भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

अध्यात्म २०९ और मोक्षधर्ममें नारद शुकसे कहते हैं (मभा. ३३१. ४४)। बृहदारण्यकोपनिषद्- (बृ. २. ३. २) मेंभी पहले पृथिवी, जल और अग्नि — इन तीनोंको ब्रह्मका मूर्त रूप कहा है। फिर वायु तथा आकाशको अमूर्त रूप कह कर दिखाया है, कि इन अमूर्तोंके सारभूत पुरुषके रूप या रंग बदल जाते हैं; और अंतमें यह उपदेश किया है, कि 'नेति' 'नेति' अर्थात् अबतक जो कहा गया है, वह 'वह' नहीं है; वह ब्रह्म नहीं है — इन सब नामरूपात्मक मूर्त या अमूर्त पदार्थोंके परे जो 'अग्राह्य' या 'अवर्णनीय' है, उसेही परब्रह्म समझो (बृह. २. ३. ६ और वे. सू. ३. २. २२)। अधिक क्या कहें; जिन जिन पदार्थोंको कुछ नाम दिया जा सकता है, उन सबसेभी परे जो है, वही ब्रह्म है; उस ब्रह्मका अव्यक्त तथा निर्गुण स्वरूप दिखलानेके लिये 'नेति' 'नेति' एक छोटा-सा निर्देश, आदेश या सूत्रही हो गया है; और बृहदारण्यक उपनिषद्‌मेंही पुनः उसका चार बार प्रयोग हुआ है (बृह. ४. ९. २६; ४. २. ४; ४. ४. २२; ४. ५. १५)। इसी प्रकार दूसरे उपनिषदोंमेंभी परब्रह्मके निर्गुण और अचिंत्य रूपके वर्णन पाये जाते हैं। जैसे “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” (तैत्ति. २. ९); अद्रेश्यं. (अदृश्य), अग्राह्यं' (मुं. १. १. ६) “न चक्षुषा गृह्यते नाऽपि वाचा” (मुं. ३. १. ८); नेत्रोंसे न दिखनेवाला अथवा वाणीमे कहा न जानेवाला अथवा —

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते॥

अर्थात् वह परब्रह्म पंचमहाभूतोंके शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध — इन पाँच गुणोंसे रहित, अनादि, अनंत और अव्यय है (कठ. ३. १५; वे. सू. ३. २. २२-३०)। महाभारतांतर्गत शांतिपर्वमें नारायणीय या भागवतधर्मके वर्णनमेंभी भगवानने नारदको अपना सच्चा स्वरूप “अदृश्य, अघ्रेय, अस्पृश्य, निर्गुण, निष्कल (निरव- यव), अज, नित्य, शाश्वत और निष्क्रिय” बतला कर कहा है, कि “वही सृष्टिकी उत्पत्ति तथा लय करनेवाला त्रिगुणातीत परमेश्वर है;” और इसीको “वासुदेव- परमात्मा” कहते हैं (मभा. शां. ३३९. २१-२८)।

उपर्युक्त वचनोंसे यह प्रकट होगा, कि न केवल भगवद्गीतामेंही, वरन् महा- भारतांतर्गत नारायणीय या भागवत धर्ममें और उपनिषदोंमेंभी परमात्माका अव्यक्त स्वरूपही व्यक्त स्वरूपसे श्रेष्ठ माना गया है; और यही अव्यक्त श्रेष्ठ स्वरूप वहाँ तीन प्रकारसे वर्णित है; अर्थात् सगुण, सगुण-निर्गुण ओर अंतमें केवल निर्गुण। प्रश्न यह है, कि अव्यक्त और श्रेष्ठ स्वरूपके उक्त तीन परस्परविरोधी रूपोंका मेल किस तरह किया जावे? यह कहा जा सकता है, कि इन तीनोंमेंसे जो सगुण- निर्गुण अर्थात् उभयात्मक रूप है, वह सगुणसे निर्गुणमें (अथवा अज्ञेयमें) जानेकी सीढ़ी या साधन है। क्योंकि, पहले सगुण रूपका ज्ञान होनेपरही, धीरे धीरे एक गी. र. १४