भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

२२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कि "मैं यह नहीं जानना चाहता, कि गहना गढ़वानेमें तोलेके पिछे क्या उजरत देनी पड़ी है, यदि सोनेके चलत् भावमें इसे बेचना चाहो, तो हम ले लेंगे!" वेदान्तकी परिभाषामें इसी विचारको इस ढंगसे व्यक्त करेंगे :- सराफ़को गहना मिथ्या और उसका सोना भर सत्य दीख पड़ता है। इसी प्रकार यदि किसी नये मकानको बेचना हो, तो उसकी सुंदर बनावट ( रूप ) और सुविधाजनक रचना ( आकृति ) करनेमें जो खर्च लगा होगा, उसकी ओर खरीददार ज़राभी ध्यान नहीं देता। वह कहता है, कि ईंट, चूना, लकड़ी, पत्थर और मजदूरीकी लागतमें यदि बेचना चाहो, तो बेच डालो। इन दृष्टान्तोंसे वेदान्तियोंके इस कथनको पाठक भली-भाँति समझ जावेंगे, कि नामरूपात्मक जगत् मिथ्या है; और ब्रह्म सत्य है। "दृश्य जगत् मिथ्या है" इसका अर्थ यह नहीं, कि वह आँखोंसे तो दीखही पड़ता नहीं। किंतु इसका ठीक ठीक अर्थ यही है, कि (वह आँखोंसे तो दीख पड़ता है; पर ) एकही द्रव्यके नामरूप-भेदके कारण जगत्के बहुतेरे जो स्थलकृत अथवा काल- कृत दृश्य हैं, वे नाशवान् हैं; और इसीसे मिथ्या हैं। और इन सब नामरूपात्मक दृश्योंके आच्छादनमें छिपा हुआ सदैव वर्तमान, जो अविनाशी और अविकारी द्रव्य है, वही नित्य और सत्य है। सराफ़को कड़े, कंगन, गुंज और अँगूठियाँ खोटी जँचती हैं। उसे सिर्फ़ उनका सोना सच्चा जँचता है। परंतु सृष्टिके सुनारके कारखा- नेमें मूलमें ऐसा एक ही द्रव्य है, कि जिसको भिन्न भिन्न नामरूप दे कर उससे सोना, चाँदी, लोहा, पत्थर, लकड़ी, हवा-पानी आदि सारे गहने गढ़वाये जाते हैं। इसलिये सराफ़की अपेक्षा वेदान्ती कुछ और आगे बढ़कर सोना, चाँदी या पत्थर प्रभृति नामरूपोंको जेवरकेही समान मिथ्या समझकर सिद्धान्त करता है, कि इन सब पदार्थोंके मूलमें जो द्रव्य अर्थात् 'वस्तुतत्त्व' मौजूद है, वही सच्चा अर्थात् अविकारी सत्य है। इस वस्तुतत्त्वमें नामरूप आदि कोईभी गुण नहीं है। इस कारण इसे नेत्र आदि इंद्रियाँ कभी नहीं जान सकतीं। आँखोंसे न दीख पड़ने, नाकसे परंतु न सूँघे जाने अथवा हाथसे न टटोले जानेपरभी बुद्धिसे निश्चयपूर्वक यह अनुमान किया जाता है, कि अव्यक्त रूपसे वह होगा अवश्यही। न केवल इतनाही; बल्कि यहभी निश्चय करना पड़ता है, कि इस जगत्में कभीभी न बदलनेवाला 'जो कुछ' है, वह यही सत्य वस्तुतत्त्व है। जगत्का मूल सत्य इसीको कहते हैं। परंतु कुछ अनाड़ी विदेशी और स्वदेशी पंडितमन्यभी सत्य और मिथ्या शब्दोंके वेदान्तशास्त्रवाले पारिभाषिक अर्थपर ध्यान न देकर; और यह देखनेका कष्टभी न उठाते हुए, कि सत्य शब्दका जो अर्थ हमें सूझता है, उसकी अपेक्षा इसका कुछ और अर्थभी हो सकेगा या नहीं। यह कहकर अद्वैत वेदान्तका उपहास किया करते हैं, कि "हमें जो जगत् आँखोंसे प्रत्यक्ष दीख पड़ता है, उसेभी वेदान्ती लोग मिथ्या कहते हैं। भला, यहभी कोई बात हुई ? " परंतु यास्कके शब्दोंमें कह सकते हैं, कि अंधेको यदि खंभा नहीं सूझता, तो इसका दोषी खंभा नहीं है! छांदोग्य (छां. ६. १; और ७. १),