श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पड़ता है। परंतु गीतामें इस प्रकार का भेद नहीं किया गया है। गीता कहती है, कि "जिस मायासे स्वयं भगवान् व्यक्त रूप यानी सगुण रूप धारण करते हैं (७. २५) अथवा जिस मायाके द्वारा अष्टधा प्रकृति अर्थात् सृष्टिकी सारी विभूतियां उनसे उत्पन्न होती हैं, (४. ६) उसी मायाके अज्ञानसे जीव मोहित होता है" (७. ४-१५) । 'अविद्या' शब्द गीतामें कहींभी नहीं आया है; और श्वेताश्वत- रोपनिषदमें जहाँ वह शब्द आया है, वहाँ उसका स्पष्टीकरणभी इस प्रकार किया है, कि मायाके प्रपंचकोही 'अविद्या' कहते हैं ( श्वेता. ५. १ ) । अतएव उत्तरकालीन वेदान्त ग्रंथोंमें केवल निरूपणकी सरलताके लिये - जीव और ईश्वरकी दृष्टिसे - किये गये सूक्ष्म भेद - अर्थात् माया और अविद्याको स्वीकार न कर हम 'माया', 'अविद्या' और 'अज्ञान' शब्दोंको समानार्थीही मानते हैं। और अब शास्त्रीय रीतिसे संक्षेपमें इस विषयका विवेचन करते हैं, कि त्रिगुणात्मक माया, अविद्या या अज्ञान और मोहका सामान्यतः तात्त्विक स्वरूप क्या है, और उसकी सहायतासे गीता तथा उपनिषदोंके सिद्धान्तोंकी उपपत्ति कैसे लग सकती है। निर्गुण और सगुण शब्द देखनेमें छोटे हैं; परंतु जब इसका विचार करने लगें, कि इन शब्दोंमें किन किन बातोंका समावेश होता है; तब सचमुच सारा ब्रह्मांड दृष्टिके सामने खड़ा हो जाता है। जैसे, इस संसारका मूल जो कि अनादि परब्रह्म है, जो एक निष्क्रिय और उदासीन है; तब उसीमें मनुष्यको इंद्रियोंको गोचर होनेवाले अनेक प्रकारके व्यापार या गुण कैसे उत्पन्न हुए ? तथा इस प्रकार उसकी अखंडता भंग कैसे हो गई ? अथवा जो मूलमे एकरूप है, उसीके बहुरूपी भिन्न भिन्न व्यक्त पदार्थ कैसे दिखाई देते हैं ? जो परब्रह्म निर्विकार है, और जिसमें खट्टा, मिठा, कडुवा या गाढ़ा-पतला अथवा शीत-उष्ण आदि भेद नहीं हैं, उसीमें नाना प्रकारकी रुचियाँ, न्यूनाधिक गाढ़ा-पतलापन या शीत और उष्ण, सुख और दुःख, प्रकाश और अँधेरा, मृत्यु और अमरता इत्यादि अनेक प्रकारके द्वंद्व कैसे उत्पन्न हुए ? जो परब्रह्म शांत और निर्वात है, उसीमें नाना प्रकारकी ध्वनियां और शब्द कैसे निर्माण होते हैं ? जिस परब्रह्ममें भीतर-बाहर या दूर-समीपका कोई भेद नहीं है, उसीमें आगे या पीछे, दूर या समीप, अथवा पूर्व-पश्चिम इत्यादि दिक्कृत या स्थलकृत भेद कैसे हो गये ? जो परब्रह्म अविकारी, त्रिकालाबाधित, नित्य और अमृत है, उसीसे न्यूनाधिक कालमानके नाशवान् पदार्थ कैसे बने ? अथवा जिसे कार्यकारणभावका स्पर्शभी नहीं होता, उसी परब्रह्मके कार्यकारणरूप - जैसे मिट्टी और घड़ा - क्यों दिखाई देते हैं ? ऐसेही औरभी अनेक विषयोंका उक्त छोटेसे दो शब्दोंमें समावेश हुआ है। अथवा संक्षेपमें कहा जाय, तो अब इस बातका विचार करना है, कि एकहीमें अनेकता, निर्द्वंद्वमें नाना प्रकारकी द्वंद्वता, अद्वैतमें द्वैत और निःसंगमें संग कैसे हो गया। सांख्योंने तो उस झगड़ेसे बचनेके लिये यह द्वैत कल्पित कर लिया है, कि निर्गुण और नित्यपुरुषके साथ साथ त्रिगुणात्मक यानी सगुण