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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

अध्यात्म २०९ और मोक्षधर्ममें नारद शुकसे कहते हैं (मभा. ३३१. ४४)। बृहदारण्यकोपनिषद्- (बृ. २. ३. २) मेंभी पहले पृथिवी, जल और अग्नि — इन तीनोंको ब्रह्मका मूर्त रूप कहा है। फिर वायु तथा आकाशको अमूर्त रूप कह कर दिखाया है, कि इन अमूर्तोंके सारभूत पुरुषके रूप या रंग बदल जाते हैं; और अंतमें यह उपदेश किया है, कि 'नेति' 'नेति' अर्थात् अबतक जो कहा गया है, वह 'वह' नहीं है; वह ब्रह्म नहीं है — इन सब नामरूपात्मक मूर्त या अमूर्त पदार्थोंके परे जो 'अग्राह्य' या 'अवर्णनीय' है, उसेही परब्रह्म समझो (बृह. २. ३. ६ और वे. सू. ३. २. २२)। अधिक क्या कहें; जिन जिन पदार्थोंको कुछ नाम दिया जा सकता है, उन सबसेभी परे जो है, वही ब्रह्म है; उस ब्रह्मका अव्यक्त तथा निर्गुण स्वरूप दिखलानेके लिये 'नेति' 'नेति' एक छोटा-सा निर्देश, आदेश या सूत्रही हो गया है; और बृहदारण्यक उपनिषद्‌मेंही पुनः उसका चार बार प्रयोग हुआ है (बृह. ४. ९. २६; ४. २. ४; ४. ४. २२; ४. ५. १५)। इसी प्रकार दूसरे उपनिषदोंमेंभी परब्रह्मके निर्गुण और अचिंत्य रूपके वर्णन पाये जाते हैं। जैसे “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” (तैत्ति. २. ९); अद्रेश्यं. (अदृश्य), अग्राह्यं' (मुं. १. १. ६) “न चक्षुषा गृह्यते नाऽपि वाचा” (मुं. ३. १. ८); नेत्रोंसे न दिखनेवाला अथवा वाणीमे कहा न जानेवाला अथवा —

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते॥

अर्थात् वह परब्रह्म पंचमहाभूतोंके शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध — इन पाँच गुणोंसे रहित, अनादि, अनंत और अव्यय है (कठ. ३. १५; वे. सू. ३. २. २२-३०)। महाभारतांतर्गत शांतिपर्वमें नारायणीय या भागवतधर्मके वर्णनमेंभी भगवानने नारदको अपना सच्चा स्वरूप “अदृश्य, अघ्रेय, अस्पृश्य, निर्गुण, निष्कल (निरव- यव), अज, नित्य, शाश्वत और निष्क्रिय” बतला कर कहा है, कि “वही सृष्टिकी उत्पत्ति तथा लय करनेवाला त्रिगुणातीत परमेश्वर है;” और इसीको “वासुदेव- परमात्मा” कहते हैं (मभा. शां. ३३९. २१-२८)।

उपर्युक्त वचनोंसे यह प्रकट होगा, कि न केवल भगवद्गीतामेंही, वरन् महा- भारतांतर्गत नारायणीय या भागवत धर्ममें और उपनिषदोंमेंभी परमात्माका अव्यक्त स्वरूपही व्यक्त स्वरूपसे श्रेष्ठ माना गया है; और यही अव्यक्त श्रेष्ठ स्वरूप वहाँ तीन प्रकारसे वर्णित है; अर्थात् सगुण, सगुण-निर्गुण ओर अंतमें केवल निर्गुण। प्रश्न यह है, कि अव्यक्त और श्रेष्ठ स्वरूपके उक्त तीन परस्परविरोधी रूपोंका मेल किस तरह किया जावे? यह कहा जा सकता है, कि इन तीनोंमेंसे जो सगुण- निर्गुण अर्थात् उभयात्मक रूप है, वह सगुणसे निर्गुणमें (अथवा अज्ञेयमें) जानेकी सीढ़ी या साधन है। क्योंकि, पहले सगुण रूपका ज्ञान होनेपरही, धीरे धीरे एक गी. र. १४

२१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र एक गुणका त्याग करनेसे निर्गुण स्वरूपका अनुभव हो सकता है; और इसी रीतिसे ब्रह्मप्रतीककी बढ़ती हुई उपासना उपनिषदोंमें बतलाई गई है। उदाहरणार्थ, तैत्तिरीय उपनिषद्‌की भृगुवल्लीमें वरुणने भृगुको पहले यही उपदेश किया है, कि अन्नही ब्रह्म है; फिर क्रमक्रमसे प्राण, मन, विज्ञान और आनंद - इन ब्रह्मरूपोंका ज्ञान उसे करा दिया है। (तैत्ति. ३. २-६) अथवा ऐसाभी कहा जा सकता है, कि गुण- बोधक विशेषणोंसे निर्गुण रूपका वर्णन करना असंभव है। अतएव परस्परविरोधी विशेषणोंसेही उसका वर्णन करना पड़ता है। इसका कारण यह है, कि जब हम किसी वस्तुके संबंधमें 'दूर' या 'सत्' शब्दोंका उपयोग करते हैं, तब हमें किसी अन्य वस्तुके 'समीप' या 'असत्' होनेकाभी अप्रत्यक्ष रूपसे बोध हो जाया करता है। परंतु यदि एकही ब्रह्म सर्वव्यापी है, तो परमेश्वरको 'दूर' या 'सत्' कहकर 'समीप' या 'असत्' किस कहें? ऐसी अवस्थामें “दूर नहीं, समीप नहीं” “सत् नहीं असत् नहीं” - इस प्रकारकी भाषाका उपयोग करनेसे दूर और समीप, सत् और असत् इत्यादि परस्परसापेक्ष गुणोंकी जोड़ियाँभी लगा दी जाती हैं। और यह बोध होनेके लिये परस्परविरुद्ध विशेषणोंकी इस भाषाकाही व्यवहारमें उपयोग करना पड़ता है, कि जो कुछ शेष निर्गुण, सर्वव्यापी, सर्वदा निरपेक्ष और स्वतंत्र बचा है, वही सच्चा ब्रह्म है (गीता १३. १२)। जो कुछ है वह सब ब्रह्मही है। इसलिये दूर वही, समीपभी वही, सत्‌भी वही और असत्‌भी वही है। अतएव दूसरी दृष्टिसे उसी ब्रह्मका एकही समय परस्परविरोधी विशेषणोंके द्वारा वर्णन किया जा सकता है (गीता ११. ३७; १३. १५)। अब यद्यपि उभयविध सगुण-निर्गुण वर्णनकी उपपत्ति इस प्रकार बतला चुके; तथापि इस बातका स्पष्टीकरण रहही जाता है, कि एकही परमेश्वरके परस्पर-विरोधी दो स्वरूप -- सगुण और निर्गुण - कैसे हो सकते हैं? माना कि जब अव्यक्त परमेश्वर व्यक्त रूप अर्थात् इंद्रियगोचर रूप धारण करता है, तब वह उसकी माया कहलाती है; परंतु जब वह व्यक्त - यानी इंद्रिय- गोचर - न होते हुए अव्यक्त रूपमेंही निर्गुणका सगुण हो जाता है, तब उसे क्या कहें? उदाहरणार्थ, एकही निराकार परमेश्वरको कोई 'नेति नेति' कह कर निर्गुण मानते हैं; और कोई उसे सर्वगुणसंपन्न, सर्वकर्मा तथा दयालु कहकर सगुण मानते हैं। इसका रहस्य क्या है? उक्त दोनोंमें श्रेष्ठ पक्ष कौन-सा है? इस निर्गुण और अव्यक्त ब्रह्मसे सारी व्यक्त सृष्टि और जीवकी उत्पत्ति कैसे हुई? - इत्यादि बातोंका स्पष्टीकरण हो जाना आवश्यक है। यह कहना मानों अध्यात्मशास्त्रहीको जड़से काटना है, कि सब संकल्पोंका दाता अव्यक्त परमेश्वर तो यथार्थमें सगुण है; और उपनिषदोंमें या गीतामें निर्गुण स्वरूपका जो वर्णन किया गया है, वह केवल अतिशयोक्ति या व्यर्थ प्रशंसा है। क्योंकि जिन बड़े बड़े महात्माओं और ऋषियोंने मन एकाग्र करके सूक्ष्म तथा शांत विचारोंसे यह सिद्धान्त ढूँढ़ निकाला, कि “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” (तै. २. ९) - मनकोभी जो दुर्गम है और

अध्यात्म २११ वाणीभी जिसका वर्णन कर नहीं सकती, वही अंतिम ब्रह्मस्वरूप है - उनके आत्मा- नुभवको अतिशयोक्ति कैसे कहें ? केवल एक साधारण मनुष्य अपने क्षुद्र मनमें यदि अनंत और निर्गुण ब्रह्मको ग्रहण नहीं कर सकता; इसलिये यह कहना, कि सच्चा ब्रह्म सगुणही होना चाहिये; मानों सूर्यकी अपेक्षा अपने छोटेसे दीपकको श्रेष्ठ बत- लाना है। हां, यदि इस निर्गुण रूपकी उपपत्ति उपनिषदोंमें या गीतामें न दी गई होती तो बात दूसरी थी; परंतु यथार्थमें वैसा नहीं है। देखिये न ! भगवद्गीतामें तो स्पष्टही कहा है, कि परमेश्वरका सच्चा और श्रेष्ठ स्वरूप अव्यक्तही है; और व्यक्त सृष्टिका रूप धारण करना तो उसकी माया है (गीता ४. ६)। परंतु भगवानने यह भी कहा है, कि प्रकृतिके गुणोंसे "मोहमें फँसकर मूर्ख लोग (अव्यक्त और निर्गुण) आत्माकोही कर्ता मानते हैं" (गीता ३. २७-२९); किंतु ईश्वर तो कुछ नहीं करता। लोग केवल अज्ञानसे धोखा खाते हैं (गीता ५. १५)। अर्थात् भगवानने स्पष्ट शब्दोंमें यह उपदेश किया है, कि यद्यपि अव्यक्त आत्मा या परमेश्वर वस्तुतः निर्गुण है, (गीता १३. ३१) तोभी लोग उसपर 'मोह' या 'अज्ञान'से कर्तृत्व आदि गुणोंका अध्यारोप करते हैं; और उसे अव्यक्त सगुण बना देते हैं (गीता ७. २४)। उक्त विवेचनसे परमेश्वरके स्वरूपके 'विषय'में गीताके ये ही सच्चे सिद्धान्त मालूम होते हैं:- (१) गीतामें परमेश्वरके व्यक्त स्वरूपका यद्यपि बहुतसा वर्णन है, तथापि परमेश्वरका मूल और श्रेष्ठ स्वरूप निर्गुण तथा अव्यक्तही है : किंतु मनुष्य मोह या अज्ञानसे उसे सगुण मानते हैं; (२) सांख्योंकी प्रकृति या उसका व्यक्त पसारा - यानी अखिल संसार - उस परमेश्वरकी माया है; और (३) सांख्योंका पुरुष यानी जीवात्मा यथार्थमें परमेश्वररूपी और परमे- श्वरके समान ही निर्गुण और अकर्ता है, परंतु अज्ञानके कारण लोग उसे कर्ता मानते हैं। वेदान्तशास्त्रके सिद्धान्तभी ऐसेही हैं; परंतु उत्तर-वेदान्त-ग्रंथोंमें इन सिद्धान्तोंको बतलाते समय माया और अविद्यामें कुछ भेद किया गया है। उदाहरणार्थ, पंचदशीमें पहले यह बतलाया गया है, कि आत्मा और परब्रह्म दोनों मूलमें एकही यानी ब्रह्मस्वरूप हैं। और यह चित्स्वरूपी ब्रह्म जब मायामें प्रतिबिंबित होता है, तब सत्त्वरजतमगुणमयी (सांख्योंकी मूल) प्रकृतिका निर्माण होता है। परंतु आगे चलकर इस मायाकेही दो भेद - 'माया' और 'अविद्या' - किये गये हैं। और यह बतलाया गया है, कि जब मायाके तीन गुणोंमेंसे 'शुद्ध' सत्त्वगुणका उत्कर्ष होता है, तब उसे केवल माया कहते हैं; और इस मायामें प्रतिबिंबित होनेवाले ब्रह्मको सगुण यानी व्यक्त ईश्वर (हिरण्यगर्भ) कहते हैं। और यदि यही सत्त्वगुण 'अशुद्ध' हो, तो उसे 'अविद्या' कहते हैं; तथा उस अविद्यामें प्रतिबिंबित ब्रह्मको 'जीव' कहते हैं। (पंच. १. १५-१७) इस दृष्टिसे, यानी उत्तरकालीन वेदान्तकी दृष्टिसे देखें, तो एकही मायाके स्वरूपतः दो भेद करने पड़ते हैं - अर्थात् परब्रह्मसे 'व्यक्त ईश्वर'के निर्माण होनेका कारण माया और 'जीव'के निर्माण होनेका कारण अविद्या मानना

२१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पड़ता है। परंतु गीतामें इस प्रकार का भेद नहीं किया गया है। गीता कहती है, कि "जिस मायासे स्वयं भगवान् व्यक्त रूप यानी सगुण रूप धारण करते हैं (७. २५) अथवा जिस मायाके द्वारा अष्टधा प्रकृति अर्थात् सृष्टिकी सारी विभूतियां उनसे उत्पन्न होती हैं, (४. ६) उसी मायाके अज्ञानसे जीव मोहित होता है" (७. ४-१५) । 'अविद्या' शब्द गीतामें कहींभी नहीं आया है; और श्वेताश्वत- रोपनिषदमें जहाँ वह शब्द आया है, वहाँ उसका स्पष्टीकरणभी इस प्रकार किया है, कि मायाके प्रपंचकोही 'अविद्या' कहते हैं ( श्वेता. ५. १ ) । अतएव उत्तरकालीन वेदान्त ग्रंथोंमें केवल निरूपणकी सरलताके लिये - जीव और ईश्वरकी दृष्टिसे - किये गये सूक्ष्म भेद - अर्थात् माया और अविद्याको स्वीकार न कर हम 'माया', 'अविद्या' और 'अज्ञान' शब्दोंको समानार्थीही मानते हैं। और अब शास्त्रीय रीतिसे संक्षेपमें इस विषयका विवेचन करते हैं, कि त्रिगुणात्मक माया, अविद्या या अज्ञान और मोहका सामान्यतः तात्त्विक स्वरूप क्या है, और उसकी सहायतासे गीता तथा उपनिषदोंके सिद्धान्तोंकी उपपत्ति कैसे लग सकती है। निर्गुण और सगुण शब्द देखनेमें छोटे हैं; परंतु जब इसका विचार करने लगें, कि इन शब्दोंमें किन किन बातोंका समावेश होता है; तब सचमुच सारा ब्रह्मांड दृष्टिके सामने खड़ा हो जाता है। जैसे, इस संसारका मूल जो कि अनादि परब्रह्म है, जो एक निष्क्रिय और उदासीन है; तब उसीमें मनुष्यको इंद्रियोंको गोचर होनेवाले अनेक प्रकारके व्यापार या गुण कैसे उत्पन्न हुए ? तथा इस प्रकार उसकी अखंडता भंग कैसे हो गई ? अथवा जो मूलमे एकरूप है, उसीके बहुरूपी भिन्न भिन्न व्यक्त पदार्थ कैसे दिखाई देते हैं ? जो परब्रह्म निर्विकार है, और जिसमें खट्टा, मिठा, कडुवा या गाढ़ा-पतला अथवा शीत-उष्ण आदि भेद नहीं हैं, उसीमें नाना प्रकारकी रुचियाँ, न्यूनाधिक गाढ़ा-पतलापन या शीत और उष्ण, सुख और दुःख, प्रकाश और अँधेरा, मृत्यु और अमरता इत्यादि अनेक प्रकारके द्वंद्व कैसे उत्पन्न हुए ? जो परब्रह्म शांत और निर्वात है, उसीमें नाना प्रकारकी ध्वनियां और शब्द कैसे निर्माण होते हैं ? जिस परब्रह्ममें भीतर-बाहर या दूर-समीपका कोई भेद नहीं है, उसीमें आगे या पीछे, दूर या समीप, अथवा पूर्व-पश्चिम इत्यादि दिक्कृत या स्थलकृत भेद कैसे हो गये ? जो परब्रह्म अविकारी, त्रिकालाबाधित, नित्य और अमृत है, उसीसे न्यूनाधिक कालमानके नाशवान् पदार्थ कैसे बने ? अथवा जिसे कार्यकारणभावका स्पर्शभी नहीं होता, उसी परब्रह्मके कार्यकारणरूप - जैसे मिट्टी और घड़ा - क्यों दिखाई देते हैं ? ऐसेही औरभी अनेक विषयोंका उक्त छोटेसे दो शब्दोंमें समावेश हुआ है। अथवा संक्षेपमें कहा जाय, तो अब इस बातका विचार करना है, कि एकहीमें अनेकता, निर्द्वंद्वमें नाना प्रकारकी द्वंद्वता, अद्वैतमें द्वैत और निःसंगमें संग कैसे हो गया। सांख्योंने तो उस झगड़ेसे बचनेके लिये यह द्वैत कल्पित कर लिया है, कि निर्गुण और नित्यपुरुषके साथ साथ त्रिगुणात्मक यानी सगुण

अध्यात्म २१३

प्रकृतिभी नित्य और स्वतंत्र है। परंतु जगतके मूलतत्त्वको ढूंढ़ निकालनेकी मनुष्यके मनकी जो स्वाभाविक प्रवृत्ति है, उसका समाधान इस द्वैतसे नहीं होता। इतनाही नहीं; किंतु यह द्वैत युक्तिवादकेभी सामने टिक नहीं पाता। इसलिये प्रकृति और पुरुषकेभी परे जाकर उपनिषद्कारोंने यह सिद्धान्त स्थापित किया, कि सच्चिदानंद ब्रह्मसेभी श्रेष्ठ श्रेणीका 'निर्गुण' ब्रह्मही जगतका मूल है। परंतु अब इसकी उपपत्ति देनी चाहिये, कि निर्गुणसे सगुण कैसे हुआ। क्योंकि सांख्यके समान वेदान्तकाभी यह सिद्धान्त है, कि जो वस्तु नहीं है, वह होही नहीं सकती; और उससे, 'जो वस्तु है' उसकी कभी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इस सिद्धान्तके अनुसार निर्गुण (अर्थात् जिसमें गुण नहीं हैं उस) ब्रह्मसे सगुण सृष्टिके पदार्थ (कि जिनमें गुण हैं) उत्पन्न हो नहीं सकते। तो फिर सगुण आया कहांसे? यदि कहें कि सगुण कुछ नहीं है, तो वह प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर है। और यदि निर्गुणके समान सगुणकोभी सत्य मानें; तो हम देखते हैं, कि इंद्रियगोचर होनेवाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस आदि सब गुणोंके स्वरूप आज एक हैं, तो कल दूसरेही - अर्थात् वे नित्य परिवर्तनशील होनेके कारण नाशवान्, विकारी और अशाश्वत हैं। तब तो (ऐसी कल्पना करके कि परमेश्वर विभाज्य है) यही कहना होगा, कि सर्वव्यापी परमेश्वरभी सगुणोंके संबंधमें परिवर्तनशील एवं नाशवान् है। परंतु जो विभाज्य और नाशवान् होकर सृष्टिके नियमोंकी पकड़में नित्य परतंत्र रहता है, उसे परमेश्वरही कैसे कहें ? सारांश, चाहे यह मानो, कि इंद्रियगोचर सारे सगुण पदार्थ पंचमहाभूतोंसे निर्मित हुए हैं; अथवा सांख्यानुसार या आधिभौतिक दृष्टिसे यह अनुमान कर लो, कि इन सारे पदार्थोंका निर्माण एक ही अव्यक्त सगुण मूलप्रकृतिसे हुआ है। किसीभी पक्षका स्वीकार करो; यह बात निर्विवाद सिद्ध है, कि जब तक नाशवान् गुण इस मूल प्रकृतिसेभी छूट नहीं गये हैं, तबतक पंचमहाभूतोंको या प्रकृति रूप इस सगुण मूल पदार्थको जगतका अविनाशी, स्वतंत्र और अमृत तत्त्व नहीं कह सकते। अतएव जिसे प्रकृतिवादका स्वीकार करना है, उसे उचित है, कि वह या तो यह कहना छोड़ दे, कि परमेश्वर नित्य, स्वतंत्र और अमृतरूप है; या इस बातकी खोज करे, कि पंचमहाभूतोंके परे अथवा सगुण मूल प्रकृतिकेभी परे और कौनसा तत्त्व है। इसके सिवा अन्य कोई मार्ग नहीं है। जिस प्रकार मृगजलसे प्यास नहीं बुझती, या बालूसे तेल नहीं निकलता, उसी प्रकार प्रत्यक्ष नाशवान् वस्तुसे अमृतत्वकी प्राप्तिकी आशा करना भी व्यर्थ है। और इसीलिये याज्ञवल्क्यने अपनी स्त्री - मैत्रेयी - को स्पष्ट उपदेश किया है, कि चाहे जितनी संपत्ति क्यों न प्राप्त हो जावे; पर उससे अमृतत्वकी आशा करना व्यर्थ है - "अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन" (बृह. २. ४. २) अच्छा; अब यदि अमृतत्वको मिथ्या कहें; तो मनुष्योंको यह स्वाभाविक इच्छा दीख पड़ती है, कि वे किसी राजासे मिलनेवाले पुरस्कार या पारितोषिकका उपभोग न केवल अपने लिये वरन् पुत्रपौत्रादिके लियेभी आचन्द्रार्क - अर्थात्

२१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चिरकालके लिये - करना चाहते हैं। अथवा यहभी देखा जाता है, कि चिरकाल रहनेवाली या शाश्वत कीर्ति पानेका जब अवसर आ जाता है, तब मनुष्य अपने जीवनकीभी परवाह नहीं करता। ऋग्वेदके समान अत्यंत प्राचीन ग्रंथोंमेंभी पूर्व- ऋषियोंकी प्रार्थना है, कि "हे इंद्र ! तू हमें 'अक्षित श्रव' अर्थात् अक्षय कीर्ति या धन दे" (ऋ. १. ९. ७); अथवा "हे सोम ! तू मुझे वैवस्वत (यम) लोकमें अमर कर दे" (ऋ. ९. ११३. ८)। और, अर्वाचीन समयमें इसी दृष्टीको स्वीकार करके स्पेन्सर, कांट प्रभृति केवल आधिभौतिक पंडितभी यही कहते हैं, कि "इस संसारमें मनुष्यमात्रका नैतिक परम कर्तव्य यही है, कि वह किसी प्रकारके क्षणिक सुखमें न फँसकर वर्तमान और भावी मनुष्यजातिके चिरकालिक सुखके लिये उद्योग करे।" हमारे जीवनके पश्चात्के चिरकालिक कल्याणकी अर्थात् अमृतत्वकी यह कल्पना आई कहाँसे ? यदि कहें, कि यह स्वभावसिद्ध है; तो मानना पड़ेगा, कि इस नाशवान् देहके परे और कोई अमृत वस्तु अवश्य है। और यदि कहें, कि ऐसी कोई अमृत वस्तु नहीं है; तो हमें जिस मनोवृत्तिकी साक्षात् प्रतीति होती, उसका अन्य कोई कारणभी नहीं बतलाते बन पड़ता ! ऐसी कठिनाई आ पड़नेपर बहुतेरे आधिभौतिक पंडित यह उपदेश करते हैं, कि इन प्रश्नोंका कभी समाधानकारक उत्तर नहीं मिल सकता। अतएव इनका विचार न करके दृश्य सृष्टिके पदार्थोंके गुण- धर्मोंके परे अपने मनकी दौड़ कभी न जाने दो। यह उपदेश है तो सरल; परंतु मनुष्यके मनमें तत्त्वज्ञानकी जो स्वाभाविक लालसा होती है, उसका प्रतिरोध कौन और किस प्रकारसे कर सकता है ? और इस दुर्धर जिज्ञासाका यदि नाश कर डालें, तो फिर ज्ञानकी वृद्धि हो तो कैसे ? जबसे मनुष्य इस पृथ्वीतलपर उत्पन्न हुआ है, तभीसे वह इस प्रश्नका विचार करता चला आया है, कि "सारी दृश्य और नाशवान् सृष्टिका मूलभूत अमृततत्त्व क्या है ? और वह मुझे कैसे प्राप्त होगा ?" आधिभौतिक शास्त्रोंकी जितनी चाहे उन्नति हो; तथापि मनुष्यकी अमृततत्त्वसंबंधी ज्ञानकी स्वाभाविक प्रवृत्ति कभी कम होनेकी नहीं। आधिभौतिक शास्त्रोंकी चाहे जैसी वृद्धि हो तोभी सारे आधिभौतिक सृष्टिज्ञानको बगलमें दबाकर आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान सदा उसके आगेही दौड़ता रहेगा ! दो-चार हजार वर्षके पहले यही दशा थी; और अब पश्चिमी देशोंमेंभी वही बात दीख पड़ती है। और तो क्या; मनुष्यकी बुद्धिका ज्ञानलालसा जिस दिन छूटेगी, उस दिन उसके विषयमें यही कहना होगा, कि "स वै मुक्तोऽथवा पशुः।" दिक्कालसे अमर्यादित, अमृत, अनादि, स्वतंत्र, एकरूप, एक, निरंतर, सर्व- व्यापी और निर्गुण तत्त्वके अस्तित्वके विषयमें, अथवा उस निर्गुण तत्त्वसे सगुण सृष्टिकी उत्पत्तिके विषयमें जैसा व्याख्यान हमारे प्राचीन उपनिषदोंमें किया गया है, उससे अधिक सयुक्तिक व्याख्यान अन्य देशोंके तत्त्वज्ञोंने अबतक नहीं किया है। अर्वाचीन जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटने इस बातका सूक्ष्म विचार किया है, कि मनुष्यको

अध्यात्म २१५

बाह्य सृष्टिकी विविधता या भिन्नताका ज्ञान एकतासे क्यों और कैसे होता है ? और फिर उक्त उपपत्तिकोही उसने अर्वाचीन शास्त्रकी रीतिसे अधिक स्पष्ट कर दिया है। और हेगेल यद्यपि अपने विचारमें कांटसे कुछ आगे बढ़ा है, तथापि उसके सिद्धान्तभी वेदान्तसे आगे नहीं बढ़े हैं। शोपेनहरकाभी यही हाल है। उपनिषदोंके लैटिन भाषाके अनुवादका अध्ययन उसने किया था - और उसने यह बातभी लिख रखी है, कि "संसारके साहित्यके इन अत्युत्तम" ग्रंथोंसे कुछ विचार मैंने अपने ग्रंथोंमें लिये हैं। इस छोटेसे ग्रंथमें इन सब बातोंका विस्तारपूर्वक निरूपण करना संभव नहीं, कि उक्त गंभीर विचारों और उनके साधक-बाधक प्रमाणोंमें, अथवा वेदान्तके सिद्धान्तों और कांट प्रभृति पश्चिमी तत्त्वज्ञोंके सिद्धान्तोंमें समानता कितनी है और अंतर कितना है। इसी प्रकार इस बातकीभी विस्तारसे चर्चा नहीं कर सकते, कि उपनिषद् और वेदान्तसूत्र जैसे प्राचीन ग्रंथोंके वेदान्तमें और तदुत्तर- कालीन ग्रंथोंके वेदान्तमें छोटे-मोटे भेद कौनकौनसे हैं। अतएव भगवद्गीताके अध्यात्म-सिद्धान्तोंकी सत्यता, महत्त्व और उपपत्ति समझा देनेके लिये जिन जिन बातोंकी आवश्यकता हैं, सिर्फ़ उन्हीं बातोंका यहाँ दिग्दर्शन किया गया है; और इस चर्चाके लिये उपनिषद्, वेदान्त-सूत्र और उनके शांकरभाष्यका आधार प्रधान रूपसे लिया गया है। प्रकृति-पुरुषरूपी सांख्योक्त द्वैतके परे क्या है - इसका निर्णय करनेके लिये केवल द्रष्टा और दृश्य सृष्टिके द्वैतभेदपरही ठहर जाना उचित नहीं। किंतु इस बातकाभी सूक्ष्म विचार करना चाहिये, कि द्रष्टा पुरुषको बाह्य सृष्टिका जो ज्ञान होता है, उसका स्वरूप क्या है? वह ज्ञान किससे और किसका होता है ? बाह्य सृष्टिके पदार्थ मनुष्यको अपने नेत्रोंसे जैसे दिखाई देते हैं, वैसे तो वे गुण पशु- ओंकोभी दिखाई देते हैं। परंतु मनुष्यकी यह विशेषता है, कि आँख, कान इत्यादि ज्ञानेंद्रियोंसे उसके मनपर जो संस्कार हुआ करते हैं, उनका एकीकरण करनेकी विशेष शक्ति उसमें है, और इसीलिये बाह्य सृष्टिके पदार्थमात्रका ज्ञान उसको हुआ करता है। पहले क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें बतला चुके हैं, कि जिस एकीकरण-शक्तिका फल उपर्युक्त विशेषता है, वह शक्ति मन और बुद्धिकेभी परे है - अर्थात् वह आत्माकी शक्ति है। यह बात नहीं, कि किसी एकही पदार्थका ज्ञान उक्त रीतिसे होता हो; किंतु सृष्टिके भिन्न भिन्न पदार्थोंके कार्यकारणभाव आदि जो अनेक संबंध हैं - जिन्हें हम सृष्टिके नियम कहतें हैं - उनका ज्ञानभी इसी प्रकार हुआ करता है। इसका कारण यह है, कि यद्यपि हम भिन्न भिन्न पदार्थोंको देखते हैं, तथापि उनका कार्यकारण-संबंध प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता; किंतु हम उसे अपने मानसिक व्यापारोंसे निश्चित किया करते हैं। उदाहरणार्थ, जब कोई पदार्थ हमारे नेत्रोंके सामनेसे जाता है, तब उसका रूप और उसकी गति देखकर हम निश्चय करते हैं, कि यह एक 'फ़ौजी सिपाही' है; और यही संस्कार मनमें बना रहता है। इसके बाद जब कोई दूसरा पदार्थ उसी रूप और गतिमें दृष्टिके सामने आता है, तब वही

२१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मानसिक क्रिया फिर शुरू हो जाती है; और हमारी बुद्धिका निश्चय हो जाता है कि वहभी एक फौजी सिपाही है। इस प्रकार भिन्न भिन्न समयमें (एके बाद दूसरा) जो अनेक संस्कार हमारे मनपर होते रहते हैं, उन्हें हम अपनी स्मरणशक्तिसे याद कर एकत्र रखते हैं; और जब वह पदार्थसमूह हमारी दृष्टिके सामने आ जाता है, तब उन सब भिन्न भिन्न संस्कारोंका ज्ञान एकताके रूपमें होकर हम कहने लगते हैं, कि हमारे सामनेसे 'फौज' जा रही है। इस सेनाके पीछेसे आनेवाले पदार्थका रूप देखकर हम निश्चय करते हैं, कि वह 'राजा' है। और 'फौज'-संबंधी पहले संस्कारको तथा 'राजा'संबंधी इस नूतन संस्कारको एकत्र कर हम कह सकते हैं, कि यह "राजाकी सवारी जा रही है।" इसलिये कहना पड़ता है, कि सृष्टिज्ञान केवल इंद्रि- योंसे प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाला जड़ पदार्थ नहीं है; किंतु इंद्रियोंके द्वारा मनपर होने- वाले अनेक संस्कारों या परिणामोंका जो 'एकीकरण' 'द्रष्टा आत्मा' किया करता है, उसी एकीकरणका फल ज्ञान है। इसीलिये भगवद्गीतामेंभी ज्ञानका लक्षण इस प्रकार दिया है - "अविभक्तं विभक्तेषु" अर्थात् सच्चा ज्ञान वही है, कि जिससे विभक्त या निरालेपनकी अविभक्तता या एकताका बोध हो* (गीता १८.२०)। परंतु इस विषयका यदि पुनः सूक्ष्म विचार किया जावे, कि इंद्रियोंके द्वारा मनपर जो संस्कार पहले होते हैं, वे किसके हैं, तो जान पड़ेगा कि यद्यपि आंख, कान, नाक इत्यादि इंद्रियोंसे पदार्थके रूप, शब्द, गंध आदि गुणोंका ज्ञान हमें होता है। तथापि जिस द्रव्यमें ये बाह्य गुण हैं, उसके आंतरिक स्वरूपके विषयमें हमारी इंद्रियाँ हमें कुछभी नहीं बतला सकतीं। हम यह देखते हैं सही, कि 'गीली मिट्टी' से घड़ा बनता है; परंतु यह नहीं जान सकते कि, जिसे हम 'गीली मिट्टी' कहते हैं; उस पदार्थका यथार्थ तात्त्विक स्वरूप क्या है। चिकनाई, गीलापन, मैला रंग या गोलाकार (रूप) इत्यादि गुण जब इंद्रियोंके द्वारा मनको पृथक् पृथक् मालूम हो जाते हैं, तब उन संस्कारोंका एकीकरण करके 'द्रष्टा' आत्मा कहता है, कि "यह गीली मिट्टी है"; और आगे इसी द्रव्यकी (क्योंकि यह माननेके लिये कोई कारण नहीं, कि द्रव्यका तात्त्विक रूप बदल गया) गोल तथा पोली आकृति या रूप, ठन ठन आवाज और सूखापन इत्यादि गुण जब इंद्रियोंके द्वारा मनको मालूम हो जाते हैं, तब उनका एकीकरण करके 'द्रष्टा' उसे 'घड़ा' कहता है। सारांश, सारा भेद, 'रूप या आकार' मेंही होता रहता है। और जब इन्हीं गुणोंके संस्कारोंको (जो मन- पर हुआ करते हैं) 'द्रष्टा' आत्मा एकत्र कर लेता है, तब एकही तात्त्विक पदार्थको अनेक नाम प्राप्त हो जाते हैं। इसका सबसे सरल उदाहरण समुद्र और तरंगका या सोना और अलंकारका है। क्योंकि इन दोनों उदाहरणोंमें रंग, गाढ़ापन, * Cf. "Knowledge is first produced by the synthesis of what is manifold." Kant's Critique of Pure Reason, p. 64, Max-Muller's translation. 2nd Ed.

अध्यात्म २१७ पतलापन, वजन आदि गुण एकहीसे रहते हैं; और केवल रूप ( आकार ) तथा नाम यही दो गुण बदलते रहते हैं। इसीलिये वेदान्तमें ये सरल दृष्टान्त हमेशा पाये जाते हैं। सोना तो एक पदार्थ है; परंतु भिन्न भिन्न समयपर बदलनेवाले उसके आकारोंके जो संस्कार इंद्रियोंके द्वारा मनपर होते हैं, उन्हें एकत्र करके 'द्रष्टा' उस सोनेकोही – कि जो तात्त्विक दृष्टिसे एकही मूल द्रव्य है - कभी 'कड़ा', कभी 'अँगूठी' या कभी 'पँचलड़ी', 'पहूँची और कंगन' इत्यादि भिन्न भिन्न नाम दिया करता है। भिन्न भिन्न समयपर पदार्थोंको जो इस प्रकार नाम दिये जाते हैं, उन नामोंको, तथा पदार्थोंको जिन भिन्न भिन्न आकृतियोंके कारण वे नाम बदलते रहते हैं, उन आकृतियोंको उपनिषदोंमें 'नामरूप' कहते हैं; और इन्हींमें अन्य सब गुणों- काभी समावेश कर दिया जाता है ( छां. ६. ३ और ४; बृ. १. ४. ७ ) । और इस प्रकार समावेश होना ठीकभी है। क्योंकि कोईभी गुण लीजिये; उसका कुछ-न-कुछ नाम और रूप अवश्यही होगा। यद्यपि इन नामरूपोंमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहे, तथापि कहना पड़ता है कि - इन नामरूपोंके मूलमें आधारभूत कोई तत्त्व या द्रव्य है, जो इन नामरूपोंसे भिन्न है; और कभी बदलताही नहीं। जिस प्रकार पानीपर तरंगें आ जाती हैं, उसी प्रकार ये सब नामरूप किसी एकही मूल द्रव्यपर तरंगोंके समान हैं। यह सच है, कि हमारी इंद्रियां नामरूपके अतिरिक्त और कुछभी पहचान नहीं सकतीं; अतएव इन इंद्रियोंको उस मूल द्रव्यका ज्ञान होना संभव नहीं, कि जो नामरूपसे भिन्न है, परंतु उसका आधारभूत है। परंतु सारे संसारका आधारभूत यह तत्त्व भलेही अव्यक्त हो; अर्थात् इंद्रियोंसे जाना न जा सकता हो; तथापि हमको अपनी बुद्धिसे यही निश्चित अनुमान करना पड़ता है, कि वह सत् है - अर्थात् वह सचमुच सर्वकाल सब नामरूपोंके मूलमें तथा नामरूपोंमेंभी निवास करता है; और उसका कभी नाश नहीं होता। क्योंकि यदि इंद्रियगोचर नामरूपोंके अतिरिक्त मूलतत्त्वको कुछ मानेही नहीं, तो फिर 'कड़ा' 'कंगन' आदि पदार्थ भिन्न भिन्न हो जावेंगे। एवं इस समय हमें यह ज्ञान हुआ करता है, कि "वे सब एकही धातुके ( सोनेके ) बने हैं", उस ज्ञानके लिये कुछभी आधार नहीं रह जावेगा। ऐसी अवस्थामें केवल इतनाही कहते बनेगा, कि यह 'कड़ा' है; यह 'कंगन' है। यह कदापि न कह सकेंगे, कि कड़ा सोनेका है; और कंगनभी सोनेका है। अतएव न्यायतः यह सिद्ध होता है, कि 'कड़ा सोनेका है', "कंगन सोनेका है', इत्यादि वाक्योंमें 'है' शब्दसे जिस सोनेके साथ नामरूपात्मक 'कड़े' 'कंगन'का संबंध जोड़ा गया है, वह सोना केवल शशशृंगवत अभावरूप नहीं है। किंतु वह उस द्रव्यांशकाही बोधक है, कि जो सारे आभूषणोंका आधार है। इसी न्यायका उपयोग सृष्टिके सारे पदार्थोंमें करें, तो यह सिद्धान्त निकलता है, कि पत्थर, मिट्टी, चांदी, लोहा, लकड़ी, इत्यादि अनेक नामरूपात्मक पदार्थ, जो नजर आते हैं, वे सब किसी एकही नित्य द्रव्यपर भिन्न भिन्न नामरूपोंका मुलम्मा या

२१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गिल्ट बनकर उत्पन्न हुए हैं; अर्थात् सारा भेद केवल नामरूपोंका है, मूल द्रव्यका नहीं। भिन्न भिन्न नामरूपोंकी जड़में एकरूप एकही द्रव्य नित्य निवास करता है। “सब पदार्थोंमें इस प्रकारसे नित्यरूपसे सदैव रहना” – संस्कृतमें 'सत्तासामान्यत्व' कहलाता है। वेदान्तशास्त्रके उक्त सिद्धान्तकाही कांट आदि अर्वाचीन पश्चिमी तत्त्व- ज्ञानियोंनेभी स्वीकार किया है। नामरूपात्मक जगत्की जड़में नामरूपोंसे भिन्न, जो कुछ अदृश्य नित्य द्रव्य है, उसे कांटने अपने ग्रंथमें 'वस्तुतत्त्व' कहा है; और नेत्र आदि इंद्रियोंको गोचर होनेवाले नामरूपको 'बाहरी दृश्य' कहा है। * परंतु वेदान्त- शास्त्रमें नित्य बदलनेवाले नामरूपात्मक दृश्यको (जगत्) 'मिथ्या' या 'नाशवान्' और मूलद्रव्यको 'सत्य' या 'अमृत' कहते हैं। सामान्य लोग सत्यकी व्याख्या यों करते हैं, कि 'चक्षुर्वै सत्यं' अर्थात् जो आँखोंमें दीख पड़े वही सत्य है; और व्यवहारमेंभी देखते हैं, कि किसीने स्वप्नमें लाख रुपया पा लिया अथवा लाख रुपयेकी बात कानसे सुन ली, तो इस स्वप्नकी बातमें और सचमुच लाख रुपयेकी रकमके मिल पानेमें बड़ा भारी अंतर रहता है। इस कारण किसी दूसरेसे सुनी हुई और आँखोंसे प्रत्यक्ष देखी हुई – इन दोनों बातोंमें किसका अधिक विश्वास करे ? आँखोंका या कानों का ? इसी दुविधाको मिटानेके लिये बृहदारण्यक उपनिषद् (बृ. ५. १४. ४) में यह 'चक्षुर्वै सत्यं' वाक्य आया है। किंतु जिस शास्त्रमें रुपयेके खरेखोटे होनेका निश्चय 'रुपये'के रुपया गोलमोल सूरत और उसके प्रचलित नामसे करना है, वहाँ सत्यकी इस साक्षेप व्याख्याका क्या उपयोग होगा ? हम व्यवहारमें देखते हैं, कि यदि किसीकी बातचीतमें संगति नहीं है; और यदि घंटे-घंटेमें वह अपनी बात बदलने लगे, तो लोग उसे झूठा कहते हैं। फिर इसी न्यायसे 'रुपये'के नामरूपको (भीतरी द्रव्यको नहीं) खोटा अथवा झूठा कहनेमें क्या हानि है ? क्योंकि रुपयेका जो नामरूप आज इस घड़ी है, उसे दूर करके, उसके बदले 'करधनी' 'कटोरे'का नामरूप उसे दूसरे दिनही दिया जा सकता है; अर्थात् हम अपनी आँखोंसे देखते हैं कि यह नामरूप हमेशा बदलता रहता है – या उसीमें संगति नहीं होती। अब यदि कहे कि जो अपनी आँखोंसे दीख पड़ता है, उसके सिवा अन्य कुछ सत्य नहीं है; तो एकीकरणकी जिस मानसिक क्रियामें सृष्टिज्ञान होता है, वहभी तो आँखोंसे नहीं दीख पड़ती। अतएव उसेभी झूठ कहना पड़ेगा। इस कारण हमें जो कुछ ज्ञान होता है, उसेभी असत्य, झूठ कहना पड़ेगा। इनपर (और ऐसीही दूसरी

  • कांटने अपने Critique of Pure Reason नामक ग्रंथमें यह विचार किया है। नामरूपात्मक संसारकी जड़में जो द्रव्य है, उसे उसने 'डिंग आन झिश्' (Ding an sich—Thing in itself) कहा है, और हमने उसीका भाषांतर वस्तुतत्त्व किया है। नामरूपोंके बाहरी दृश्यको कांटने 'एरशायनुंग' (Ersch- einung-appearance) कहा है। कांट कहता है कि वस्तुतत्त्व अज्ञेय है।

अध्यात्म २१९ कठिनाइयोंपर) ध्यान देकर 'चक्षुर्वै सत्यं' जैसे सत्यके लौकिक और साक्षेप लक्षणको ठीक नहीं माना है। किंतु सर्वोपनिषद्में सत्यकी यही व्याख्या की है, कि सत्य वही है, जो अविनाशी है अर्थात् जिसका अन्य बातोंके नाश हो जानेपरभी कभी नाश नहीं होता। और इसी प्रकार महाभारतमेंभी सत्यका यही लक्षण बतलाया गया है :- सत्यं नामाऽव्ययं नित्यमविकारि तथैव च ।* अर्थात् "सत्य वही है कि जो अव्यय है अर्थात् जिसका कभी नाश नहीं होता; जो नित्य है अर्थात् सदासर्वदा बना रहता है; और अविकारी है अर्थात् जिसका स्वरूप कभी बदलता नहीं" (मभा. शां. १६२. १०)। अभी कुछ और थोड़ी देरमें कुछ कहनेवाले मनुष्यको झूठा कहनेका कारण यही है, कि वह अपनी बात- पर स्थिर नहीं रहता - इधर-उधर डगमगता रहता है। सत्यके इस निरपेक्ष लक्षणको स्वीकार कर लेनेपर कहना पड़ता है कि आँखोंसे दीख पड़नेवाला, पर हरघड़ीमें बदलनेवाला नामरूप मिथ्या है। और उस नामरूपसे ढँका हुआ और उसीके मूलमें सदैव एकही-सा स्थिर रहनेवाला अमृत वस्तुतत्त्वही - वह आँखोंसे भलेही न दीख पड़े - ठीक ठीक सत्य है। भगवद्गीतामें ब्रह्मका वर्णन इसी नीतिसे किया गया है - "यः सा सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति" (गीता ८. २०; १३. २७) - अक्षर ब्रह्म वही है, कि जो सब पदार्थ अर्थात् सभी पदार्थोंके नामरूपा- त्मक शरीर न रहनेपरभी नष्ट नहीं होता। महाभारतमें नाराणीय अथवा भागवत धर्मके निरूपणमें यही श्लोक पाठभेदसे फिर "यः स सर्वेषु भूतेषु"के स्थानमें 'भूतग्रामशरीरेषु' होकर आया है (मभा. शां. ३३९. २३)। ऐसेही गीताके दूसरे अध्यायके सोलहवें और सत्रहवें श्लोकोंका तात्पर्यभी वही है। वेदान्तमें जब आभूषणको 'मिथ्या' और सुवर्णको 'सत्य' कहते हैं, तब उसका यह मतलब नहीं है, कि वह जेवर निरुपयोगी या बिलकुल खोटा है - अर्थात् आँखोंसे दिखाई नहीं पड़ता, या मिट्टीपर पन्नी चिपका कर बनाया गया है - अथवा वह अस्तित्वमें हीही नहीं। यहाँ 'मिथ्या' शब्दका प्रयोग पदार्थके रंग, रूप आदि गुणोंके लिये और आकृतिके लिये अर्थात् ऊपरी दृश्यके लिये किया गया है। भीतरी द्रव्यसे उसका प्रयोजन नहीं है। स्मरण रहे, कि तात्त्विक द्रव्य तो सदैव 'सत्य' है। वेदान्ती यही देखता है, कि पदार्थमात्रके नामरूपात्मक आच्छादनके नीचे मूल कौनसा तत्त्व है; और तत्त्वज्ञानका सच्चा विषय हैभी यही। व्यवहारमें यह प्रत्यक्ष देखा जाता है, कि गहना गढ़वानेमें चाहे जितना मेहनताना देना पड़ा हो; पर आपत्तिके समय जब उसे बेचनेके लिये सराफ़की दूकानपर ले जाते हैं, तब वह साफ़ साफ़ कह देता है, * ग्रीनने real (सत् या सत्य) की व्याख्या बतलाते समय "whatever anything is really, it is unalterably कहा है (Prolegomena to Ethics § 25) ग्रीन की यह व्याख्या और महाभारतकी उक्त व्याख्या दोनो तत्त्वतः एकही है।

२२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कि "मैं यह नहीं जानना चाहता, कि गहना गढ़वानेमें तोलेके पिछे क्या उजरत देनी पड़ी है, यदि सोनेके चलत् भावमें इसे बेचना चाहो, तो हम ले लेंगे!" वेदान्तकी परिभाषामें इसी विचारको इस ढंगसे व्यक्त करेंगे :- सराफ़को गहना मिथ्या और उसका सोना भर सत्य दीख पड़ता है। इसी प्रकार यदि किसी नये मकानको बेचना हो, तो उसकी सुंदर बनावट ( रूप ) और सुविधाजनक रचना ( आकृति ) करनेमें जो खर्च लगा होगा, उसकी ओर खरीददार ज़राभी ध्यान नहीं देता। वह कहता है, कि ईंट, चूना, लकड़ी, पत्थर और मजदूरीकी लागतमें यदि बेचना चाहो, तो बेच डालो। इन दृष्टान्तोंसे वेदान्तियोंके इस कथनको पाठक भली-भाँति समझ जावेंगे, कि नामरूपात्मक जगत् मिथ्या है; और ब्रह्म सत्य है। "दृश्य जगत् मिथ्या है" इसका अर्थ यह नहीं, कि वह आँखोंसे तो दीखही पड़ता नहीं। किंतु इसका ठीक ठीक अर्थ यही है, कि (वह आँखोंसे तो दीख पड़ता है; पर ) एकही द्रव्यके नामरूप-भेदके कारण जगत्के बहुतेरे जो स्थलकृत अथवा काल- कृत दृश्य हैं, वे नाशवान् हैं; और इसीसे मिथ्या हैं। और इन सब नामरूपात्मक दृश्योंके आच्छादनमें छिपा हुआ सदैव वर्तमान, जो अविनाशी और अविकारी द्रव्य है, वही नित्य और सत्य है। सराफ़को कड़े, कंगन, गुंज और अँगूठियाँ खोटी जँचती हैं। उसे सिर्फ़ उनका सोना सच्चा जँचता है। परंतु सृष्टिके सुनारके कारखा- नेमें मूलमें ऐसा एक ही द्रव्य है, कि जिसको भिन्न भिन्न नामरूप दे कर उससे सोना, चाँदी, लोहा, पत्थर, लकड़ी, हवा-पानी आदि सारे गहने गढ़वाये जाते हैं। इसलिये सराफ़की अपेक्षा वेदान्ती कुछ और आगे बढ़कर सोना, चाँदी या पत्थर प्रभृति नामरूपोंको जेवरकेही समान मिथ्या समझकर सिद्धान्त करता है, कि इन सब पदार्थोंके मूलमें जो द्रव्य अर्थात् 'वस्तुतत्त्व' मौजूद है, वही सच्चा अर्थात् अविकारी सत्य है। इस वस्तुतत्त्वमें नामरूप आदि कोईभी गुण नहीं है। इस कारण इसे नेत्र आदि इंद्रियाँ कभी नहीं जान सकतीं। आँखोंसे न दीख पड़ने, नाकसे परंतु न सूँघे जाने अथवा हाथसे न टटोले जानेपरभी बुद्धिसे निश्चयपूर्वक यह अनुमान किया जाता है, कि अव्यक्त रूपसे वह होगा अवश्यही। न केवल इतनाही; बल्कि यहभी निश्चय करना पड़ता है, कि इस जगत्में कभीभी न बदलनेवाला 'जो कुछ' है, वह यही सत्य वस्तुतत्त्व है। जगत्का मूल सत्य इसीको कहते हैं। परंतु कुछ अनाड़ी विदेशी और स्वदेशी पंडितमन्यभी सत्य और मिथ्या शब्दोंके वेदान्तशास्त्रवाले पारिभाषिक अर्थपर ध्यान न देकर; और यह देखनेका कष्टभी न उठाते हुए, कि सत्य शब्दका जो अर्थ हमें सूझता है, उसकी अपेक्षा इसका कुछ और अर्थभी हो सकेगा या नहीं। यह कहकर अद्वैत वेदान्तका उपहास किया करते हैं, कि "हमें जो जगत् आँखोंसे प्रत्यक्ष दीख पड़ता है, उसेभी वेदान्ती लोग मिथ्या कहते हैं। भला, यहभी कोई बात हुई ? " परंतु यास्कके शब्दोंमें कह सकते हैं, कि अंधेको यदि खंभा नहीं सूझता, तो इसका दोषी खंभा नहीं है! छांदोग्य (छां. ६. १; और ७. १),

अध्यात्म २२१ बृहदारण्यक (बृ. १. ६. ३), मुंडक (मुं. ३. २. ८), और प्रश्न (प्र. ६. ५), आदि उपनिषदोंमें बारबार बतलाया गया है, कि नित्य बदलते रहनेवाले अर्थात् नाशवान् नामरूप सत्य नहीं हैं। जिसे सत्य अर्थात् नित्य, स्थिर तत्व देखना हो, उसे अपनी दृष्टिको इस नामरूपोंके परे पहुँचाना चाहिये। इन्हीं नामरूपोंको कठ (कठ. २. ५) और मुंडक (मुं. १. २. ९) आदि उपनिषदोंमें 'अविद्या' तथा अंतमें श्वेता- श्वतर (श्वे. ४. १०) उपनिषद्में 'माया' कहा है। भगवद्गीतामें 'माया', 'मोह' और 'अज्ञान' शब्दोंसे वही अर्थ विवक्षित है। जगत्के आरंभमें जो कुछ था, वह बिना नामरूपका था - अर्थात् निर्गुण और अव्यक्त था ! फिर आगे चलकर नाम- रूप मिल जानेसे वही व्यक्त और सगुण बन जाता है (बृ. १. ४. ७; छां. ६. १. २. ३)। अतएव विकारवान् अथवा नाशवान् नामरूपोंकोही 'माया' नाम देकर कहते हैं, कि यह सगुण अथवा दृश्य सृष्टि एक मूलद्रव्य अर्थात् ईश्वरकी मायाका खेल या लीला है। अब इस दृष्टिसे देखें, तो सांख्योंकी प्रकृति अव्यक्त भलेही बनी रहे; पर वह सत्वरजतम-गुणमयी है, अतः नामरूपोंसे युक्त मायाही है। इस प्रकृतिसे व्यक्त विश्वकी जो उत्पत्ति या पसारा होता है (जिसका वर्णन आठवें प्रकरणमें किया है), वहभी तो उस मायाका सगुण नामरूपात्मक विकार है। क्योंकि कोईभी गुण हो; वह इंद्रियोंको गोचर होनेवाला और इसीसे नामरूपात्मकही रहेगा। सारे आधिभौतिक शास्त्रभी इसी प्रकार मायाके वर्गमें आ जाते हैं। इतिहास, भूगर्भशास्त्र, विद्युच्छास्त्र, रसायनशास्त्र, पदार्थविज्ञान आदि कोईभी शास्त्र लीजिये; उसमें सब नामरूपात्मककाही तो विवेचन रहता है - अर्थात् यही वर्णन होता है, कि किसी पदार्थका एक नामरूप चला जाकर उसे दूसरा नामरूप कैसे मिलता है। उदाहरणार्थ, नामरूपके भेदकाही विचार इस शास्त्रमें इस प्रकार रहता है :- जैसे, पानी जिसका नाम है, उसको भाफ़ नाम कब और कैसे मिलता है, अथवा काले-कलूटे तारकोलसे लाल-हरे, नीले-पीले रँगनेके रंग (रूप) क्योंकर बनते हैं, इत्यादि। अतएव नामरूपोंमेंही उलझे हुए इन शास्त्रोंके अभ्याससे उस सत्य वस्तुका बोध नहीं हो सकता, कि जो नामरूपोंसे परे है। प्रकट है, कि जिसे सच्चे ब्रह्मस्वरूपका पता लगाना हो, उसको अपनी दृष्टि इन सब आधिभौतिक अर्थात् नामरूपात्मक शास्त्रोंसे परे पहुँचानी चाहिये। और यही अर्थ छांदोग्य उपनिषदमें सातवें अध्यायके आरंभकी कथामें व्यक्त किया गया है। कथाका आरंभ इस प्रकार है :- नारद ऋषि सनत्कुमार अर्थात् स्कंदके यहाँ जाकर कहने लगे, कि, “मुझे आत्म- ज्ञान बतलाओ” तब सनत्कुमार बोले, कि "पहले बतलाओ, तुमने क्या सीखा है, फिर उसके आगे मैं बतलाता हूँ।" इस पर नारदने कहा, कि "मैंने इतिहास- पुराणरूपी पाँचवें वेदसहित ऋग्वेद प्रभृति समग्र वेद, व्याकरण, गणित, तर्कशास्त्र, कालशास्त्र, नीतिशास्त्र, सभी वेदांग, धर्मशास्त्र, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या और सर्पदेवजनविद्या-प्रभृति सब कुछ पढ़ा है। परंतु जब उससे आत्मज्ञान नहीं हुआ,

२२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तब अब तुम्हारे यहाँ आया हूँ । " इसको सनत्कुमारने यह उत्तर दिया, " कि तूने जो कुछ सीखा है, वह तो सारा नामरूपात्मक है । सच्चा ब्रह्म इस नामब्रह्मसे बहुत परे है ; " और फिर नारदको क्रमशः इस प्रकार पहचान करा दी, कि इन नामरूपोंके अर्थात् सांख्योंकी अव्यक्त प्रकृतिसे अथवा वाणी, आशा, संकल्प, मन, बुद्धि ( ज्ञान ) और प्राणसेभी परे एवं उनसे बढ़-चढ़कर जो है, वही परमात्मारूपी अमृततत्त्व है । यहाँतक जो विवेचन किया गया, उसका तात्पर्य यह है, कि यद्यपि मनुष्यकी इंद्रियोंको नामरूपोंके अतिरिक्त और किसीकाभी प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता है, तोभी इन अनित्य नामरूपोंके आच्छादनसे ढँका हुआ लेकिन आँखोंसे न दीख पड़नेवाला अर्थात् कुछ-न-कुछ अव्यक्त नित्य द्रव्य रहनाही चाहिये; और इसी कारण सारी सृष्टिका ज्ञान हमें एकतासे होता रहता है। जो कुछ ज्ञान होता है, सो आत्माकोही होता है। इसलिये आत्माही ज्ञाता यानी जाननेवाला हुआ । और इस ज्ञाताको नामरूपात्मक सृष्टिकाही ज्ञान होता है। अतः नामरूपात्मक बाह्य सृष्टि ज्ञान हुई ( मभा. शां. ३०६. ४० ) और इस नामरूपात्मक सृष्टिके मूलमें जो कुछ वस्तुतत्त्व है, वही ज्ञेय है। इसी वर्गीकरणको मानकर भगवद्गीताने ज्ञाताको क्षेत्रज्ञ आत्मा और ज्ञेयको इंद्रियातीत नित्य परब्रह्म कहा है ( गीता १३. १२-१७ )। और फिर आगे ज्ञानके तीन भेद करके कहा है, कि भिन्नता या नानात्वसे जो सृष्टि- ज्ञान होता है, वह राजस है; तथा अंतमें इस नानात्वका जो ज्ञान एकत्वरूपसे होता है, वह सात्त्विक ज्ञान है ( गीता १८. २०-२१ )। इसपर कुछ लोग यह युक्तिवाद करते हैं, कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय इस प्रकार त्रिविध भेद करना ठीक नहीं है । एवं यह माननेके लिये हमारे पास कुछभी प्रमाण नहीं है, कि हमें जो कुछ ज्ञान होता है, उसकी अपेक्षा इस जगत्में औरभी कुछ है। गाय, घोड़े, प्रभृति जो बाह्य वस्तुएँ हमें दीख पड़ती हैं, वहभी तो ज्ञानही है; जो कि हमें होता है। और यद्यपि यह ज्ञान सत्य है, तोभी यह बतलानेके लिये - कि वह ज्ञान है काहे का - हमारे पास ज्ञानको छोड़ और कोई मार्गही नहीं रह जाता । अतएव यह नहीं कहा जा सकता, कि इस ज्ञानके अतिरिक्त बाह्य पदार्थके नाते कुछ स्वतंत्र वस्तुएँ हैं; अथवा इन बाह्य वस्तुओंके मूलमें और कोई स्वतंत्र तत्त्व है। क्योंकि जब ज्ञाताही न रहा, तब जगत् कहाँसे रहे ? इस दृष्टिसे विचार करनेपर उक्त वर्गीकरणसे अर्थात् ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयमेंसे - ज्ञेय नहीं रह जाता । ज्ञाता और उसको होनेवाला ज्ञान, यही दो बच जाते हैं; और इसी युक्तिवादको और जरा-सा आगे ले चलें, तो 'ज्ञाता' या 'द्रष्टा'भी तो एक प्रकार का ज्ञानही है। इसलिये अंतमें ज्ञानके सिवा दूसरी वस्तुही शेष नहीं रहती। इसीको 'विज्ञानवाद' कहते हैं; और योगाचार पंथके बौद्धोंने इसेही प्रमाण माना है। इस पंथके विद्वानोंने प्रतिपादन किया है, कि ज्ञाताके ज्ञानके अतिरिक्त इस जगत्में और कुछभी स्वतंत्र नहीं है। और तो क्या ? दुनियाही नहीं है। जो कुछ है, मनुष्यका ज्ञानही ज्ञान है। अंग्रेज ग्रंथकारोंमेंभी ह्यूम जैसे पंडित इस ढंगके मतके पुरस्कर्ता हैं।

अध्यात्म २२३ परंतु वेदान्तियोंको यह मत मान्य नहीं है । वेदान्तसूत्रों ( वे. सू. २. २. २८-३२) में आचार्य बादरायणने और इन्हीं सूत्रोंके भाष्यमें श्रीमच्छंकराचार्यने इस मतका खंडन किया है। यह तो झूठ नहीं, कि मनुष्यके मनपर जो संस्कार होते हैं, अंतमें वही उसे विदित रहते हैं; और इसीको हम ज्ञान कहते हैं । परंतु अब प्रश्न होता है, कि यदि इस ज्ञानके अतिरिक्त और कुछ हैही नहीं; तो 'गाय'संबंधी ज्ञान जुदा है, 'घोडा'- संबंधी ज्ञान जुदा है, और 'मैं'-विषयक ज्ञान जुदा है - इस प्रकार ज्ञान-ज्ञानकीही यह जो भिन्नता हमारी बुद्धिको ज्ञात होती है, उसका कारण क्या है ? माना कि, ज्ञान होनेकी मानसिक क्रिया सर्वत्र एकही है। परंतु यदि कहा जाय, कि इसके सिवा और कुछ हैही नहीं; तो गाय, घोड़ा इत्यादि भिन्न भिन्न भेद आ गये कहाँसे ? यदि कोई कहे, कि स्वप्नकी सृष्टिके समान मन अपने आप, अपनी मर्जीसे ज्ञानके ये भेद बनाया करता है; तो स्वप्नकी सृष्टिसे पृथक् जागृत अवस्थाके ज्ञानमें जो एक प्रकारकी सुसंगति मिलती है, उसका कारण बतलाते नहीं बनता ( वे. सू. शां. भा. २. २. २९; ३. २. ४ ) । अच्छा; यदि कहें कि ज्ञानको छोड़ दूसरी कोईभी वस्तु नहीं है; और 'द्रष्टा'का मनही सारे भिन्न भिन्न पदार्थोंको निर्मित करता है; तो प्रत्येक द्रष्टाको 'अहंपूर्वक' यह सारा ज्ञान होना चाहिये, कि "मेरा मन यानी मेंही खंभा हूँ"; अथवा "मैंही गाय हूँ"। परंतु ऐसा होता कहाँ है ? इसीसे शंकराचार्यने सिद्धान्त किया है, कि जब सभीको यह प्रतीति होती है, कि मैं अलग हूँ, और मुझसे खंभा और गाय प्रभृति पदार्थभी अलग हैं; तब द्रष्टाके मनमें समूचा ज्ञान होनेके लिये, इस आधारभूत बाह्य सृष्टिमें कुछ-न-कुछ स्वतंत्र वस्तुएँ अवश्य होनी चाहिये ( वे. सू. शां.भा.२२.२८ ) । कांटका मतभी इसी प्रकारका है। उसने स्पष्ट कह दिया है, कि सृष्टिका ज्ञान होनेके लिये यद्यपि मनुष्यकी बुद्धिका एकीकरण आवश्यक है, तथापि बुद्धि इस ज्ञानको सर्वथा अपनीही गाँठसे - अर्थात् निराधार या नये सिरेसे नहीं उत्पन्न कर देती । उसे सृष्टिकी बाह्य वस्तुओंकी सदैव अपेक्षा रहती है । यहाँ कोई प्रश्न करे, कि "क्योंजी ! शंकराचार्य एक बार बाह्य सृष्टिको मिथ्या कहते हैं; और दूसरी बार बौद्धोंका खंडन करने उसी बाह्यसृष्टिके अस्तित्वको, 'द्रष्टा'के अस्तित्वके समानही सत्य प्रतिपादन करते हैं। इन बेमेल बातोंका मिलान होगा कैसे ? " पर इस प्रश्नका उत्तर पहलेही बतला चुके हैं। आचार्य जब बाह्यसृष्टिको. मिथ्या या असत्य कहते हैं, तब उसका इतनाही अर्थ समझना चाहिये, कि बाह्य सृष्टिका दृश्य नामरूप असत्य अर्थात् विनाशवान् है। नामरूपात्मक बाह्य दृश्य मिथ्या बना रहे; पर उससे सिद्धान्तमें रत्तीभरभी आँच नहीं लगती, कि उस बाह्यसृष्टिके मूलमें कुछ-न-कुछ इंद्रियातीत सत्यवस्तु है । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विचारमें जिस प्रकार यह सिद्धान्त किया है; कि देहेंद्रिय आदि विनाशवान् नामरूपोंके मूलमें कोई नित्य आत्मतत्त्व है; उसी प्रकार कहना पड़ता है, कि नामस्वरूपात्मक बाह्य सृष्टिके मूलमेंभी कुछ-न-कुछ नित्य आत्मतत्त्व है। अतएव वेदान्तशास्त्रने निश्चित

२२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र किया है, कि देहेंद्रियों और बाह्य सृष्टिके निशिदिन बदलनेवाले अर्थात् मिथ्या दृश्योंके मूलमें दोनोंही ओर कोई नित्य अर्थात् सत्य द्रव्य छिपा हुआ है। इसके आगे अब प्रश्न होता है, कि दोनों ओर जो ये नित्य तत्त्व हैं, वे अलग अलग हैं या एकरूपी हैं ? परंतु इसका विचार फिर करेंगे। पहले इस मतकी अर्वाचीनताके संबंधमें मौके- बेमौके जो आक्षेप हुआ करता है, उसीका थोड़ा-सा विचार करते हैं। कई लोग कहते हैं, कि बौद्धोंका विज्ञानवाद यदि वेदान्तशास्त्रको संमत नहीं है, तो श्रीशंकराचार्यके मायावादकाभी प्राचीन उपनिषदोंमें वर्णन नहीं है; इसलिये उसेभी वेदान्तशास्त्रका मूलभाग नहीं मान सकते। श्रीशंकराचार्यका मत - कि जिसे मायावाद कहते हैं - यह है, कि बाह्यसृष्टिका आँखोंसे दीख पड़नेवाला नामरूपात्मक स्वरूप मिथ्या है। उसके मूलमें जो अव्यय और नित्यद्रव्य है, वही सत्य है। परंतु उपनिषदोंका मन लगाकर अध्ययन करनेसे कोईभी सहजही जान जावेगा, कि यह आक्षेप निराधार है। यह पहलेही बतला चुके हैं, कि 'सत्य' शब्दका उपयोग साधारण व्यवहारमें आँखोंसे प्रत्यक्ष दीख पड़नेवाली वस्तुके लिये किया जाता है। अतः 'सत्य' शब्दके इसी प्रचलित अर्थको लेकर उपनिषदोंमें कुछ स्थानोंपर आँखोंसे दीख पड़ने- वाले नामरूपात्मक बाह्य पदार्थोंको 'सत्य' और उन नामरूपोंसे आच्छादित द्रव्यको 'अमृत' नाम दिया गया है। उदाहरण लीजिये। बृहदारण्यक उपनिषद्में (बृ. १. ६. ३) "तदेतदमृतं सत्येन च्छन्नं" - वह अमृत सत्यसे आच्छादित है - कह कर तुरंत अमृत और सत्य शब्दोंकी यह व्याख्या की है, कि "प्राणो वा अमृतं नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः" अर्थात् प्राण अमृत है; और नामरूप सत्य है। एवं इस नाम- रूप सत्यसे प्राण ढँका हुआ है। यहाँ प्राणका अर्थ प्राणस्वरूपी परब्रह्म है। इससे प्रकट है, कि आगेके उपनिषदोंमें जिन्हें 'मिथ्या' और 'सत्य' कहा है, पहले उन्हींके नाम क्रमसे 'सत्य' और 'अमृत' थे। अनेक स्थानोंपर इसी अमृतको 'सत्यस्य सत्यं'

  • आँखोंसे दीख पड़नेवाले सत्यके भीतरका अंतिम सत्य (बृ. २. ३. ६) -- कहा है। किंतु उक्त आक्षेप इतनेहीसे सिद्ध नहीं हो जाता, कि उपनिषदोंमें कुछ स्थानोंपर आँखोंसे दीख पड़नेवाली सृष्टिकोही सत्य कहा है। क्योंकि बृहदारण्यकमेंही अंतमें यह सिद्धान्त किया है, कि आत्मरूप परब्रह्मको छोड़, और सब 'आर्तम्' अर्थात् विनाश- वान् है (बृ. ३. ७. २३)। जब पहले पहल जगत्के मूलतत्त्वकी खोज होने लगी, तब शोधक लोग आँखोंसे दीख पड़नेवाले जगत्को पहले सत्य मानकर ढूँढ़ने लगे, कि उसके पेटमें और कौन-सा सूक्ष्म सत्य छिपा हुआ है। किंतु फिर ज्ञात हुआ, कि जिस दृश्य सृष्टिके रूपको हम सत्य मानते हैं, वह तो असलमें विनाशवान् है; और उसके भीतर कोई अविनाशी या अमृत तत्त्व मौजूद है। दोनोंके बीचके इस भेदको जैसे जैसे अधिक व्यक्त करनेकी आवश्यकता होने लगी, वैसे वैसे 'सत्य' और 'अमृत' शब्दोंके स्थानमें 'अविद्या' और 'विद्या', एवं अंतमें 'माया और सत्य' अथवा 'मिथ्या और सत्य' इन पारिभाषिक शब्दोंका प्रचार होता गया। क्योंकि 'सत्य'का धात्वर्थ 'सदैव

अध्यात्म २२५ रहनेवाला' है। इस कारण नित्य बदलनेवाले और नाशवान् नामरूपको सत्य कहन उत्तरोत्तर औरभी अनुचित जँचने लगा। परंतु इस रीतिमे 'माया अथवा मिथ्या' शब्दोंका प्रचार पीछे भलेही हुआ हो; तोभी ये विचार बहुत पुराने जमानेसे चले आ रहे हैं, कि जगत्की वस्तुओंका वह दृश्य, जो नज़रसे दीख पड़ता है, विनाशी और असत्य है। एवं उसका आधारभूत 'तात्त्विक द्रव्य' ही सत् या सत्य है। प्रत्यक्ष ऋग्वेदमेंभी कहा है कि "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (ऋ. १. १६४. ४६. और १०. ११४. ५) - मूलमें जो एक और नित्य (सत्) है, उसीको विप्र (ज्ञाता) भिन्न भिन्न नाम देते हैं- अर्थात् एकही सत्य वस्तु नामरूपसे भिन्न भिन्न दीख पड़ती है। 'एक रूपके अनेक रूप दिखलाने 'के अर्थमें, 'माया' शब्द ऋग्वेदमेंभी प्रयुक्त है; और वहाँ यह वर्णन है, कि "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूपः ईयते" - इंद्र अपनी मायासे अनेक रूप धारण करता है (ऋ. ६. ४७. १८) । तैत्तिरीय संहिता (तै. सं. ३. १. ११) में एक स्थानपर 'माया' शब्दका इसी अर्थमें प्रयोग किया गया है; और श्वेताश्वतर उपनिषदमें इस 'माया' शब्दका नामरूपके लिये उपयोग हुआ है; जो हो, नामरूपके लिये 'माया' शब्दका प्रयोग किये जानेकी रीति प्रथम श्वेताश्वतर उपनिषदके समयमें भलेही चल निकली हो; पर इतना तो निर्विवाद है, कि नामरूपोंके अनित्य अथवा असत्य होनेकी कल्पना इससे पहलेकी है। 'माया' शब्दका विपरीत अर्थ करके श्रीशंकराचार्यने यह कल्पना नये सिरेसे नहीं चला दी है। नामरूपात्मक सृष्टिके स्वरूपको श्रीशंकरा- चार्यके समान बेधड़क 'मिथ्या' कह देनेकी जो हिम्मत न कर सकें; अथवा जैसे गीतामें भगवानने उसी अर्थमें 'माया' शब्दका उपयोग किया है; वैसा करनेसे जो हिचकते हों; वे चाहें तो खुशीसे बृहदारण्यक उपनिषद्‌के 'सत्य' और 'अमृत' शब्दोंका उपयोग करें। कुछभी क्यों न कहा जावे; पर इस सिद्धान्तमें जराभी चोट नहीं लगती, कि नामरूप 'विनाशवान्' हैं; और जो तत्त्व उनसे आच्छादित है, वह 'अमृत' या 'अविनाशी' है। एवं यह भेद प्राचीन वैदिक कालसे चला आ रहा है। हमारे आत्माको नामरूपात्मक बाह्य सृष्टिके सारे पदार्थोंका ज्ञान होनेके लिये 'कुछ-न-कुछ' एक ऐसा नित्य मूल द्रव्य होना चाहिये, कि जो आत्माका आधार- भूत हो; और उसीके मेलका हो। एवं बाह्य सृष्टिके नाना पदार्थोंकी जड़में वर्तमान रहता हो; नहीं तो यह ज्ञानही न होगा। किंतु इतना निश्चय कर देनेसे अध्यात्म- शास्त्रका काम समाप्त नहीं हो जाता। बाह्य सृष्टिके मूलमें रहनेवाले इस नित्य द्रव्यको वेदान्ती लोग 'ब्रह्म' कहते हैं; और अब हो सके तो ब्रह्मके स्वरूपका निर्णय करनाभी आवश्यक है। सारे नामरूपात्मक पदार्थोंके मूलमें वर्तमान यह नित्य तत्त्व है अव्यक्त। इसलिये प्रकटही है, कि इसका स्वरूप नामरूपात्मक पदार्थोंके समान व्यक्त और स्थूल (जड़) नहीं रह सकता। परंतु यदि व्यक्त और स्थूल पदार्थोंको छोड़ दें, तो मन, स्मृति, वासना, प्राण और ज्ञान प्रभृति बहुतसे ऐसे अव्यक्त पदार्थ हैं; कि जो स्थूल नहीं हैं; । एवं यह असंभव नहीं, कि परब्रह्म इनमेंसे किसीभी एक गी. र. १५

२२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आद्यके स्वरूपका हो। कुछ लोग कहते हैं, कि प्राणका और परब्रह्मका स्वरूप एकही है। जर्मन पंडित शोपेनहरने परब्रह्मको वासनात्मक निश्चित किया है; और वासना मनका धर्म है, अतः इस मतके अनुसार ब्रह्म. मनोमयही कहा जावेगा (तै. ३. ४)। परंतु, अब तक जो विवेचन हुआ है उससे तो यही कहा जावेगा कि – “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ. ३. ३) अथवा “विज्ञानं ब्रह्म” (तै. ३. ५) — जड सृष्टिके नानात्वका जो ज्ञान एकस्वरूपसे हमें होता है, वही ब्रह्मका स्वरूप होगा। हेकेलका सिद्धान्त इसी ढंगका है। परंतु उपनिषदोंमें चिद्रूपी ज्ञानके साथ सत् (अर्थात् जगतकी सारी वस्तुओंके अस्तित्वके सामान्य धर्म या सत्तासमानताका) और आनंदकाभी ब्रह्म- स्वरूपमेंही अंतर्भाव करके ब्रह्मको सच्चिदानंदरूपी माना है। इसके अतिरिक्त दूसरा ब्रह्मस्वरूप कहना हो, तो वह ॐकार है। इसकी उपपत्ति इस प्रकार है :– पहले समस्त अनादि वेद ॐकारसे उपजे हैं; और वेदोंके निकल चुकनेपर उनके नित्य शब्दोंसेही आगे चलकर ब्रह्माने जब सारी सृष्टिका निर्माण किया है (गीता १७. २३; महा. शां. २३१. ५६-५८), तब मूल आरंभमें ॐकारको छोड़ और कुछ न था। इससे सिद्ध होता है, कि ॐकारही सच्चा ब्रह्मस्वरूप है (मांडूक्य. १; तै. १. ८)। परंतु केवल अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे विचार किया जाय, तो परब्रह्मके ये सभी स्वरूप थोड़ेबहुत नामरूपात्मकही हैं। क्योंकि इन सभी स्वरूपोंको मनुष्य अपनी इंद्रियोंसे जान सकता है; और मनुष्यको इस रीतिसे जो कुछ ज्ञात हुआ करता है, वह नामरूपोंकी श्रेणीमें आ जाता है। फिर इस नामरूपके मूलमें स्थित जो अनादि, भीतरबाहर सर्वत्र एक-सा भरा हुआ, एकरूप नित्य और अमृत तत्त्व है (गीता १३. १२-१७), उसके वास्तविक स्वरूपका निर्णयही तो क्योकर हो ? कितनेही अध्यात्मशास्त्री पंडित कहते हैं, कि कुछभी हो; यह तत्त्व हमारी इंद्रियोंको अज्ञेयही रहेगा; और कांटने तो इस प्रश्नपर अधिक विचार करनाही छोड़ दिया है। इसी प्रकार उपनिषदोंमेंभी परब्रह्मके अज्ञेय स्वरूपके वर्णन इस प्रकार हैं: ‘नेति नेति’ अर्थात् वह नहीं है, कि जिसके विषयमें कुछ कहा जा सकता है; ब्रह्म इससे परे है; वह आँखोंसे दीख नहीं पड़ता; वह वाणीको और मनकोभी अगोचर है – “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।” फिरभी अध्यात्मशास्त्रने निश्चय किया है, कि इस अगम्य स्थितिमेंभी मनुष्य अपनी बुद्धिसे ब्रह्मके स्वरूपका एक प्रकारसे निर्णय कर सकता है। ऊपर जो वासना, स्मृति, धृति, आशा, प्राण और ज्ञान प्रभृति अव्यक्त पदार्थ बतलाये गये हैं, उनमेंसे जो सबसे अतिशय व्यापक अथवा सबसे श्रेष्ठ निर्णित हो, उसी को परब्रह्मका स्वरूप मानना चाहिये। क्योंकि यह तो निर्विवादही है, कि सब अव्यक्त पदार्थोंमें परब्रह्म श्रेष्ठ है। अब इस दृष्टिसे आशा, स्मृति, वासना और धृति आदिका विचार करें, तो ये सब मनके धर्म हैं; अतएव इनकी अपेक्षा मन श्रेष्ठ हुआ। मनसे ज्ञान श्रेष्ठ है; और ज्ञान है बुद्धिका धर्म। अत, ज्ञानसे बुद्धि श्रेष्ठ हुई। और अंतमें यह बुद्धिभी जिसकी नौकर है, वह आत्माही सबसे श्रेष्ठ है (गीता ३.४२)।

अध्यात्म २२७ 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-प्रकरण'मे उक्त विचार किया गया है। अब वासना और मन आदि अव्यक्त पदार्थोंसे यदि आत्मा श्रेष्ठ है, तो आपही सिद्ध हो गया, कि परब्रह्मका स्वरूपभी वही (आत्मा) हो। छांदोग्य उपनिषदके सातवें अध्यायमें इसी युक्तिवादसे काम लिया गया है। और सनत्कुमारने नारदसे कहा है, कि "वाणीकी अपेक्षा मन अधिक योग्यताका (भूयस्) है। मनसे ज्ञान, ज्ञानमे बल और इसी प्रकार चढ़ते चढ़ते जब कि आत्मा सबसे श्रेष्ठ (भूमन्) है, तब आत्माहीको परब्रह्मका सच्चा स्वरूप कहना चाहिये।" अंग्रेज ग्रंथकारोंमें ग्रीनने इसी सिद्धान्तको माना है; किंतु उसका युक्तिवाद कुछ भिन्न है। इसलिये यहाँ उसे संक्षेपसे वेदान्तकी परिभाषामें बतलाते हैं। ग्रीनका कथन है, कि हमारे मनपर इंद्रियोंके द्वारा बाह्य नामरूपोंके जो संस्कार हुआ करते हैं, उनके एकीकरणसे हमारा आत्मा जो ज्ञान उत्पन्न करता है उस ज्ञानके मेलके लिये बाह्यसृष्टिके भिन्न भिन्न नामरूपोंके मूलमेंभी एकतामे रहनेवाली कोई न कोई वस्तु होनी चाहिये। नहीं तो आत्माके एकीकरणसे, जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह स्वकपोलकल्पित और निराधार हो कर विज्ञानवादके समान असत्य प्रमाणित हो जायगा। इस 'कोई न कोई' वस्तुको हम ब्रह्म कहते हैं। भेद इतनाही है, कि कांटकी परिभाषाको मानकर ग्रीन उसको वस्तुतत्त्व कहता है। कुछभी कहो; अंतमें वस्तुतत्त्व (ब्रह्म) और आत्मा यही दो पदार्थ रह जाते हैं, कि जो परस्परके मेलके हैं। इनमेंसे 'आत्मा' मन और बुद्धिसे परे अर्थात् इंद्रियातीत है। तथापि अपने विश्वासके प्रमाणपर हम माना करते हैं, कि आत्मा जड़ नहीं है और निश्चय करते हैं कि वह या तो चिद्रूपी है या चैतन्यरूपी है। इस प्रकार आत्माके स्वरूपका निश्चय करके देखना है, कि बाह्य सृष्टिके ब्रह्मका स्वरूप क्या है। इस विषयमें यहाँ दोही पक्ष हो सकते हैं; यह ब्रह्म या वस्तुतत्त्व (१) आत्माके स्वरूपका होगा या (२) आत्मासे भिन्न स्वरूपका। क्योंकि, ब्रह्म, और आत्माके सिवा अब तीसरी वस्तुही नहीं रह जानी। परंतु सभीका अनुभव यह है, कि यदि कोईभी दो पदार्थ स्वरूपसे भिन्न हों; तो उनके परिणाम अथवा कार्यभी भिन्न भिन्न होने चाहिये। अतएव हम लोग पदार्थोंके भिन्न अथवा एकरूप होनेका निर्णय उन पदार्थोंके परिणामोंसेही किसीभी शास्त्रमें किया करते हैं। एक उदाहरण लीजिये; दो वृक्षोंके फल, फूल, पत्ते, छिलके और जड़को देखकर हम निश्चय करते हैं, कि वे दोनों अलग अलग हैं या एकही हैं। यदि इसी रीतिका अवलंबन करके यहाँ विचार करें, तो दीख पड़ता है, कि आत्मा और ब्रह्म एकही स्वरूपके होने चाहिये। क्योंकि ऊपर कहा जा चुका है, कि सृष्टिके भिन्न भिन्न पदार्थोंके जो संस्कार मनपर होते हैं, उनका आत्माकी क्रियासे एकी- करण होता है। इस एकीकरणके साथ उस एकीकरणका मेल होना चाहिये, कि जिसे भिन्न भिन्न बाह्य पदार्थोंके मूलमें रहनेवाला वस्तुतत्त्व अर्थात् ब्रह्म इन पदार्थोंकी अनेकताको मेट कर निष्पन्न करता है। यदि इस प्रकार दोनोंमें मेल न होगा, तो समूचा ज्ञान निराधार और असत्य हो जावेगा। एकही नमूनेके और बिलकुल एक

२२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र दूसरेके जोड़के एकीकरण करनेवाले ये तत्व दो स्थानोंपर भलेही हों; परंतु वे परस्पर भिन्न भिन्न नहीं रह सकते। अतएव यह आपही सिद्ध होता है, कि इनमेंसे आत्माका जो रूप होगा, वही रूप ब्रह्मकाभी होना चहिये।* सारांश, किसीभी रीतिसे विचार क्यों न किया जाय; सिद्ध यही होगा कि, बाह्य सृष्टिके नाम और रूपोंसे आच्छादित ब्रह्मतत्त्व, नामरूपात्मक प्रकृतिके समान जड़ तो हैही नहीं, किंतु वासनात्मक ब्रह्म, मनोमय ब्रह्म, ज्ञानमय ब्रह्म, प्राणब्रह्म अथवा ॐकाररूपी शब्दब्रह्म

  • ये ब्रह्मके रूपभी निम्न श्रेणीके हैं; और ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप इनसे परे है; एवं इनसे अधिक योग्यताका अर्थात् शुद्ध आत्मस्वरूपी है। और इस विषयके संबंधमें गीतामें अनेक स्थानोंपर जो उल्लेख हैं, उनसे स्पष्ट होता है, कि गीताका सिद्धान्तभी यही है (गीता २.२०; ७.५; ८.४; १३.३१; १५.७, ८)। फिरभी यह न समझ लेना चाहिये, कि ब्रह्म और आत्माके एकस्वरूप रहनेके सिद्धान्तको हमारे ऋषियोंने केवल ऐसी युक्ति-प्रयुक्तियोंसेही पहले खोजा था। इसका कारण इसी प्रकरणके आरंभमें बतला चुके हैं, कि अध्यात्मशास्त्रमें बुद्धिमात्रकी सहायतासे कोईभी एकही अनुमान निश्चित नहीं किया जाता है, उसे सदैव आत्मप्रतीतिका सहारा चाहिये। इसके अतिरिक्त सर्वदा देखा जाता है, कि आधिभौतिक शास्त्रोंमेंभी अनुभव पहले होता है; और उसकी उपपत्ति या तो पीछेसे मालूम हो जाती है, या ढूँढ ली जाती है। इसी न्यायसे उक्त ब्रह्मात्मैक्यकी बुद्धिगम्य उपपत्तिके निकलनेके सैकड़ों वर्ष पहले प्राचीन ऋषियोंने प्रथम यह निर्णय कर दिया था, कि "नेह नानाऽस्ति किंचन" (बृ. ४.४.१९; कठ. ४.११) - इस सृष्टिमें दीख पड़नेवाली अनेकता सच नहीं है। उसके मूलमें चारों ओर एकही अमृत, अव्यय और नित्य तत्त्व है (गीता १८.२०)। और फिर उन्होंने अपनी अंतर्दृष्टिसे यह सिद्धान्त ढूँढ निकाला, कि बाह्यसृष्टिके नामरूपसे आच्छादित अविनाशी तत्त्व और हमारे शरीरका वह आत्मतत्त्व - कि जो बुद्धिसे परे है - ये दोनों एकही अर्थात् अमर और अव्यय हैं; अथवा जो तत्त्व ब्रह्मांडमें है, वही पिंडमें यानी मनुष्यकी देहमें वास करता है। एवं बृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्यने मैत्रेयीको, गार्गी-वारुणि प्रभृतिको और जनकको (बृ. ३.५-८; ४.२-४) बतलाया है कि पूरे वेदान्तका यही रहस्य है। इसी उपनिषद्में पहले कहा गया गया है, कि जिसने जान लिया, कि "अहं ब्रह्मास्मि" - मैंही परब्रह्म हूँ - उसने सब कुछ जान लिया (बृ. १.४. १०); और छांदोग्य उपनिषदके छठे अध्यायमें श्वेतकेतुको उसके पिताने अद्वैत वेदान्तका यही तत्त्व अनेक रीतियोंसे समझा दिया है। जब अध्यायके आरंभमें श्वेत- केतुने अपने पितासे पूछा, कि "जिस प्रकार मिट्टीके एक लौंदेका भेद जान लेनेसे मिट्टीके नामरूपात्मक सभी विकार जाने जाते हैं, उसी प्रकार जिस एकही वस्तुका ज्ञान हो जानेसे सब कुछ समझमें आ जावें; वही एक वस्तु मुझे बतलाइये, मुझे उसका
  • Green's Prolegomena to Ethics, § PP. 26-36.