श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यात्म २४१ इस वर्णनका तत्त्व आ जावेगा, कि केवल इंद्रियोंसे देखनेवाले अप्रबुद्ध लोगोंको परमे- श्वर व्यक्त और सगुण दीख पड़े तोभी उसका सच्चा और श्रेष्ठ स्वरूप निर्गुण है और उसको ज्ञानदृष्टिसे जाननेमेंही ज्ञानकी परमावधि है ( गीता ७. १४, २४, २५ ) । इस प्रकार निर्णय तो कर दिया, कि परमेश्वर मूलमें निर्गुण है, और मनुष्यकी इंद्रियोंको उसीमें सगुण सृष्टिका विविध दृश्य दीख पड़ता है; फिरभी इस बातका थोड़ा-सा स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है, कि उक्त सिद्धान्तमें निर्गुण शब्दका अर्थ क्या समझा जावे। यह सच है, कि हवाकी लहरोंपर शब्दरूप आदि गुणोंका अथवा सीपपर चाँदीका जब हमारी इंद्रियां अध्यारोप करती हैं, तब हवाकी लहरोंमें शब्द- रूप आदिके अथवा सीपमें चाँदीके गुण नहीं होते। परंतु यद्यपि उनमें अध्यारोपित गुण न हों; तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि उनसे भिन्न गुण, मूल पदार्थोंमें होंगेही नहीं। क्योंकि हम प्रत्यक्ष देखते हैं, कि यद्यपि सीपमें चाँदीके गुण नहीं हैं, तोभी चाँदीके गुणोंके अतिरिक्त और दूसरे गुण उसमें रहते होंगेही। इसीसे अब यहाँ एक और शंका होती है - कि इंद्रियोंने अपने अज्ञानसे मूलब्रह्मपर जिन गुणोंका अध्या- रोप किया था, वे गुण ब्रह्ममें नहीं हैं - इस प्रकार न होंगे तो क्या और दूसरे गुण परब्रह्ममें न होंगे ? यदि मान लो, कि यदि कहें; तो फिर वह निर्गुण कहाँ रहा ? किंतु कुछ और अधिक सूक्ष्म विचार करनेसे ज्ञात होगा, कि यदि मूल ब्रह्ममें इंद्रियोंके द्वारा अध्यारोपित गुणोंके अतिरिक्त और दूसरे गुण होंभी; तो हम उन्हें मालूम कैसे कर सकेंगे ? क्योंकि गुणोंको मनुष्य अपनी इंद्रियोंसेही तो जानता है; और जो गुण इंद्रियोंको अगोचर हैं, वे जानेही नहीं जाते। सारांश, इंद्रियोंके द्वारा अध्यारोपित गुणोंके अतिरिक्त परब्रह्ममें यदि और कुछ दूसरे गुण हों, तो उनको जान लेना हमारी सामर्थ्यके बाहर है; और जिन गुणोंको जान लेना हमारे काबूमें नहीं, उनको परब्रह्ममें माननाभी न्यायशास्त्रकी दृष्टिसे योग्य नहीं है। अतएव गुण शब्दका “ मनुष्यको ज्ञात होनेवाले गुण ” अर्थ करके वेदान्ती लोग सिद्धान्त किया करते हैं, कि ब्रह्म 'निर्गुण' है। न तो अद्वैत वेदान्तही यह कहता है; और न कोई दूसराभी कह सकेगा, कि मूल परब्रह्म-रूपमें ऐसा गुण या ऐसी शक्ति भरीही नहीं होगी, कि जो मनुष्यके लिये अतर्क्य है, बल्कि यह तो पहलेही बतला दिया है, कि वेदान्ती लोगभी इंद्रियोंके उक्त अज्ञान अथवा मायाको उसी मूल परब्रह्मकी एक अतर्क्य शक्ति कहा करते हैं। त्रिगुणात्मक माया अथवा प्रकृति कोई दूसरी स्वतन्त्र वस्तु नहीं है, किंतु एक- रूप निर्गुण ब्रह्मपरही मनुष्यकी इंद्रियां अज्ञानसे सगुण दृश्योंका अध्यारोप किया करती हैं। इसी मतको 'विवर्तवाद' कहते हैं। अद्वैत वेदान्तके अनुसार यह उपपत्ति इस बातकी हुई, कि जब निर्गुण ब्रह्म एकमात्रही मूलतत्त्व है, तब नाना प्रकारका सगुण जगत् पहले दिखाई कैसे देने लगा ? कणादप्रणीत न्यायशास्त्रमें असंख्य परमाणु जगतके मूलकारण माने गये हैं; और नैयायिक इन परमाणुओंको सत्य मानते हैं। गी. र. १६