श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र है, कि मूल प्रकृतिके समान ये नियमभी मायिकही हैं; और परमेश्वर इन सब मायिक नियमोंका अधिपति है। वह इनसे परे है; और उसकी सत्तासेही इन निय- मोंको नियमत्व अर्थात् नित्यता प्राप्त हो गई है। दृश्यरूपी सगुण अतएव विनाशी प्रकृतिमें ऐसे नियम बना देनेकी सामर्थ्य नहीं रह सकती, कि जो त्रिकालमेंभी अबाधित रहें। यहां तक जो विवेचन किया गया है, उससे ज्ञात होगा, कि जगत्, जीव और परमेश्वर – अथवा अध्यात्मशास्त्रकी परिभाषाके अनुसार माया (अर्थात् मायासे उत्पन्न किया हुआ जगत्), आत्मा और परब्रह्मका स्वरूप क्या है? एवं इनका पर- स्पर-संबंध क्या है? अध्यात्मदृष्टिसे जगतकी सभी वस्तुओंके दो वर्ग होते हैं, ‘नामरूप’ और नामरूपोंसे आच्छादित 'नित्य तत्त्व'। इनमेंसे नामरूपोंकोही सगुण माया अथवा प्रकृति कहते हैं। परंतु नामरूपोंको निकाल डालनेपर जो ‘नित्य द्रव्य’ बच रहता है, वह निर्गुणही रहना चाहिये। क्योंकि कोईभी गुण बिना नामरूपोंके रह नहीं सकता। यह नित्य और अव्यक्त तत्त्वही परब्रह्म है; और मनुष्यकी दुर्बल इंद्रियोंको इस निर्गुण परब्रह्ममेंही सगुण माया उपजी हुई दीख पड़ती है। यह माया सत्य पदार्थ नहीं है। परब्रह्मही सत्य अर्थात् त्रिकालमेंभी अबाधित और कभीभी न पलटनेवाली वस्तु है। दृश्य सृष्टिके नामरूप और उनसे आच्छादित परब्रह्मके स्वरूपसंबंधी ये सिद्धान्त हुए; अब इसी न्यायसे मनुष्यका विचार करें, तो सिद्ध होता है, कि मनुष्यकी देह और इंद्रियां दृश्य सृष्टिके अन्यान्य पदार्थोंके समान नामरूपात्मक अर्थात् अनित्य मायाके वर्गकी हैं; और इन देहेंद्रियोंसे ढँका हुआ आत्मा नित्यस्वरूपी परब्रह्मकी श्रेणीका है; अथवा ब्रह्म और आत्मा एकही हैं। इस अर्थसे बाह्य सृष्टिको स्वतंत्र, सत्य पदार्थ न माननेवाले अद्वैत-सिद्धान्तका और बौद्ध-सिद्धान्तका भेद अब पाठकोंके ध्यानमें आही गया होगा। विज्ञानवादी बौद्ध मानते हैं, कि बाह्यसृष्टिही नहीं है। वे ज्ञानमात्रकोही सत्य मानते हैं। और वेदान्तशास्त्री बाह्य सृष्टिके नित्य बदलते रहनेवाले नामरूपकोही असत्य मानकर यह सिद्धान्त करते हैं, कि इस नाम- रूपके मूलमें और मनुष्यकी देहमें–दोनोंमें–एकही आत्मरूपी, नित्य द्रव्य भरा हुआ है। एवं यह एकरूप आत्मतत्त्वही अंतिम सत्य है। सांख्यमतवालोंने ‘अविभक्तं विभक्तेषु’के न्यायसे सृष्ट पदार्थोंकी अनेकताके एकीकरणको जड़ प्रकृति भरके लियेही स्वीकार कर लिया है। परंतु वेदान्तियोंने सत्कार्यवादकी बाधाको दूर करके निश्चय किया है, कि जो “पिंडमें है वही ब्रह्मांडमें है।” इस कारण अब सांख्योंके असंख्य पुरुषोंका और प्रकृतिका एकही परमात्मामें अद्वैतसे या अविभागसे समावेश हो गया है। शुद्ध आधिभौतिक पंडित हेकेल अद्वैती है सही; पर वह अकेली जड़ प्रकृतिमेंही चैतन्यकाभी संग्रह करता है। और वेदान्त, जड़को प्रधानता न देकर यह सिद्धान्त स्थिर करता है, कि दिक्कालोंसे अमर्यादित, अमृत, और स्वतंत्र चिद्रूपी परब्रह्मही सारी सृष्टिका मूल है। हेकेलके जड़ अद्वैतमें और अध्यात्मशास्त्रके अद्वैतमें यह अत्यंत