श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उसे सुन कर 'वाह !' 'वाह !' कहते हुए सिर हिलानेवाले या किसी नाटकके दर्शकोंके समान "एक बार फिरसे - वन्स मोर" कहनेवाले बहुतेरे होंगे (गीता २. २९; क. २. ७)। परंतु जैसा कि ऊपर कह आये हैं - जो मनुष्य अंतर्बाह्य शुद्ध अर्थात् साम्यशील हो गया हो - वही सच्चा आत्मनिष्ठ है; और उसीको मुक्ति मिलती है; न कि कोरे पंडितको - चाहे वह कितनाही बहुश्रुत और बुद्धिमान् क्यों न हो ? उपनिषदोंमें स्पष्ट कहा है, कि "नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन" (क. २. २२; मुं. ३. २. ३)। और इसी प्रकार तुकाराम महाराजभी कहते हैं - "यदि तू पंडित होगा, तो तू पुराण-कथा कहेगा; परंतु तू यह नहीं जान सकता, कि, "मैं कौन हूँ" (तु. गा. २५९९)। देखिये हमारा ज्ञान कितना संकुचित है। 'मुक्ति मिलती है' - ये शब्द सहजही हमारे मुखसे निकल पड़ते हैं। मानो यह मुक्ति आत्मासे कोई भिन्न वस्तु है ! ब्रह्म और आत्मा एक है - यह ज्ञान होनेके पहले द्रष्टा और दृश्य जगत्में भेद था सही; परंतु हमारे अध्यात्मशास्त्रने निश्चित करके रखा है, कि जब ब्रह्मात्मैक्यका पूरा ज्ञान हो जाता है, तब आत्मा ब्रह्ममें मिल जाता है और ब्रह्मज्ञानी पुरुष आपही ब्रह्मरूप हो जाता है। इस आध्यात्मिक अवस्थाकोही 'ब्रह्मनिर्वाण' मोक्ष कहते हैं। यह ब्रह्मनिर्वाण किसीसे किसीको दिया नहीं जाता। यह किसी दूसरे स्थानसे आता नहीं या इसकी प्राप्तिके लिये किसी अन्य लोकमें जानेकीभी आवश्यकता नहीं। पूर्ण आत्मज्ञान जब और जहां होगा, उसी क्षण और उसी स्थानपर मोक्ष धरा हुआ है। क्योंकि मोक्ष तो आत्माहीकी मूल शुद्धावस्था है। वह कुछ निराली स्वतंत्र वस्तु या स्थल नहीं। शिवगीता (१३. ३२) में यह श्लोक है :- मोक्षस्य न हि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमेव वा। अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः ॥ अर्थात् "मोक्ष कोई ऐसी वस्तु नहीं, कि जो किसी एक स्थानमें रखी हो; अथवा यहभी नहीं, कि उसकी प्राप्तिके लिये किसी दूसरे गांव या प्रदेशको जाना पड़े ! वास्तवमें हृदयकी अज्ञानग्रंथिका नाश हो जानेकोही मोक्ष कहते हैं।" इसी प्रकार अध्यात्मशास्त्रसे निष्पन्न होनेवाला यही अर्थ भगवद्गीताके "अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्" (गीता ५. २६) - जिन्हें पूर्ण आत्मज्ञान हुआ है, उन्हें ब्रह्मनिर्वाणरूपी मोक्ष आप-ही-आप प्राप्त हो जाता है; तथा "यः सदा मुक्त एव स." (गीता ५. २८) इस श्लोकमें वर्णित है; और "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" - जिसने ब्रह्म जाना, वह ब्रह्मही हो जाता है (मुं. ३. २. ९) - इत्यादि उपनिषद्ववाक्योंमेंभी वही अर्थ वर्णित है। मनुष्यके आत्माकी ज्ञानदृष्टिसे जो यह पूर्णावस्था होती है, उसीको 'ब्रह्मभूत' (गीता १८. ५४) या 'ब्राह्मी स्थिति' कहते हैं (गीता २. ७२) और स्थितप्रज्ञ (गीता २. ५५-७२),