भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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अध्यात्म २१३

प्रकृतिभी नित्य और स्वतंत्र है। परंतु जगतके मूलतत्त्वको ढूंढ़ निकालनेकी मनुष्यके मनकी जो स्वाभाविक प्रवृत्ति है, उसका समाधान इस द्वैतसे नहीं होता। इतनाही नहीं; किंतु यह द्वैत युक्तिवादकेभी सामने टिक नहीं पाता। इसलिये प्रकृति और पुरुषकेभी परे जाकर उपनिषद्कारोंने यह सिद्धान्त स्थापित किया, कि सच्चिदानंद ब्रह्मसेभी श्रेष्ठ श्रेणीका 'निर्गुण' ब्रह्मही जगतका मूल है। परंतु अब इसकी उपपत्ति देनी चाहिये, कि निर्गुणसे सगुण कैसे हुआ। क्योंकि सांख्यके समान वेदान्तकाभी यह सिद्धान्त है, कि जो वस्तु नहीं है, वह होही नहीं सकती; और उससे, 'जो वस्तु है' उसकी कभी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इस सिद्धान्तके अनुसार निर्गुण (अर्थात् जिसमें गुण नहीं हैं उस) ब्रह्मसे सगुण सृष्टिके पदार्थ (कि जिनमें गुण हैं) उत्पन्न हो नहीं सकते। तो फिर सगुण आया कहांसे? यदि कहें कि सगुण कुछ नहीं है, तो वह प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर है। और यदि निर्गुणके समान सगुणकोभी सत्य मानें; तो हम देखते हैं, कि इंद्रियगोचर होनेवाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस आदि सब गुणोंके स्वरूप आज एक हैं, तो कल दूसरेही - अर्थात् वे नित्य परिवर्तनशील होनेके कारण नाशवान्, विकारी और अशाश्वत हैं। तब तो (ऐसी कल्पना करके कि परमेश्वर विभाज्य है) यही कहना होगा, कि सर्वव्यापी परमेश्वरभी सगुणोंके संबंधमें परिवर्तनशील एवं नाशवान् है। परंतु जो विभाज्य और नाशवान् होकर सृष्टिके नियमोंकी पकड़में नित्य परतंत्र रहता है, उसे परमेश्वरही कैसे कहें ? सारांश, चाहे यह मानो, कि इंद्रियगोचर सारे सगुण पदार्थ पंचमहाभूतोंसे निर्मित हुए हैं; अथवा सांख्यानुसार या आधिभौतिक दृष्टिसे यह अनुमान कर लो, कि इन सारे पदार्थोंका निर्माण एक ही अव्यक्त सगुण मूलप्रकृतिसे हुआ है। किसीभी पक्षका स्वीकार करो; यह बात निर्विवाद सिद्ध है, कि जब तक नाशवान् गुण इस मूल प्रकृतिसेभी छूट नहीं गये हैं, तबतक पंचमहाभूतोंको या प्रकृति रूप इस सगुण मूल पदार्थको जगतका अविनाशी, स्वतंत्र और अमृत तत्त्व नहीं कह सकते। अतएव जिसे प्रकृतिवादका स्वीकार करना है, उसे उचित है, कि वह या तो यह कहना छोड़ दे, कि परमेश्वर नित्य, स्वतंत्र और अमृतरूप है; या इस बातकी खोज करे, कि पंचमहाभूतोंके परे अथवा सगुण मूल प्रकृतिकेभी परे और कौनसा तत्त्व है। इसके सिवा अन्य कोई मार्ग नहीं है। जिस प्रकार मृगजलसे प्यास नहीं बुझती, या बालूसे तेल नहीं निकलता, उसी प्रकार प्रत्यक्ष नाशवान् वस्तुसे अमृतत्वकी प्राप्तिकी आशा करना भी व्यर्थ है। और इसीलिये याज्ञवल्क्यने अपनी स्त्री - मैत्रेयी - को स्पष्ट उपदेश किया है, कि चाहे जितनी संपत्ति क्यों न प्राप्त हो जावे; पर उससे अमृतत्वकी आशा करना व्यर्थ है - "अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन" (बृह. २. ४. २) अच्छा; अब यदि अमृतत्वको मिथ्या कहें; तो मनुष्योंको यह स्वाभाविक इच्छा दीख पड़ती है, कि वे किसी राजासे मिलनेवाले पुरस्कार या पारितोषिकका उपभोग न केवल अपने लिये वरन् पुत्रपौत्रादिके लियेभी आचन्द्रार्क - अर्थात्