श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इसलिये उन्होंने निश्चय किया है, कि जहां इन असंख्य परमाणुओंका संयोग होने लगा, वहाँ सृष्टिके अनेक पदार्थ बनने लगते हैं। परमाणुओंके संयोगका आरंभ होनेपर, इस मतसे सृष्टिका निर्माण होता है। इसलिये इसको 'आरंभवाद' कहते हैं। परंतु नैयायिकोंके असंख्य परमाणुओंके मतको सांख्यमार्गवाले नहीं मानते। वे कहते हैं, कि जड सृष्टिका मूल कारण "एकरूप, सत्य और त्रिगुणात्मक प्रकृतिही" है। एवं इस त्रिगुणात्मक प्रकृतिके गुणोंके विकाससे अथवा परिणामसे व्यक्त सृष्टि बनती है। इस मतको 'गुणपरिणामवाद' कहते हैं। क्योंकि इसमें यह प्रतिपादन किया जाता है, कि एक मूल सगुण प्रकृतिके गुणविकाससेही सारी व्यक्त सृष्टि पैदा हुई है। किंतु इन दोनों वादोंको अद्वैती वेदान्ती स्वीकार नहीं करते। परमाणु असंख्य हैं; इसलिये अद्वैत मतके अनुसार वे जगतका मूल हो नहीं सकते; और रह गई प्रकृति। सो यद्यपि वह एक हो, तोभी उसके पुरुषसे भिन्न और स्वतंत्र होनेके कारण अद्वैत सिद्धान्तके यह द्वैतभी विरुद्ध है। परंतु इस प्रकार इन दोनों वादोंको त्याग देनेसे इस बातकी कोई न कोई उपपत्ति देनी होगी, कि एक निर्गुण ब्रह्मसे सगुण सृष्टि कैसे उपजी है। क्योंकि, सत्कार्यवादके अनुसार निर्गुणसे सगुण उत्पन्न हो नहीं सकता। इसपर वेदान्ती कहते हैं, कि सत्कार्यवादके इस सिद्धान्तका उपयोग वहीं होता है, जहां कार्य और कारण दोनों वस्तुएँ सत्य हों, परंतु जहाँ मूल वस्तु एकही है, और जहाँ उसके भिन्न भिन्न दृश्यभी पलटते हैं, वहाँ इस न्यायका उपयोग नहीं होता। क्योंकि हम सदैव देखते हैं, कि एकही वस्तुके भिन्न भिन्न दृश्योंका दीख पड़ना उस वस्तुका धर्म नहीं है; किंतु द्रष्टा – देखनेवाले पुरुषके – दृष्टिभेदके कारण ये भिन्न भिन्न दृश्य उत्पन्न हो सकते हैं।* इसी न्यायका उपयोग निर्गुण ब्रह्म और सगुण जगतके लिये करनेपर कहेंगे, कि ब्रह्म तो निर्गुण है; पर मनुष्यके इंद्रियधर्मके कारण उसीमें सगुणत्वकी झलक उत्पन्न हो जाती है। यह विवर्तवाद है। विवर्तवादमें यह मानते हैं, कि एकही मूल सत्य द्रव्यपर अनेक असत्य अर्थात् सदा बदलते रहनेवाले दृश्योंका अध्यारोप होता है; और गुणपरिणामवादमें पहलेसेही दो सत्य द्रव्य मान लिये जाते हैं, जिनमेंसे एकके गुणोंका विकास होकर जगतकी नाना गुणयुक्त अन्यान्य वस्तुएँ उपजती रहती हैं। रस्सीमें सर्पका भास होना विवर्त है; और नारियलकी रेशोंसे रस्सी बन जाना अथवा दूधसे दही बन जाना गुणपरिणाम है। इसी कारण 'वेदान्त- सार' नामक ग्रंथकी एक आवृत्तिमें इन दोनों वादोंके लक्षण इस प्रकार बतलाये गये हैं :-
- अंग्रेजीमें इस! अर्थको व्यक्त करना हो, तो यों कहेंगे :- “ appearances are the results of subjective conditions, viz. the senses of the obser- ver and not of the thing itself. ”