भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 292

अध्यात्म २४५ महत्त्वपूर्ण भेद है। अद्वैत वेदान्तके यही सिद्धान्त गीतामें हैं; और एक पुराने कविने समग्र अद्वैत वेदान्तके सारका वर्णन यों किया है :- श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः । ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ॥ “ करोड़ों ग्रंथोंका सार आधे श्लोकमें बतलाता हूँ :- (१) ब्रह्म सत्य है, (२) जगत् अर्थात् जगतके सभी नामरूप मिथ्या अथवा नाशवान् हैं; और (३) मनुष्यका आत्मा एवं ब्रह्म मूलमें एकही हैं - दो नहीं।" इस श्लोकका 'मिथ्या' शब्द यदि किसीके कानोंमें चुभता हो, तो वह बृहदारण्यक उपनिषदके अनुसार इसके तीसरे चरण - “ब्रह्मामृतं जगत्सत्यं "का - पाठांतर खुशीसे करलें; परंतु पहलेही बतला चुके हैं, कि इससे भावार्थ नहीं बदलता है। फिरभी कुछ वेदान्ती इस बातको लेकर निरर्थक झगड़ते रहते हैं, कि समूचे दृश्य जगत्के अदृश्य किंतु नित्य परब्रह्मरूपी मूल तत्त्वको सत् (सत्य) कहें या असत् (असत्य-अनृत) । अतएव इसका यहाँ थोड़ा-सा स्पष्टीकरण किये देते हैंः कि इस विवादका सच्चा बीज (जड़) क्या है। सत् या सत्य इस एकही शब्दके दो भिन्न भिन्न अर्थ होते हैं, इसी कारण यह झगड़ा मचा हुआ है। और यदि ध्यानसे देखा जावे, कि प्रत्येक पुरुष इस 'सत्' शब्दका किस अर्थमें उपयोग करता है, तो कुछभी गड़बड़ नहीं रह जाती । क्योंकि यह भेद तो सभीको एक-सा मंजूर है, कि ब्रह्म अदृश्य होने परभी नित्य है; और नामरूपात्मक जगत् दृश्य होनेपरभी पल-पलमें बदलनेवाला है। इस सत् या सत्य शब्दका व्यावहारिक अर्थ है :- (१) आँखोंके आगे अभी प्रत्यक्ष दीख पड़नेवाला - अर्थात् व्यक्त (फिर कल उसका दृश्य स्वरूप चाहे बदले, चाहे न बदले); और दूसरा अर्थ है :- (२) वह अव्यक्त स्वरूप, जो आँखोंसे भलेही न दीख पड़े पर जो सदैव एक-सा रहता है। और जो कभी बदलता नहीं है। इनमेंसे पहला अर्थ जिनको संमत है, वे आँखोंसे दिखाई देनेवाले नामरूपात्मक जगतको सत्य कहते हैं; और परब्रह्मको इसके विरुद्ध अर्थमें अर्थात् आँखोंसे न दीख पड़ने- वाला अतएव असत् अथवा असत्य कहते हैं। उदाहरणार्थ, तैत्तिरीय उपनिषदमें दृश्य सृष्टिके लिये 'सत्' और जो दृश्य सृष्टिसे परे है, उसके लिये 'त्यत्' (अर्थात् जो कि परे है) अथवा 'अनृत' (आँखोंको न दीख पड़नेवाला) शब्दोंका उपयोग करके ब्रह्मका वर्णन इस प्रकार किया है, कि जो कुछ मूलमें या आरंभमें था, वही द्रव्य “सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च । विज्ञानं चाविज्ञानं च । सत्यं चानृतं च ।" (तै. २. ६) - सत् (आँखोंसे दीख पड़नेवाला) और त्यत् (जो परे है), वाच्य और अनिर्वाच्य साधार और निराधार; ज्ञात और अविज्ञात (अज्ञेय), सत्य और अनृत - इस प्रकार द्विधा बना हुआ है। परंतु इस प्रकार ब्रह्मको 'अनृत' कहनेसे अनृतका अर्थ झूठ या असत्य नहीं होता है, क्योंकि