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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

२०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

दोनोंसेभी परे एकही परमात्मा है। इसलिये यह कहा जाता है, कि वह क्षर-अक्षरके परे है; और कभी कहा जाता है, कि वह जीवके या जीवात्माके (पुरुषके) परे है। एवं एकही परमात्माकी ऐसी द्विविध व्याख्याएं कहनेमें वस्तुतः कोई भिन्नता नहीं हो जाती। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर कालिदासनेभी कुमारसंभवमें परमेश्वरका वर्णन इस प्रकार किया है - “पुरुषके लाभके लिये उद्युक्त होनेवाली प्रकृतिभी तूही है; और स्वयं उदासीन रह कर उस प्रकृतिका द्रष्टाभी तूही है” (कुमा. २. १३) इसी भाँति गीतामें भगवान् कहते हैं, कि “मम योनिर्महद्ब्रह्म” यह प्रकृति मेरी योनि या मेरा एक स्वरूप है (१४. ३) और जीव या आत्माभी मेराही अंश है (१५. ७) सातवें अध्यायमेंभी कहा गया है :- भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ अर्थात् “पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार - इस तरह आठ प्रकारकी मेरी प्रकृति है; और इसके सिवा (अपरेयमितस्त्वन्यां) सारे संसारका धारण जिसने किया है, वह जीवभी मेरीही दूसरी प्रकृति है” (गीता ७. ४. ५)। महाभारतके शांतिपर्वमें सांख्योंके पचीस तत्त्वोंका कई स्थलोंपर विवेचन है; परंतु वहीं अंतमें यहभी कह दिया गया है, कि इन पचीस तत्त्वोंके परे एक छब्बीसवाँ (षड्विंश) परमतत्त्व है; जिसे पहचाने बिना मनुष्य 'बुद्ध' नहीं हो सकता (मभा. शां. ३०८)। सृष्टिके पदार्थोंका जो ज्ञान हमें अपनी ज्ञानेंद्रियोंसे होता है, वही हमारी सारी सृष्टि है। अतएव प्रकृति या सृष्टीहीको कई स्थानोंपर 'ज्ञात' कहा है और इसी दृष्टिसे पुरुष 'ज्ञाता' कहा जाता है (मभा. शां. ३०६. ३५-४१)। परंतु जो सच्चा ज्ञेय है (गीता १३. १२) वह प्रकृति और पुरुष - ज्ञान और ज्ञातासेभी - परे है। इसलिये भगवद्गीतामें उसे परमपुरुष कहा है। तीनों लोकोंको व्याप्त कर उन्हें सदैव धारण करनेवाला जो यह परमपुरुष या परपुरुष है, उसे पहचानो; वह एक है, अव्यक्त है, नित्य है, अक्षर है - यह बात केवल भगवद्- गीताही नहीं, किंतु वेदान्तशास्त्रके सारे ग्रंथ एक स्वरसे कह रहे हैं। सांख्यशास्त्रमें 'अक्षर' और 'अव्यक्त' शब्दों या विशेषणोंका प्रयोग प्रकृतिके लिये किया जाता है। क्योंकि सांख्योंका सिद्धान्त है, कि प्रकृतिकी अपेक्षा अधिक सूक्ष्म और कोई भी मूलकारण इस जगत्‌का नहीं है (सां. का. ६१)। परंतु यदि वेदान्तकी दृष्टिसे देखें, तो परब्रह्मही एक अ-क्षर है, यानी उसका कभी नाश नहीं होता; और वही अव्यक्त है - अर्थात् इंद्रियगोचर नहीं है। अतएव इस भेदपर पाठक सदा ध्यान रखें, कि भगवद्गीतामें 'अक्षर' और 'अव्यक्त' शब्दोंका उपयोग प्रकृ- तिसे परेके परब्रह्मके स्वरूपको दिखलानेके लियेभी किया गया है (गीता ८. २०; ११. ३७; १२. १६, १७)। जब इस प्रकार वेदान्तकी दृष्टिका स्वीकार किया गया तब इसमें संदेह नहीं, कि प्रकृतिको 'अक्षर' कहना उचित नहीं है - चाहे

अध्यात्म २०३ वह प्रकृति अव्यक्त भलेही हो । सृष्टिके उत्पत्तिक्रमके विषयमें सांख्योंके सिद्धान्त गीताकोभी मान्य हैं। इसलिये उनकी निश्चित परिभाषामें कुछ अदलाबदल न कर, उन्हींके शब्दोंमें क्षर-अक्षर या व्यक्त-अव्यक्त-सृष्टिका वर्णन गीतामें किया गया है। परंतु स्मरण रहे, कि इस वर्णनसे प्रकृति और पुरुषके परे जो तीसरा उत्तम पुरुष है, उसके सर्वशक्तित्वमें कुछभी बाधा नहीं होने पाती। इसका परिणाम यह हुआ है, कि जहाँ भगवद्गीतामें परब्रह्मके स्वरूपका वर्णन किया गया है, वहाँ सांख्य और वेदान्तके मतान्तरका संदेह मिटानेके लिये (सांख्य) अव्यक्तकेभी परेका अव्यक्त और (सांख्य) अक्षरसेभी परेका अक्षर, इस प्रकारके शब्दोंका उपयोग करना पड़ा है। उदाहरणार्थ, इस प्रकरणके आरंभमें जो श्लोक दिया गया है, उसे देखो। सारांश, गीता पढ़ते समय इस बातका सदा ध्यान रखना चाहिये, कि 'अव्यक्त' और 'अक्षर' ये दोनों शब्द कभी सांख्योंकी प्रकृतिके लिये और कभी वेदान्तियोंके परब्रह्मके लिये अर्थात् दो प्रकारसे - गीतामें प्रयुक्त हुए हैं। वेदान्तकी दृष्टिसे, सांख्योंकी अव्यक्त प्रकृतिकेभी परेका दूसरा अव्यक्त तत्त्व जगतका मूलही है। जगत्के आदितत्त्वके विषयमें सांख्य और वेदान्तमें उपर्युक्त भेद है। आगे इस विषयका विवरण किया जायगा, कि इसी भेदसे अध्यात्मशास्त्रप्रतिपादित मोक्ष- स्वरूपभी सांख्योंके मोक्षस्वरूपसे कैसे भिन्न हो गया है। सांख्योंके द्वैत - प्रकृति और पुरुष - को न मानकर, जब यह मान लिया गया, कि इस जगतकी जड़में परमेश्वररूपी अथवा पुरुषोत्तमरूपी एक तीसराही नित्य तत्त्व है; और प्रकृति तथा पुरुष दोनों उसकी विभूतियाँ हैं; तब सहजही यह प्रश्न उत्पन्न होता है, कि उस तीसरे मूलभूत तत्त्वका स्वरूप क्या है: और प्रकृति तथा पुरुषसे उसका कौन-सा संबंध है ? प्रकृति, पुरुष और परमेश्वर इसी त्रयीको अध्यात्मशास्त्रमें क्रमसे जगत्, जीव और परब्रह्म कहते हैं, और इन तीनों वस्तुओंके स्वरूप तथा इनके पारस्परिक संबंधका निर्णय करनाही वेदान्तशास्त्रका प्रधान कार्य है। एवं उपनिषदोंमेंभी सर्वत्र यही चर्चा की गई है। परंतु सब वेदान्तियोंका मत इस त्रयीके विषयमें एक नहीं है। कोई कहते हैं, कि ये तीनों पदार्थ मूलमें एकही हैं, और कोई यह मानते हैं, कि जीव और जगत् परमेश्वरसे मूलहीमें थोड़े या अत्यंत भिन्न हैं। इसीसे वेदान्तियोंमें अद्वैती, विशिष्टाद्वैती, और द्वैती इस प्रकार भेद उत्पन्न हो गये हैं। यह सिद्धान्त सब लोगोंको एक-सा ग्राह्य है, कि जीव और जगतके सारे व्यवहार परमेश्वरकी इच्छासे होते हैं। परंतु कुछ लोग तो मानते हैं,' कि जीव, जगत् और परब्रह्म, इन तीनोंका मूलस्वरूप आकाशके समान एकरूप और अखंडित है, तथा दूसरे वेदान्ती कहते हैं, कि जड़ और चैतन्यका एक होना संभव नहीं। अतएव अनार या दाड़िमके फलमें यद्यपि अनेक दाने होते हैं, तोभी उससे जैसे फलकी एकता नष्ट नहीं होती, वैसेही जीव और जगत् यद्यपि परमेश्वरमें भरे हुए हैं, तथापि ये मूलमें उससे, भिन्न हैं; और उपनिषदोंमें जब ऐसा वर्णन आता है, कि तीनों 'एक' हैं; तब उसका

२०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अर्थ 'दाड़िमके फलके समान एक' जानना चाहिये । जब जीवके स्वरूपके विषयमें यह मतांतर उपस्थित हो गया, तब भिन्न भिन्न सांप्रदायिक टीकाकार अपने अपने मतके अनुसार उपनिषदों और गीताके शब्दोंकीभी खींचातानी करने लगे जिससे गीताका यथार्थ स्वरूप - उसमें प्रतिपादित सच्चा कर्मयोग विषय - तो एक ओर रह गया, और अनेक सांप्रदायिक टीकाकारोंके मतसे गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय यही हो गया, कि गीताप्रतिपादित वेदान्त द्वैतमतका है या अद्वैतमतका ! अस्तु, इसके बारेमें अधिक विचार करनेके पहले यह देखना चाहिये, कि जगत् ( प्रकृति ), जीव ( आत्मा अथवा पुरुष ), और परब्रह्मके ( परमात्मा अथवा पुरुषोत्तम ) परस्परसंबंधके विषयमें स्वयं भगवान् श्रीकृष्णही गीतामें क्या कहते हैं। आगेके विवेचनसे पाठकोंको विदित होगा कि इस विषयमें गीता और उपनिषदोंका एकही मत है, और गीतामें कहे गये सब विचार उपनिषदोंमें पहलेही आ चुके हैं। प्रकृति और पुरुषकेभी परे जो पुरुषोत्तम, परपुरुष, परमात्मा या परब्रह्म है, उसका वर्णन करते समय भगवद्गीतामें पहले उसके दो स्वरूप बतलाये गये हैं, यथा, व्यक्त और अव्यक्त ( आँखोंसे दिखनेवाला और आँखोंसे न दिखनेवाला ) । अब इसमें संदेह नहीं, कि व्यक्त स्वरूप अर्थात् इंद्रियगोचर रूप सगुणही होना चाहिये । अब शेष रहा अव्यक्त रूप । यह सच है, कि यह अव्यक्त रूप इंद्रियोंको अगोचर है। और अव्यक्त रूप यद्यपि इंद्रयोंको अगोचर है, तोभी इतनेहीसे यह नहीं कहा जा सकता, कि वह निर्गुणही हो । क्योंकि, यद्यपि वह हमारी आँखोंसे न दीख पड़े, तोभी उसमें सब प्रकारके गुण सूक्ष्म रूपसे रह सकते हैं। इसलिये अव्यक्तकेभी तीन भेद किये हैं, जैसे सगुण, सगुणनिर्गुण और निर्गुण । यहाँ 'गुण' शब्दमें उन सब गुणोंका समावेश किया गया है, कि जिनका ज्ञान मनुष्यको केवल उसकी बाह्येंद्रियोंसे नहीं होता, किंतु मनसेभी होता है। परमेश्वरके मूर्तिमान् अवतार भगवान् श्रीकृष्ण स्वयंसाक्षात् अर्जुनके सामने खड़े होकर उपदेश कर रहे थे । इसलिये गीतामें जगह- जगहपर अपने व्यक्तिस्वरूपको लक्ष करके उन्होंने अपने विषयमें प्रथम पुरुषका निर्देश इस प्रकार किया है - जैसे, "प्रकृति मेरा स्वरूप है" (गीता ९. ८), "जीव मेरा अंश है" ( गीता १५. ७ ), "सब भूतोंका अंतर्यामी आत्मा मैं हूँ" ( गीता १०. २० ), "संसारमें जितनी श्रीमान् या विभूतिमान् मूर्तियां हैं, वे सब मेरे अंशमे उत्पन्न हुई है" ( गीता १०. ४१ ), "मुझमें मन लगा कर मेरा भक्त हो" ( गीता. ९. ३४ ), "तो तू मुझीमें मिल जायगा," "तू मेरा प्रिय भक्त है, इसलिये मैं तुझे यह प्रतिज्ञापूर्वक बतलाता हूँ" (गीता १८. ६५)। और जब अपने विश्वरूपदर्शनसे अर्जुनको यह प्रत्यक्ष अनुभव करा दिया, कि सारी चराचर सृष्टि मेरे व्यक्त रूपमेंही साक्षात् भरी हुई है, तब भगवानने उसको यही उपदेश किया है, कि अव्यक्त रूपसे व्यक्त रूपकी उपासना करना अधिक सहज है । " इसलिये तू मुझमेंही अपना भक्तिभाव रख" (गीता १२. ८), "मैँही ब्रह्मका, अव्यक्त मोक्षका,

अध्यात्म २०५ शाश्वत धर्मका और अनंत सुखका मूल स्थान हूँ” (गीता १४. २७)। इससे विदित होगा, कि गीतामें आदिसे अंततक अधिकांशमें भगवानके व्यक्त स्वरूप- काही वर्णन किया गया है। इतनेहीसे केवल भक्तिके अभिमानी बहुतेरे पंडितों और टीकाकारोंने यह मत प्रकट किया है, कि गीतामें परमात्माका व्यक्त रूपही अंतिम साध्य माना गया है। परंतु उनका यह मत सच नहीं कहा जा सकता। क्योंकि उक्त वर्णनके साथही भगवानने स्पष्ट रूपसे कह दिया है, कि मेरा व्यक्त स्वरूप मायिक है, और उसके परेका जो अव्यक्त रूप - अर्थात् जो इंद्रियोंको अगोचर-है, वही मेरा सच्चा स्वरूप है। उदाहरणार्थ, भगवानने, सातवें अध्यायमें (गीता ७. २४) कहा है, कि :- अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ “यद्यपि मैं अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर हूँ, तोभी मूर्ख लोग मुझे व्यक्त समझते हैं, और व्यक्तसेभी परेके मेरे श्रेष्ठ तथा अव्यक्त रूपको नहीं पहचानते।” और इसके अगले श्लोकमें भगवान् कहते हैं, कि “मैं अपनी योगमायासे आच्छादित हूँ, इसलिये मूर्ख लोग मुझे नहीं पहचानते” (गीता ७. २५)। फिर चौथे अध्यायमें उन्होंने अपने व्यक्त रूपकी उत्पत्ति इस प्रकार बतलाई है, “मैं यद्यपि जन्मरहित और अव्यय हूँ, तथापि अपनीही प्रकृतिमें अधिष्ठित होकर मैं अपनी मायासे (स्वात्ममाया मे) जन्म लिया करता हूँ - अर्थात् व्यक्त होता रहता हूँ” (गीता ४. ६)। वे आगे सातवें अध्यायमें कहते हैं, “यह त्रिगुणात्मक प्रकृति मेरी दैवी माया है। इस मायाको जो पार कर जाते हैं, वे मुझमें समा जाते हैं, और इस मायासे जिनका ज्ञान नष्ट हो जाता है, वे मूढ नराधम मुझमें नहीं समा जा सकते।” (गीता ७. १४, १५)। अंतमें अठारहवें (गीता १८. ६१) अध्यायमें भगवानने उपदेश किया है, कि “हे अर्जुन ! सब प्राणियोंके हृदयमें जीवरूप परमात्माहीका निवास है; और वह अपनी मायासे यंत्रकी भांति सब प्राणियोंको घुमाता है।” भगवान्‌ने अर्जुनको जो विश्वरूप दिखाया है, वही नारदकोभी दिखलाया था। इसका वर्णन महाभारतके शांतिपर्वान्तर्गत नारायणीय प्रकरणमें (मभा. शां. ३३९) है; और हम पहलेही प्रकरणमें बतला चुके हैं, कि नारायणीय अर्थात् भागवतधर्मही गीतामें प्रतिपादित किया गया है। नारदको हजारों नेत्रों, रंगों, तथा अन्य गुणोंका विश्वरूप दिखलाकर भगवान्‌ने कहा :- माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद । सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि ॥ “तुम मेरा जो रूप देख रहे हो, वह मेरी उत्पन्न की हुई माया है। इससे तुम यह न समझो, कि मैं, सर्वभूतोंके गुणोंसे युक्त हूँ।” और यह फिरभी कहा है, कि “मेरा

२०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सच्चा स्वरूप सर्वव्यापी, अव्यक्त और नित्य है और उसे सिद्धपुरुषही पहचानते हैं" (मभा. शां. ३३९. ४४, ४८) । इससे कहना पड़ता है, कि गीतामें वर्णित भगवानका अर्जुनको दिखलाया हुआ विश्वरूपभी मायिक था ! सारांश, उपर्युक्त वचनोंसे इस विषयमें कुछ भी संदेह नहीं रह जाता, कि गीताका यही सिद्धान्त होना चाहिये, कि यद्यपि केवल उपासनाके लिये व्यक्त स्वरूपकी प्रशंसा गीतामें भगवान्‌ने की है; तथापि परमेश्वरका श्रेष्ठ स्वरूप अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचरही है; और अव्यक्तसे व्यक्त होनाही उसकी माया है। और इस मायासे पार होकर जब तक मनुष्यको मायाके परे परमात्माके, शुद्ध तथा अव्यक्त रूपका ज्ञान न हो, तबतक उसे मोक्ष नहीं मिल सकता। अब इसका अधिक विचार आगे करेंगे, कि माया क्या वस्तु है। ऊपर दिये गये वचनोंसे इतनी बात स्पष्ट है, कि यह मायावाद श्रीशंकराचार्यने नये सिरेसे नहीं उपस्थित किया है; किंतु उनके पहलेही भगवद्गीता, महाभारत और भागवतधर्ममेंभी वह ग्राह्य माना गया था। श्वेताश्वतरोपनिषद्‌मेंभी सृष्टिकी उत्पत्ति इस प्रकार कही गई है - "मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्" (श्वेता. ४. १०) - अर्थात् मायाही (सांख्योंकी) प्रकृति है और परमेश्वर उस मायाका अधिपति है, और वही अपनी मायासे विश्व निर्माण करता है। अब इतनी बात यद्यपि स्पष्ट हो चुकी, कि परमेश्वरका श्रेष्ठ स्वरूप व्यक्त नहीं, अव्यक्त है, तथापि यहाँ थोड़ा-सा विचार होनाभी आवश्यक है, कि परमात्माका यह श्रेष्ठ अव्यक्त स्वरूप सगुण है या निर्गुण। जब कि सगुण-अव्यक्तका हमारे सामने यह एक उदाहरण है, कि सांख्यशास्त्रकी प्रकृति अव्यक्त (अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर) होनेपरभी सगुण अर्थात् सत्त्व-रज-तम-गुणमय है; तब कुछ लोग यह कहते हैं, कि परमेश्वरका अव्यक्त और श्रेष्ठ रूपभी उसी प्रकार सगुण माना जावे। अपनी मायाहीसे क्यों न हो; परंतु जब कि वही अव्यक्त परमेश्वर व्यक्त सृष्टि निर्माण करता है (गीता ९. ८); और सब लोगोंके हृदयमें रहकर उनसे उनके सारे व्यापार करवाता है (गीता १८. ६१), जब की वह सब यज्ञोंका भोक्ता और प्रभु है (गीता ९. २४); जब कि प्राणियोंके सुखदुःख आदि सब 'भाव' उसीसे उत्पन्न होते हैं, (गीता १०. ५) और जब कि प्राणियोंके हृदयमें श्रद्धा उत्पन्न करनेवालाभी वही है; एवं "लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्" (गीता ७. २२) - प्राणियोंकी वासनाका फल देनेवालाभी वही है; तब तो यही बात सिद्ध होती है, कि वह अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर भलेही हो; तथापि वह दया, कर्तृत्व आदि गुणोंसे युक्त अर्थात् 'सगुण' अवश्यही होना चाहिये। परंतु इसके विरुद्ध भगवान् ऐसाभी कहते हैं, कि "न मां कर्माणि लिम्पन्ति" - मुझे कर्मोंका अर्थात् गुणोंकाभी कभी स्पर्श नहीं होता (गीता ४. १४), प्रकृतिके गुणोंसे मोहित होकर मूर्ख लोग आत्माहीको कर्ता मानते हैं (गीता ३. २७, १४. १९) अथवा, यह अव्यक्त और अकर्ता परमेश्वरही प्राणियोंके हृदयमें जीवरूपसे निवास करता है (गीता १३. ३१),

अध्यात्म २०७ और इसीलिये यद्यपि वह प्राणियोंके कर्तृत्व और कर्मसे वस्तुतः अलिप्त है, तथापि अज्ञानमें फँसे हुए लोग मोहित हो जाया करते हैं (गीता ५. १४, १५)। इस प्रकार अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर परमेश्वरके रूप - सगुण और निर्गुण - दोकेही तरह नहीं हैं किंतु इसके अतिरिक्त कही कही इन दोनोंको एकत्र मिलाकरभी अव्यक्त परमेश्वरका वर्णन किया गया है। उदाहरणार्थ, “भूतभृत् न च भूतस्थो” (गीता ९. ५) “मैं भूतोंका आधार होकरभी उनमें नहीं हूँ,” इस तरह नौवें और तेरहवें अध्यायमें “परब्रह्म न तो सत् है और न असत्” (गीता १३. १२), “सर्वेद्रियवान् होनेका जिसमें भास हो परंतु जो सर्वेद्रियरहित है, और निर्गुण हो कर गुणोंका उपभोग करनेवाला है” (गीता १३. १४), “दूर है और समीपभी है” (गीता १३. १५), “अविभक्त है और विभक्तभी दीख पड़ता है” (गीता १३. १६) - इस प्रकार परमेश्वरके स्वरूपका सगुण-निर्गुण-मिश्रित अर्थात् परस्पर- विरोधी वर्णनभी किया गया है। तथापि आरंभमें दूसरेही अध्यायमें कहा गया है, कि “यह आत्मा अव्यक्त, अचित्य और अविकार्य है” (गीता २. २५), और फिर तेरहवें अध्यायमें - “यह परमात्मा अनादि, निर्गुण और अव्यक्त है; इसलिये शरीरमें रहकरभी न तो यह कुछ करता है और न किसीमें लिप्त होता है” (गीता १३. ३१) - इस प्रकार परमात्माके शुद्ध, निर्गुण, निरवयव, निर्विकार, अचिंत्य अनादि और अव्यक्त रूपकी श्रेष्ठताका वर्णन गीतामें किया गया है। भगवद्गीताकी भाँति उपनिषदोंमेंभी अव्यक्त परमात्माका स्वरूप तीन प्रकारका पाया जाता है - अर्थात् कभी कभी उभयविध यानी सगुण-निर्गुण-मिश्रित और कभी सगुण, निर्गुण। इस बातकी कोई आवश्यकता नहीं, कि उपासनाके लिये सदा प्रत्यक्ष मूर्तिही नेत्रोंके सामने रहे। ऐसे स्वरूपकीभी उपासना हो सकती है, कि जो निराकार अर्थात् चक्षु आदि ज्ञानेंद्रियोंको गोचर भलेही न हो; तोभी मनको गोचर हुए बिना उसकी उपासना होना संभव नहीं है। उपासना कहते हैं, चिंतन, मनन, या ध्यानको और यदि चिंतित वस्तुका कोई रूप न हो, तो न सही; परंतु जब तक उसका अन्य कोईभी गुण मनको मालूम न हो जाय, तब तक मन चिंतन करेगाही किसका ? अतएव उपनिषदोंमें जहाँ जहाँ अव्यक्त अर्थात् नेत्रोंमें न दिखाई देनेवाले परमात्माकी उपासना (चिंतन, मनन, ध्यान) बतलाई गई है वहाँ वहाँ अव्यक्त परमेश्वर सगुणही कल्पित किया गया है। परमात्मामें कल्पित गुण उपासकके अधिकारानुसार न्यूनाधिक व्यापक या सात्त्विक होते हैं; और जिसकी जैसी निष्ठा हो, उसको वैसाही फलभी मिलता है। छांदोग्योपनिषद्में (छां. ३. १४. १) कहा है, कि “पुरुष ऋतुमय है। जिसका जैसा ऋतु (निश्चय) हो, उसे मृत्युके पश्चात् वैसाही फलभी मिलता है।” और भगवद्गीताभी कहती है, कि “देवताओंकी भक्ति करनेवाले देवताओंमें और पितरोंकी भक्ति करनेवाले पित- रोंमें जा मिलते हैं” (गीता ९. २५), अथवा “यो यच्छ्रद्धः स एव सः” - जिसकी

२०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जैसी श्रद्धा हो, उसे वैसी सिद्धि प्राप्त होती है (गीता १७. ३)। तात्पर्य यह है, कि उपासकके अधिकारभेदके अनुसार उपास्य अव्यक्त परमात्माके गुणभी उप- निषदोंमें भिन्न भिन्न कहे गये हैं। उपनिषदोंके इस प्रकरणको 'विद्या' कहते हैं। विद्या ईश्वरप्राप्तिका (उपासनारूप) मार्ग है; और यह मार्ग जिस प्रकरणमें बतलाया गया है, उसेभी 'विद्या'ही नाम अंतमें दिया जाता है। शांडिल्यविद्या (छां. ३. १४), पुरुषविद्या (छां. ३. १६, १७), पर्यंकविद्या (कौषी. १), प्राणोपासना (कौषी. २) इत्यादि अनेक प्रकारकी उपासनाओंका वर्णन उपनिषदोंमें किया गया है; और इस सबका विवेचन वेदान्तसूत्रोंके तृतीयाध्यायके तीसरे पादमें किया गया है। इस प्रकरणमें अव्यक्त परमात्माका सगुण वर्णन इस प्रकार है, कि वह मनोमय, प्राणशरीर, भारूप, सत्यसंकल्प, आकाशात्मा, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगंध और सर्वरस है (छां. ३. १४. २)। तैत्तिरीय उपनिषद्में तो अन्न, प्राण, मन, विज्ञान या आनंद

  • इन रूपोंमेंभी परमात्माकी बढ़ती हुई उपासना बतलाई गई है (तै. २. १-५; ३. २-६)। बृहदारण्यकमें (बृ. २. १) गार्ग्य बालाकीने अजातशत्रुको पहले पहल आदित्य, चंद्र, विद्युत्, आकाश, वायु, अग्नि, जल या दिशाओंमें रहनेवाले पुरुषोंकी ब्रह्मरूपसे उपासना बतलाई है; परंतु आगे अजातशत्रुने उससे यह कहा, कि सच्चा ब्रह्म इनकेभी परे है; और अंतमें प्राणोपासनाहीको मुख्य ठहराया है। इतनेहीसे यह परंपरा कुछ पूरी नहीं हो जाती। उपर्युक्त सब ब्रह्मरूपोंको प्रतीक, अर्थात् इन सबको उपासनाके लिये कल्पित गौण ब्रह्मस्वरूप अथवा ब्रह्मनिदर्शक चिन्ह कहते हैं; और जब यही गौणरूप किसी मूर्तिके रूपमें नेत्रोंके सामने रखा जाता है, तब उसीको 'प्रतिमा' कहते हैं। परंतु स्मरण रहे, कि सब उपनिषदोंका सिद्धांत यही है, कि सच्चा ब्रह्मरूप इनसे भिन्न है (केन. १. २-८)। इस ब्रह्मके लक्षणका वर्णन करते समय कई स्थानोंमें तो "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तैत्ति. २. १) या "विज्ञानमानंदं ब्रह्म" (बृ. ३. ९. २८) कहा है। अर्थात् ब्रह्म सत्य (सत्), ज्ञान (चित्) और आनंदरूप है - अर्थात् सच्चिदानंदस्वरूप है - इस प्रकार सब गुणोंका तीनही गुणोंमें समावेश करके वर्णन किया गया है। और अन्य स्थानोंमें भगवद्गीताके समानही परस्परविरुद्ध गुणोंको एकत्र करके ब्रह्मका वर्णन इस प्रकार किया गया है, कि "ब्रह्म सत् भी नहीं और असत्भी नहीं" (ऋ. १०. १२९. १) अथवा "अणोरणीयान्- महतो महीयान्" अर्थात् अणुसेभी छोटा और बड़ेसेभी बड़ा है (कठ. २. २०) "तदेजति तन्नैजति तत् दूरे तद्वन्तिके" अर्थात् वह हिलता है और हिलताभी नहीं; वह दूर है और समीपभी है (ईश. ५; मुं. ३. १. ७); अथवा "सर्वेन्द्रियगुणाभासं होकरभी 'सर्वेन्द्रियविवर्जित' है (श्वेता. ३. १३)। मृत्युने नचिकेताको यह उपदेश किया है, कि अंतमें उपर्युक्त सब लक्षणोंको छोड़ दो और जो धर्म और अधर्मके, कृत और अकृतके, अथवा भूत और भव्यकेभी परे है, उसेही ब्रह्म जानो (कठ. २.१४)। इसी प्रकार महाभारतके नारायणीय धर्ममें ब्रह्मा रुद्रसे (मभा. शां. ३५१. ११),

अध्यात्म २०९ और मोक्षधर्ममें नारद शुकसे कहते हैं (मभा. ३३१. ४४)। बृहदारण्यकोपनिषद्- (बृ. २. ३. २) मेंभी पहले पृथिवी, जल और अग्नि — इन तीनोंको ब्रह्मका मूर्त रूप कहा है। फिर वायु तथा आकाशको अमूर्त रूप कह कर दिखाया है, कि इन अमूर्तोंके सारभूत पुरुषके रूप या रंग बदल जाते हैं; और अंतमें यह उपदेश किया है, कि 'नेति' 'नेति' अर्थात् अबतक जो कहा गया है, वह 'वह' नहीं है; वह ब्रह्म नहीं है — इन सब नामरूपात्मक मूर्त या अमूर्त पदार्थोंके परे जो 'अग्राह्य' या 'अवर्णनीय' है, उसेही परब्रह्म समझो (बृह. २. ३. ६ और वे. सू. ३. २. २२)। अधिक क्या कहें; जिन जिन पदार्थोंको कुछ नाम दिया जा सकता है, उन सबसेभी परे जो है, वही ब्रह्म है; उस ब्रह्मका अव्यक्त तथा निर्गुण स्वरूप दिखलानेके लिये 'नेति' 'नेति' एक छोटा-सा निर्देश, आदेश या सूत्रही हो गया है; और बृहदारण्यक उपनिषद्‌मेंही पुनः उसका चार बार प्रयोग हुआ है (बृह. ४. ९. २६; ४. २. ४; ४. ४. २२; ४. ५. १५)। इसी प्रकार दूसरे उपनिषदोंमेंभी परब्रह्मके निर्गुण और अचिंत्य रूपके वर्णन पाये जाते हैं। जैसे “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” (तैत्ति. २. ९); अद्रेश्यं. (अदृश्य), अग्राह्यं' (मुं. १. १. ६) “न चक्षुषा गृह्यते नाऽपि वाचा” (मुं. ३. १. ८); नेत्रोंसे न दिखनेवाला अथवा वाणीमे कहा न जानेवाला अथवा —

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते॥

अर्थात् वह परब्रह्म पंचमहाभूतोंके शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध — इन पाँच गुणोंसे रहित, अनादि, अनंत और अव्यय है (कठ. ३. १५; वे. सू. ३. २. २२-३०)। महाभारतांतर्गत शांतिपर्वमें नारायणीय या भागवतधर्मके वर्णनमेंभी भगवानने नारदको अपना सच्चा स्वरूप “अदृश्य, अघ्रेय, अस्पृश्य, निर्गुण, निष्कल (निरव- यव), अज, नित्य, शाश्वत और निष्क्रिय” बतला कर कहा है, कि “वही सृष्टिकी उत्पत्ति तथा लय करनेवाला त्रिगुणातीत परमेश्वर है;” और इसीको “वासुदेव- परमात्मा” कहते हैं (मभा. शां. ३३९. २१-२८)।

उपर्युक्त वचनोंसे यह प्रकट होगा, कि न केवल भगवद्गीतामेंही, वरन् महा- भारतांतर्गत नारायणीय या भागवत धर्ममें और उपनिषदोंमेंभी परमात्माका अव्यक्त स्वरूपही व्यक्त स्वरूपसे श्रेष्ठ माना गया है; और यही अव्यक्त श्रेष्ठ स्वरूप वहाँ तीन प्रकारसे वर्णित है; अर्थात् सगुण, सगुण-निर्गुण ओर अंतमें केवल निर्गुण। प्रश्न यह है, कि अव्यक्त और श्रेष्ठ स्वरूपके उक्त तीन परस्परविरोधी रूपोंका मेल किस तरह किया जावे? यह कहा जा सकता है, कि इन तीनोंमेंसे जो सगुण- निर्गुण अर्थात् उभयात्मक रूप है, वह सगुणसे निर्गुणमें (अथवा अज्ञेयमें) जानेकी सीढ़ी या साधन है। क्योंकि, पहले सगुण रूपका ज्ञान होनेपरही, धीरे धीरे एक गी. र. १४

२१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र एक गुणका त्याग करनेसे निर्गुण स्वरूपका अनुभव हो सकता है; और इसी रीतिसे ब्रह्मप्रतीककी बढ़ती हुई उपासना उपनिषदोंमें बतलाई गई है। उदाहरणार्थ, तैत्तिरीय उपनिषद्‌की भृगुवल्लीमें वरुणने भृगुको पहले यही उपदेश किया है, कि अन्नही ब्रह्म है; फिर क्रमक्रमसे प्राण, मन, विज्ञान और आनंद - इन ब्रह्मरूपोंका ज्ञान उसे करा दिया है। (तैत्ति. ३. २-६) अथवा ऐसाभी कहा जा सकता है, कि गुण- बोधक विशेषणोंसे निर्गुण रूपका वर्णन करना असंभव है। अतएव परस्परविरोधी विशेषणोंसेही उसका वर्णन करना पड़ता है। इसका कारण यह है, कि जब हम किसी वस्तुके संबंधमें 'दूर' या 'सत्' शब्दोंका उपयोग करते हैं, तब हमें किसी अन्य वस्तुके 'समीप' या 'असत्' होनेकाभी अप्रत्यक्ष रूपसे बोध हो जाया करता है। परंतु यदि एकही ब्रह्म सर्वव्यापी है, तो परमेश्वरको 'दूर' या 'सत्' कहकर 'समीप' या 'असत्' किस कहें? ऐसी अवस्थामें “दूर नहीं, समीप नहीं” “सत् नहीं असत् नहीं” - इस प्रकारकी भाषाका उपयोग करनेसे दूर और समीप, सत् और असत् इत्यादि परस्परसापेक्ष गुणोंकी जोड़ियाँभी लगा दी जाती हैं। और यह बोध होनेके लिये परस्परविरुद्ध विशेषणोंकी इस भाषाकाही व्यवहारमें उपयोग करना पड़ता है, कि जो कुछ शेष निर्गुण, सर्वव्यापी, सर्वदा निरपेक्ष और स्वतंत्र बचा है, वही सच्चा ब्रह्म है (गीता १३. १२)। जो कुछ है वह सब ब्रह्मही है। इसलिये दूर वही, समीपभी वही, सत्‌भी वही और असत्‌भी वही है। अतएव दूसरी दृष्टिसे उसी ब्रह्मका एकही समय परस्परविरोधी विशेषणोंके द्वारा वर्णन किया जा सकता है (गीता ११. ३७; १३. १५)। अब यद्यपि उभयविध सगुण-निर्गुण वर्णनकी उपपत्ति इस प्रकार बतला चुके; तथापि इस बातका स्पष्टीकरण रहही जाता है, कि एकही परमेश्वरके परस्पर-विरोधी दो स्वरूप -- सगुण और निर्गुण - कैसे हो सकते हैं? माना कि जब अव्यक्त परमेश्वर व्यक्त रूप अर्थात् इंद्रियगोचर रूप धारण करता है, तब वह उसकी माया कहलाती है; परंतु जब वह व्यक्त - यानी इंद्रिय- गोचर - न होते हुए अव्यक्त रूपमेंही निर्गुणका सगुण हो जाता है, तब उसे क्या कहें? उदाहरणार्थ, एकही निराकार परमेश्वरको कोई 'नेति नेति' कह कर निर्गुण मानते हैं; और कोई उसे सर्वगुणसंपन्न, सर्वकर्मा तथा दयालु कहकर सगुण मानते हैं। इसका रहस्य क्या है? उक्त दोनोंमें श्रेष्ठ पक्ष कौन-सा है? इस निर्गुण और अव्यक्त ब्रह्मसे सारी व्यक्त सृष्टि और जीवकी उत्पत्ति कैसे हुई? - इत्यादि बातोंका स्पष्टीकरण हो जाना आवश्यक है। यह कहना मानों अध्यात्मशास्त्रहीको जड़से काटना है, कि सब संकल्पोंका दाता अव्यक्त परमेश्वर तो यथार्थमें सगुण है; और उपनिषदोंमें या गीतामें निर्गुण स्वरूपका जो वर्णन किया गया है, वह केवल अतिशयोक्ति या व्यर्थ प्रशंसा है। क्योंकि जिन बड़े बड़े महात्माओं और ऋषियोंने मन एकाग्र करके सूक्ष्म तथा शांत विचारोंसे यह सिद्धान्त ढूँढ़ निकाला, कि “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” (तै. २. ९) - मनकोभी जो दुर्गम है और

अध्यात्म २११ वाणीभी जिसका वर्णन कर नहीं सकती, वही अंतिम ब्रह्मस्वरूप है - उनके आत्मा- नुभवको अतिशयोक्ति कैसे कहें ? केवल एक साधारण मनुष्य अपने क्षुद्र मनमें यदि अनंत और निर्गुण ब्रह्मको ग्रहण नहीं कर सकता; इसलिये यह कहना, कि सच्चा ब्रह्म सगुणही होना चाहिये; मानों सूर्यकी अपेक्षा अपने छोटेसे दीपकको श्रेष्ठ बत- लाना है। हां, यदि इस निर्गुण रूपकी उपपत्ति उपनिषदोंमें या गीतामें न दी गई होती तो बात दूसरी थी; परंतु यथार्थमें वैसा नहीं है। देखिये न ! भगवद्गीतामें तो स्पष्टही कहा है, कि परमेश्वरका सच्चा और श्रेष्ठ स्वरूप अव्यक्तही है; और व्यक्त सृष्टिका रूप धारण करना तो उसकी माया है (गीता ४. ६)। परंतु भगवानने यह भी कहा है, कि प्रकृतिके गुणोंसे "मोहमें फँसकर मूर्ख लोग (अव्यक्त और निर्गुण) आत्माकोही कर्ता मानते हैं" (गीता ३. २७-२९); किंतु ईश्वर तो कुछ नहीं करता। लोग केवल अज्ञानसे धोखा खाते हैं (गीता ५. १५)। अर्थात् भगवानने स्पष्ट शब्दोंमें यह उपदेश किया है, कि यद्यपि अव्यक्त आत्मा या परमेश्वर वस्तुतः निर्गुण है, (गीता १३. ३१) तोभी लोग उसपर 'मोह' या 'अज्ञान'से कर्तृत्व आदि गुणोंका अध्यारोप करते हैं; और उसे अव्यक्त सगुण बना देते हैं (गीता ७. २४)। उक्त विवेचनसे परमेश्वरके स्वरूपके 'विषय'में गीताके ये ही सच्चे सिद्धान्त मालूम होते हैं:- (१) गीतामें परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपका यद्यपि बहुतसा वर्णन है, तथापि परमेश्वरका मूल और श्रेष्ठ स्वरूप निर्गुण तथा अव्यक्तही है : किंतु मनुष्य मोह या अज्ञानसे उसे सगुण मानते हैं; (२) सांख्योंकी प्रकृति या उसका व्यक्त पसारा - यानी अखिल संसार - उस परमेश्वरकी माया है; और (३) सांख्योंका पुरुष यानी जीवात्मा यथार्थमें परमेश्वररूपी और परमे- श्वरके समान ही निर्गुण और अकर्ता है, परंतु अज्ञानके कारण लोग उसे कर्ता मानते हैं। वेदान्तशास्त्रके सिद्धान्तभी ऐसेही हैं; परंतु उत्तर-वेदान्त-ग्रंथोंमें इन सिद्धान्तोंको बतलाते समय माया और अविद्यामें कुछ भेद किया गया है। उदाहरणार्थ, पंचदशीमें पहले यह बतलाया गया है, कि आत्मा और परब्रह्म दोनों मूलमें एकही यानी ब्रह्मस्वरूप हैं। और यह चित्स्वरूपी ब्रह्म जब मायामें प्रतिबिंबित होता है, तब सत्त्वरजतमगुणमयी (सांख्योंकी मूल) प्रकृतिका निर्माण होता है। परंतु आगे चलकर इस मायाकेही दो भेद - 'माया' और 'अविद्या' - किये गये हैं। और यह बतलाया गया है, कि जब मायाके तीन गुणोंमेंसे 'शुद्ध' सत्त्वगुणका उत्कर्ष होता है, तब उसे केवल माया कहते हैं; और इस मायामें प्रतिबिंबित होनेवाले ब्रह्मको सगुण यानी व्यक्त ईश्वर (हिरण्यगर्भ) कहते हैं। और यदि यही सत्त्वगुण 'अशुद्ध' हो, तो उसे 'अविद्या' कहते हैं; तथा उस अविद्यामें प्रतिबिंबित ब्रह्मको 'जीव' कहते हैं। (पंच. १. १५-१७) इस दृष्टिसे, यानी उत्तरकालीन वेदान्तकी दृष्टिसे देखें, तो एकही मायाके स्वरूपतः दो भेद करने पड़ते हैं - अर्थात् परब्रह्मसे 'व्यक्त ईश्वर'के निर्माण होनेका कारण माया और 'जीव'के निर्माण होनेका कारण अविद्या मानना

२१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पड़ता है। परंतु गीतामें इस प्रकार का भेद नहीं किया गया है। गीता कहती है, कि "जिस मायासे स्वयं भगवान् व्यक्त रूप यानी सगुण रूप धारण करते हैं (७. २५) अथवा जिस मायाके द्वारा अष्टधा प्रकृति अर्थात् सृष्टिकी सारी विभूतियां उनसे उत्पन्न होती हैं, (४. ६) उसी मायाके अज्ञानसे जीव मोहित होता है" (७. ४-१५) । 'अविद्या' शब्द गीतामें कहींभी नहीं आया है; और श्वेताश्वत- रोपनिषदमें जहाँ वह शब्द आया है, वहाँ उसका स्पष्टीकरणभी इस प्रकार किया है, कि मायाके प्रपंचकोही 'अविद्या' कहते हैं ( श्वेता. ५. १ ) । अतएव उत्तरकालीन वेदान्त ग्रंथोंमें केवल निरूपणकी सरलताके लिये - जीव और ईश्वरकी दृष्टिसे - किये गये सूक्ष्म भेद - अर्थात् माया और अविद्याको स्वीकार न कर हम 'माया', 'अविद्या' और 'अज्ञान' शब्दोंको समानार्थीही मानते हैं। और अब शास्त्रीय रीतिसे संक्षेपमें इस विषयका विवेचन करते हैं, कि त्रिगुणात्मक माया, अविद्या या अज्ञान और मोहका सामान्यतः तात्त्विक स्वरूप क्या है, और उसकी सहायतासे गीता तथा उपनिषदोंके सिद्धान्तोंकी उपपत्ति कैसे लग सकती है। निर्गुण और सगुण शब्द देखनेमें छोटे हैं; परंतु जब इसका विचार करने लगें, कि इन शब्दोंमें किन किन बातोंका समावेश होता है; तब सचमुच सारा ब्रह्मांड दृष्टिके सामने खड़ा हो जाता है। जैसे, इस संसारका मूल जो कि अनादि परब्रह्म है, जो एक निष्क्रिय और उदासीन है; तब उसीमें मनुष्यको इंद्रियोंको गोचर होनेवाले अनेक प्रकारके व्यापार या गुण कैसे उत्पन्न हुए ? तथा इस प्रकार उसकी अखंडता भंग कैसे हो गई ? अथवा जो मूलमे एकरूप है, उसीके बहुरूपी भिन्न भिन्न व्यक्त पदार्थ कैसे दिखाई देते हैं ? जो परब्रह्म निर्विकार है, और जिसमें खट्टा, मिठा, कडुवा या गाढ़ा-पतला अथवा शीत-उष्ण आदि भेद नहीं हैं, उसीमें नाना प्रकारकी रुचियाँ, न्यूनाधिक गाढ़ा-पतलापन या शीत और उष्ण, सुख और दुःख, प्रकाश और अँधेरा, मृत्यु और अमरता इत्यादि अनेक प्रकारके द्वंद्व कैसे उत्पन्न हुए ? जो परब्रह्म शांत और निर्वात है, उसीमें नाना प्रकारकी ध्वनियां और शब्द कैसे निर्माण होते हैं ? जिस परब्रह्ममें भीतर-बाहर या दूर-समीपका कोई भेद नहीं है, उसीमें आगे या पीछे, दूर या समीप, अथवा पूर्व-पश्चिम इत्यादि दिक्कृत या स्थलकृत भेद कैसे हो गये ? जो परब्रह्म अविकारी, त्रिकालाबाधित, नित्य और अमृत है, उसीसे न्यूनाधिक कालमानके नाशवान् पदार्थ कैसे बने ? अथवा जिसे कार्यकारणभावका स्पर्शभी नहीं होता, उसी परब्रह्मके कार्यकारणरूप - जैसे मिट्टी और घड़ा - क्यों दिखाई देते हैं ? ऐसेही औरभी अनेक विषयोंका उक्त छोटेसे दो शब्दोंमें समावेश हुआ है। अथवा संक्षेपमें कहा जाय, तो अब इस बातका विचार करना है, कि एकहीमें अनेकता, निर्द्वंद्वमें नाना प्रकारकी द्वंद्वता, अद्वैतमें द्वैत और निःसंगमें संग कैसे हो गया। सांख्योंने तो उस झगड़ेसे बचनेके लिये यह द्वैत कल्पित कर लिया है, कि निर्गुण और नित्यपुरुषके साथ साथ त्रिगुणात्मक यानी सगुण

अध्यात्म २१३

प्रकृतिभी नित्य और स्वतंत्र है। परंतु जगतके मूलतत्त्वको ढूंढ़ निकालनेकी मनुष्यके मनकी जो स्वाभाविक प्रवृत्ति है, उसका समाधान इस द्वैतसे नहीं होता। इतनाही नहीं; किंतु यह द्वैत युक्तिवादकेभी सामने टिक नहीं पाता। इसलिये प्रकृति और पुरुषकेभी परे जाकर उपनिषद्कारोंने यह सिद्धान्त स्थापित किया, कि सच्चिदानंद ब्रह्मसेभी श्रेष्ठ श्रेणीका 'निर्गुण' ब्रह्मही जगतका मूल है। परंतु अब इसकी उपपत्ति देनी चाहिये, कि निर्गुणसे सगुण कैसे हुआ। क्योंकि सांख्यके समान वेदान्तकाभी यह सिद्धान्त है, कि जो वस्तु नहीं है, वह होही नहीं सकती; और उससे, 'जो वस्तु है' उसकी कभी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इस सिद्धान्तके अनुसार निर्गुण (अर्थात् जिसमें गुण नहीं हैं उस) ब्रह्मसे सगुण सृष्टिके पदार्थ (कि जिनमें गुण हैं) उत्पन्न हो नहीं सकते। तो फिर सगुण आया कहांसे? यदि कहें कि सगुण कुछ नहीं है, तो वह प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर है। और यदि निर्गुणके समान सगुणकोभी सत्य मानें; तो हम देखते हैं, कि इंद्रियगोचर होनेवाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस आदि सब गुणोंके स्वरूप आज एक हैं, तो कल दूसरेही - अर्थात् वे नित्य परिवर्तनशील होनेके कारण नाशवान्, विकारी और अशाश्वत हैं। तब तो (ऐसी कल्पना करके कि परमेश्वर विभाज्य है) यही कहना होगा, कि सर्वव्यापी परमेश्वरभी सगुणोंके संबंधमें परिवर्तनशील एवं नाशवान् है। परंतु जो विभाज्य और नाशवान् होकर सृष्टिके नियमोंकी पकड़में नित्य परतंत्र रहता है, उसे परमेश्वरही कैसे कहें ? सारांश, चाहे यह मानो, कि इंद्रियगोचर सारे सगुण पदार्थ पंचमहाभूतोंसे निर्मित हुए हैं; अथवा सांख्यानुसार या आधिभौतिक दृष्टिसे यह अनुमान कर लो, कि इन सारे पदार्थोंका निर्माण एक ही अव्यक्त सगुण मूलप्रकृतिसे हुआ है। किसीभी पक्षका स्वीकार करो; यह बात निर्विवाद सिद्ध है, कि जब तक नाशवान् गुण इस मूल प्रकृतिसेभी छूट नहीं गये हैं, तबतक पंचमहाभूतोंको या प्रकृति रूप इस सगुण मूल पदार्थको जगतका अविनाशी, स्वतंत्र और अमृत तत्त्व नहीं कह सकते। अतएव जिसे प्रकृतिवादका स्वीकार करना है, उसे उचित है, कि वह या तो यह कहना छोड़ दे, कि परमेश्वर नित्य, स्वतंत्र और अमृतरूप है; या इस बातकी खोज करे, कि पंचमहाभूतोंके परे अथवा सगुण मूल प्रकृतिकेभी परे और कौनसा तत्त्व है। इसके सिवा अन्य कोई मार्ग नहीं है। जिस प्रकार मृगजलसे प्यास नहीं बुझती, या बालूसे तेल नहीं निकलता, उसी प्रकार प्रत्यक्ष नाशवान् वस्तुसे अमृतत्वकी प्राप्तिकी आशा करना भी व्यर्थ है। और इसीलिये याज्ञवल्क्यने अपनी स्त्री - मैत्रेयी - को स्पष्ट उपदेश किया है, कि चाहे जितनी संपत्ति क्यों न प्राप्त हो जावे; पर उससे अमृतत्वकी आशा करना व्यर्थ है - "अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन" (बृह. २. ४. २) अच्छा; अब यदि अमृतत्वको मिथ्या कहें; तो मनुष्योंको यह स्वाभाविक इच्छा दीख पड़ती है, कि वे किसी राजासे मिलनेवाले पुरस्कार या पारितोषिकका उपभोग न केवल अपने लिये वरन् पुत्रपौत्रादिके लियेभी आचन्द्रार्क - अर्थात्

२१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चिरकालके लिये - करना चाहते हैं। अथवा यहभी देखा जाता है, कि चिरकाल रहनेवाली या शाश्वत कीर्ति पानेका जब अवसर आ जाता है, तब मनुष्य अपने जीवनकीभी परवाह नहीं करता। ऋग्वेदके समान अत्यंत प्राचीन ग्रंथोंमेंभी पूर्व- ऋषियोंकी प्रार्थना है, कि "हे इंद्र ! तू हमें 'अक्षित श्रव' अर्थात् अक्षय कीर्ति या धन दे" (ऋ. १. ९. ७); अथवा "हे सोम ! तू मुझे वैवस्वत (यम) लोकमें अमर कर दे" (ऋ. ९. ११३. ८)। और, अर्वाचीन समयमें इसी दृष्टीको स्वीकार करके स्पेन्सर, कांट प्रभृति केवल आधिभौतिक पंडितभी यही कहते हैं, कि "इस संसारमें मनुष्यमात्रका नैतिक परम कर्तव्य यही है, कि वह किसी प्रकारके क्षणिक सुखमें न फँसकर वर्तमान और भावी मनुष्यजातिके चिरकालिक सुखके लिये उद्योग करे।" हमारे जीवनके पश्चात्के चिरकालिक कल्याणकी अर्थात् अमृतत्वकी यह कल्पना आई कहाँसे ? यदि कहें, कि यह स्वभावसिद्ध है; तो मानना पड़ेगा, कि इस नाशवान् देहके परे और कोई अमृत वस्तु अवश्य है। और यदि कहें, कि ऐसी कोई अमृत वस्तु नहीं है; तो हमें जिस मनोवृत्तिकी साक्षात् प्रतीति होती, उसका अन्य कोई कारणभी नहीं बतलाते बन पड़ता ! ऐसी कठिनाई आ पड़नेपर बहुतेरे आधिभौतिक पंडित यह उपदेश करते हैं, कि इन प्रश्नोंका कभी समाधानकारक उत्तर नहीं मिल सकता। अतएव इनका विचार न करके दृश्य सृष्टिके पदार्थोंके गुण- धर्मोंके परे अपने मनकी दौड़ कभी न जाने दो। यह उपदेश है तो सरल; परंतु मनुष्यके मनमें तत्त्वज्ञानकी जो स्वाभाविक लालसा होती है, उसका प्रतिरोध कौन और किस प्रकारसे कर सकता है ? और इस दुर्धर जिज्ञासाका यदि नाश कर डालें, तो फिर ज्ञानकी वृद्धि हो तो कैसे ? जबसे मनुष्य इस पृथ्वीतलपर उत्पन्न हुआ है, तभीसे वह इस प्रश्नका विचार करता चला आया है, कि "सारी दृश्य और नाशवान् सृष्टिका मूलभूत अमृततत्त्व क्या है ? और वह मुझे कैसे प्राप्त होगा ?" आधिभौतिक शास्त्रोंकी जितनी चाहे उन्नति हो; तथापि मनुष्यकी अमृततत्त्वसंबंधी ज्ञानकी स्वाभाविक प्रवृत्ति कभी कम होनेकी नहीं। आधिभौतिक शास्त्रोंकी चाहे जैसी वृद्धि हो तोभी सारे आधिभौतिक सृष्टिज्ञानको बगलमें दबाकर आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान सदा उसके आगेही दौड़ता रहेगा ! दो-चार हजार वर्षके पहले यही दशा थी; और अब पश्चिमी देशोंमेंभी वही बात दीख पड़ती है। और तो क्या; मनुष्यकी बुद्धिका ज्ञानलालसा जिस दिन छूटेगी, उस दिन उसके विषयमें यही कहना होगा, कि "स वै मुक्तोऽथवा पशुः।" दिक्कालसे अमर्यादित, अमृत, अनादि, स्वतंत्र, एकरूप, एक, निरंतर, सर्व- व्यापी और निर्गुण तत्त्वके अस्तित्वके विषयमें, अथवा उस निर्गुण तत्त्वसे सगुण सृष्टिकी उत्पत्तिके विषयमें जैसा व्याख्यान हमारे प्राचीन उपनिषदोंमें किया गया है, उससे अधिक सयुक्तिक व्याख्यान अन्य देशोंके तत्त्वज्ञोंने अबतक नहीं किया है। अर्वाचीन जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटने इस बातका सूक्ष्म विचार किया है, कि मनुष्यको

अध्यात्म २१५

बाह्य सृष्टिकी विविधता या भिन्नताका ज्ञान एकतासे क्यों और कैसे होता है ? और फिर उक्त उपपत्तिकोही उसने अर्वाचीन शास्त्रकी रीतिसे अधिक स्पष्ट कर दिया है। और हेगेल यद्यपि अपने विचारमें कांटसे कुछ आगे बढ़ा है, तथापि उसके सिद्धान्तभी वेदान्तसे आगे नहीं बढ़े हैं। शोपेनहरकाभी यही हाल है। उपनिषदोंके लैटिन भाषाके अनुवादका अध्ययन उसने किया था - और उसने यह बातभी लिख रखी है, कि "संसारके साहित्यके इन अत्युत्तम" ग्रंथोंसे कुछ विचार मैंने अपने ग्रंथोंमें लिये हैं। इस छोटेसे ग्रंथमें इन सब बातोंका विस्तारपूर्वक निरूपण करना संभव नहीं, कि उक्त गंभीर विचारों और उनके साधक-बाधक प्रमाणोंमें, अथवा वेदान्तके सिद्धान्तों और कांट प्रभृति पश्चिमी तत्त्वज्ञोंके सिद्धान्तोंमें समानता कितनी है और अंतर कितना है। इसी प्रकार इस बातकीभी विस्तारसे चर्चा नहीं कर सकते, कि उपनिषद् और वेदान्तसूत्र जैसे प्राचीन ग्रंथोंके वेदान्तमें और तदुत्तर- कालीन ग्रंथोंके वेदान्तमें छोटे-मोटे भेद कौनकौनसे हैं। अतएव भगवद्गीताके अध्यात्म-सिद्धान्तोंकी सत्यता, महत्त्व और उपपत्ति समझा देनेके लिये जिन जिन बातोंकी आवश्यकता हैं, सिर्फ़ उन्हीं बातोंका यहाँ दिग्दर्शन किया गया है; और इस चर्चाके लिये उपनिषद्, वेदान्त-सूत्र और उनके शांकरभाष्यका आधार प्रधान रूपसे लिया गया है। प्रकृति-पुरुषरूपी सांख्योक्त द्वैतके परे क्या है - इसका निर्णय करनेके लिये केवल द्रष्टा और दृश्य सृष्टिके द्वैतभेदपरही ठहर जाना उचित नहीं। किंतु इस बातकाभी सूक्ष्म विचार करना चाहिये, कि द्रष्टा पुरुषको बाह्य सृष्टिका जो ज्ञान होता है, उसका स्वरूप क्या है? वह ज्ञान किससे और किसका होता है ? बाह्य सृष्टिके पदार्थ मनुष्यको अपने नेत्रोंसे जैसे दिखाई देते हैं, वैसे तो वे गुण पशु- ओंकोभी दिखाई देते हैं। परंतु मनुष्यकी यह विशेषता है, कि आँख, कान इत्यादि ज्ञानेंद्रियोंसे उसके मनपर जो संस्कार हुआ करते हैं, उनका एकीकरण करनेकी विशेष शक्ति उसमें है, और इसीलिये बाह्य सृष्टिके पदार्थमात्रका ज्ञान उसको हुआ करता है। पहले क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें बतला चुके हैं, कि जिस एकीकरण-शक्तिका फल उपर्युक्त विशेषता है, वह शक्ति मन और बुद्धिकेभी परे है - अर्थात् वह आत्माकी शक्ति है। यह बात नहीं, कि किसी एकही पदार्थका ज्ञान उक्त रीतिसे होता हो; किंतु सृष्टिके भिन्न भिन्न पदार्थोंके कार्यकारणभाव आदि जो अनेक संबंध हैं - जिन्हें हम सृष्टिके नियम कहतें हैं - उनका ज्ञानभी इसी प्रकार हुआ करता है। इसका कारण यह है, कि यद्यपि हम भिन्न भिन्न पदार्थोंको देखते हैं, तथापि उनका कार्यकारण-संबंध प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता; किंतु हम उसे अपने मानसिक व्यापारोंसे निश्चित किया करते हैं। उदाहरणार्थ, जब कोई पदार्थ हमारे नेत्रोंके सामनेसे जाता है, तब उसका रूप और उसकी गति देखकर हम निश्चय करते हैं, कि यह एक 'फ़ौजी सिपाही' है; और यही संस्कार मनमें बना रहता है। इसके बाद जब कोई दूसरा पदार्थ उसी रूप और गतिमें दृष्टिके सामने आता है, तब वही

२१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मानसिक क्रिया फिर शुरू हो जाती है; और हमारी बुद्धिका निश्चय हो जाता है कि वहभी एक फौजी सिपाही है। इस प्रकार भिन्न भिन्न समयमें (एके बाद दूसरा) जो अनेक संस्कार हमारे मनपर होते रहते हैं, उन्हें हम अपनी स्मरणशक्तिसे याद कर एकत्र रखते हैं; और जब वह पदार्थसमूह हमारी दृष्टिके सामने आ जाता है, तब उन सब भिन्न भिन्न संस्कारोंका ज्ञान एकताके रूपमें होकर हम कहने लगते हैं, कि हमारे सामनेसे 'फौज' जा रही है। इस सेनाके पीछेसे आनेवाले पदार्थका रूप देखकर हम निश्चय करते हैं, कि वह 'राजा' है। और 'फौज'-संबंधी पहले संस्कारको तथा 'राजा'संबंधी इस नूतन संस्कारको एकत्र कर हम कह सकते हैं, कि यह "राजाकी सवारी जा रही है।" इसलिये कहना पड़ता है, कि सृष्टिज्ञान केवल इंद्रि- योंसे प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाला जड़ पदार्थ नहीं है; किंतु इंद्रियोंके द्वारा मनपर होने- वाले अनेक संस्कारों या परिणामोंका जो 'एकीकरण' 'द्रष्टा आत्मा' किया करता है, उसी एकीकरणका फल ज्ञान है। इसीलिये भगवद्गीतामेंभी ज्ञानका लक्षण इस प्रकार दिया है - "अविभक्तं विभक्तेषु" अर्थात् सच्चा ज्ञान वही है, कि जिससे विभक्त या निरालेपनकी अविभक्तता या एकताका बोध हो* (गीता १८.२०)। परंतु इस विषयका यदि पुनः सूक्ष्म विचार किया जावे, कि इंद्रियोंके द्वारा मनपर जो संस्कार पहले होते हैं, वे किसके हैं, तो जान पड़ेगा कि यद्यपि आंख, कान, नाक इत्यादि इंद्रियोंसे पदार्थके रूप, शब्द, गंध आदि गुणोंका ज्ञान हमें होता है। तथापि जिस द्रव्यमें ये बाह्य गुण हैं, उसके आंतरिक स्वरूपके विषयमें हमारी इंद्रियाँ हमें कुछभी नहीं बतला सकतीं। हम यह देखते हैं सही, कि 'गीली मिट्टी' से घड़ा बनता है; परंतु यह नहीं जान सकते कि, जिसे हम 'गीली मिट्टी' कहते हैं; उस पदार्थका यथार्थ तात्त्विक स्वरूप क्या है। चिकनाई, गीलापन, मैला रंग या गोलाकार (रूप) इत्यादि गुण जब इंद्रियोंके द्वारा मनको पृथक् पृथक् मालूम हो जाते हैं, तब उन संस्कारोंका एकीकरण करके 'द्रष्टा' आत्मा कहता है, कि "यह गीली मिट्टी है"; और आगे इसी द्रव्यकी (क्योंकि यह माननेके लिये कोई कारण नहीं, कि द्रव्यका तात्त्विक रूप बदल गया) गोल तथा पोली आकृति या रूप, ठन ठन आवाज और सूखापन इत्यादि गुण जब इंद्रियोंके द्वारा मनको मालूम हो जाते हैं, तब उनका एकीकरण करके 'द्रष्टा' उसे 'घड़ा' कहता है। सारांश, सारा भेद, 'रूप या आकार' मेंही होता रहता है। और जब इन्हीं गुणोंके संस्कारोंको (जो मन- पर हुआ करते हैं) 'द्रष्टा' आत्मा एकत्र कर लेता है, तब एकही तात्त्विक पदार्थको अनेक नाम प्राप्त हो जाते हैं। इसका सबसे सरल उदाहरण समुद्र और तरंगका या सोना और अलंकारका है। क्योंकि इन दोनों उदाहरणोंमें रंग, गाढ़ापन, * Cf. "Knowledge is first produced by the synthesis of what is manifold." Kant's Critique of Pure Reason, p. 64, Max-Muller's translation. 2nd Ed.

अध्यात्म २१७ पतलापन, वजन आदि गुण एकहीसे रहते हैं; और केवल रूप ( आकार ) तथा नाम यही दो गुण बदलते रहते हैं। इसीलिये वेदान्तमें ये सरल दृष्टान्त हमेशा पाये जाते हैं। सोना तो एक पदार्थ है; परंतु भिन्न भिन्न समयपर बदलनेवाले उसके आकारोंके जो संस्कार इंद्रियोंके द्वारा मनपर होते हैं, उन्हें एकत्र करके 'द्रष्टा' उस सोनेकोही – कि जो तात्त्विक दृष्टिसे एकही मूल द्रव्य है - कभी 'कड़ा', कभी 'अँगूठी' या कभी 'पँचलड़ी', 'पहूँची और कंगन' इत्यादि भिन्न भिन्न नाम दिया करता है। भिन्न भिन्न समयपर पदार्थोंको जो इस प्रकार नाम दिये जाते हैं, उन नामोंको, तथा पदार्थोंको जिन भिन्न भिन्न आकृतियोंके कारण वे नाम बदलते रहते हैं, उन आकृतियोंको उपनिषदोंमें 'नामरूप' कहते हैं; और इन्हींमें अन्य सब गुणों- काभी समावेश कर दिया जाता है ( छां. ६. ३ और ४; बृ. १. ४. ७ ) । और इस प्रकार समावेश होना ठीकभी है। क्योंकि कोईभी गुण लीजिये; उसका कुछ-न-कुछ नाम और रूप अवश्यही होगा। यद्यपि इन नामरूपोंमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहे, तथापि कहना पड़ता है कि - इन नामरूपोंके मूलमें आधारभूत कोई तत्त्व या द्रव्य है, जो इन नामरूपोंसे भिन्न है; और कभी बदलताही नहीं। जिस प्रकार पानीपर तरंगें आ जाती हैं, उसी प्रकार ये सब नामरूप किसी एकही मूल द्रव्यपर तरंगोंके समान हैं। यह सच है, कि हमारी इंद्रियां नामरूपके अतिरिक्त और कुछभी पहचान नहीं सकतीं; अतएव इन इंद्रियोंको उस मूल द्रव्यका ज्ञान होना संभव नहीं, कि जो नामरूपसे भिन्न है, परंतु उसका आधारभूत है। परंतु सारे संसारका आधारभूत यह तत्त्व भलेही अव्यक्त हो; अर्थात् इंद्रियोंसे जाना न जा सकता हो; तथापि हमको अपनी बुद्धिसे यही निश्चित अनुमान करना पड़ता है, कि वह सत् है - अर्थात् वह सचमुच सर्वकाल सब नामरूपोंके मूलमें तथा नामरूपोंमेंभी निवास करता है; और उसका कभी नाश नहीं होता। क्योंकि यदि इंद्रियगोचर नामरूपोंके अतिरिक्त मूलतत्त्वको कुछ मानेही नहीं, तो फिर 'कड़ा' 'कंगन' आदि पदार्थ भिन्न भिन्न हो जावेंगे। एवं इस समय हमें यह ज्ञान हुआ करता है, कि "वे सब एकही धातुके ( सोनेके ) बने हैं", उस ज्ञानके लिये कुछभी आधार नहीं रह जावेगा। ऐसी अवस्थामें केवल इतनाही कहते बनेगा, कि यह 'कड़ा' है; यह 'कंगन' है। यह कदापि न कह सकेंगे, कि कड़ा सोनेका है; और कंगनभी सोनेका है। अतएव न्यायतः यह सिद्ध होता है, कि 'कड़ा सोनेका है', "कंगन सोनेका है', इत्यादि वाक्योंमें 'है' शब्दसे जिस सोनेके साथ नामरूपात्मक 'कड़े' 'कंगन'का संबंध जोड़ा गया है, वह सोना केवल शशशृंगवत अभावरूप नहीं है। किंतु वह उस द्रव्यांशकाही बोधक है, कि जो सारे आभूषणोंका आधार है। इसी न्यायका उपयोग सृष्टिके सारे पदार्थोंमें करें, तो यह सिद्धान्त निकलता है, कि पत्थर, मिट्टी, चांदी, लोहा, लकड़ी, इत्यादि अनेक नामरूपात्मक पदार्थ, जो नजर आते हैं, वे सब किसी एकही नित्य द्रव्यपर भिन्न भिन्न नामरूपोंका मुलम्मा या

२१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गिल्ट बनकर उत्पन्न हुए हैं; अर्थात् सारा भेद केवल नामरूपोंका है, मूल द्रव्यका नहीं। भिन्न भिन्न नामरूपोंकी जड़में एकरूप एकही द्रव्य नित्य निवास करता है। “सब पदार्थोंमें इस प्रकारसे नित्यरूपसे सदैव रहना” – संस्कृतमें 'सत्तासामान्यत्व' कहलाता है। वेदान्तशास्त्रके उक्त सिद्धान्तकाही कांट आदि अर्वाचीन पश्चिमी तत्त्व- ज्ञानियोंनेभी स्वीकार किया है। नामरूपात्मक जगत्की जड़में नामरूपोंसे भिन्न, जो कुछ अदृश्य नित्य द्रव्य है, उसे कांटने अपने ग्रंथमें 'वस्तुतत्त्व' कहा है; और नेत्र आदि इंद्रियोंको गोचर होनेवाले नामरूपको 'बाहरी दृश्य' कहा है। * परंतु वेदान्त- शास्त्रमें नित्य बदलनेवाले नामरूपात्मक दृश्यको (जगत्) 'मिथ्या' या 'नाशवान्' और मूलद्रव्यको 'सत्य' या 'अमृत' कहते हैं। सामान्य लोग सत्यकी व्याख्या यों करते हैं, कि 'चक्षुर्वै सत्यं' अर्थात् जो आँखोंमें दीख पड़े वही सत्य है; और व्यवहारमेंभी देखते हैं, कि किसीने स्वप्नमें लाख रुपया पा लिया अथवा लाख रुपयेकी बात कानसे सुन ली, तो इस स्वप्नकी बातमें और सचमुच लाख रुपयेकी रकमके मिल पानेमें बड़ा भारी अंतर रहता है। इस कारण किसी दूसरेसे सुनी हुई और आँखोंसे प्रत्यक्ष देखी हुई – इन दोनों बातोंमें किसका अधिक विश्वास करे ? आँखोंका या कानों का ? इसी दुविधाको मिटानेके लिये बृहदारण्यक उपनिषद् (बृ. ५. १४. ४) में यह 'चक्षुर्वै सत्यं' वाक्य आया है। किंतु जिस शास्त्रमें रुपयेके खरेखोटे होनेका निश्चय 'रुपये'के रुपया गोलमोल सूरत और उसके प्रचलित नामसे करना है, वहाँ सत्यकी इस साक्षेप व्याख्याका क्या उपयोग होगा ? हम व्यवहारमें देखते हैं, कि यदि किसीकी बातचीतमें संगति नहीं है; और यदि घंटे-घंटेमें वह अपनी बात बदलने लगे, तो लोग उसे झूठा कहते हैं। फिर इसी न्यायसे 'रुपये'के नामरूपको (भीतरी द्रव्यको नहीं) खोटा अथवा झूठा कहनेमें क्या हानि है ? क्योंकि रुपयेका जो नामरूप आज इस घड़ी है, उसे दूर करके, उसके बदले 'करधनी' 'कटोरे'का नामरूप उसे दूसरे दिनही दिया जा सकता है; अर्थात् हम अपनी आँखोंसे देखते हैं कि यह नामरूप हमेशा बदलता रहता है – या उसीमें संगति नहीं होती। अब यदि कहे कि जो अपनी आँखोंसे दीख पड़ता है, उसके सिवा अन्य कुछ सत्य नहीं है; तो एकीकरणकी जिस मानसिक क्रियामें सृष्टिज्ञान होता है, वहभी तो आँखोंसे नहीं दीख पड़ती। अतएव उसेभी झूठ कहना पड़ेगा। इस कारण हमें जो कुछ ज्ञान होता है, उसेभी असत्य, झूठ कहना पड़ेगा। इनपर (और ऐसीही दूसरी

  • कांटने अपने Critique of Pure Reason नामक ग्रंथमें यह विचार किया है। नामरूपात्मक संसारकी जड़में जो द्रव्य है, उसे उसने 'डिंग आन झिश्' (Ding an sich—Thing in itself) कहा है, और हमने उसीका भाषांतर वस्तुतत्त्व किया है। नामरूपोंके बाहरी दृश्यको कांटने 'एरशायनुंग' (Ersch- einung-appearance) कहा है। कांट कहता है कि वस्तुतत्त्व अज्ञेय है।

अध्यात्म २१९ कठिनाइयोंपर) ध्यान देकर 'चक्षुर्वै सत्यं' जैसे सत्यके लौकिक और साक्षेप लक्षणको ठीक नहीं माना है। किंतु सर्वोपनिषद्में सत्यकी यही व्याख्या की है, कि सत्य वही है, जो अविनाशी है अर्थात् जिसका अन्य बातोंके नाश हो जानेपरभी कभी नाश नहीं होता। और इसी प्रकार महाभारतमेंभी सत्यका यही लक्षण बतलाया गया है :- सत्यं नामाऽव्ययं नित्यमविकारि तथैव च ।* अर्थात् "सत्य वही है कि जो अव्यय है अर्थात् जिसका कभी नाश नहीं होता; जो नित्य है अर्थात् सदासर्वदा बना रहता है; और अविकारी है अर्थात् जिसका स्वरूप कभी बदलता नहीं" (मभा. शां. १६२. १०)। अभी कुछ और थोड़ी देरमें कुछ कहनेवाले मनुष्यको झूठा कहनेका कारण यही है, कि वह अपनी बात- पर स्थिर नहीं रहता - इधर-उधर डगमगता रहता है। सत्यके इस निरपेक्ष लक्षणको स्वीकार कर लेनेपर कहना पड़ता है कि आँखोंसे दीख पड़नेवाला, पर हरघड़ीमें बदलनेवाला नामरूप मिथ्या है। और उस नामरूपसे ढँका हुआ और उसीके मूलमें सदैव एकही-सा स्थिर रहनेवाला अमृत वस्तुतत्त्वही - वह आँखोंसे भलेही न दीख पड़े - ठीक ठीक सत्य है। भगवद्गीतामें ब्रह्मका वर्णन इसी नीतिसे किया गया है - "यः सा सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति" (गीता ८. २०; १३. २७) - अक्षर ब्रह्म वही है, कि जो सब पदार्थ अर्थात् सभी पदार्थोंके नामरूपा- त्मक शरीर न रहनेपरभी नष्ट नहीं होता। महाभारतमें नाराणीय अथवा भागवत धर्मके निरूपणमें यही श्लोक पाठभेदसे फिर "यः स सर्वेषु भूतेषु"के स्थानमें 'भूतग्रामशरीरेषु' होकर आया है (मभा. शां. ३३९. २३)। ऐसेही गीताके दूसरे अध्यायके सोलहवें और सत्रहवें श्लोकोंका तात्पर्यभी वही है। वेदान्तमें जब आभूषणको 'मिथ्या' और सुवर्णको 'सत्य' कहते हैं, तब उसका यह मतलब नहीं है, कि वह जेवर निरुपयोगी या बिलकुल खोटा है - अर्थात् आँखोंसे दिखाई नहीं पड़ता, या मिट्टीपर पन्नी चिपका कर बनाया गया है - अथवा वह अस्तित्वमें हीही नहीं। यहाँ 'मिथ्या' शब्दका प्रयोग पदार्थके रंग, रूप आदि गुणोंके लिये और आकृतिके लिये अर्थात् ऊपरी दृश्यके लिये किया गया है। भीतरी द्रव्यसे उसका प्रयोजन नहीं है। स्मरण रहे, कि तात्त्विक द्रव्य तो सदैव 'सत्य' है। वेदान्ती यही देखता है, कि पदार्थमात्रके नामरूपात्मक आच्छादनके नीचे मूल कौनसा तत्त्व है; और तत्त्वज्ञानका सच्चा विषय हैभी यही। व्यवहारमें यह प्रत्यक्ष देखा जाता है, कि गहना गढ़वानेमें चाहे जितना मेहनताना देना पड़ा हो; पर आपत्तिके समय जब उसे बेचनेके लिये सराफ़की दूकानपर ले जाते हैं, तब वह साफ़ साफ़ कह देता है, * ग्रीनने real (सत् या सत्य) की व्याख्या बतलाते समय "whatever anything is really, it is unalterably कहा है (Prolegomena to Ethics § 25) ग्रीन की यह व्याख्या और महाभारतकी उक्त व्याख्या दोनो तत्त्वतः एकही है।

२२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कि "मैं यह नहीं जानना चाहता, कि गहना गढ़वानेमें तोलेके पिछे क्या उजरत देनी पड़ी है, यदि सोनेके चलत् भावमें इसे बेचना चाहो, तो हम ले लेंगे!" वेदान्तकी परिभाषामें इसी विचारको इस ढंगसे व्यक्त करेंगे :- सराफ़को गहना मिथ्या और उसका सोना भर सत्य दीख पड़ता है। इसी प्रकार यदि किसी नये मकानको बेचना हो, तो उसकी सुंदर बनावट ( रूप ) और सुविधाजनक रचना ( आकृति ) करनेमें जो खर्च लगा होगा, उसकी ओर खरीददार ज़राभी ध्यान नहीं देता। वह कहता है, कि ईंट, चूना, लकड़ी, पत्थर और मजदूरीकी लागतमें यदि बेचना चाहो, तो बेच डालो। इन दृष्टान्तोंसे वेदान्तियोंके इस कथनको पाठक भली-भाँति समझ जावेंगे, कि नामरूपात्मक जगत् मिथ्या है; और ब्रह्म सत्य है। "दृश्य जगत् मिथ्या है" इसका अर्थ यह नहीं, कि वह आँखोंसे तो दीखही पड़ता नहीं। किंतु इसका ठीक ठीक अर्थ यही है, कि (वह आँखोंसे तो दीख पड़ता है; पर ) एकही द्रव्यके नामरूप-भेदके कारण जगत्के बहुतेरे जो स्थलकृत अथवा काल- कृत दृश्य हैं, वे नाशवान् हैं; और इसीसे मिथ्या हैं। और इन सब नामरूपात्मक दृश्योंके आच्छादनमें छिपा हुआ सदैव वर्तमान, जो अविनाशी और अविकारी द्रव्य है, वही नित्य और सत्य है। सराफ़को कड़े, कंगन, गुंज और अँगूठियाँ खोटी जँचती हैं। उसे सिर्फ़ उनका सोना सच्चा जँचता है। परंतु सृष्टिके सुनारके कारखा- नेमें मूलमें ऐसा एक ही द्रव्य है, कि जिसको भिन्न भिन्न नामरूप दे कर उससे सोना, चाँदी, लोहा, पत्थर, लकड़ी, हवा-पानी आदि सारे गहने गढ़वाये जाते हैं। इसलिये सराफ़की अपेक्षा वेदान्ती कुछ और आगे बढ़कर सोना, चाँदी या पत्थर प्रभृति नामरूपोंको जेवरकेही समान मिथ्या समझकर सिद्धान्त करता है, कि इन सब पदार्थोंके मूलमें जो द्रव्य अर्थात् 'वस्तुतत्त्व' मौजूद है, वही सच्चा अर्थात् अविकारी सत्य है। इस वस्तुतत्त्वमें नामरूप आदि कोईभी गुण नहीं है। इस कारण इसे नेत्र आदि इंद्रियाँ कभी नहीं जान सकतीं। आँखोंसे न दीख पड़ने, नाकसे परंतु न सूँघे जाने अथवा हाथसे न टटोले जानेपरभी बुद्धिसे निश्चयपूर्वक यह अनुमान किया जाता है, कि अव्यक्त रूपसे वह होगा अवश्यही। न केवल इतनाही; बल्कि यहभी निश्चय करना पड़ता है, कि इस जगत्में कभीभी न बदलनेवाला 'जो कुछ' है, वह यही सत्य वस्तुतत्त्व है। जगत्का मूल सत्य इसीको कहते हैं। परंतु कुछ अनाड़ी विदेशी और स्वदेशी पंडितमन्यभी सत्य और मिथ्या शब्दोंके वेदान्तशास्त्रवाले पारिभाषिक अर्थपर ध्यान न देकर; और यह देखनेका कष्टभी न उठाते हुए, कि सत्य शब्दका जो अर्थ हमें सूझता है, उसकी अपेक्षा इसका कुछ और अर्थभी हो सकेगा या नहीं। यह कहकर अद्वैत वेदान्तका उपहास किया करते हैं, कि "हमें जो जगत् आँखोंसे प्रत्यक्ष दीख पड़ता है, उसेभी वेदान्ती लोग मिथ्या कहते हैं। भला, यहभी कोई बात हुई ? " परंतु यास्कके शब्दोंमें कह सकते हैं, कि अंधेको यदि खंभा नहीं सूझता, तो इसका दोषी खंभा नहीं है! छांदोग्य (छां. ६. १; और ७. १),

अध्यात्म २२१ बृहदारण्यक (बृ. १. ६. ३), मुंडक (मुं. ३. २. ८), और प्रश्न (प्र. ६. ५), आदि उपनिषदोंमें बारबार बतलाया गया है, कि नित्य बदलते रहनेवाले अर्थात् नाशवान् नामरूप सत्य नहीं हैं। जिसे सत्य अर्थात् नित्य, स्थिर तत्व देखना हो, उसे अपनी दृष्टिको इस नामरूपोंके परे पहुँचाना चाहिये। इन्हीं नामरूपोंको कठ (कठ. २. ५) और मुंडक (मुं. १. २. ९) आदि उपनिषदोंमें 'अविद्या' तथा अंतमें श्वेता- श्वतर (श्वे. ४. १०) उपनिषद्में 'माया' कहा है। भगवद्गीतामें 'माया', 'मोह' और 'अज्ञान' शब्दोंसे वही अर्थ विवक्षित है। जगत्के आरंभमें जो कुछ था, वह बिना नामरूपका था - अर्थात् निर्गुण और अव्यक्त था ! फिर आगे चलकर नाम- रूप मिल जानेसे वही व्यक्त और सगुण बन जाता है (बृ. १. ४. ७; छां. ६. १. २. ३)। अतएव विकारवान् अथवा नाशवान् नामरूपोंकोही 'माया' नाम देकर कहते हैं, कि यह सगुण अथवा दृश्य सृष्टि एक मूलद्रव्य अर्थात् ईश्वरकी मायाका खेल या लीला है। अब इस दृष्टिसे देखें, तो सांख्योंकी प्रकृति अव्यक्त भलेही बनी रहे; पर वह सत्वरजतम-गुणमयी है, अतः नामरूपोंसे युक्त मायाही है। इस प्रकृतिसे व्यक्त विश्वकी जो उत्पत्ति या पसारा होता है (जिसका वर्णन आठवें प्रकरणमें किया है), वहभी तो उस मायाका सगुण नामरूपात्मक विकार है। क्योंकि कोईभी गुण हो; वह इंद्रियोंको गोचर होनेवाला और इसीसे नामरूपात्मकही रहेगा। सारे आधिभौतिक शास्त्रभी इसी प्रकार मायाके वर्गमें आ जाते हैं। इतिहास, भूगर्भशास्त्र, विद्युच्छास्त्र, रसायनशास्त्र, पदार्थविज्ञान आदि कोईभी शास्त्र लीजिये; उसमें सब नामरूपात्मककाही तो विवेचन रहता है - अर्थात् यही वर्णन होता है, कि किसी पदार्थका एक नामरूप चला जाकर उसे दूसरा नामरूप कैसे मिलता है। उदाहरणार्थ, नामरूपके भेदकाही विचार इस शास्त्रमें इस प्रकार रहता है :- जैसे, पानी जिसका नाम है, उसको भाफ़ नाम कब और कैसे मिलता है, अथवा काले-कलूटे तारकोलसे लाल-हरे, नीले-पीले रँगनेके रंग (रूप) क्योंकर बनते हैं, इत्यादि। अतएव नामरूपोंमेंही उलझे हुए इन शास्त्रोंके अभ्याससे उस सत्य वस्तुका बोध नहीं हो सकता, कि जो नामरूपोंसे परे है। प्रकट है, कि जिसे सच्चे ब्रह्मस्वरूपका पता लगाना हो, उसको अपनी दृष्टि इन सब आधिभौतिक अर्थात् नामरूपात्मक शास्त्रोंसे परे पहुँचानी चाहिये। और यही अर्थ छांदोग्य उपनिषदमें सातवें अध्यायके आरंभकी कथामें व्यक्त किया गया है। कथाका आरंभ इस प्रकार है :- नारद ऋषि सनत्कुमार अर्थात् स्कंदके यहाँ जाकर कहने लगे, कि, “मुझे आत्म- ज्ञान बतलाओ” तब सनत्कुमार बोले, कि "पहले बतलाओ, तुमने क्या सीखा है, फिर उसके आगे मैं बतलाता हूँ।" इस पर नारदने कहा, कि "मैंने इतिहास- पुराणरूपी पाँचवें वेदसहित ऋग्वेद प्रभृति समग्र वेद, व्याकरण, गणित, तर्कशास्त्र, कालशास्त्र, नीतिशास्त्र, सभी वेदांग, धर्मशास्त्र, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या और सर्पदेवजनविद्या-प्रभृति सब कुछ पढ़ा है। परंतु जब उससे आत्मज्ञान नहीं हुआ,