भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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अध्यात्म २१५

बाह्य सृष्टिकी विविधता या भिन्नताका ज्ञान एकतासे क्यों और कैसे होता है ? और फिर उक्त उपपत्तिकोही उसने अर्वाचीन शास्त्रकी रीतिसे अधिक स्पष्ट कर दिया है। और हेगेल यद्यपि अपने विचारमें कांटसे कुछ आगे बढ़ा है, तथापि उसके सिद्धान्तभी वेदान्तसे आगे नहीं बढ़े हैं। शोपेनहरकाभी यही हाल है। उपनिषदोंके लैटिन भाषाके अनुवादका अध्ययन उसने किया था - और उसने यह बातभी लिख रखी है, कि "संसारके साहित्यके इन अत्युत्तम" ग्रंथोंसे कुछ विचार मैंने अपने ग्रंथोंमें लिये हैं। इस छोटेसे ग्रंथमें इन सब बातोंका विस्तारपूर्वक निरूपण करना संभव नहीं, कि उक्त गंभीर विचारों और उनके साधक-बाधक प्रमाणोंमें, अथवा वेदान्तके सिद्धान्तों और कांट प्रभृति पश्चिमी तत्त्वज्ञोंके सिद्धान्तोंमें समानता कितनी है और अंतर कितना है। इसी प्रकार इस बातकीभी विस्तारसे चर्चा नहीं कर सकते, कि उपनिषद् और वेदान्तसूत्र जैसे प्राचीन ग्रंथोंके वेदान्तमें और तदुत्तर- कालीन ग्रंथोंके वेदान्तमें छोटे-मोटे भेद कौनकौनसे हैं। अतएव भगवद्गीताके अध्यात्म-सिद्धान्तोंकी सत्यता, महत्त्व और उपपत्ति समझा देनेके लिये जिन जिन बातोंकी आवश्यकता हैं, सिर्फ़ उन्हीं बातोंका यहाँ दिग्दर्शन किया गया है; और इस चर्चाके लिये उपनिषद्, वेदान्त-सूत्र और उनके शांकरभाष्यका आधार प्रधान रूपसे लिया गया है। प्रकृति-पुरुषरूपी सांख्योक्त द्वैतके परे क्या है - इसका निर्णय करनेके लिये केवल द्रष्टा और दृश्य सृष्टिके द्वैतभेदपरही ठहर जाना उचित नहीं। किंतु इस बातकाभी सूक्ष्म विचार करना चाहिये, कि द्रष्टा पुरुषको बाह्य सृष्टिका जो ज्ञान होता है, उसका स्वरूप क्या है? वह ज्ञान किससे और किसका होता है ? बाह्य सृष्टिके पदार्थ मनुष्यको अपने नेत्रोंसे जैसे दिखाई देते हैं, वैसे तो वे गुण पशु- ओंकोभी दिखाई देते हैं। परंतु मनुष्यकी यह विशेषता है, कि आँख, कान इत्यादि ज्ञानेंद्रियोंसे उसके मनपर जो संस्कार हुआ करते हैं, उनका एकीकरण करनेकी विशेष शक्ति उसमें है, और इसीलिये बाह्य सृष्टिके पदार्थमात्रका ज्ञान उसको हुआ करता है। पहले क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें बतला चुके हैं, कि जिस एकीकरण-शक्तिका फल उपर्युक्त विशेषता है, वह शक्ति मन और बुद्धिकेभी परे है - अर्थात् वह आत्माकी शक्ति है। यह बात नहीं, कि किसी एकही पदार्थका ज्ञान उक्त रीतिसे होता हो; किंतु सृष्टिके भिन्न भिन्न पदार्थोंके कार्यकारणभाव आदि जो अनेक संबंध हैं - जिन्हें हम सृष्टिके नियम कहतें हैं - उनका ज्ञानभी इसी प्रकार हुआ करता है। इसका कारण यह है, कि यद्यपि हम भिन्न भिन्न पदार्थोंको देखते हैं, तथापि उनका कार्यकारण-संबंध प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता; किंतु हम उसे अपने मानसिक व्यापारोंसे निश्चित किया करते हैं। उदाहरणार्थ, जब कोई पदार्थ हमारे नेत्रोंके सामनेसे जाता है, तब उसका रूप और उसकी गति देखकर हम निश्चय करते हैं, कि यह एक 'फ़ौजी सिपाही' है; और यही संस्कार मनमें बना रहता है। इसके बाद जब कोई दूसरा पदार्थ उसी रूप और गतिमें दृष्टिके सामने आता है, तब वही