श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
दोनोंसेभी परे एकही परमात्मा है। इसलिये यह कहा जाता है, कि वह क्षर-अक्षरके परे है; और कभी कहा जाता है, कि वह जीवके या जीवात्माके (पुरुषके) परे है। एवं एकही परमात्माकी ऐसी द्विविध व्याख्याएं कहनेमें वस्तुतः कोई भिन्नता नहीं हो जाती। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर कालिदासनेभी कुमारसंभवमें परमेश्वरका वर्णन इस प्रकार किया है - “पुरुषके लाभके लिये उद्युक्त होनेवाली प्रकृतिभी तूही है; और स्वयं उदासीन रह कर उस प्रकृतिका द्रष्टाभी तूही है” (कुमा. २. १३) इसी भाँति गीतामें भगवान् कहते हैं, कि “मम योनिर्महद्ब्रह्म” यह प्रकृति मेरी योनि या मेरा एक स्वरूप है (१४. ३) और जीव या आत्माभी मेराही अंश है (१५. ७) सातवें अध्यायमेंभी कहा गया है :- भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ अर्थात् “पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार - इस तरह आठ प्रकारकी मेरी प्रकृति है; और इसके सिवा (अपरेयमितस्त्वन्यां) सारे संसारका धारण जिसने किया है, वह जीवभी मेरीही दूसरी प्रकृति है” (गीता ७. ४. ५)। महाभारतके शांतिपर्वमें सांख्योंके पचीस तत्त्वोंका कई स्थलोंपर विवेचन है; परंतु वहीं अंतमें यहभी कह दिया गया है, कि इन पचीस तत्त्वोंके परे एक छब्बीसवाँ (षड्विंश) परमतत्त्व है; जिसे पहचाने बिना मनुष्य 'बुद्ध' नहीं हो सकता (मभा. शां. ३०८)। सृष्टिके पदार्थोंका जो ज्ञान हमें अपनी ज्ञानेंद्रियोंसे होता है, वही हमारी सारी सृष्टि है। अतएव प्रकृति या सृष्टीहीको कई स्थानोंपर 'ज्ञात' कहा है और इसी दृष्टिसे पुरुष 'ज्ञाता' कहा जाता है (मभा. शां. ३०६. ३५-४१)। परंतु जो सच्चा ज्ञेय है (गीता १३. १२) वह प्रकृति और पुरुष - ज्ञान और ज्ञातासेभी - परे है। इसलिये भगवद्गीतामें उसे परमपुरुष कहा है। तीनों लोकोंको व्याप्त कर उन्हें सदैव धारण करनेवाला जो यह परमपुरुष या परपुरुष है, उसे पहचानो; वह एक है, अव्यक्त है, नित्य है, अक्षर है - यह बात केवल भगवद्- गीताही नहीं, किंतु वेदान्तशास्त्रके सारे ग्रंथ एक स्वरसे कह रहे हैं। सांख्यशास्त्रमें 'अक्षर' और 'अव्यक्त' शब्दों या विशेषणोंका प्रयोग प्रकृतिके लिये किया जाता है। क्योंकि सांख्योंका सिद्धान्त है, कि प्रकृतिकी अपेक्षा अधिक सूक्ष्म और कोई भी मूलकारण इस जगत्का नहीं है (सां. का. ६१)। परंतु यदि वेदान्तकी दृष्टिसे देखें, तो परब्रह्मही एक अ-क्षर है, यानी उसका कभी नाश नहीं होता; और वही अव्यक्त है - अर्थात् इंद्रियगोचर नहीं है। अतएव इस भेदपर पाठक सदा ध्यान रखें, कि भगवद्गीतामें 'अक्षर' और 'अव्यक्त' शब्दोंका उपयोग प्रकृ- तिसे परेके परब्रह्मके स्वरूपको दिखलानेके लियेभी किया गया है (गीता ८. २०; ११. ३७; १२. १६, १७)। जब इस प्रकार वेदान्तकी दृष्टिका स्वीकार किया गया तब इसमें संदेह नहीं, कि प्रकृतिको 'अक्षर' कहना उचित नहीं है - चाहे