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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 956 में से

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पृष्ठ 257

२१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र एक गुणका त्याग करनेसे निर्गुण स्वरूपका अनुभव हो सकता है; और इसी रीतिसे ब्रह्मप्रतीककी बढ़ती हुई उपासना उपनिषदोंमें बतलाई गई है। उदाहरणार्थ, तैत्तिरीय उपनिषद्‌की भृगुवल्लीमें वरुणने भृगुको पहले यही उपदेश किया है, कि अन्नही ब्रह्म है; फिर क्रमक्रमसे प्राण, मन, विज्ञान और आनंद - इन ब्रह्मरूपोंका ज्ञान उसे करा दिया है। (तैत्ति. ३. २-६) अथवा ऐसाभी कहा जा सकता है, कि गुण- बोधक विशेषणोंसे निर्गुण रूपका वर्णन करना असंभव है। अतएव परस्परविरोधी विशेषणोंसेही उसका वर्णन करना पड़ता है। इसका कारण यह है, कि जब हम किसी वस्तुके संबंधमें 'दूर' या 'सत्' शब्दोंका उपयोग करते हैं, तब हमें किसी अन्य वस्तुके 'समीप' या 'असत्' होनेकाभी अप्रत्यक्ष रूपसे बोध हो जाया करता है। परंतु यदि एकही ब्रह्म सर्वव्यापी है, तो परमेश्वरको 'दूर' या 'सत्' कहकर 'समीप' या 'असत्' किस कहें? ऐसी अवस्थामें “दूर नहीं, समीप नहीं” “सत् नहीं असत् नहीं” - इस प्रकारकी भाषाका उपयोग करनेसे दूर और समीप, सत् और असत् इत्यादि परस्परसापेक्ष गुणोंकी जोड़ियाँभी लगा दी जाती हैं। और यह बोध होनेके लिये परस्परविरुद्ध विशेषणोंकी इस भाषाकाही व्यवहारमें उपयोग करना पड़ता है, कि जो कुछ शेष निर्गुण, सर्वव्यापी, सर्वदा निरपेक्ष और स्वतंत्र बचा है, वही सच्चा ब्रह्म है (गीता १३. १२)। जो कुछ है वह सब ब्रह्मही है। इसलिये दूर वही, समीपभी वही, सत्‌भी वही और असत्‌भी वही है। अतएव दूसरी दृष्टिसे उसी ब्रह्मका एकही समय परस्परविरोधी विशेषणोंके द्वारा वर्णन किया जा सकता है (गीता ११. ३७; १३. १५)। अब यद्यपि उभयविध सगुण-निर्गुण वर्णनकी उपपत्ति इस प्रकार बतला चुके; तथापि इस बातका स्पष्टीकरण रहही जाता है, कि एकही परमेश्वरके परस्पर-विरोधी दो स्वरूप -- सगुण और निर्गुण - कैसे हो सकते हैं? माना कि जब अव्यक्त परमेश्वर व्यक्त रूप अर्थात् इंद्रियगोचर रूप धारण करता है, तब वह उसकी माया कहलाती है; परंतु जब वह व्यक्त - यानी इंद्रिय- गोचर - न होते हुए अव्यक्त रूपमेंही निर्गुणका सगुण हो जाता है, तब उसे क्या कहें? उदाहरणार्थ, एकही निराकार परमेश्वरको कोई 'नेति नेति' कह कर निर्गुण मानते हैं; और कोई उसे सर्वगुणसंपन्न, सर्वकर्मा तथा दयालु कहकर सगुण मानते हैं। इसका रहस्य क्या है? उक्त दोनोंमें श्रेष्ठ पक्ष कौन-सा है? इस निर्गुण और अव्यक्त ब्रह्मसे सारी व्यक्त सृष्टि और जीवकी उत्पत्ति कैसे हुई? - इत्यादि बातोंका स्पष्टीकरण हो जाना आवश्यक है। यह कहना मानों अध्यात्मशास्त्रहीको जड़से काटना है, कि सब संकल्पोंका दाता अव्यक्त परमेश्वर तो यथार्थमें सगुण है; और उपनिषदोंमें या गीतामें निर्गुण स्वरूपका जो वर्णन किया गया है, वह केवल अतिशयोक्ति या व्यर्थ प्रशंसा है। क्योंकि जिन बड़े बड़े महात्माओं और ऋषियोंने मन एकाग्र करके सूक्ष्म तथा शांत विचारोंसे यह सिद्धान्त ढूँढ़ निकाला, कि “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” (तै. २. ९) - मनकोभी जो दुर्गम है और

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