श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यात्म २१९ कठिनाइयोंपर) ध्यान देकर 'चक्षुर्वै सत्यं' जैसे सत्यके लौकिक और साक्षेप लक्षणको ठीक नहीं माना है। किंतु सर्वोपनिषद्में सत्यकी यही व्याख्या की है, कि सत्य वही है, जो अविनाशी है अर्थात् जिसका अन्य बातोंके नाश हो जानेपरभी कभी नाश नहीं होता। और इसी प्रकार महाभारतमेंभी सत्यका यही लक्षण बतलाया गया है :- सत्यं नामाऽव्ययं नित्यमविकारि तथैव च ।* अर्थात् "सत्य वही है कि जो अव्यय है अर्थात् जिसका कभी नाश नहीं होता; जो नित्य है अर्थात् सदासर्वदा बना रहता है; और अविकारी है अर्थात् जिसका स्वरूप कभी बदलता नहीं" (मभा. शां. १६२. १०)। अभी कुछ और थोड़ी देरमें कुछ कहनेवाले मनुष्यको झूठा कहनेका कारण यही है, कि वह अपनी बात- पर स्थिर नहीं रहता - इधर-उधर डगमगता रहता है। सत्यके इस निरपेक्ष लक्षणको स्वीकार कर लेनेपर कहना पड़ता है कि आँखोंसे दीख पड़नेवाला, पर हरघड़ीमें बदलनेवाला नामरूप मिथ्या है। और उस नामरूपसे ढँका हुआ और उसीके मूलमें सदैव एकही-सा स्थिर रहनेवाला अमृत वस्तुतत्त्वही - वह आँखोंसे भलेही न दीख पड़े - ठीक ठीक सत्य है। भगवद्गीतामें ब्रह्मका वर्णन इसी नीतिसे किया गया है - "यः सा सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति" (गीता ८. २०; १३. २७) - अक्षर ब्रह्म वही है, कि जो सब पदार्थ अर्थात् सभी पदार्थोंके नामरूपा- त्मक शरीर न रहनेपरभी नष्ट नहीं होता। महाभारतमें नाराणीय अथवा भागवत धर्मके निरूपणमें यही श्लोक पाठभेदसे फिर "यः स सर्वेषु भूतेषु"के स्थानमें 'भूतग्रामशरीरेषु' होकर आया है (मभा. शां. ३३९. २३)। ऐसेही गीताके दूसरे अध्यायके सोलहवें और सत्रहवें श्लोकोंका तात्पर्यभी वही है। वेदान्तमें जब आभूषणको 'मिथ्या' और सुवर्णको 'सत्य' कहते हैं, तब उसका यह मतलब नहीं है, कि वह जेवर निरुपयोगी या बिलकुल खोटा है - अर्थात् आँखोंसे दिखाई नहीं पड़ता, या मिट्टीपर पन्नी चिपका कर बनाया गया है - अथवा वह अस्तित्वमें हीही नहीं। यहाँ 'मिथ्या' शब्दका प्रयोग पदार्थके रंग, रूप आदि गुणोंके लिये और आकृतिके लिये अर्थात् ऊपरी दृश्यके लिये किया गया है। भीतरी द्रव्यसे उसका प्रयोजन नहीं है। स्मरण रहे, कि तात्त्विक द्रव्य तो सदैव 'सत्य' है। वेदान्ती यही देखता है, कि पदार्थमात्रके नामरूपात्मक आच्छादनके नीचे मूल कौनसा तत्त्व है; और तत्त्वज्ञानका सच्चा विषय हैभी यही। व्यवहारमें यह प्रत्यक्ष देखा जाता है, कि गहना गढ़वानेमें चाहे जितना मेहनताना देना पड़ा हो; पर आपत्तिके समय जब उसे बेचनेके लिये सराफ़की दूकानपर ले जाते हैं, तब वह साफ़ साफ़ कह देता है, * ग्रीनने real (सत् या सत्य) की व्याख्या बतलाते समय "whatever anything is really, it is unalterably कहा है (Prolegomena to Ethics § 25) ग्रीन की यह व्याख्या और महाभारतकी उक्त व्याख्या दोनो तत्त्वतः एकही है।