श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मानसिक क्रिया फिर शुरू हो जाती है; और हमारी बुद्धिका निश्चय हो जाता है कि वहभी एक फौजी सिपाही है। इस प्रकार भिन्न भिन्न समयमें (एके बाद दूसरा) जो अनेक संस्कार हमारे मनपर होते रहते हैं, उन्हें हम अपनी स्मरणशक्तिसे याद कर एकत्र रखते हैं; और जब वह पदार्थसमूह हमारी दृष्टिके सामने आ जाता है, तब उन सब भिन्न भिन्न संस्कारोंका ज्ञान एकताके रूपमें होकर हम कहने लगते हैं, कि हमारे सामनेसे 'फौज' जा रही है। इस सेनाके पीछेसे आनेवाले पदार्थका रूप देखकर हम निश्चय करते हैं, कि वह 'राजा' है। और 'फौज'-संबंधी पहले संस्कारको तथा 'राजा'संबंधी इस नूतन संस्कारको एकत्र कर हम कह सकते हैं, कि यह "राजाकी सवारी जा रही है।" इसलिये कहना पड़ता है, कि सृष्टिज्ञान केवल इंद्रि- योंसे प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाला जड़ पदार्थ नहीं है; किंतु इंद्रियोंके द्वारा मनपर होने- वाले अनेक संस्कारों या परिणामोंका जो 'एकीकरण' 'द्रष्टा आत्मा' किया करता है, उसी एकीकरणका फल ज्ञान है। इसीलिये भगवद्गीतामेंभी ज्ञानका लक्षण इस प्रकार दिया है - "अविभक्तं विभक्तेषु" अर्थात् सच्चा ज्ञान वही है, कि जिससे विभक्त या निरालेपनकी अविभक्तता या एकताका बोध हो* (गीता १८.२०)। परंतु इस विषयका यदि पुनः सूक्ष्म विचार किया जावे, कि इंद्रियोंके द्वारा मनपर जो संस्कार पहले होते हैं, वे किसके हैं, तो जान पड़ेगा कि यद्यपि आंख, कान, नाक इत्यादि इंद्रियोंसे पदार्थके रूप, शब्द, गंध आदि गुणोंका ज्ञान हमें होता है। तथापि जिस द्रव्यमें ये बाह्य गुण हैं, उसके आंतरिक स्वरूपके विषयमें हमारी इंद्रियाँ हमें कुछभी नहीं बतला सकतीं। हम यह देखते हैं सही, कि 'गीली मिट्टी' से घड़ा बनता है; परंतु यह नहीं जान सकते कि, जिसे हम 'गीली मिट्टी' कहते हैं; उस पदार्थका यथार्थ तात्त्विक स्वरूप क्या है। चिकनाई, गीलापन, मैला रंग या गोलाकार (रूप) इत्यादि गुण जब इंद्रियोंके द्वारा मनको पृथक् पृथक् मालूम हो जाते हैं, तब उन संस्कारोंका एकीकरण करके 'द्रष्टा' आत्मा कहता है, कि "यह गीली मिट्टी है"; और आगे इसी द्रव्यकी (क्योंकि यह माननेके लिये कोई कारण नहीं, कि द्रव्यका तात्त्विक रूप बदल गया) गोल तथा पोली आकृति या रूप, ठन ठन आवाज और सूखापन इत्यादि गुण जब इंद्रियोंके द्वारा मनको मालूम हो जाते हैं, तब उनका एकीकरण करके 'द्रष्टा' उसे 'घड़ा' कहता है। सारांश, सारा भेद, 'रूप या आकार' मेंही होता रहता है। और जब इन्हीं गुणोंके संस्कारोंको (जो मन- पर हुआ करते हैं) 'द्रष्टा' आत्मा एकत्र कर लेता है, तब एकही तात्त्विक पदार्थको अनेक नाम प्राप्त हो जाते हैं। इसका सबसे सरल उदाहरण समुद्र और तरंगका या सोना और अलंकारका है। क्योंकि इन दोनों उदाहरणोंमें रंग, गाढ़ापन, * Cf. "Knowledge is first produced by the synthesis of what is manifold." Kant's Critique of Pure Reason, p. 64, Max-Muller's translation. 2nd Ed.