भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 261

२१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चिरकालके लिये - करना चाहते हैं। अथवा यहभी देखा जाता है, कि चिरकाल रहनेवाली या शाश्वत कीर्ति पानेका जब अवसर आ जाता है, तब मनुष्य अपने जीवनकीभी परवाह नहीं करता। ऋग्वेदके समान अत्यंत प्राचीन ग्रंथोंमेंभी पूर्व- ऋषियोंकी प्रार्थना है, कि "हे इंद्र ! तू हमें 'अक्षित श्रव' अर्थात् अक्षय कीर्ति या धन दे" (ऋ. १. ९. ७); अथवा "हे सोम ! तू मुझे वैवस्वत (यम) लोकमें अमर कर दे" (ऋ. ९. ११३. ८)। और, अर्वाचीन समयमें इसी दृष्टीको स्वीकार करके स्पेन्सर, कांट प्रभृति केवल आधिभौतिक पंडितभी यही कहते हैं, कि "इस संसारमें मनुष्यमात्रका नैतिक परम कर्तव्य यही है, कि वह किसी प्रकारके क्षणिक सुखमें न फँसकर वर्तमान और भावी मनुष्यजातिके चिरकालिक सुखके लिये उद्योग करे।" हमारे जीवनके पश्चात्के चिरकालिक कल्याणकी अर्थात् अमृतत्वकी यह कल्पना आई कहाँसे ? यदि कहें, कि यह स्वभावसिद्ध है; तो मानना पड़ेगा, कि इस नाशवान् देहके परे और कोई अमृत वस्तु अवश्य है। और यदि कहें, कि ऐसी कोई अमृत वस्तु नहीं है; तो हमें जिस मनोवृत्तिकी साक्षात् प्रतीति होती, उसका अन्य कोई कारणभी नहीं बतलाते बन पड़ता ! ऐसी कठिनाई आ पड़नेपर बहुतेरे आधिभौतिक पंडित यह उपदेश करते हैं, कि इन प्रश्नोंका कभी समाधानकारक उत्तर नहीं मिल सकता। अतएव इनका विचार न करके दृश्य सृष्टिके पदार्थोंके गुण- धर्मोंके परे अपने मनकी दौड़ कभी न जाने दो। यह उपदेश है तो सरल; परंतु मनुष्यके मनमें तत्त्वज्ञानकी जो स्वाभाविक लालसा होती है, उसका प्रतिरोध कौन और किस प्रकारसे कर सकता है ? और इस दुर्धर जिज्ञासाका यदि नाश कर डालें, तो फिर ज्ञानकी वृद्धि हो तो कैसे ? जबसे मनुष्य इस पृथ्वीतलपर उत्पन्न हुआ है, तभीसे वह इस प्रश्नका विचार करता चला आया है, कि "सारी दृश्य और नाशवान् सृष्टिका मूलभूत अमृततत्त्व क्या है ? और वह मुझे कैसे प्राप्त होगा ?" आधिभौतिक शास्त्रोंकी जितनी चाहे उन्नति हो; तथापि मनुष्यकी अमृततत्त्वसंबंधी ज्ञानकी स्वाभाविक प्रवृत्ति कभी कम होनेकी नहीं। आधिभौतिक शास्त्रोंकी चाहे जैसी वृद्धि हो तोभी सारे आधिभौतिक सृष्टिज्ञानको बगलमें दबाकर आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान सदा उसके आगेही दौड़ता रहेगा ! दो-चार हजार वर्षके पहले यही दशा थी; और अब पश्चिमी देशोंमेंभी वही बात दीख पड़ती है। और तो क्या; मनुष्यकी बुद्धिका ज्ञानलालसा जिस दिन छूटेगी, उस दिन उसके विषयमें यही कहना होगा, कि "स वै मुक्तोऽथवा पशुः।" दिक्कालसे अमर्यादित, अमृत, अनादि, स्वतंत्र, एकरूप, एक, निरंतर, सर्व- व्यापी और निर्गुण तत्त्वके अस्तित्वके विषयमें, अथवा उस निर्गुण तत्त्वसे सगुण सृष्टिकी उत्पत्तिके विषयमें जैसा व्याख्यान हमारे प्राचीन उपनिषदोंमें किया गया है, उससे अधिक सयुक्तिक व्याख्यान अन्य देशोंके तत्त्वज्ञोंने अबतक नहीं किया है। अर्वाचीन जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटने इस बातका सूक्ष्म विचार किया है, कि मनुष्यको

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