श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
अध्यात्म २२९ ज्ञान नहीं है । ” तब पिताने नदी, समुद्र, पानी और नमक प्रभृति अनेक दृष्टान्त देकर समझाया, कि बाह्यसृष्टिके मूलमें जो द्रव्य है, वह ( तत् ) और तू ( त्वम् ) अर्थात् तेरी देहका आत्मा दोनों एकही हैं - ‘तत्त्वमसि’; एवं ज्योंही तूने अपने आत्माको पहचाना, त्योंही तुझे आपही मालूम हो जावेगा, कि समस्त जगत्के मूलमें क्या है । इस प्रकार पिताने श्वेतकेतुको भिन्न भिन्न नौ दृष्टान्तोंसे उपदेश किया है; और प्रतिबार ‘तत्त्वमसि’- वही तू है - इस सूत्रकी पुनरावृत्ति की है (छां. ६. ८-१६) । यह ‘तत्त्वमसि’ अद्वैत वेदान्तके महावाक्योंमें मुख्य वाक्य है । इस प्रकार निर्णय हो गया, कि ब्रह्म आत्मस्वरूपी है। परंतु आत्मा चिद्रूपी है, इसलिये संभव है, कि कुछ लोग ब्रह्मकोभी चिद्रूपी समझें । अतएव यहाँ ब्रह्मके और उसके साथही साथ आत्माके सच्चे स्वरूपका और थोड़ा-सा स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है। आत्माके सान्निध्यसे जड़ात्मक बुद्धिमें उत्पन्न होनेवाले धर्मको चित् अर्थात् ज्ञान कहते हैं। परंतु जब कि बुद्धिके इस धर्मको आत्मापर लादना उचित नहीं है, तब तात्त्विक दृष्टिसे आत्माके मूलस्वरूपकोभी निर्गुण और अज्ञेयही मानना चाहिये । अतएव कई-एकौंका मत है, कि यदि ब्रह्म आत्मस्वरूपी है, तो इन दोनोंको या इनमेंसे किसीभी एकको चिद्रूपी कहना कुछ अंशोंमें गौणही है। यह आक्षेप अकेले चिद्रूपीपरही नहीं है। किंतु यह आप-ही-आप सिद्ध होता है, कि परब्रह्मके लिये ‘सत्’ विशेषणका प्रयोग करना उचित नहीं है। क्योंकि सत् और असत्, ये दोनों धर्म परस्पर-विरुद्ध और सदैव परस्पर-सापेक्ष हैं। अर्थात् भिन्न भिन्न दो वस्तुओंका निर्देश करनेके लिये कहे जाते हैं। जिसने कभी उजाला न देखा हो, वह अँधेरेकी कल्पना नहीं कर सकता। यही नहीं; किंतु ‘उजाला’ और ‘अँधेरा’ इन शब्दोंकी यह जोड़ीही उसको सूझ न पड़ेगी। सत् और असत् शब्दोंकी जोड़ी (द्वंद्व) के लिये यही न्याय उपयोगी है। जब हम देखते हैं, कि कुछ वस्तुओंका नाश होता है, तब सब वस्तुओंके असत् ( नाश होनेवाली ) और सत् ( नाश न होनेवाली ) ये दो भेद करने लगते हैं; अथवा सत् और असत् शब्द सूझ पड़नेके लिये मनुष्यकी दृष्टिके आगे दो प्रकारके विरुद्ध धर्मोंकी आवश्यकता होती है। अच्छा; यदि आरंभमें एकही वस्तु थी, तो द्वैतके उत्पन्न होने पर दो वस्तुओंके उद्देशसे जिन सापेक्ष सत् और असत् शब्दोंका प्रचार हुआ है, उनका प्रयोग इस मूल वस्तुके लिये कैसे किया जावेगा ? क्योंकि, यदि इसे सत् कहते हैं, तो शंका होती है, कि क्या उस समय उसकी जोड़का कुछ असत्भी था ? यही कारण है, जो ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें ( ऋ. १०. १२९ ) परब्रह्मको कोईभी विशेषण न दे कर सृष्टिके मूल तत्त्वका वर्णन उस प्रकार किया है, कि “जगतके आरंभमें न तो सत् था; और न असतभी था। जो कुछ था वह एकही था।” इन सत् और असत् शब्दोंकी जोड़ियाँ ( अथवा द्वंद्व ) तो पीछेसे निकली हैं; और गीतामें ( गीता ७. २८; २. ४५ ) कहा है, कि सत् और असत्, शीत और उष्ण आदि द्वंद्वोंसे जिसकी बुद्धि मुक्त हो
२३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
जाय, वह इन सब द्वंद्वोंसे परे अर्थात् निर्द्वंद्व ब्रह्मपदको पहुँच जाता है। इससे दीख पड़ेगा, कि अध्यात्मशास्त्रके विचार कितने गहन और सूक्ष्म हैं। केवल तर्क- दृष्टिसे विचार करें, तो परब्रह्मका अथवा आत्माकाभी अज्ञेयत्व स्वीकार किये बिना गति नहीं रहती। परंतु ब्रह्म इस प्रकार अज्ञेय और निर्गुण अतएव इंद्रि- यातीत हो; तोभी यह प्रतीति हो सकती है, कि परब्रह्मकाभी वही स्वरूप है; जो कि हमारे निर्गुण तथा अनिर्वाच्य आत्माका है; और जिसे हम साक्षात्कारसे पहचानते हैं। इसका कारण यह है, कि प्रत्येक मनुष्यको अपने आत्माकी साक्षात् प्रतीति होती ही है। अतएव अब यह सिद्धान्त निरर्थक नहीं हो सकता, कि ब्रह्म और आत्मा एकस्वरूपी हैं। इस दृष्टिसे देखें, तो ब्रह्मस्वरूपके विषयमें इसकी अपेक्षा कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता, कि ब्रह्म आत्मस्वरूपी है। शेष बातोंके संबंधमें अपने अनुभवको ही पूरा प्रमाण मानना पड़ता है। किंतु बुद्धिगम्य शास्त्रीय प्रतिपादनमें शब्दोंसे जितना हो सकता है, उतना स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है। इसलिये यद्यपि ब्रह्म सर्वत्र एक-सा व्याप्त, अज्ञेय और अनिर्वाच्य है, तोभी जड़सृष्टिका और आत्मस्वरूपी ब्रह्मतत्त्वका भेद व्यक्त करनेके लिये, आत्माके सान्निध्यसे जड़ प्रकृतिमें चैतन्यरूपी जो गुण हमें दृग्गोचर होता है, उसीको आत्माका प्रधान लक्षण मानकर अध्यात्मशास्त्रमें आत्मा और ब्रह्म दोनोंको चिद्रूपी या चैतन्यरूपी कहते हैं। क्योंकि यदि ऐसा न करें, तो आत्मा और ब्रह्म दोनोंही निर्गुण, निरंजन एवं अनिर्वाच्य होनेके कारण उनके रूपका वर्णन करनेमें या तो चुप्पी साध जाना पड़ता है या शब्दोंमें किसीने कुछ वर्णन किया, तो 'नहीं नहीं' का यह मंत्र रटना पड़ता है, कि "नेति नेति एतस्मादन्यत्परमस्ति।" — यह नहीं है, यह (ब्रह्म) नहीं है (यह तो नामरूप हो गया)। सच्चा ब्रह्म इससे परे अन्यही है। इस नकारात्मक पाठका आवर्तन करनेके अतिरिक्त और दूसरा मार्गही नहीं रह जाता (बृ. २. ३. ६)। यही कारण है, कि जो सामान्य रीतिसे ब्रह्मके स्वरूपके लक्षण चित् (ज्ञान), सत् (सत्तामात्रत्व अथवा अस्तित्व) और आनंद बतलाये जाते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं, कि ये लक्षण अन्य सभी लक्षणोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं। फिरभी स्मरण रहे, कि शब्दोंसे ब्रह्मस्वरूपकी जितनी पहचान हो सकती है, उतनी करा देनेके लिये ये लक्षण कहे गये हैं। वास्तविक ब्रह्मस्वरूप निर्गुणही है और उसका ज्ञान होनेके लिये उसका अपरोक्षानुभवही होना चाहिये। यह अनुभव कैसे हो सकता है? — इंद्रियातीत होनेके कारण अनिर्वाच्य ब्रह्मके स्वरूपका अनुभव ब्रह्मनिष्ठ पुरुषोंको कब और कैसे होता है? — इस विषयमें हमारे शास्त्रकारोंने जो विवेचन किया है, उसे यहाँ संक्षेपमें बतलाते हैं। ब्रह्म और आत्माकी एकताके उक्त समीकरणको सरल भाषामें इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं, कि "जो पिंडमें है, वही ब्रह्मांडमें है।" जब इस प्रकार ब्रह्मा- त्मैक्यका अनुभव हो जावे, तब यह भेदभाव नहीं रह सकता, कि ज्ञाता अर्थात
अध्यात्म २३१ द्रष्टा आत्मा भिन्न वस्तु है; और ज्ञेय अर्थात् देखनेकी वस्तु अलग है। किंतु इस विषयमें शंका हो सकती है, कि मनुष्य जबतक जीवित है, तबतक उसकी नेत्र आदि इंद्रियाँ यदि छूट नहीं जाती हैं; तो इंद्रियाँ पृथक् हुईं और उनको गोचर होनेवाले विषय पृथक् हुए - तो यह भेद छूटेगा कैसे ? और यदि यह भेद नहीं छूटेगा, तो ब्रह्मात्मैक्यका अनुभव कैसे होगा ? तब यदि इंद्रिय-दृष्टिसेही विचार करें, तो यह शंका एका-एक अनुचितभी नहीं जान पड़ती। परंतु हाँ, गंभीर विचार करने लगे, तो जान पड़ेगा, कि इंद्रियाँ बाह्य विषयोंको देखनेका काम खुद मुख्तारीसे
- अपनीही मर्जीसे नहीं किया करती हैं। पहले बतला दिया है, कि "चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा न तु चक्षुषा" (मभा. शां. ३११. १७) - कोईभी वस्तु देखनेके लिये (और सुनने आदिके लियेभी) नेत्रोंको (ऐसेही कान प्रभृतिकोभी) मनकी सहायता आवश्यक है। यदि मन शून्य हो, किसी और विचारमें डूबा हो, तो आँखोंके आगे धरी हुई वस्तुभी नहीं सूझती ? व्यवहारमें होनेवाले इस अनुभवपर ध्यान देनेसे सहजही अनुमान होता है, कि नेत्र आदि इंद्रियोंके अक्षुण्ण रहते हुएभी मनको यदि उनमेंसे निकाल लें, तो इंद्रियोंके विषयोंके द्वंद्व बाह्य सृष्टिमें वर्तमान होने- परभी हमारे लिये न होनेके समान रहेंगे। फिर परिणाम यह होगा, कि मन केवल आत्मामें अर्थात् आत्मस्वरूपी ब्रह्ममेंही रत रहेगा। इससे हमें ब्रह्मात्मैक्यका साक्षात्कार होने लगेगा। ध्यानसे, समाधिसे, एकान्त उपासनासे अथवा अत्यंत ब्रह्मविचार करनेसे, अंतमें यह मानसिक स्थिति जिसको प्राप्त हो जाती है; उसकी नज़रके आगे दृश्य सृष्टिके द्वंद्व या भेद नाचते भले रहा करें; पर वह उनसे लापरवाह है - उसे वे दीखही नहीं पड़ते; और फिर उसको अद्वैत ब्रह्मस्वरूपकी आप-ही-आप पूर्ण साक्षात्कार होता जाता है। पूर्ण ब्रह्मज्ञानसे अंतमें परमावधिकी जो यह स्थिति प्राप्त होती है, उसमें ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान, यह तीन प्रकारका भेद अर्थात् त्रिपुटी नहीं रहती; अथवा उपास्य और उपासकका द्वैतभावभी नहीं बचने पाता। अतएव यह अवस्था और किसी दूसरेको बतलाई नहीं जा सकती। क्योंकि ज्योंहि 'दूसरे' शब्दका उच्चारण किया, त्योंही यह अवस्था बिगड़ी; और फिर प्रकटही है, कि मनुष्य अद्वैतसे द्वैतमें आ जाता है। और तो क्या; यह कहनाभी मुश्किल है, कि मुझे इस अवस्थाका ज्ञान हो गया। क्योंकि 'मैं' कहतेही औरोंसे भिन्न होनेकी भावना मनमें आ जाती है; और ब्रह्मात्मैक्य होनेमें यह भावना पूरी बाधक है; इसी कारणसे याज्ञवल्क्यने बृहदारण्यकमें (बृ. ४. ५. १५. ४. ३. २७) इस परमावधिकी स्थितिका वर्णन यों किया है: "यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितरं इतरं पश्यति...जिघ्रति...शृणोति...विजानाति।...यत्र त्वस्य सर्वमात्मै- वाभूत्तत्केन कं पश्येत्...जिघ्रेत्...शृणुयात्...विजानीयात् ।...विज्ञातारमरे केन विजानीयात् । एतावदरे खलु अमृतत्वमिति।" इसका भावार्थ यह है, कि "देखनेवाला (द्रष्टा) और देखनेका पदार्थ यह द्वैत जबतक बना हुआ था, तबतक
२३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र एक दूसरेको देखता था, सूंघता था, सुनता था और जानता था। परंतु जब सभी आत्ममय हो गया (अर्थात् आप-पर भेदही न रहा) तब कौन किसको देखेगा, सूंघेगा, सुनेगा और जानेगा? अरे ! जो स्वयं ज्ञाता अर्थात् जाननेवाला है, उसीको जाननेवाला और दूसरा कहाँसे लाओगे?" इस प्रकार सभी आत्मभूत या ब्रह्मभूत हो जानेपर वहाँ भीति, शोक अथवा सुखदुःख आदि द्वंद्वभी रह कहाँ सकते हैं? (ईश. ७) क्योंकि, जिससे डरना है या जिसका शोक करना है, वह तो अपनेसे - हमसे - जुदा होना चाहिये; और ब्रह्मात्मैक्यका अनुभव हो जानेपर इस प्रकारकी किसीभी भिन्नताको अवकाशही नहीं मिलता। इसी दुःखशोक-विरहित अवस्थाको 'आनंदमय' नाम देकर तैत्तिरीय उपनिषद् (तै. २. ८; ३. ६) में कहा है, कि यह आनंदही ब्रह्म है। किंतु यह वर्णनभी गौणही है। क्योंकि आनंदका अनुभव करनेवाला अब रहही कहाँ जाता है? अतएव बृहदारण्यक उपनिषदमें (बृ. ४. ३. ३२) कहा है, कि लौकिक आनंदकी अपेक्षा आत्मानंद कुछ विलक्षणही होता है। ब्रह्मके वर्णनमें 'आनंद' शब्द आया करता है। उसकी गौणतापर ध्यान देकर अन्य स्थानोंमें ब्रह्मवेत्ता पुरुषका अंतिम वर्णन ('आनंद' शब्दको हटाकर) इतनाही किया जाता है, "ब्रह्म भवति य एवं वेद" (बृ. ४. ४. २५)। अथवा "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" (मुं. ३. २. ९) - जिसने ब्रह्मको जान लिया, वह ब्रह्मही हो गया। उपनिषदोंमें (बृ. २. ४. १२; छां. ६. १३) इस स्थितिके लिये यह दृष्टान्त दिया गया है, कि नमककी डली जब पानीमें घुल जाती है, तब जिस प्रकार यह भेद नहीं रहता कि इतना भाग खारे पानीका है और इतना भाग मामूली पानीका है - उसी प्रकार ब्रह्मात्मैक्यका ज्ञान हो जानेपर सब ब्रह्ममय हो जाता है। किंतु श्री तुकाराम महाराजने (कि "जिनकी कहै नित्य वेदान्त वाणी") इस खारे पानीके दृष्टान्तके बदले गुड़ का यह मीठा दृष्टान्त देकर अपने अनुभवका वर्णन किया है :- 'गूंगे का गुड़' है भगवान्, बाहरभीतर एक समान। किसका ध्यान करूँ सविवेक ? जल-तरंगसे हैं हम एक ॥
- तु. गा. ३६२७ इसीलिये कहा जाता है, कि परब्रह्म इंद्रियोंको अगोचर और मनकोभी अगम्य होने- परभी स्वानुभवगम्य है, अर्थात् अपने अपने अनुभवसे जाना जाता है। परब्रह्मकी जिस अज्ञेयताका वर्णन किया जाता है, वह 'ज्ञाता और ज्ञेय'वाली द्वैती स्थिति है; 'अद्वैत-साक्षात्कार'वाली स्थिति नहीं। जबतक यह बुद्धि बनी है, कि मैं अलग हूँ और दुनिया अलग है, तबतक कुछभी क्यों न किया जाय, ब्रह्मात्मैक्यका पूरा ज्ञान होना संभव नहीं। किंतु नदी यदि समुद्रको निगल नहीं सकती - उसको अपनेमें लीन नहीं कर सकती - तो जिस प्रकार समुद्रमें गिरकर नदी तद्रूप हो जाती है, उसी प्रकार
अध्यात्म २३३ परब्रह्ममें निमग्न होनेसे मनुष्यको उसका अनुभव हो जाया करता है; और उसकी परब्रह्म-स्थिति हो जाती है, कि "सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" (गीता ६. २९) – सब प्राणी मुझमें हैं; और मैं सबमें हूँ। केन उपनिषद्में बड़ी खूबीके साथ परब्रह्मके स्वरूपका विरोधाभासात्मक वर्णन इस अर्थको व्यक्त करनेके लिये किया गया है, कि पूर्ण परब्रह्मका ज्ञान केवल अपने अनुभवपर ही निर्भर है। वह वर्णन इस प्रकार है : "अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्" (केन. २. ३) – जो कहते हैं, कि हमें परब्रह्मका ज्ञान हो गया है, उन्हें उसका ज्ञान नहीं हुआ है; और जिन्हें जानही नहीं पड़ता कि हमने उसको जान लिया; उन्हेंही वह ज्ञान हुआ है। क्योंकि, जब कोई कहता है, कि मैंने परमेश्वरको जान लिया, तब उसके मनमें वह द्वैतबुद्धि उत्पन्न हो जाती है, कि मैं (ज्ञाता) जुदा हूँ; और मैंने जिसे जान लिया, वह (ज्ञेय) ब्रह्म अलग है। अतएव उसका ब्रह्मात्मैक्यरूपी अद्वैती अनुभव उस समय उतनाही कच्चा और अपूर्ण होता है। और यह उसके अपने मुखहीसे सिद्ध होता है कि उसने सच्चे ब्रह्मवेद जानाही नहीं है। इसके उल्टे जब 'मैं' (ज्ञाता) और 'ब्रह्म' (ज्ञेय) यह द्वैती भेद नष्ट हो जाता है तब ब्रह्मात्मैक्यका पूर्ण अनुभव हो जाता है। फलतः उसके मुँहसे ऐसी भाषाका निकलनाही संभव नहीं रहता, कि "मैंने उसे (अर्थात् अपनेसे भिन्न और कुछ) जान लिया।" अतएव इस स्थितिमें, अर्थात् जब कोई ज्ञानी पुरुष यह बतलानेमें असमर्थ है, कि मैं ब्रह्मको जान गया; तब कहना पड़ता है, कि उसे ब्रह्मका ज्ञान हो गया है। इस प्रकार द्वैतका बिलकुल लोप होकर परब्रह्ममें ज्ञाताका सर्वथा रँग जाना, लयपा लेना, बिलकुल घुल जाना, अथवा एकजीव हो जाना सामान्य रूपतः तो दुष्कर दीख पड़ता है; परंतु हमारे शास्त्रकारोंने अनुभवसे निश्चय किया है, कि एका-एक दुर्घट प्रतीत होनेवाली 'निर्वाण' स्थिति, अभ्यास और वैराग्यसे अंतमें मनुष्यको साध्य हो सकती है। 'मै'-पनरूपी द्वैतभाव उक्त स्थितिमें (अहं) नष्ट हो जाता है, मृत हो जाता है। अतएव कुछ लोग शंका किया करते हैं, कि यह तो आत्मनाशकाही एक तरीका है। किंतु ज्योंही यह समझमें आए कि यद्यपि इस स्थितिका अनुभव करते समय इसका वर्णन करते नहीं बनता है, परंतु पीछे उसका स्मरण हो सकता है, त्यांही उक्त शंका निर्मूल हो जाती है।* पर इसकी अपेक्षा और भी
- ध्यानसे और समाधिसे प्राप्त होनेवाली अद्वैतकी अथवा अभेदभावकी यह अवस्था nitrous-oxide gas नामक एक प्रकारकी रासायनिक वायुको सूँघनेसे प्राप्त हो जाया करती है। इसी वायुको 'लाफिंग गैस'भी कहते हैं। Will to Be- lieve and Other Essays on Popular Philosophy, by William James, pp. 294-298. परंतु यह नकली अवस्था है। समाधिमें जो अवस्था प्राप्त होती है, वह सच्ची और असली है। यही इन दोनोंमें महत्त्वका भेद है। फिरभी यहाँ उसका उल्लेख हमने इस लिये किया, कि इस कृत्रिम अवस्थाके प्रमाणसे अभेदावस्थाके अस्तित्वके विषयमें कुछभी वाद नहीं रह जाता।
२३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अधिक प्रबल प्रमाण साधुसंतोंका अनुभव है। बहुत प्राचीन सिद्ध पुरुषोंके अनुभव तो प्रसिद्ध हैंही उनके, संबंधमें और क्या कहें ? किंतु बिलकुल अभीके प्रसिद्ध भगवद्भक्त तुकाराम महाराजनेभी इस परमावधिकी स्थितिका वर्णन आलंकारिक भाषामें बड़ी खूबीसे धन्यतापूर्वक इस प्रकार किया है, कि "मैं अपनी मृत्यु अपनी आँखोंसे देख ली; वहभी एक अनुपम उत्सवही था" (तु. गा. ३५७९) । व्यक्त अथवा सगुण ब्रह्मकी उपासनासे, ध्यानके द्वारा धीरे धीरे बढ़ता हुआ उपासक अंतमें "अहं ब्रह्मास्मि" (बृ. १. ४. १०) - मैंही ब्रह्म हूँ-की स्थितिमें जा पहुँचता है; और ब्रह्मात्मैक्यस्थितिका उसे साक्षात्कार होने लगता है। फिर उसमें वह इतना मग्न हो जाता है, कि इस बातकी ओर उसका ध्यानभी नहीं जाता, कि मैं किस स्थितिमें हूँ; अथवा किसका अनुभव कर रहा हूँ। इस स्थितिमें जागृति बनी रहती है, अतः इस अवस्थाको न तो स्वप्न कह सकते हैं; और न सुषुप्ति । यदि जागृति कहें तो इसमें जागृत द्वैतके अवस्थामें सामान्य रीतिसे होनेवाले सब व्यवहार रुक जाते हैं, इस- लिये स्वप्न, सुषुप्ति (नींद) अथवा जागृति - इन तीनों व्यावहारिक अवस्थाओंसे बिलकुलही भिन्न यह चौथी अथवा तुरीय अवस्था है - इस प्रकार शास्त्रोंमें कहा गया है। इस स्थितिको प्राप्त करनेके लिये पातंजलयोगशास्त्रकी दृष्टिसे मुख्य साधन निर्विकल्प समाधियोग लगाना है, जिसमें द्वैतका जरासाभी लवलेश नहीं रहता ! और यही कारण है, कि जो गीतामें (गी. ६. २०-२३) कहा है कि इस निर्विकल्प समाधि- योगको अभ्याससे प्राप्त कर लेनेमें मनुष्यको उकताना नहीं चाहिये । यही ब्रह्मात्मैक्य स्थिति ज्ञानकी पूर्णावस्था है। क्योंकि जब संपूर्ण जगत् ब्रह्मरूप अर्थात् एकही हो चुका, तब गीताके ज्ञानक्रियावाले इस लक्षणकी पूर्णता हो जाती है, कि "अविभक्तं विभक्तेषु" - अनेकत्वकी एकता करनी चाहिये - और फिर इसके आगे किसीकोभी अधिक ज्ञान हो नहीं सकता। इसी प्रकार नामरूपसे परे इस अमृतत्वका जहाँ मनुष्यको अनुभव हुआ, कि जन्म-मरणका चक्करभी आप-ही-से छूट जाता है। क्योंकि जन्म- मरण तो नामरूपोंमेंही है; और यह मनुष्य पहुँच जाता है उन नामरूपोंसे परे (गीता ८. २१) । इसीसे तुकाराम महाराजने इस स्थितिका नाम 'मरणका मरण' रख छोड़ा है। और इसी कारणसे याज्ञवल्क्य इस स्थितिको अमृतत्वकी सीमा या परा- काष्ठा कहते हैं। यही जीवन्मुक्तावस्था है। पातंजलयोगसूत्र और अन्य स्थानोंमेंभी वर्णन है, कि इस अवस्थामें आकाशगमन आदि कुछ अपूर्व अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं (पातंजलसूत्र ३. १६-५५); और इन्हींको पानेके लिये कितनेही मनुष्य योगाभ्यासकी धुनमें लग जाते हैं। परंतु योगवासिष्ठप्रणेता कहते हैं, कि आकाशगमन प्रभृति सिद्धियाँ न तो ब्रह्मनिष्ठ-स्थितिका साध्य है और न उसका कोई भागही। अतः जीवन्मुक्त पुरुष इन सिद्धियोंको पा लेनेका उद्योग नहीं करता; और बहुधा उसमें ये देखीभी नहीं जातीं (यो. ५. ८९) । इसी कारण इन सिद्धियोंका उल्लेख न तो योगवासिष्ठमेंही है और न गीतामेंभी किया है। वसिष्ठने रामसे स्पष्ट
अध्यात्म २३५ कह दिया है, कि ये चमत्कार तो मायाके खेल हैं; यह ब्रह्मविद्या नहीं है। कदाचित् ये सच्चेभी हों। हम यह नहीं कहते, कि ये सच्चे होंगेही नहीं। जो हो; इतना तो निर्विवाद है, कि यह ब्रह्मविद्याका विषय नहीं है। अतएव, ये सिद्धियाँ मिलें तो, और न मिलें तोभी इनकी परवाह न करनी चाहिये । ब्रह्मविद्याशास्त्रका कथन है, कि इनकी इच्छा अथवा आशाभी न करके मनुष्यको वही प्रयत्न करते रहना चाहिये, कि जिनसे प्राणिमात्रमें ‘एक-आत्मा'वाली परमावधिकी ब्रह्मनिष्ठ स्थिति प्राप्त हो जावे । ब्रह्मज्ञान आत्माकी शुद्ध अवस्था है। वह कुछ जादू, करामात या चमत्कार नहीं है। इस कारण इन सिद्धियोंसे - इन चमत्कारोंसे - ब्रह्मज्ञानके गौरवका बढ़ना तो दूर, किंतु उसके गौरवके - उसकी महत्ताके - ये चमत्कार प्रमाणभी नहीं हो सकते । पक्षी तो पहलेभी आकाशमें उड़ते थे; पर अब विमानोंवाले लोगभी आकाशमें उड़ने लगे हैं, किंतु सिर्फ इसी गुणके होनेसे कोई इनकी गिनती ब्रह्मवेत्ताओंमें नहीं करता । और तो क्या; जिन पुरुषोंको ये आकाशगमन आदि सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, उनमेंसे कुछ ‘मालतीमाधव' नाटकवाले अघोरघंटके समान क्रूर और घातकीभी हो सकते हैं। ब्रह्मात्मैक्यरूप आनंदमय स्थितिका अनिर्वाच्य अनुभव किसी दूसरेको पूर्णतया बतलाया नहीं जा सकता । क्योंकि जब उसके संबंधमें दूसरेको बतलाने लगेंगे, तब 'मैं-तू' वाली द्वैतकीही भाषासे काम लेना पड़ेगा; और इस द्वैती भाषामें अद्वैतका समस्त अनुभव व्यक्त करते नहीं बनता । अतएव उपनिषदोंमें इस परमावधिकी स्थितिके जो वर्णन हैं; उन्हेंभी अधूरे या गौण समझना चाहिये । और जब ये वर्णन गौण हैं, तब सृष्टिकी उत्पत्ति एवं रचना समझानेके लिये अनेक स्थानोंपर उपनिषदोंमें जो निरे द्वैती वर्णन पाये जाते हैं, उन्हेंभी गौणही मानना चाहिये । उदाहरण लीजिये; उपनिषदोंमें दृश्य सृष्टिकी उत्पत्तिके विषयमें ऐसे वर्णन हैं, कि आत्मस्वरूपी, शुद्ध, नित्य, सर्वव्यापी और अविकारी ब्रह्महीसे आगे चलकर हिरण्यगर्भ नामक सगुण पुरुष या आप (पानी) प्रभृति सृष्टिके व्यक्त पदार्थ क्रमशः निर्मित हुए; अथवा परमेश्वरने इन नामरूपोंकी रचना करके फिर जीवरूपसे उनमें प्रवेश किया (तै. २. ६; छां. ६. २, ३; बृ. १. ४. ७), ये सब द्वैतपूर्ण वर्णन अद्वैतदृष्टिसे यथार्थ नहीं हो सकते । क्योंकि ज्ञानगम्य, निर्गुण परमेश्वरही जब चारों ओर भरा हुआ है, तब तात्त्विक दृष्टिसे यह कहनाही निर्मूल हो जाता है, कि एकने दूसरेको पैदा किया । परंतु साधारण मनुष्योंको सृष्टिकी रचना समझा देनेके लिये व्यावहारिक अर्थात् द्वैतकी भाषाही तो एक साधन है। इस कारण व्यक्त सृष्टिकी अर्थात् नामरूपकी उत्पत्तिके वर्णन उपनिषदोंमें उसी ढंगके मिलते हैं, जैसा कि ऊपर एक उदाहरण दिया गया है। तोभी उसमें अद्वैतका तत्त्व बनाही रहता है; और अनेक स्थानोंमें यह कह दिया है, कि इस प्रकार द्वैती व्यावहारिक भाषा वर्तने परभी मूलमें अद्वैत सच्चाही है। देखिये, अब निश्चय हो चुका है, कि सूर्य घूमता नहीं है, स्थिर है,
२३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र फिरभी बोलचालमें जिस प्रकार यही कहा जाता है, कि सूर्य निकल आया अथवा डूब गया; उसी प्रकार यद्यपि निश्चित है कि एकही आत्मस्वरूपी परब्रह्म चारों ओर अखंड भरा हुआ है; और वह अविकार्य है; तथापि उपनिषदोंमें ऐसीही भाषाके प्रयोग मिलते हैं, कि "परब्रह्मसे व्यक्त जगत्की उत्पत्ति हुई है।" इसी प्रकार गीतामेंभी यद्यपि भगवानने यह कहा है, कि "मेरा सच्चा स्वरूप अव्यक्त और अज है" (गीता ७. २५); तथापि उन्होंने कहा है, कि "मैं सारे जगत्को उत्पन्न करता हूँ (गीता ४. ६)। परंतु इन वर्णनोंके मर्मको बिना समझे-बूझे कुछ पंडित लोग इनको शब्दशः सच्चा मान लेते हैं; और फिर उन्हेंही मुख्य समझ कर यह सिद्धान्त किया करते हैं, कि द्वैत अथवा विशिष्टाद्वैत मतका उपनिषदोंमें प्रतिपादन है। वे कहते हैं; कि यदि यह मान लिया जाय, कि एकही निर्गुण ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त हो रहा है; तो फिर इसकी उपपत्ति नहीं लगती, कि इस अविकारी ब्रह्मसे विकारसहित नाशवान् सगुण पदार्थ कैसे निर्मित हो गये। क्योंकि नामरूपात्मका सृष्टिको यदि 'माया' कहें, तो निर्गुण ब्रह्मसे सगुण मायाका उत्पन्न होनाही तर्ककी दृष्टिसे शक्य नहीं है। इससे अद्वैतवाद लँगड़ा हो जाता है। इससे तो कहीं अच्छा यह होगा, कि सांख्यशास्त्रके मतानुसार प्रकृतिके सदृश नामरूपात्मक व्यक्त सृष्टिके किसी सगुण परंतु व्यक्त रूपको नित्य मान लिया जावे; और उस व्यक्त रूपके अभ्यंतरमें कोई दूसरा परब्रह्म रूप नित्यतत्त्व ऐसे ओतप्रोत भरा हुआ रखा जावे, जैसः कि पेंचकी नलीमें भाफ रहती है (बृ. ३. ७)। एवं उन दोनोंमें वैसीही एकता मानी जावे, जैसी कि दाड़िम या अनारके फलकी भीतरी दानोंके साथ रहती है। परंतु हमारे मतमे उपनिषदोंके तात्पर्यका ऐसा विचार करना योग्य नहीं है। उपनिषदोंमें कहीं कहीं द्वैती और कहीं कहीं शुद्ध अद्वैती वर्णन पाये जाते हैं। सो यह सही है कि इन दोनोंकी कुछ-न-कुछ एकवाक्यता करनी चाहिये; परंतु अद्वैतवादको मुख्य समझने और जब निर्गुण ब्रह्म सगुण होने लगता है, तब उतनेही समयके लिये मायिक द्वैतकी स्थिति प्राप्त हुई जाती है इस प्रकार मान लेनेसे सब वचनोंकी जैसी व्यवस्था लगती है, वैसी व्यवस्था द्वैत पक्षको प्रधान माननेसे लगती नहीं है। उदाहरण लीजिये; 'तत् त्वमसि' इस वाक्यके पदोंका अन्वय द्वैती मतानुसार कभीभी ठीक नहीं लगता। तो क्या इस अड़चनको द्वैतमतवालोंने समझही नहीं पाया? नहीं, समझा ज़रूर है। तभी तो वे उक्त महावाक्यका जैसा- तैसा अर्थ लगा कर अपने मनको समझा लेते हैं। 'तत्त्वमसि' को द्वैतवाले इस प्रकार सुलझाते हैं-तत्त्वम् = तस्य त्वम् - अर्थात् उसका तू है, कि जो कोई तुझसे भिन्न है; तू वही नहीं है। परंतु जिसको संस्कृतका थोड़ा-साभी ज्ञान है; और जिसकी बुद्धि आग्रहमें बँध नहीं गई है वह तुरंत ताड़ लेगा, कि यह खींचातानीका अर्थ ठीक नहीं है। कैवल्य उपनिषद् (कै. १. १६) में, तो "स त्वमेव त्वमेव तत्" इस प्रकार 'तत्' और 'त्वम्'को उलट-पलट कर उक्त महावाक्यके अद्वैतप्रधान
अध्यात्म २३७ होनेकाही सिद्धान्त दर्शाया है। अब और क्या बतलावे ? समस्त उपनिषदोंका बहुतसा भाग निकाल डाले बिना अथवा जान-बूझकर उसपर दुर्लक्ष किये बिना, उपनिषच्छास्त्रमें अद्वैतको छोड़ और कोई दूसरा रहस्य बतला देना संभवही नहीं है। परंतु ये वाद तो ऐसे हैं, कि जिनका कोई ओर-छोरही नहीं; तो फिर यहाँ हम इनकी विशेष चर्चा क्यों करें ? जिन्हें अद्वैतके अतिरिक्त अन्य मत रुचते हों, वे खुशीसे उन्हें स्वीकार कर लें। उन्हें रोकता कौन है। जिन उदार महात्माओंने उपनिषदोंमें अपना यह स्पष्ट विश्वास बतलाया है, कि “नेह नानास्ति किंचन” (बृ. ४. ४. १९; कठ. ४. ११) - इस सृष्टिमें किसीभी प्रकारकी अनेकता नहीं है, जो कुछ है, वह मूलमें सब 'एकमेवाद्वितीयम्' (छां. ६. २. २.) है; और जिन्होंने आगे यह वर्णन किया है, कि “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” - जिसे इस जगत्में नानात्व दीख पड़ता है, वह जन्ममरणके चक्करमें फँसता है - हम नहीं समझते, कि उन महात्माओंका आशय अद्वैतको छोड़ औरभी किसी अन्य प्रकारका हो सकेगा। परंतु अनेक वैदिक शाखाओंके अनेक उपनिषद् होनेके कारण जैसे इस शंकाको थोड़ीसी गुंजाइश मिल जाती है, कि कुल उपनिषदोंका तात्पर्य क्या एकही है ? वैसा हाल गीताका नहीं है। जब गीता एकही ग्रंथ है, तब प्रकटही है, कि उसमें एकही प्रकारके वेदान्तका प्रतिपादन होना चाहिये। और जो विचारने लगें, कि वह कौन-सा वेदान्त है ? तो यह अद्वैतप्रधान सिद्धान्त करना पड़ता है, कि “मव भूतोंका नाश हो जानेपरभी जो एकही स्थिर रहता है” (गीता ८. २०), वही यथार्थमें सत्य है। एवं देह और विश्वमें मिलकर सर्वत्र वही व्याप्त हो रहा है (गीता १३. ३१)। और तो क्या; आत्मौपम्यबुद्धिका जो नीतितत्त्व गीतामें बतलाया गया है, उसकी पूरी पूरी उपपत्तिभी अद्वैतको छोड़ दूसरे प्रकारकी वेदान्त दृष्टिसे नहीं लगती है। इससे कोई हमारा यह आशय न समझ लें, कि श्रीशंकराचार्यके समयमें अथवा उनके पश्चात् अद्वैतमतका पोषण करनेवाली जितनी युक्तियाँ निकली हैं; अथवा प्रमाण निकले हैं, वे सभी यच्चयावत् गीतामें प्रतिपादित हैं। यहतो हमभी मानते हैं, कि द्वैत, अद्वैत और विशिष्टाद्वैत प्रभृति संप्रदायोंकी उत्पत्ति होनेसे पहलेही गीता बन चुकी है; और इसी कारणसे गीतामें किसीभी विशेष संप्रदायके युक्तिवादोंका समावेश होना संभव नहीं है। किंतु इस संमतिसे यह कहनेमें कोईभी बाधा नहीं आती, कि गीताका वेदान्त मामूली तौरपर शांकर- संप्रदायके ज्ञानानुसार अद्वैती है - द्वैती नहीं। इस प्रकार गीता और शांकर- संप्रदायमें तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे सामान्य मेल है सही; पर हमारा मत है, कि आचारदृष्टिसे गीता कर्मसंन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगको अधिक महत्त्व देती है। इस कारण गीताधर्म शांकरसंप्रदायसे भिन्न हो गया है। इसका विचार आगे किया जावेगा। प्रस्तुत विषय तत्त्वज्ञानसंबंधी है। इसलिये यहाँ इतनाही कहना है, कि गीता और शांकरसंप्रदायमें - दोनोंमें - यह तत्त्वज्ञान एकही प्रकारका
है, अर्थात् अद्वैती है। अन्य सांप्रदायिक भाष्योंकी अपेक्षा गीताके शांकरभाष्यका जो अधिक महत्त्व हो गया है, उसका कारणभी यही है। ज्ञानदृष्टिसे सारे नामरूपोंको एक ओर निकाल देने पर एकही अधिकारी और निर्गुण तत्त्व स्थिर रह जाता है। अतएव पूर्ण और सूक्ष्म विचार करनेपर अद्वैत सिद्धान्तकाही स्वीकार करना पड़ता है। जब इतना सिद्ध हो चुका तब अद्वैत वेदान्तकी दृष्टिसे यह विवेचन करना आवश्यक है, कि इस एक निर्गुण, अव्यक्त द्रव्यसे नाना प्रकारकी व्यक्त सगुण सृष्टि क्योंकर उपजी ? पहले बतला आये हैं, कि सांख्योंने तो निर्गुण पुरुषके साथही त्रिगुणात्मक अर्थात् सगुण प्रकृतिको अनादि और स्वतंत्र मान कर, इस प्रश्नको हल कर लिया है। किंतु यदि इस प्रकार सगुण प्रकृतिको स्वतंत्र मान लें, तो जगत्के मूलतत्त्व दो हुए जाते हैं। और ऐसा करनेसे उस अद्वैत मतमें बाधा आती है, कि जिसका उक्त अनेक कारणोंके द्वारा पूर्णतया निश्चय कर लिया गया है। यदि सगुण प्रकृतिको स्वतंत्र नहीं मानते हैं, तो यह बतलाते नहीं बनता, कि एकही मूल निर्गुण द्रव्यसे नानाविध सगुण सृष्टि कैसे उत्पन्न हो गई। क्योंकि सत्कार्यवादका सिद्धान्त यह है, कि निर्गुणसे सगुण - अर्थात् जो कुछभी नहीं है, उससे और कुछ - का उपजना शक्य नहीं है; और यह सिद्धान्त अद्वैतवादियोंकोभी मान्य हो चुका है। इसलिये दोनोंही ओर अड़चन है। फिर यह उलझन सुलझे कैसे ? बिना अद्वैतको छोड़ेही निर्गुणसे सगुणकी उत्पत्ति होनेका मार्ग बतलाना चाहिये; और सत्कार्यवादकी दृष्टिमे वह तो रुका हुआ-साही है। कठिन पेंच है - ऐमीवैसी उलझन नहीं है। और तो क्या ? कुछ लोगोंकी समझमें अद्वैत सिद्धान्तके माननेमें यही ऐसी अड़चन है, जोकि सबसे बड़ी पेचीदा और कठिन है। इसी अड़चनमे छटककर वे द्वैतको अंगीकार करने लिया करते हैं। किंतु अद्वैती पंडितोंने अपनी बुद्धिके द्वारा इस विकट अड़चनके फंदेसे छूटनेके लियेभी एक युक्ति- संगत बेजोड़ मार्ग ढूंढ़ लिया है। वे कहते हैं, कि सत्कार्यवाद अथवा गुणपरिणाम- वादके सिद्धान्तका उपयोग तब होता है, जब कार्य और कारण, दोनों एकही श्रेणीके अथवा एकही वर्गके होते हैं; और इस कारण अद्वैती वेदान्तीभी इसे स्वीकार कर लेंगे, कि सत्य और निर्गुण ब्रह्ममे मत्य और सगुण मायाका उत्पन्न होना शक्य नहीं है। परंतु यह स्वीकृति उस समयकी है, जब कि दोनों पदार्थ सत्य हों; पर जहाँ एक पदार्थ मत्य है, और दूसरा उसका सिर्फ दृश्य है, वहाँ सत्कार्य- वादका उपयोग नहीं होता। सांख्यमतवाले 'पुरुषके समानही प्रकृति 'को स्वतंत्र : और सत्य पदार्थ मानते हैं। यही कारण है, जो वे निर्गुण पुरुषसे सगुण प्रकृतिकी उत्पत्तिका विवेचन सत्कार्यवादके अनुसार कर नहीं सकते। किंतु अद्वैत वेदान्तका सिद्धान्त यह है, कि माया अनादि बनी रहे; फिरभी वह सत्य और स्वतंत्र नहीं है। वह तो गीताके कथनानुसार 'मोह', 'अज्ञान', अथवा "इंद्रियोंको दिखाई देनेवाला दृश्य" है। इसलिये सत्कार्यवादसे जो आक्षेप निष्पन्न हुआ था, उसका
उपयोग अद्वैत सिद्धान्तके लिये कियाही नहीं जा सकता। बापसे लड़का पैदा हो, तो कहेंगे, कि वह बापके गुणपरिणामसे हुआ है। परंतु पिता एकही व्यक्ति है; और जब कभी वह बच्चेका, कभी जवानका और कभी बुड्ढेका स्वांग बनाये हुए दीख पड़ता है, तब हम सदैव देखा करते हैं, कि इस व्यक्तिमें और इसके अनेक स्वांगोंमें गुणपरिणामरूपी कार्यकारणभाव नहीं रहता। ऐसेही जब निश्चित हो जाता है, कि सूर्य एकही है; तब पानीमें आँखोंको दिखाई देनेवाले उसके प्रतिबिंबको हम भ्रम कह देते हैं, और उसे गुणपरिणामसे उपजा हुआ दूसरा सूर्य नहीं मानते। इसी प्रकार दूरबीनसे किसी ग्रहके यथार्थ स्वरूपका निश्चय हो जानेपर, ज्योतिःशास्त्र स्पष्ट कह देता है, कि उस ग्रहका जो स्वरूप निरी आँखोंसे दीख पड़ता है, वह दृष्टिकी कमजोरी है और उसके अत्यंत दूरीपर रहनेके कारण निरा दृश्य उत्पन्न हो गया है। इससे प्रकट हो गया, कि कोईभी बात नेत्र आदि इंद्रियोंको प्रत्यक्ष गोचर हो जानेसेही स्वतंत्र और सत्य वस्तु मानी नहीं जा सकती। फिर इसी न्यायका अध्यात्मशास्त्रमें उपयोग करके यदि यह कहें तो क्या हानि है, कि ज्ञानचक्षुरूप दूरबीनसे जिसका निश्चय कर लिया गया है, वह निर्गुण परब्रह्मही सत्य है। और ज्ञानहीन चर्मचक्षुओंको जो नामरूप गोचर होता है, वह इस परब्रह्मका कार्य नहीं है - वह तो इंद्रियोंकी दुर्बलतासे उपजा हुआ निरा भ्रम अर्थात् मोहात्मक दृश्य है। यहाँपर यह आक्षेपही नहीं फबता, कि निर्गुणसे सगुण उत्पन्न नहीं हो सकता। क्योंकि दोनों वस्तुएँ एकही श्रेणीकी नहीं हैं। इनमें एक तो सत्य है; और दूसरी है सिर्फ दृश्य। एवं अनुभव यह है, कि मूलमें एकही सत्य वस्तु रहने- परभी देखनेवाले पुरुषके दृष्टिभेदसे, अज्ञानसे अथवा नज़रबंदीसे उस एकही वस्तुके दृश्य बदलते रहते हैं। उदाहरणार्थ, कानोंको सुनाई देनेवाले शब्द और आँखोंसे दिखाई देनेवाले रंग - इन्हीं दो गुणोंको लीजिये। इनमेंसे कानोंको जो शब्द या आवाज़ सुनाई देती है, उसकी सूक्ष्मतासे जांच करके आधिभौतिकशास्त्रियोंने पूर्णतया सिद्ध कर दिया है, कि 'शब्द' या तो वायुकी लहरें हैं या गति है। और अब सूक्ष्म शोध करनेसे निश्चय हो गया है, कि आँखोंमे दीख पड़नेवाले लाल, हरे, पीले, आदि रंगभी मूलमें एकही सूर्यप्रकाशके विकार हैं; और सूर्यप्रकाश स्वयं एक प्रकारकी गतिही है। जब कि 'गति' मूलमें एकही है, पर कान उसे शब्द और आँखें उसे रंग बतलाती हैं, तब यदि इसी न्यायका उपयोग कुछ अधिक व्यापक रीतिसे सारी इंद्रियोंके लिये किया जावे, तो सभी नामरूपोंकी उत्पत्तिके संबंधमें सत्कार्यवादकी सहायताके बिना ठीकही ठीक उपपत्ति इस प्रकार लगाई जा सकती है, कि किसीभी एक अविकार्य वस्तुपर मनुष्यकी भिन्न भिन्न इंद्रियाँ अपनी अपनी ओरसे शब्दरूप आदि अनेक नामरूपात्मक गुणोंका 'अध्यारोप' करके नाना प्रकारके दृश्य उपजाया करती हैं। परंतु यह आवश्यक नहीं है, कि मूलकी एकही वस्तुमें ये दृश्य, ये गुण अथवा ये नामरूप हों ही। और इसी अर्थको सिद्ध करनेके लिये
२४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र रस्सीमें सर्पका अथवा सीपमें चाँदीका भ्रम होना, या आँखमें उँगली डालनेसे एकके दो पदार्थ दीख पड़ना अथवा अनेक रंगोंके चश्मे लगानेपर एकही पदार्थका रंग-बिरंगा दीख पड़ना आदि अनेक दृष्टान्त वेदान्तशास्त्रमें दिये जाते हैं। मनुष्यकी इंद्रियाँ उससे कभी छूट नहीं जाती हैं। इस कारण जगत्के नामरूप अथवा गुण उसके नयनपथमें गोचर तो अवश्यही होंगे; परंतु यह नहीं कहा जा सकता, कि इंद्रियवान् मनुष्यकी दृष्टिसे जगत्का जो सापेक्ष स्वरूप दीख पड़ता है, वही इस जगत्के मूलका अर्थात् निरपेक्ष और नित्य स्वरूप है। मनुष्यकी वर्तमान इंद्रियोंकी अपेक्षा यदि उसे न्यूनाधिक इंद्रियाँ प्राप्त हो जावें, तो यह सृष्टि उसे जैसे आजकल दीख पड़ती है, वैसेही न दीखती रहेगी। और यदि यह ठीक है, तो जब कोई पूछे, कि द्रष्टाकी – देखनेवाले मनुष्यकी – इंद्रियोंकी अपेक्षा न करके यह बतलाओ, कि सृष्टिके मूलमें जो तत्त्व है, उसका नित्य और सत्य स्वरूप क्या है ? तब यही उत्तर देना पड़ता है, कि वह मूलतत्त्व है तो निर्गुण; परंतु मनुष्यको सगुण दिखलाई देता है – यह मनुष्यकी इंद्रियोंका धर्म है; न कि मूलवस्तुका गुण। आधिभौतिकशास्त्रमें उन्हीं बातोंकी जाँच होती है, कि जो इंद्रियोंको गोचर हुआ करती हैं। और यही कारण है, कि वहाँ इस ढंगके प्रश्न होतेही नहीं। परंतु मनुष्य और उसकी इंद्रियोंके नष्टप्राय हो जानेसे यह नहीं कह सकते, कि ईश्वरभी नष्ट हो जाता है; अथवा मनुष्यको वह अमुक प्रकारका दीख पड़ता है। इसलिये उसका त्रिकालाबाधित नित्य और निरपेक्ष स्वरूपभी वही होना चाहिये। अतएव जिस अध्यात्मशास्त्रमें यह विचार करना होता है, कि जगत्के मूलमें वर्तमान सत्यका मूलस्वरूप क्या है; उसमें मानवी इंद्रियोंकी सापेक्षदृष्टि छोड़ देनी पड़ती है; और केवल ज्ञानदृष्टिसे अर्थात् जितना हो सके उतना बुद्धिसेही अंतिम विचार करना पड़ता है। ऐसा करनेसे इंद्रियोंको गोचर होनेवाले सभी गुण आपही आप छूट जाते हैं। और यह सिद्ध हो जाता है, कि, ब्रह्मका नित्य स्वरूप इंद्रियातीत अर्थात् निर्गुण एवं सबसे श्रेष्ठ है। परंतु अब प्रश्न होता है, कि जो निर्गुण है, उसका वर्णन करेगाही कौन ? और किस प्रकार करेगा ? इसीलिये अद्वैत वेदान्तमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि परब्रह्मका अंतिम अर्थात् निरपेक्ष और नित्य स्वरूप निर्गुण तो हैही, पर अनि- र्वाच्यभी है; और इसी निर्गुण स्वरूपमें मनुष्यको अपनी इंद्रियोंके योगसे सगुण दृश्यकी झलक दीख पड़ती है। अब यहाँ प्रश्न होता है, कि निर्गुणको सगुण करनेकी यह शक्ति इंद्रियोंने पा कहाँसे ली ? इसपर अद्वैतवेदान्तशास्त्रका यह उत्तर है कि मानवी ज्ञानकी गति यहींतक है। इसके आगे उसकी गुज़र नहीं। इसलिये यह इंद्रियोंका अज्ञान है; और निर्गुण परब्रह्ममें सगुण जगत्का दृश्य दीखना यह उसी अज्ञानका परिणाम है। अथवा यहाँ इतनाही निश्चित अनुमान करके निश्चित हो जाना पड़ता है, कि इंद्रियाँभी परमेश्वरकी सृष्टिकीही हैं। इस कारण यह सगुण सृष्टि (प्रकृति) निर्गुण परमे- श्वरकीही एक 'दैवी माया' है (गीता ७. १४)। पाठकोंकी समझमें अब गीताके
अध्यात्म २४१ इस वर्णनका तत्त्व आ जावेगा, कि केवल इंद्रियोंसे देखनेवाले अप्रबुद्ध लोगोंको परमे- श्वर व्यक्त और सगुण दीख पड़े तोभी उसका सच्चा और श्रेष्ठ स्वरूप निर्गुण है और उसको ज्ञानदृष्टिसे जाननेमेंही ज्ञानकी परमावधि है ( गीता ७. १४, २४, २५ ) । इस प्रकार निर्णय तो कर दिया, कि परमेश्वर मूलमें निर्गुण है, और मनुष्यकी इंद्रियोंको उसीमें सगुण सृष्टिका विविध दृश्य दीख पड़ता है; फिरभी इस बातका थोड़ा-सा स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है, कि उक्त सिद्धान्तमें निर्गुण शब्दका अर्थ क्या समझा जावे। यह सच है, कि हवाकी लहरोंपर शब्दरूप आदि गुणोंका अथवा सीपपर चाँदीका जब हमारी इंद्रियां अध्यारोप करती हैं, तब हवाकी लहरोंमें शब्द- रूप आदिके अथवा सीपमें चाँदीके गुण नहीं होते। परंतु यद्यपि उनमें अध्यारोपित गुण न हों; तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि उनसे भिन्न गुण, मूल पदार्थोंमें होंगेही नहीं। क्योंकि हम प्रत्यक्ष देखते हैं, कि यद्यपि सीपमें चाँदीके गुण नहीं हैं, तोभी चाँदीके गुणोंके अतिरिक्त और दूसरे गुण उसमें रहते होंगेही। इसीसे अब यहाँ एक और शंका होती है - कि इंद्रियोंने अपने अज्ञानसे मूलब्रह्मपर जिन गुणोंका अध्या- रोप किया था, वे गुण ब्रह्ममें नहीं हैं - इस प्रकार न होंगे तो क्या और दूसरे गुण परब्रह्ममें न होंगे ? यदि मान लो, कि यदि कहें; तो फिर वह निर्गुण कहाँ रहा ? किंतु कुछ और अधिक सूक्ष्म विचार करनेसे ज्ञात होगा, कि यदि मूल ब्रह्ममें इंद्रियोंके द्वारा अध्यारोपित गुणोंके अतिरिक्त और दूसरे गुण होंभी; तो हम उन्हें मालूम कैसे कर सकेंगे ? क्योंकि गुणोंको मनुष्य अपनी इंद्रियोंसेही तो जानता है; और जो गुण इंद्रियोंको अगोचर हैं, वे जानेही नहीं जाते। सारांश, इंद्रियोंके द्वारा अध्यारोपित गुणोंके अतिरिक्त परब्रह्ममें यदि और कुछ दूसरे गुण हों, तो उनको जान लेना हमारी सामर्थ्यके बाहर है; और जिन गुणोंको जान लेना हमारे काबूमें नहीं, उनको परब्रह्ममें माननाभी न्यायशास्त्रकी दृष्टिसे योग्य नहीं है। अतएव गुण शब्दका “ मनुष्यको ज्ञात होनेवाले गुण ” अर्थ करके वेदान्ती लोग सिद्धान्त किया करते हैं, कि ब्रह्म 'निर्गुण' है। न तो अद्वैत वेदान्तही यह कहता है; और न कोई दूसराभी कह सकेगा, कि मूल परब्रह्म-रूपमें ऐसा गुण या ऐसी शक्ति भरीही नहीं होगी, कि जो मनुष्यके लिये अतर्क्य है, बल्कि यह तो पहलेही बतला दिया है, कि वेदान्ती लोगभी इंद्रियोंके उक्त अज्ञान अथवा मायाको उसी मूल परब्रह्मकी एक अतर्क्य शक्ति कहा करते हैं। त्रिगुणात्मक माया अथवा प्रकृति कोई दूसरी स्वतन्त्र वस्तु नहीं है, किंतु एक- रूप निर्गुण ब्रह्मपरही मनुष्यकी इंद्रियां अज्ञानसे सगुण दृश्योंका अध्यारोप किया करती हैं। इसी मतको 'विवर्तवाद' कहते हैं। अद्वैत वेदान्तके अनुसार यह उपपत्ति इस बातकी हुई, कि जब निर्गुण ब्रह्म एकमात्रही मूलतत्त्व है, तब नाना प्रकारका सगुण जगत् पहले दिखाई कैसे देने लगा ? कणादप्रणीत न्यायशास्त्रमें असंख्य परमाणु जगतके मूलकारण माने गये हैं; और नैयायिक इन परमाणुओंको सत्य मानते हैं। गी. र. १६
२४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इसलिये उन्होंने निश्चय किया है, कि जहां इन असंख्य परमाणुओंका संयोग होने लगा, वहाँ सृष्टिके अनेक पदार्थ बनने लगते हैं। परमाणुओंके संयोगका आरंभ होनेपर, इस मतसे सृष्टिका निर्माण होता है। इसलिये इसको 'आरंभवाद' कहते हैं। परंतु नैयायिकोंके असंख्य परमाणुओंके मतको सांख्यमार्गवाले नहीं मानते। वे कहते हैं, कि जड सृष्टिका मूल कारण "एकरूप, सत्य और त्रिगुणात्मक प्रकृतिही" है। एवं इस त्रिगुणात्मक प्रकृतिके गुणोंके विकाससे अथवा परिणामसे व्यक्त सृष्टि बनती है। इस मतको 'गुणपरिणामवाद' कहते हैं। क्योंकि इसमें यह प्रतिपादन किया जाता है, कि एक मूल सगुण प्रकृतिके गुणविकाससेही सारी व्यक्त सृष्टि पैदा हुई है। किंतु इन दोनों वादोंको अद्वैती वेदान्ती स्वीकार नहीं करते। परमाणु असंख्य हैं; इसलिये अद्वैत मतके अनुसार वे जगतका मूल हो नहीं सकते; और रह गई प्रकृति। सो यद्यपि वह एक हो, तोभी उसके पुरुषसे भिन्न और स्वतंत्र होनेके कारण अद्वैत सिद्धान्तके यह द्वैतभी विरुद्ध है। परंतु इस प्रकार इन दोनों वादोंको त्याग देनेसे इस बातकी कोई न कोई उपपत्ति देनी होगी, कि एक निर्गुण ब्रह्मसे सगुण सृष्टि कैसे उपजी है। क्योंकि, सत्कार्यवादके अनुसार निर्गुणसे सगुण उत्पन्न हो नहीं सकता। इसपर वेदान्ती कहते हैं, कि सत्कार्यवादके इस सिद्धान्तका उपयोग वहीं होता है, जहां कार्य और कारण दोनों वस्तुएँ सत्य हों, परंतु जहाँ मूल वस्तु एकही है, और जहाँ उसके भिन्न भिन्न दृश्यभी पलटते हैं, वहाँ इस न्यायका उपयोग नहीं होता। क्योंकि हम सदैव देखते हैं, कि एकही वस्तुके भिन्न भिन्न दृश्योंका दीख पड़ना उस वस्तुका धर्म नहीं है; किंतु द्रष्टा – देखनेवाले पुरुषके – दृष्टिभेदके कारण ये भिन्न भिन्न दृश्य उत्पन्न हो सकते हैं।* इसी न्यायका उपयोग निर्गुण ब्रह्म और सगुण जगतके लिये करनेपर कहेंगे, कि ब्रह्म तो निर्गुण है; पर मनुष्यके इंद्रियधर्मके कारण उसीमें सगुणत्वकी झलक उत्पन्न हो जाती है। यह विवर्तवाद है। विवर्तवादमें यह मानते हैं, कि एकही मूल सत्य द्रव्यपर अनेक असत्य अर्थात् सदा बदलते रहनेवाले दृश्योंका अध्यारोप होता है; और गुणपरिणामवादमें पहलेसेही दो सत्य द्रव्य मान लिये जाते हैं, जिनमेंसे एकके गुणोंका विकास होकर जगतकी नाना गुणयुक्त अन्यान्य वस्तुएँ उपजती रहती हैं। रस्सीमें सर्पका भास होना विवर्त है; और नारियलकी रेशोंसे रस्सी बन जाना अथवा दूधसे दही बन जाना गुणपरिणाम है। इसी कारण 'वेदान्त- सार' नामक ग्रंथकी एक आवृत्तिमें इन दोनों वादोंके लक्षण इस प्रकार बतलाये गये हैं :-
- अंग्रेजीमें इस! अर्थको व्यक्त करना हो, तो यों कहेंगे :- “ appearances are the results of subjective conditions, viz. the senses of the obser- ver and not of the thing itself. ”
अध्यात्म २४३ यस्तात्त्विकोऽन्यथाभावः परिणाम उदीरितः । अतात्त्विकोऽन्यथाभावो विवर्तःस उदीरितः ॥ "किसी मूल वस्तुसे जब तात्त्विक अर्थात् सचमुचही दूसरे प्रकारकी वस्तु बनती है, तब उसको ( गुण ) परिणाम कहते हैं। और जब ऐसा न होकर मूलवस्तुही कुछ- की-कुछ ( अतात्त्विक ) भासने लगती है, तब उसे विवर्त कहते हैं" ( वे. सा. २१ ) । आरंभवाद नैयायिकोंका है, गुणपरिणामवाद सांख्योंका है और विवर्तवाद अद्वैती वेदान्तियोंका है। अद्वैती वेदान्ती परमाणु या प्रकृति इन दोनों सगुण वस्तुओंको निर्गुण ब्रह्मसे भिन्न और स्वतंत्र नहीं मानते, परंतु फिर यह आक्षेप होता है, कि सत्कार्य- वादके अनुसार निर्गुणसे सगुणकी उत्पत्ति होना असंभव है। इस आक्षेपको दूर करनेके लियेही ही विवर्तवाद निकला है। परंतु इसीसे कुछ लोग जो यह समझ बैठे हैं, कि वेदान्ती लोग गुणपरिणामवादका कभी स्वीकार नहीं करते हैं; अथवा आगे कभी न करेंगे, वह उनकी भूल है। अद्वैत मतपर सांख्यमतवालोंका अथवा अन्यान्य द्वैतमत- वालोंकाभी जो यह मुख्य आक्षेप रहता है, कि निर्गुण ब्रह्मसे सगुण प्रकृतिका अर्थात् मायाका उद्गम होही नहीं सकता; सो वह आक्षेप कुछ अपरिहार्य नहीं है। विवर्त- वादका मुख्य उद्देश्य इतनाही दिखला देना है, कि एकही निर्गुण ब्रह्ममें मायाके अनेक दृश्योंका हमारी इंद्रियोंको दीख पड़ना संभव है। वह उद्देश्य सफल हो जानेपर - अर्थात् जहाँ विवर्तवादसे यह सिद्ध हुआ, कि एक निर्गुण परब्रह्ममेंही त्रिगुणात्मक सगुण प्रकृतिके दृश्यका दीख पड़ना शक्य है; वहाँ - वेदान्तशास्त्रको यह स्वीकार करनेमें कोईभी हानि नहीं, कि इस प्रकृतिका अगला विस्तार गुणपरिणामसे हुआ है। अद्वैत वेदान्तका मुख्य कथन यही है, कि स्वयं मूल प्रकृति एक दृश्य है -सत्य नहीं है। जहाँ प्रकृतिका दृश्य एक बार दिखाई देने लगा, वहाँ फिर इन दृश्योंसे आगे चल- कर निकलनेवाले दूसरे दृश्योंको स्वतंत्र न मानकर, अद्वैत वेदान्तको यह मान लेनेमें कुछभी आपत्ति नहीं है कि एक दृश्यके गुणोंसे दूसरे दृश्यके गुण और दूसरेसे तीसरे आदिके इस प्रकार नानागुणात्मक दृश्य उत्पन्न होते हैं। अतएव यद्यपि गीतामें भगवाननें बतलाया है, कि "यह प्रकृति मेरीही माया है" ( गीता ७. १४; ४. ६ ), फिरभी गीतामेंही यह कह दिया है, कि ईश्वरके द्वारा अधिष्ठित ( गीता ९. १० ) इस प्रकृतिका अगला विस्तार "गुणा गुणेषु वर्तन्ते" ( गीता ३. २८; १४. २३ ) इस न्यायसेही होता रहता है। इससे ज्ञात होता है, कि विवर्तवादके अनुसार मूल निर्गुण परब्रह्ममें एक बार मायाका दृश्य उत्पन्न हो चुकनेपर इस मायिक दृश्यकी अर्थात् प्रकृतिके अगले विस्तारकी - उपपत्तिके लिये गुणोत्कर्षका तत्त्व गीताकोभी मान्य हो चुका है। जब समूचे दृश्य जगतकोही एक बार मायात्मक दृश्य कह दिया, तब यह कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, कि इन दृश्योंके अन्याय रूपोंके लिये गुणो- त्कर्षके जैसे कुछ नियम होनेही नहीं चाहिये । वेदान्तियोंको यह अस्वीकार नहीं है, कि मायात्मक दृश्यका विस्तारभी नियमबद्धही रहता है। उनका तो इतनाही कहना
२४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र है, कि मूल प्रकृतिके समान ये नियमभी मायिकही हैं; और परमेश्वर इन सब मायिक नियमोंका अधिपति है। वह इनसे परे है; और उसकी सत्तासेही इन निय- मोंको नियमत्व अर्थात् नित्यता प्राप्त हो गई है। दृश्यरूपी सगुण अतएव विनाशी प्रकृतिमें ऐसे नियम बना देनेकी सामर्थ्य नहीं रह सकती, कि जो त्रिकालमेंभी अबाधित रहें। यहां तक जो विवेचन किया गया है, उससे ज्ञात होगा, कि जगत्, जीव और परमेश्वर – अथवा अध्यात्मशास्त्रकी परिभाषाके अनुसार माया (अर्थात् मायासे उत्पन्न किया हुआ जगत्), आत्मा और परब्रह्मका स्वरूप क्या है? एवं इनका पर- स्पर-संबंध क्या है? अध्यात्मदृष्टिसे जगतकी सभी वस्तुओंके दो वर्ग होते हैं, ‘नामरूप’ और नामरूपोंसे आच्छादित 'नित्य तत्त्व'। इनमेंसे नामरूपोंकोही सगुण माया अथवा प्रकृति कहते हैं। परंतु नामरूपोंको निकाल डालनेपर जो ‘नित्य द्रव्य’ बच रहता है, वह निर्गुणही रहना चाहिये। क्योंकि कोईभी गुण बिना नामरूपोंके रह नहीं सकता। यह नित्य और अव्यक्त तत्त्वही परब्रह्म है; और मनुष्यकी दुर्बल इंद्रियोंको इस निर्गुण परब्रह्ममेंही सगुण माया उपजी हुई दीख पड़ती है। यह माया सत्य पदार्थ नहीं है। परब्रह्मही सत्य अर्थात् त्रिकालमेंभी अबाधित और कभीभी न पलटनेवाली वस्तु है। दृश्य सृष्टिके नामरूप और उनसे आच्छादित परब्रह्मके स्वरूपसंबंधी ये सिद्धान्त हुए; अब इसी न्यायसे मनुष्यका विचार करें, तो सिद्ध होता है, कि मनुष्यकी देह और इंद्रियां दृश्य सृष्टिके अन्यान्य पदार्थोंके समान नामरूपात्मक अर्थात् अनित्य मायाके वर्गकी हैं; और इन देहेंद्रियोंसे ढँका हुआ आत्मा नित्यस्वरूपी परब्रह्मकी श्रेणीका है; अथवा ब्रह्म और आत्मा एकही हैं। इस अर्थसे बाह्य सृष्टिको स्वतंत्र, सत्य पदार्थ न माननेवाले अद्वैत-सिद्धान्तका और बौद्ध-सिद्धान्तका भेद अब पाठकोंके ध्यानमें आही गया होगा। विज्ञानवादी बौद्ध मानते हैं, कि बाह्यसृष्टिही नहीं है। वे ज्ञानमात्रकोही सत्य मानते हैं। और वेदान्तशास्त्री बाह्य सृष्टिके नित्य बदलते रहनेवाले नामरूपकोही असत्य मानकर यह सिद्धान्त करते हैं, कि इस नाम- रूपके मूलमें और मनुष्यकी देहमें–दोनोंमें–एकही आत्मरूपी, नित्य द्रव्य भरा हुआ है। एवं यह एकरूप आत्मतत्त्वही अंतिम सत्य है। सांख्यमतवालोंने ‘अविभक्तं विभक्तेषु’के न्यायसे सृष्ट पदार्थोंकी अनेकताके एकीकरणको जड़ प्रकृति भरके लियेही स्वीकार कर लिया है। परंतु वेदान्तियोंने सत्कार्यवादकी बाधाको दूर करके निश्चय किया है, कि जो “पिंडमें है वही ब्रह्मांडमें है।” इस कारण अब सांख्योंके असंख्य पुरुषोंका और प्रकृतिका एकही परमात्मामें अद्वैतसे या अविभागसे समावेश हो गया है। शुद्ध आधिभौतिक पंडित हेकेल अद्वैती है सही; पर वह अकेली जड़ प्रकृतिमेंही चैतन्यकाभी संग्रह करता है। और वेदान्त, जड़को प्रधानता न देकर यह सिद्धान्त स्थिर करता है, कि दिक्कालोंसे अमर्यादित, अमृत, और स्वतंत्र चिद्रूपी परब्रह्मही सारी सृष्टिका मूल है। हेकेलके जड़ अद्वैतमें और अध्यात्मशास्त्रके अद्वैतमें यह अत्यंत
अध्यात्म २४५ महत्त्वपूर्ण भेद है। अद्वैत वेदान्तके यही सिद्धान्त गीतामें हैं; और एक पुराने कविने समग्र अद्वैत वेदान्तके सारका वर्णन यों किया है :- श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः । ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ॥ “ करोड़ों ग्रंथोंका सार आधे श्लोकमें बतलाता हूँ :- (१) ब्रह्म सत्य है, (२) जगत् अर्थात् जगतके सभी नामरूप मिथ्या अथवा नाशवान् हैं; और (३) मनुष्यका आत्मा एवं ब्रह्म मूलमें एकही हैं - दो नहीं।" इस श्लोकका 'मिथ्या' शब्द यदि किसीके कानोंमें चुभता हो, तो वह बृहदारण्यक उपनिषदके अनुसार इसके तीसरे चरण - “ब्रह्मामृतं जगत्सत्यं "का - पाठांतर खुशीसे करलें; परंतु पहलेही बतला चुके हैं, कि इससे भावार्थ नहीं बदलता है। फिरभी कुछ वेदान्ती इस बातको लेकर निरर्थक झगड़ते रहते हैं, कि समूचे दृश्य जगत्के अदृश्य किंतु नित्य परब्रह्मरूपी मूल तत्त्वको सत् (सत्य) कहें या असत् (असत्य-अनृत) । अतएव इसका यहाँ थोड़ा-सा स्पष्टीकरण किये देते हैंः कि इस विवादका सच्चा बीज (जड़) क्या है। सत् या सत्य इस एकही शब्दके दो भिन्न भिन्न अर्थ होते हैं, इसी कारण यह झगड़ा मचा हुआ है। और यदि ध्यानसे देखा जावे, कि प्रत्येक पुरुष इस 'सत्' शब्दका किस अर्थमें उपयोग करता है, तो कुछभी गड़बड़ नहीं रह जाती । क्योंकि यह भेद तो सभीको एक-सा मंजूर है, कि ब्रह्म अदृश्य होने परभी नित्य है; और नामरूपात्मक जगत् दृश्य होनेपरभी पल-पलमें बदलनेवाला है। इस सत् या सत्य शब्दका व्यावहारिक अर्थ है :- (१) आँखोंके आगे अभी प्रत्यक्ष दीख पड़नेवाला - अर्थात् व्यक्त (फिर कल उसका दृश्य स्वरूप चाहे बदले, चाहे न बदले); और दूसरा अर्थ है :- (२) वह अव्यक्त स्वरूप, जो आँखोंसे भलेही न दीख पड़े पर जो सदैव एक-सा रहता है। और जो कभी बदलता नहीं है। इनमेंसे पहला अर्थ जिनको संमत है, वे आँखोंसे दिखाई देनेवाले नामरूपात्मक जगतको सत्य कहते हैं; और परब्रह्मको इसके विरुद्ध अर्थमें अर्थात् आँखोंसे न दीख पड़ने- वाला अतएव असत् अथवा असत्य कहते हैं। उदाहरणार्थ, तैत्तिरीय उपनिषदमें दृश्य सृष्टिके लिये 'सत्' और जो दृश्य सृष्टिसे परे है, उसके लिये 'त्यत्' (अर्थात् जो कि परे है) अथवा 'अनृत' (आँखोंको न दीख पड़नेवाला) शब्दोंका उपयोग करके ब्रह्मका वर्णन इस प्रकार किया है, कि जो कुछ मूलमें या आरंभमें था, वही द्रव्य “सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च । विज्ञानं चाविज्ञानं च । सत्यं चानृतं च ।" (तै. २. ६) - सत् (आँखोंसे दीख पड़नेवाला) और त्यत् (जो परे है), वाच्य और अनिर्वाच्य साधार और निराधार; ज्ञात और अविज्ञात (अज्ञेय), सत्य और अनृत - इस प्रकार द्विधा बना हुआ है। परंतु इस प्रकार ब्रह्मको 'अनृत' कहनेसे अनृतका अर्थ झूठ या असत्य नहीं होता है, क्योंकि
२४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आगे चलकर तैत्तिरीय उपनिषदमें ही कहा है, कि “यह अमृत, ब्रह्म जगत्की ‘प्रतिष्ठा’ अथवा आधार है। इसे और दूसरे आधारकी अपेक्षा नहीं है। एवं जिसने इसको जान लिया, वह अभय हो गया” इस वर्णनसे स्पष्ट हो जाता है, कि शब्दभेदके कारण भावार्थमें कुछ अंतर नहीं होता है। ऐसेही अंतमें कहा है, कि “असद्वा इदमग्र आसीत्” - यह सारा जगत् पहले असत् (ब्रह्म) था; और ऋग्वेदके (१०. १२९. ४) वर्णनके अनुसार आगे चलकर उसीसे सत् यानी नाम- रूपात्मक व्यक्त जगत् निकला है (तै. २. ७)। इससेभी स्पष्ट हो जाता है, कि यहाँ पर ‘असत्’ शब्दका प्रयोग “अव्यक्त अर्थात् आँखोंसे न दीख पड़नेवाले” के अर्थमेंही हुआ है; और वेदान्तसूत्रोंमें (वे. सू. २. १. १७) में बादरायणाचार्यने उक्त वचनोंका ऐसाही अर्थ किया है। किंतु जिन लोगोंको ‘सत्’ अथवा ‘सत्य’ शब्दका यह अर्थ - आँखोंसे न दीख पड़नेपरभी सदैव स्थिर रहनेवाला अथवा टिकाऊ - (ऊपर बतलाये हुए अर्थोंमेंसे दूसरा अर्थ) संमत है, वे उस अदृश्य परब्रह्मकोही सत् या सत्य कहते हैं, कि जो कभी नहीं बदलता; और नामरूपात्मक मायाको असत् यानी असत्य अर्थात् विनाशी कहते हैं। उदाहरणार्थ, छांदोग्यमें वर्णन किया गया है, कि “सदेव सौम्येदमग्र आसीत् कथमसतः सज्जायेत” - पहले यह सारा जगत् सत् (ब्रह्म) था, जो असत् है यानी हैही नहीं, उससे सत् यानी जो विद्यमान् है - मौजूद है - कैसे उत्पन्न होगा (छां. ६. २. १, २)। फिरभी छांदोग्य उप- निषदमेंही इस परब्रह्मके लिये एक स्थानपर अव्यक्तके अर्थमें ‘असत्’ शब्द प्रयुक्त हुआ है (छां. ३. १९. १)।* एकही परब्रह्मको भिन्न भिन्न समयों और अर्थोंमें एक बार ‘सत्’, तो एक बार ‘असत्’; यों परस्पर-विरुद्ध नाम देनेकी यह गड़बड़ - अर्थात् वाच्य अर्थके एकही होनेपरभी निरा शब्दवाद मचवानेमें सहायक - प्रणाली आगे चलकर रुक गई। और अंतमें इतनीही एक परिभाषा स्थिर हो गई है, कि ब्रह्म सत् या सत्य यानी सदैव स्थिर रहनेवाला है; और दृश्य सृष्टि असत् अर्थात् नाशवान् है। भगवद्गीतामें यही अंतिम परिभाषा मानी गई है; और इसीके अनुसार दूसरे अध्यायमें (गीता २. १६-१८) कह दिया है, कि परब्रह्म सत् और अविनाशी है। एवं नामरूप असत् अर्थात् नाशवान् हैं; और वेदान्तसूत्रोंकाभी ऐसाही मत है। फिरभी दृश्य सृष्टिको ‘सत्’ कहकर परब्रह्मको ‘असत्’ या ‘त्यत्’ (वह = परेका) कहनेकी तैत्तिरीयोपनिषदवाली उस पुरानी परिभाषाका नामो- निशाँ अबभी बिलकुल जाता नहीं रहा है। पुरानी परिभाषासे इतना भली भाँति
- अध्यात्मशास्त्रवाले अंग्रेज ग्रंथकारोंमेंभी इस विषयमें मतभेद है, कि (real) अर्थात् सत् शब्द जगत्के दृश्य (माया)के लिये उपयुक्त हो; अथवा वस्तुतत्त्व (ब्रह्म)के लिये। कांट दृश्यको सत् (real) समझकर वस्तुतत्त्वको अविनाशी मानता है; पर हेकेल और ग्रीनप्रभृति दृश्यको असत् (unreal) समझकर वस्तुतत्त्वको सत् (real) कहते हैं।
अध्यात्म २४७ स्पष्टीकरण हो जाता है, कि गीताके "ॐ तत् सत्" ब्रह्मनिर्देशका (गीता १७. २३) मूल अर्थ क्या रहा होगा। यह 'ॐ' गुढाक्षररूपी वैदिक मंत्र है। उपनिषदोंमें इसका अनेक रीतियोंसे व्याख्यान किया गया है (प्र. ५; मां. ८-१२; छां. १. १)। 'तत्' यानी वह अथवा दृश्य सृष्टिसे परे, दूर स्थिर रहनेवाला, अनिर्वाच्य तत्त्व है; और 'सत्'का अर्थ है आंखोंके सामनेवाली दृश्य सृष्टि। इस संकल्पका अर्थ यह है कि ये तीनों मिलकर सब ब्रह्मही है। और इसी अर्थमें भगवान्ने गीतामें कहा है, कि 'सदसच्चाहमर्जुन' (गीता ९.१९) - सत् यानी परब्रह्म और असत् अर्थात् दृश्य सृष्टि, दोनों मैंही हूँ। तथापि जब कि गीतामें कर्मयोगही प्रतिपाद्य है, तब सत्रहवें अध्यायके अंतमें प्रतिपादन किया है, कि निम्न अर्थके इस ब्रह्मनिर्देशसेभी कर्मयोगका पूर्ण समर्थन होता है। 'ॐ तत्सत्' के 'सत्' शब्दका अर्थ लौकिक दृष्टिसे भला अर्थात् सद्बुद्धिसे किया हुआ अथवा वह कर्म है, कि जिसका अच्छा फल मिलता है; और तत्का अर्थ है इसके परेका या फलाशा छोड़कर किया हुआ कर्म है। संकल्पमें जिसे 'सत्' कहा है, वह दृश्य सृष्टि यानी कर्मही हैं (अगला प्रकरण देखो)। अतः इस ब्रह्मनिर्देशका यह कर्मप्रधान अर्थ मूल अर्थसे सहजही निष्पन्न होता है। ॐ तत्सत्, नेति नेति, सच्चिदानंद और 'सत्यस्य सत्यं'के अतिरिक्त औरभी कुछ ब्रह्मनिर्देश उपनिषदोंमें हैं; परंतु उनको यहां इसलिये नहीं बतलाया, क्योंकि गीताका अर्थ समझनेमें उनका उपयोग नहीं हैं। जगत्, जीव और परमेश्वरके (परमात्मा) परस्पर संबंधका इस प्रकार निर्णय हो जानेपर गीतामें भगवान्ने जो कहा है, कि "जीव मेराही 'अंश' है" (गीता १५. ७) और "मैंही एक 'अंश'से सारे जगतमें व्याप्त हूँ" (गीता १०. ४२) - एवं बादरायणाचार्यनेभी वेदान्तसूत्रोंमें (वे. सू. २. ३. ४३; ४. ४. १९) में यही बात कही है- अथवा पुरुषसूक्तमें जो "पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपाद- स्यामृतं दिवि" यह वर्णन है, उसके 'पाद' या 'अंश' शब्दके अर्थका निर्णयभी सहजही हो जाता है। परमेश्वर या परमात्मा यद्यपि सर्वव्यापी है, तथापि वह निरवयव एकरूप और नामरूपरहित है। अतएव उसे काट नहीं सकते (अच्छेद्य); और उसमें विकारभी नहीं होता (अविकार्य); और इसलिये उसके अलग अलग विभाग या टुकड़े नहीं हो सकते (गीता २. २५)। अतएव चारों ओर ठसाठस भरे हुए इस एकरूप परब्रह्मका और मनुष्यके शरीरमें निवास करनेवाले आत्माका भेद बतलानेके लिये यद्यपि व्यवहारमें ऐसा कहना पड़ता है, कि "शारीर आत्मा" परब्रह्मका ही 'अंश' है; तथापि 'अंश' या 'भाग' शब्दका अर्थ "काटकर अलग किया हुआ टुकड़ा" या "अनारके अनेक दानोंमेंसे एक दाना" नहीं है; किंतु तात्त्विक दृष्टिसे उसका अर्थ यह समझना चाहिये, कि जैसे घरके भीतरका आकाश या घड़े का आकाश (मठाकाश या घटाकाश) एकही सर्वव्यापी आकाशका 'अंश'
२५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उसे सुन कर 'वाह !' 'वाह !' कहते हुए सिर हिलानेवाले या किसी नाटकके दर्शकोंके समान "एक बार फिरसे - वन्स मोर" कहनेवाले बहुतेरे होंगे (गीता २. २९; क. २. ७)। परंतु जैसा कि ऊपर कह आये हैं - जो मनुष्य अंतर्बाह्य शुद्ध अर्थात् साम्यशील हो गया हो - वही सच्चा आत्मनिष्ठ है; और उसीको मुक्ति मिलती है; न कि कोरे पंडितको - चाहे वह कितनाही बहुश्रुत और बुद्धिमान् क्यों न हो ? उपनिषदोंमें स्पष्ट कहा है, कि "नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन" (क. २. २२; मुं. ३. २. ३)। और इसी प्रकार तुकाराम महाराजभी कहते हैं - "यदि तू पंडित होगा, तो तू पुराण-कथा कहेगा; परंतु तू यह नहीं जान सकता, कि, "मैं कौन हूँ" (तु. गा. २५९९)। देखिये हमारा ज्ञान कितना संकुचित है। 'मुक्ति मिलती है' - ये शब्द सहजही हमारे मुखसे निकल पड़ते हैं। मानो यह मुक्ति आत्मासे कोई भिन्न वस्तु है ! ब्रह्म और आत्मा एक है - यह ज्ञान होनेके पहले द्रष्टा और दृश्य जगत्में भेद था सही; परंतु हमारे अध्यात्मशास्त्रने निश्चित करके रखा है, कि जब ब्रह्मात्मैक्यका पूरा ज्ञान हो जाता है, तब आत्मा ब्रह्ममें मिल जाता है और ब्रह्मज्ञानी पुरुष आपही ब्रह्मरूप हो जाता है। इस आध्यात्मिक अवस्थाकोही 'ब्रह्मनिर्वाण' मोक्ष कहते हैं। यह ब्रह्मनिर्वाण किसीसे किसीको दिया नहीं जाता। यह किसी दूसरे स्थानसे आता नहीं या इसकी प्राप्तिके लिये किसी अन्य लोकमें जानेकीभी आवश्यकता नहीं। पूर्ण आत्मज्ञान जब और जहां होगा, उसी क्षण और उसी स्थानपर मोक्ष धरा हुआ है। क्योंकि मोक्ष तो आत्माहीकी मूल शुद्धावस्था है। वह कुछ निराली स्वतंत्र वस्तु या स्थल नहीं। शिवगीता (१३. ३२) में यह श्लोक है :- मोक्षस्य न हि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमेव वा। अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः ॥ अर्थात् "मोक्ष कोई ऐसी वस्तु नहीं, कि जो किसी एक स्थानमें रखी हो; अथवा यहभी नहीं, कि उसकी प्राप्तिके लिये किसी दूसरे गांव या प्रदेशको जाना पड़े ! वास्तवमें हृदयकी अज्ञानग्रंथिका नाश हो जानेकोही मोक्ष कहते हैं।" इसी प्रकार अध्यात्मशास्त्रसे निष्पन्न होनेवाला यही अर्थ भगवद्गीताके "अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्" (गीता ५. २६) - जिन्हें पूर्ण आत्मज्ञान हुआ है, उन्हें ब्रह्मनिर्वाणरूपी मोक्ष आप-ही-आप प्राप्त हो जाता है; तथा "यः सदा मुक्त एव स." (गीता ५. २८) इस श्लोकमें वर्णित है; और "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" - जिसने ब्रह्म जाना, वह ब्रह्मही हो जाता है (मुं. ३. २. ९) - इत्यादि उपनिषद्ववाक्योंमेंभी वही अर्थ वर्णित है। मनुष्यके आत्माकी ज्ञानदृष्टिसे जो यह पूर्णावस्था होती है, उसीको 'ब्रह्मभूत' (गीता १८. ५४) या 'ब्राह्मी स्थिति' कहते हैं (गीता २. ७२) और स्थितप्रज्ञ (गीता २. ५५-७२),