श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गिल्ट बनकर उत्पन्न हुए हैं; अर्थात् सारा भेद केवल नामरूपोंका है, मूल द्रव्यका नहीं। भिन्न भिन्न नामरूपोंकी जड़में एकरूप एकही द्रव्य नित्य निवास करता है। “सब पदार्थोंमें इस प्रकारसे नित्यरूपसे सदैव रहना” – संस्कृतमें 'सत्तासामान्यत्व' कहलाता है। वेदान्तशास्त्रके उक्त सिद्धान्तकाही कांट आदि अर्वाचीन पश्चिमी तत्त्व- ज्ञानियोंनेभी स्वीकार किया है। नामरूपात्मक जगत्की जड़में नामरूपोंसे भिन्न, जो कुछ अदृश्य नित्य द्रव्य है, उसे कांटने अपने ग्रंथमें 'वस्तुतत्त्व' कहा है; और नेत्र आदि इंद्रियोंको गोचर होनेवाले नामरूपको 'बाहरी दृश्य' कहा है। * परंतु वेदान्त- शास्त्रमें नित्य बदलनेवाले नामरूपात्मक दृश्यको (जगत्) 'मिथ्या' या 'नाशवान्' और मूलद्रव्यको 'सत्य' या 'अमृत' कहते हैं। सामान्य लोग सत्यकी व्याख्या यों करते हैं, कि 'चक्षुर्वै सत्यं' अर्थात् जो आँखोंमें दीख पड़े वही सत्य है; और व्यवहारमेंभी देखते हैं, कि किसीने स्वप्नमें लाख रुपया पा लिया अथवा लाख रुपयेकी बात कानसे सुन ली, तो इस स्वप्नकी बातमें और सचमुच लाख रुपयेकी रकमके मिल पानेमें बड़ा भारी अंतर रहता है। इस कारण किसी दूसरेसे सुनी हुई और आँखोंसे प्रत्यक्ष देखी हुई – इन दोनों बातोंमें किसका अधिक विश्वास करे ? आँखोंका या कानों का ? इसी दुविधाको मिटानेके लिये बृहदारण्यक उपनिषद् (बृ. ५. १४. ४) में यह 'चक्षुर्वै सत्यं' वाक्य आया है। किंतु जिस शास्त्रमें रुपयेके खरेखोटे होनेका निश्चय 'रुपये'के रुपया गोलमोल सूरत और उसके प्रचलित नामसे करना है, वहाँ सत्यकी इस साक्षेप व्याख्याका क्या उपयोग होगा ? हम व्यवहारमें देखते हैं, कि यदि किसीकी बातचीतमें संगति नहीं है; और यदि घंटे-घंटेमें वह अपनी बात बदलने लगे, तो लोग उसे झूठा कहते हैं। फिर इसी न्यायसे 'रुपये'के नामरूपको (भीतरी द्रव्यको नहीं) खोटा अथवा झूठा कहनेमें क्या हानि है ? क्योंकि रुपयेका जो नामरूप आज इस घड़ी है, उसे दूर करके, उसके बदले 'करधनी' 'कटोरे'का नामरूप उसे दूसरे दिनही दिया जा सकता है; अर्थात् हम अपनी आँखोंसे देखते हैं कि यह नामरूप हमेशा बदलता रहता है – या उसीमें संगति नहीं होती। अब यदि कहे कि जो अपनी आँखोंसे दीख पड़ता है, उसके सिवा अन्य कुछ सत्य नहीं है; तो एकीकरणकी जिस मानसिक क्रियामें सृष्टिज्ञान होता है, वहभी तो आँखोंसे नहीं दीख पड़ती। अतएव उसेभी झूठ कहना पड़ेगा। इस कारण हमें जो कुछ ज्ञान होता है, उसेभी असत्य, झूठ कहना पड़ेगा। इनपर (और ऐसीही दूसरी
- कांटने अपने Critique of Pure Reason नामक ग्रंथमें यह विचार किया है। नामरूपात्मक संसारकी जड़में जो द्रव्य है, उसे उसने 'डिंग आन झिश्' (Ding an sich—Thing in itself) कहा है, और हमने उसीका भाषांतर वस्तुतत्त्व किया है। नामरूपोंके बाहरी दृश्यको कांटने 'एरशायनुंग' (Ersch- einung-appearance) कहा है। कांट कहता है कि वस्तुतत्त्व अज्ञेय है।