भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 258

अध्यात्म २११ वाणीभी जिसका वर्णन कर नहीं सकती, वही अंतिम ब्रह्मस्वरूप है - उनके आत्मा- नुभवको अतिशयोक्ति कैसे कहें ? केवल एक साधारण मनुष्य अपने क्षुद्र मनमें यदि अनंत और निर्गुण ब्रह्मको ग्रहण नहीं कर सकता; इसलिये यह कहना, कि सच्चा ब्रह्म सगुणही होना चाहिये; मानों सूर्यकी अपेक्षा अपने छोटेसे दीपकको श्रेष्ठ बत- लाना है। हां, यदि इस निर्गुण रूपकी उपपत्ति उपनिषदोंमें या गीतामें न दी गई होती तो बात दूसरी थी; परंतु यथार्थमें वैसा नहीं है। देखिये न ! भगवद्गीतामें तो स्पष्टही कहा है, कि परमेश्वरका सच्चा और श्रेष्ठ स्वरूप अव्यक्तही है; और व्यक्त सृष्टिका रूप धारण करना तो उसकी माया है (गीता ४. ६)। परंतु भगवानने यह भी कहा है, कि प्रकृतिके गुणोंसे "मोहमें फँसकर मूर्ख लोग (अव्यक्त और निर्गुण) आत्माकोही कर्ता मानते हैं" (गीता ३. २७-२९); किंतु ईश्वर तो कुछ नहीं करता। लोग केवल अज्ञानसे धोखा खाते हैं (गीता ५. १५)। अर्थात् भगवानने स्पष्ट शब्दोंमें यह उपदेश किया है, कि यद्यपि अव्यक्त आत्मा या परमेश्वर वस्तुतः निर्गुण है, (गीता १३. ३१) तोभी लोग उसपर 'मोह' या 'अज्ञान'से कर्तृत्व आदि गुणोंका अध्यारोप करते हैं; और उसे अव्यक्त सगुण बना देते हैं (गीता ७. २४)। उक्त विवेचनसे परमेश्वरके स्वरूपके 'विषय'में गीताके ये ही सच्चे सिद्धान्त मालूम होते हैं:- (१) गीतामें परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपका यद्यपि बहुतसा वर्णन है, तथापि परमेश्वरका मूल और श्रेष्ठ स्वरूप निर्गुण तथा अव्यक्तही है : किंतु मनुष्य मोह या अज्ञानसे उसे सगुण मानते हैं; (२) सांख्योंकी प्रकृति या उसका व्यक्त पसारा - यानी अखिल संसार - उस परमेश्वरकी माया है; और (३) सांख्योंका पुरुष यानी जीवात्मा यथार्थमें परमेश्वररूपी और परमे- श्वरके समान ही निर्गुण और अकर्ता है, परंतु अज्ञानके कारण लोग उसे कर्ता मानते हैं। वेदान्तशास्त्रके सिद्धान्तभी ऐसेही हैं; परंतु उत्तर-वेदान्त-ग्रंथोंमें इन सिद्धान्तोंको बतलाते समय माया और अविद्यामें कुछ भेद किया गया है। उदाहरणार्थ, पंचदशीमें पहले यह बतलाया गया है, कि आत्मा और परब्रह्म दोनों मूलमें एकही यानी ब्रह्मस्वरूप हैं। और यह चित्स्वरूपी ब्रह्म जब मायामें प्रतिबिंबित होता है, तब सत्त्वरजतमगुणमयी (सांख्योंकी मूल) प्रकृतिका निर्माण होता है। परंतु आगे चलकर इस मायाकेही दो भेद - 'माया' और 'अविद्या' - किये गये हैं। और यह बतलाया गया है, कि जब मायाके तीन गुणोंमेंसे 'शुद्ध' सत्त्वगुणका उत्कर्ष होता है, तब उसे केवल माया कहते हैं; और इस मायामें प्रतिबिंबित होनेवाले ब्रह्मको सगुण यानी व्यक्त ईश्वर (हिरण्यगर्भ) कहते हैं। और यदि यही सत्त्वगुण 'अशुद्ध' हो, तो उसे 'अविद्या' कहते हैं; तथा उस अविद्यामें प्रतिबिंबित ब्रह्मको 'जीव' कहते हैं। (पंच. १. १५-१७) इस दृष्टिसे, यानी उत्तरकालीन वेदान्तकी दृष्टिसे देखें, तो एकही मायाके स्वरूपतः दो भेद करने पड़ते हैं - अर्थात् परब्रह्मसे 'व्यक्त ईश्वर'के निर्माण होनेका कारण माया और 'जीव'के निर्माण होनेका कारण अविद्या मानना