श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आगे चलकर तैत्तिरीय उपनिषदमें ही कहा है, कि “यह अमृत, ब्रह्म जगत्की ‘प्रतिष्ठा’ अथवा आधार है। इसे और दूसरे आधारकी अपेक्षा नहीं है। एवं जिसने इसको जान लिया, वह अभय हो गया” इस वर्णनसे स्पष्ट हो जाता है, कि शब्दभेदके कारण भावार्थमें कुछ अंतर नहीं होता है। ऐसेही अंतमें कहा है, कि “असद्वा इदमग्र आसीत्” - यह सारा जगत् पहले असत् (ब्रह्म) था; और ऋग्वेदके (१०. १२९. ४) वर्णनके अनुसार आगे चलकर उसीसे सत् यानी नाम- रूपात्मक व्यक्त जगत् निकला है (तै. २. ७)। इससेभी स्पष्ट हो जाता है, कि यहाँ पर ‘असत्’ शब्दका प्रयोग “अव्यक्त अर्थात् आँखोंसे न दीख पड़नेवाले” के अर्थमेंही हुआ है; और वेदान्तसूत्रोंमें (वे. सू. २. १. १७) में बादरायणाचार्यने उक्त वचनोंका ऐसाही अर्थ किया है। किंतु जिन लोगोंको ‘सत्’ अथवा ‘सत्य’ शब्दका यह अर्थ - आँखोंसे न दीख पड़नेपरभी सदैव स्थिर रहनेवाला अथवा टिकाऊ - (ऊपर बतलाये हुए अर्थोंमेंसे दूसरा अर्थ) संमत है, वे उस अदृश्य परब्रह्मकोही सत् या सत्य कहते हैं, कि जो कभी नहीं बदलता; और नामरूपात्मक मायाको असत् यानी असत्य अर्थात् विनाशी कहते हैं। उदाहरणार्थ, छांदोग्यमें वर्णन किया गया है, कि “सदेव सौम्येदमग्र आसीत् कथमसतः सज्जायेत” - पहले यह सारा जगत् सत् (ब्रह्म) था, जो असत् है यानी हैही नहीं, उससे सत् यानी जो विद्यमान् है - मौजूद है - कैसे उत्पन्न होगा (छां. ६. २. १, २)। फिरभी छांदोग्य उप- निषदमेंही इस परब्रह्मके लिये एक स्थानपर अव्यक्तके अर्थमें ‘असत्’ शब्द प्रयुक्त हुआ है (छां. ३. १९. १)।* एकही परब्रह्मको भिन्न भिन्न समयों और अर्थोंमें एक बार ‘सत्’, तो एक बार ‘असत्’; यों परस्पर-विरुद्ध नाम देनेकी यह गड़बड़ - अर्थात् वाच्य अर्थके एकही होनेपरभी निरा शब्दवाद मचवानेमें सहायक - प्रणाली आगे चलकर रुक गई। और अंतमें इतनीही एक परिभाषा स्थिर हो गई है, कि ब्रह्म सत् या सत्य यानी सदैव स्थिर रहनेवाला है; और दृश्य सृष्टि असत् अर्थात् नाशवान् है। भगवद्गीतामें यही अंतिम परिभाषा मानी गई है; और इसीके अनुसार दूसरे अध्यायमें (गीता २. १६-१८) कह दिया है, कि परब्रह्म सत् और अविनाशी है। एवं नामरूप असत् अर्थात् नाशवान् हैं; और वेदान्तसूत्रोंकाभी ऐसाही मत है। फिरभी दृश्य सृष्टिको ‘सत्’ कहकर परब्रह्मको ‘असत्’ या ‘त्यत्’ (वह = परेका) कहनेकी तैत्तिरीयोपनिषदवाली उस पुरानी परिभाषाका नामो- निशाँ अबभी बिलकुल जाता नहीं रहा है। पुरानी परिभाषासे इतना भली भाँति
- अध्यात्मशास्त्रवाले अंग्रेज ग्रंथकारोंमेंभी इस विषयमें मतभेद है, कि (real) अर्थात् सत् शब्द जगत्के दृश्य (माया)के लिये उपयुक्त हो; अथवा वस्तुतत्त्व (ब्रह्म)के लिये। कांट दृश्यको सत् (real) समझकर वस्तुतत्त्वको अविनाशी मानता है; पर हेकेल और ग्रीनप्रभृति दृश्यको असत् (unreal) समझकर वस्तुतत्त्वको सत् (real) कहते हैं।