भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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अध्यात्म २४७ स्पष्टीकरण हो जाता है, कि गीताके "ॐ तत् सत्" ब्रह्मनिर्देशका (गीता १७. २३) मूल अर्थ क्या रहा होगा। यह 'ॐ' गुढाक्षररूपी वैदिक मंत्र है। उपनिषदोंमें इसका अनेक रीतियोंसे व्याख्यान किया गया है (प्र. ५; मां. ८-१२; छां. १. १)। 'तत्' यानी वह अथवा दृश्य सृष्टिसे परे, दूर स्थिर रहनेवाला, अनिर्वाच्य तत्त्व है; और 'सत्'का अर्थ है आंखोंके सामनेवाली दृश्य सृष्टि। इस संकल्पका अर्थ यह है कि ये तीनों मिलकर सब ब्रह्मही है। और इसी अर्थमें भगवान्ने गीतामें कहा है, कि 'सदसच्चाहमर्जुन' (गीता ९.१९) - सत् यानी परब्रह्म और असत् अर्थात् दृश्य सृष्टि, दोनों मैंही हूँ। तथापि जब कि गीतामें कर्मयोगही प्रतिपाद्य है, तब सत्रहवें अध्यायके अंतमें प्रतिपादन किया है, कि निम्न अर्थके इस ब्रह्मनिर्देशसेभी कर्मयोगका पूर्ण समर्थन होता है। 'ॐ तत्सत्' के 'सत्' शब्दका अर्थ लौकिक दृष्टिसे भला अर्थात् सद्बुद्धिसे किया हुआ अथवा वह कर्म है, कि जिसका अच्छा फल मिलता है; और तत्का अर्थ है इसके परेका या फलाशा छोड़कर किया हुआ कर्म है। संकल्पमें जिसे 'सत्' कहा है, वह दृश्य सृष्टि यानी कर्मही हैं (अगला प्रकरण देखो)। अतः इस ब्रह्मनिर्देशका यह कर्मप्रधान अर्थ मूल अर्थसे सहजही निष्पन्न होता है। ॐ तत्सत्, नेति नेति, सच्चिदानंद और 'सत्यस्य सत्यं'के अतिरिक्त औरभी कुछ ब्रह्मनिर्देश उपनिषदोंमें हैं; परंतु उनको यहां इसलिये नहीं बतलाया, क्योंकि गीताका अर्थ समझनेमें उनका उपयोग नहीं हैं। जगत्, जीव और परमेश्वरके (परमात्मा) परस्पर संबंधका इस प्रकार निर्णय हो जानेपर गीतामें भगवान्ने जो कहा है, कि "जीव मेराही 'अंश' है" (गीता १५. ७) और "मैंही एक 'अंश'से सारे जगतमें व्याप्त हूँ" (गीता १०. ४२) - एवं बादरायणाचार्यनेभी वेदान्तसूत्रोंमें (वे. सू. २. ३. ४३; ४. ४. १९) में यही बात कही है- अथवा पुरुषसूक्तमें जो "पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपाद- स्यामृतं दिवि" यह वर्णन है, उसके 'पाद' या 'अंश' शब्दके अर्थका निर्णयभी सहजही हो जाता है। परमेश्वर या परमात्मा यद्यपि सर्वव्यापी है, तथापि वह निरवयव एकरूप और नामरूपरहित है। अतएव उसे काट नहीं सकते (अच्छेद्य); और उसमें विकारभी नहीं होता (अविकार्य); और इसलिये उसके अलग अलग विभाग या टुकड़े नहीं हो सकते (गीता २. २५)। अतएव चारों ओर ठसाठस भरे हुए इस एकरूप परब्रह्मका और मनुष्यके शरीरमें निवास करनेवाले आत्माका भेद बतलानेके लिये यद्यपि व्यवहारमें ऐसा कहना पड़ता है, कि "शारीर आत्मा" परब्रह्मका ही 'अंश' है; तथापि 'अंश' या 'भाग' शब्दका अर्थ "काटकर अलग किया हुआ टुकड़ा" या "अनारके अनेक दानोंमेंसे एक दाना" नहीं है; किंतु तात्त्विक दृष्टिसे उसका अर्थ यह समझना चाहिये, कि जैसे घरके भीतरका आकाश या घड़े का आकाश (मठाकाश या घटाकाश) एकही सर्वव्यापी आकाशका 'अंश'