श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यात्म २१७ पतलापन, वजन आदि गुण एकहीसे रहते हैं; और केवल रूप ( आकार ) तथा नाम यही दो गुण बदलते रहते हैं। इसीलिये वेदान्तमें ये सरल दृष्टान्त हमेशा पाये जाते हैं। सोना तो एक पदार्थ है; परंतु भिन्न भिन्न समयपर बदलनेवाले उसके आकारोंके जो संस्कार इंद्रियोंके द्वारा मनपर होते हैं, उन्हें एकत्र करके 'द्रष्टा' उस सोनेकोही – कि जो तात्त्विक दृष्टिसे एकही मूल द्रव्य है - कभी 'कड़ा', कभी 'अँगूठी' या कभी 'पँचलड़ी', 'पहूँची और कंगन' इत्यादि भिन्न भिन्न नाम दिया करता है। भिन्न भिन्न समयपर पदार्थोंको जो इस प्रकार नाम दिये जाते हैं, उन नामोंको, तथा पदार्थोंको जिन भिन्न भिन्न आकृतियोंके कारण वे नाम बदलते रहते हैं, उन आकृतियोंको उपनिषदोंमें 'नामरूप' कहते हैं; और इन्हींमें अन्य सब गुणों- काभी समावेश कर दिया जाता है ( छां. ६. ३ और ४; बृ. १. ४. ७ ) । और इस प्रकार समावेश होना ठीकभी है। क्योंकि कोईभी गुण लीजिये; उसका कुछ-न-कुछ नाम और रूप अवश्यही होगा। यद्यपि इन नामरूपोंमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहे, तथापि कहना पड़ता है कि - इन नामरूपोंके मूलमें आधारभूत कोई तत्त्व या द्रव्य है, जो इन नामरूपोंसे भिन्न है; और कभी बदलताही नहीं। जिस प्रकार पानीपर तरंगें आ जाती हैं, उसी प्रकार ये सब नामरूप किसी एकही मूल द्रव्यपर तरंगोंके समान हैं। यह सच है, कि हमारी इंद्रियां नामरूपके अतिरिक्त और कुछभी पहचान नहीं सकतीं; अतएव इन इंद्रियोंको उस मूल द्रव्यका ज्ञान होना संभव नहीं, कि जो नामरूपसे भिन्न है, परंतु उसका आधारभूत है। परंतु सारे संसारका आधारभूत यह तत्त्व भलेही अव्यक्त हो; अर्थात् इंद्रियोंसे जाना न जा सकता हो; तथापि हमको अपनी बुद्धिसे यही निश्चित अनुमान करना पड़ता है, कि वह सत् है - अर्थात् वह सचमुच सर्वकाल सब नामरूपोंके मूलमें तथा नामरूपोंमेंभी निवास करता है; और उसका कभी नाश नहीं होता। क्योंकि यदि इंद्रियगोचर नामरूपोंके अतिरिक्त मूलतत्त्वको कुछ मानेही नहीं, तो फिर 'कड़ा' 'कंगन' आदि पदार्थ भिन्न भिन्न हो जावेंगे। एवं इस समय हमें यह ज्ञान हुआ करता है, कि "वे सब एकही धातुके ( सोनेके ) बने हैं", उस ज्ञानके लिये कुछभी आधार नहीं रह जावेगा। ऐसी अवस्थामें केवल इतनाही कहते बनेगा, कि यह 'कड़ा' है; यह 'कंगन' है। यह कदापि न कह सकेंगे, कि कड़ा सोनेका है; और कंगनभी सोनेका है। अतएव न्यायतः यह सिद्ध होता है, कि 'कड़ा सोनेका है', "कंगन सोनेका है', इत्यादि वाक्योंमें 'है' शब्दसे जिस सोनेके साथ नामरूपात्मक 'कड़े' 'कंगन'का संबंध जोड़ा गया है, वह सोना केवल शशशृंगवत अभावरूप नहीं है। किंतु वह उस द्रव्यांशकाही बोधक है, कि जो सारे आभूषणोंका आधार है। इसी न्यायका उपयोग सृष्टिके सारे पदार्थोंमें करें, तो यह सिद्धान्त निकलता है, कि पत्थर, मिट्टी, चांदी, लोहा, लकड़ी, इत्यादि अनेक नामरूपात्मक पदार्थ, जो नजर आते हैं, वे सब किसी एकही नित्य द्रव्यपर भिन्न भिन्न नामरूपोंका मुलम्मा या