भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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उपयोग अद्वैत सिद्धान्तके लिये कियाही नहीं जा सकता। बापसे लड़का पैदा हो, तो कहेंगे, कि वह बापके गुणपरिणामसे हुआ है। परंतु पिता एकही व्यक्ति है; और जब कभी वह बच्चेका, कभी जवानका और कभी बुड्ढेका स्वांग बनाये हुए दीख पड़ता है, तब हम सदैव देखा करते हैं, कि इस व्यक्तिमें और इसके अनेक स्वांगोंमें गुणपरिणामरूपी कार्यकारणभाव नहीं रहता। ऐसेही जब निश्चित हो जाता है, कि सूर्य एकही है; तब पानीमें आँखोंको दिखाई देनेवाले उसके प्रतिबिंबको हम भ्रम कह देते हैं, और उसे गुणपरिणामसे उपजा हुआ दूसरा सूर्य नहीं मानते। इसी प्रकार दूरबीनसे किसी ग्रहके यथार्थ स्वरूपका निश्चय हो जानेपर, ज्योतिःशास्त्र स्पष्ट कह देता है, कि उस ग्रहका जो स्वरूप निरी आँखोंसे दीख पड़ता है, वह दृष्टिकी कमजोरी है और उसके अत्यंत दूरीपर रहनेके कारण निरा दृश्य उत्पन्न हो गया है। इससे प्रकट हो गया, कि कोईभी बात नेत्र आदि इंद्रियोंको प्रत्यक्ष गोचर हो जानेसेही स्वतंत्र और सत्य वस्तु मानी नहीं जा सकती। फिर इसी न्यायका अध्यात्मशास्त्रमें उपयोग करके यदि यह कहें तो क्या हानि है, कि ज्ञानचक्षुरूप दूरबीनसे जिसका निश्चय कर लिया गया है, वह निर्गुण परब्रह्मही सत्य है। और ज्ञानहीन चर्मचक्षुओंको जो नामरूप गोचर होता है, वह इस परब्रह्मका कार्य नहीं है - वह तो इंद्रियोंकी दुर्बलतासे उपजा हुआ निरा भ्रम अर्थात् मोहात्मक दृश्य है। यहाँपर यह आक्षेपही नहीं फबता, कि निर्गुणसे सगुण उत्पन्न नहीं हो सकता। क्योंकि दोनों वस्तुएँ एकही श्रेणीकी नहीं हैं। इनमें एक तो सत्य है; और दूसरी है सिर्फ दृश्य। एवं अनुभव यह है, कि मूलमें एकही सत्य वस्तु रहने- परभी देखनेवाले पुरुषके दृष्टिभेदसे, अज्ञानसे अथवा नज़रबंदीसे उस एकही वस्तुके दृश्य बदलते रहते हैं। उदाहरणार्थ, कानोंको सुनाई देनेवाले शब्द और आँखोंसे दिखाई देनेवाले रंग - इन्हीं दो गुणोंको लीजिये। इनमेंसे कानोंको जो शब्द या आवाज़ सुनाई देती है, उसकी सूक्ष्मतासे जांच करके आधिभौतिकशास्त्रियोंने पूर्णतया सिद्ध कर दिया है, कि 'शब्द' या तो वायुकी लहरें हैं या गति है। और अब सूक्ष्म शोध करनेसे निश्चय हो गया है, कि आँखोंमे दीख पड़नेवाले लाल, हरे, पीले, आदि रंगभी मूलमें एकही सूर्यप्रकाशके विकार हैं; और सूर्यप्रकाश स्वयं एक प्रकारकी गतिही है। जब कि 'गति' मूलमें एकही है, पर कान उसे शब्द और आँखें उसे रंग बतलाती हैं, तब यदि इसी न्यायका उपयोग कुछ अधिक व्यापक रीतिसे सारी इंद्रियोंके लिये किया जावे, तो सभी नामरूपोंकी उत्पत्तिके संबंधमें सत्कार्यवादकी सहायताके बिना ठीकही ठीक उपपत्ति इस प्रकार लगाई जा सकती है, कि किसीभी एक अविकार्य वस्तुपर मनुष्यकी भिन्न भिन्न इंद्रियाँ अपनी अपनी ओरसे शब्दरूप आदि अनेक नामरूपात्मक गुणोंका 'अध्यारोप' करके नाना प्रकारके दृश्य उपजाया करती हैं। परंतु यह आवश्यक नहीं है, कि मूलकी एकही वस्तुमें ये दृश्य, ये गुण अथवा ये नामरूप हों ही। और इसी अर्थको सिद्ध करनेके लिये