नाशवान् है; इसलिये इस अव्यक्त और सगुण प्रकृति- काभी नाश हो जानेपर अंतमें जो कुछ अव्यक्त शेष रह जाता है, वही सारी सृष्टिका सच्चा और नित्य तत्त्व है। और आगे पन्द्रहवें अध्यायमें (गीता. १५. १६) क्षर और अक्षर - व्यक्त और अव्यक्त - इस भाँति सांख्यशास्त्रके अनुसार दो तत्त्व बतलाकर यह वर्णन किया है :- उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ अर्थात्, जो इन दोनोंसेभी भिन्न है, वही उत्तम पुरुष है; उसीको परमात्मा कहते हैं; वही अव्यय और सर्वशक्तिमान् है; और वही तीनों लोगोंमें व्याप्त हो कर उनकी रक्षा करता है। यह पुरुष क्षर और अक्षर (अर्थात् व्यक्त और अव्यक्त) इन दोनोंसेभी परे है। इसलिये इसे 'पुरुषोत्तम' कहा है (गीता. १५. १८)। महाभारतमेंभी भृगु ऋषिने भरद्वाजमे 'परमात्मा' शब्दकी व्याख्या बतलाते हुए कहाँ है :- आत्मा क्षेत्रज्ञ इत्युक्तः संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । तैरेव तु विनिर्मुक्तः परमात्मेत्युदाहृतः ॥ अर्थात् "जब आत्मा प्रकृतिमें या शरीरमें बद्ध रहता है, तब उसे क्षेत्रज्ञ या जीवात्मा कहते हैं; और वही प्राकृत गुणोंसे यानी प्रकृति या शरीरके गुणोंसे मुक्त होनेपर 'परमात्मा' कहलाता है" (मभा. शां. १८७. २४)। संभव है, कि 'परमात्मा' की उपर्युक्त दो व्याख्याएं भिन्न भिन्न जान पड़ें; परंतु वे भिन्न भिन्न नहीं हैं। क्षर-अक्षर सृष्टि और जीव (अथवा सांख्यशास्त्रके अनुसार अव्यक्त प्रकृति और पुरुष) इन