श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 290, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्यात्म २४३ यस्तात्त्विकोऽन्यथाभावः परिणाम उदीरितः । अतात्त्विकोऽन्यथाभावो विवर्तःस उदीरितः ॥ "किसी मूल वस्तुसे जब तात्त्विक अर्थात् सचमुचही दूसरे प्रकारकी वस्तु बनती है, तब उसको ( गुण ) परिणाम कहते हैं। और जब ऐसा न होकर मूलवस्तुही कुछ- की-कुछ ( अतात्त्विक ) भासने लगती है, तब उसे विवर्त कहते हैं" ( वे. सा. २१ ) । आरंभवाद नैयायिकोंका है, गुणपरिणामवाद सांख्योंका है और विवर्तवाद अद्वैती वेदान्तियोंका है। अद्वैती वेदान्ती परमाणु या प्रकृति इन दोनों सगुण वस्तुओंको निर्गुण ब्रह्मसे भिन्न और स्वतंत्र नहीं मानते, परंतु फिर यह आक्षेप होता है, कि सत्कार्य- वादके अनुसार निर्गुणसे सगुणकी उत्पत्ति होना असंभव है। इस आक्षेपको दूर करनेके लियेही ही विवर्तवाद निकला है। परंतु इसीसे कुछ लोग जो यह समझ बैठे हैं, कि वेदान्ती लोग गुणपरिणामवादका कभी स्वीकार नहीं करते हैं; अथवा आगे कभी न करेंगे, वह उनकी भूल है। अद्वैत मतपर सांख्यमतवालोंका अथवा अन्यान्य द्वैतमत- वालोंकाभी जो यह मुख्य आक्षेप रहता है, कि निर्गुण ब्रह्मसे सगुण प्रकृतिका अर्थात् मायाका उद्गम होही नहीं सकता; सो वह आक्षेप कुछ अपरिहार्य नहीं है। विवर्त- वादका मुख्य उद्देश्य इतनाही दिखला देना है, कि एकही निर्गुण ब्रह्ममें मायाके अनेक दृश्योंका हमारी इंद्रियोंको दीख पड़ना संभव है। वह उद्देश्य सफल हो जानेपर - अर्थात् जहाँ विवर्तवादसे यह सिद्ध हुआ, कि एक निर्गुण परब्रह्ममेंही त्रिगुणात्मक सगुण प्रकृतिके दृश्यका दीख पड़ना शक्य है; वहाँ - वेदान्तशास्त्रको यह स्वीकार करनेमें कोईभी हानि नहीं, कि इस प्रकृतिका अगला विस्तार गुणपरिणामसे हुआ है। अद्वैत वेदान्तका मुख्य कथन यही है, कि स्वयं मूल प्रकृति एक दृश्य है -सत्य नहीं है। जहाँ प्रकृतिका दृश्य एक बार दिखाई देने लगा, वहाँ फिर इन दृश्योंसे आगे चल- कर निकलनेवाले दूसरे दृश्योंको स्वतंत्र न मानकर, अद्वैत वेदान्तको यह मान लेनेमें कुछभी आपत्ति नहीं है कि एक दृश्यके गुणोंसे दूसरे दृश्यके गुण और दूसरेसे तीसरे आदिके इस प्रकार नानागुणात्मक दृश्य उत्पन्न होते हैं। अतएव यद्यपि गीतामें भगवाननें बतलाया है, कि "यह प्रकृति मेरीही माया है" ( गीता ७. १४; ४. ६ ), फिरभी गीतामेंही यह कह दिया है, कि ईश्वरके द्वारा अधिष्ठित ( गीता ९. १० ) इस प्रकृतिका अगला विस्तार "गुणा गुणेषु वर्तन्ते" ( गीता ३. २८; १४. २३ ) इस न्यायसेही होता रहता है। इससे ज्ञात होता है, कि विवर्तवादके अनुसार मूल निर्गुण परब्रह्ममें एक बार मायाका दृश्य उत्पन्न हो चुकनेपर इस मायिक दृश्यकी अर्थात् प्रकृतिके अगले विस्तारकी - उपपत्तिके लिये गुणोत्कर्षका तत्त्व गीताकोभी मान्य हो चुका है। जब समूचे दृश्य जगतकोही एक बार मायात्मक दृश्य कह दिया, तब यह कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, कि इन दृश्योंके अन्याय रूपोंके लिये गुणो- त्कर्षके जैसे कुछ नियम होनेही नहीं चाहिये । वेदान्तियोंको यह अस्वीकार नहीं है, कि मायात्मक दृश्यका विस्तारभी नियमबद्धही रहता है। उनका तो इतनाही कहना