भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 287

२४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र रस्सीमें सर्पका अथवा सीपमें चाँदीका भ्रम होना, या आँखमें उँगली डालनेसे एकके दो पदार्थ दीख पड़ना अथवा अनेक रंगोंके चश्मे लगानेपर एकही पदार्थका रंग-बिरंगा दीख पड़ना आदि अनेक दृष्टान्त वेदान्तशास्त्रमें दिये जाते हैं। मनुष्यकी इंद्रियाँ उससे कभी छूट नहीं जाती हैं। इस कारण जगत्‌के नामरूप अथवा गुण उसके नयनपथमें गोचर तो अवश्यही होंगे; परंतु यह नहीं कहा जा सकता, कि इंद्रियवान् मनुष्यकी दृष्टिसे जगत्‌का जो सापेक्ष स्वरूप दीख पड़ता है, वही इस जगत्‌के मूलका अर्थात् निरपेक्ष और नित्य स्वरूप है। मनुष्यकी वर्तमान इंद्रियोंकी अपेक्षा यदि उसे न्यूनाधिक इंद्रियाँ प्राप्त हो जावें, तो यह सृष्टि उसे जैसे आजकल दीख पड़ती है, वैसेही न दीखती रहेगी। और यदि यह ठीक है, तो जब कोई पूछे, कि द्रष्टाकी – देखनेवाले मनुष्यकी – इंद्रियोंकी अपेक्षा न करके यह बतलाओ, कि सृष्टिके मूलमें जो तत्त्व है, उसका नित्य और सत्य स्वरूप क्या है ? तब यही उत्तर देना पड़ता है, कि वह मूलतत्त्व है तो निर्गुण; परंतु मनुष्यको सगुण दिखलाई देता है – यह मनुष्यकी इंद्रियोंका धर्म है; न कि मूलवस्तुका गुण। आधिभौतिकशास्त्रमें उन्हीं बातोंकी जाँच होती है, कि जो इंद्रियोंको गोचर हुआ करती हैं। और यही कारण है, कि वहाँ इस ढंगके प्रश्न होतेही नहीं। परंतु मनुष्य और उसकी इंद्रियोंके नष्टप्राय हो जानेसे यह नहीं कह सकते, कि ईश्वरभी नष्ट हो जाता है; अथवा मनुष्यको वह अमुक प्रकारका दीख पड़ता है। इसलिये उसका त्रिकालाबाधित नित्य और निरपेक्ष स्वरूपभी वही होना चाहिये। अतएव जिस अध्यात्मशास्त्रमें यह विचार करना होता है, कि जगत्‌के मूलमें वर्तमान सत्यका मूलस्वरूप क्या है; उसमें मानवी इंद्रियोंकी सापेक्षदृष्टि छोड़ देनी पड़ती है; और केवल ज्ञानदृष्टिसे अर्थात् जितना हो सके उतना बुद्धिसेही अंतिम विचार करना पड़ता है। ऐसा करनेसे इंद्रियोंको गोचर होनेवाले सभी गुण आपही आप छूट जाते हैं। और यह सिद्ध हो जाता है, कि, ब्रह्मका नित्य स्वरूप इंद्रियातीत अर्थात् निर्गुण एवं सबसे श्रेष्ठ है। परंतु अब प्रश्न होता है, कि जो निर्गुण है, उसका वर्णन करेगाही कौन ? और किस प्रकार करेगा ? इसीलिये अद्वैत वेदान्तमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि परब्रह्मका अंतिम अर्थात् निरपेक्ष और नित्य स्वरूप निर्गुण तो हैही, पर अनि- र्वाच्यभी है; और इसी निर्गुण स्वरूपमें मनुष्यको अपनी इंद्रियोंके योगसे सगुण दृश्यकी झलक दीख पड़ती है। अब यहाँ प्रश्न होता है, कि निर्गुणको सगुण करनेकी यह शक्ति इंद्रियोंने पा कहाँसे ली ? इसपर अद्वैतवेदान्तशास्त्रका यह उत्तर है कि मानवी ज्ञानकी गति यहींतक है। इसके आगे उसकी गुज़र नहीं। इसलिये यह इंद्रियोंका अज्ञान है; और निर्गुण परब्रह्ममें सगुण जगत्‌का दृश्य दीखना यह उसी अज्ञानका परिणाम है। अथवा यहाँ इतनाही निश्चित अनुमान करके निश्चित हो जाना पड़ता है, कि इंद्रियाँभी परमेश्वरकी सृष्टिकीही हैं। इस कारण यह सगुण सृष्टि (प्रकृति) निर्गुण परमे- श्वरकीही एक 'दैवी माया' है (गीता ७. १४)। पाठकोंकी समझमें अब गीताके