भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 285

है, अर्थात् अद्वैती है। अन्य सांप्रदायिक भाष्योंकी अपेक्षा गीताके शांकरभाष्यका जो अधिक महत्त्व हो गया है, उसका कारणभी यही है। ज्ञानदृष्टिसे सारे नामरूपोंको एक ओर निकाल देने पर एकही अधिकारी और निर्गुण तत्त्व स्थिर रह जाता है। अतएव पूर्ण और सूक्ष्म विचार करनेपर अद्वैत सिद्धान्तकाही स्वीकार करना पड़ता है। जब इतना सिद्ध हो चुका तब अद्वैत वेदान्तकी दृष्टिसे यह विवेचन करना आवश्यक है, कि इस एक निर्गुण, अव्यक्त द्रव्यसे नाना प्रकारकी व्यक्त सगुण सृष्टि क्योंकर उपजी ? पहले बतला आये हैं, कि सांख्योंने तो निर्गुण पुरुषके साथही त्रिगुणात्मक अर्थात् सगुण प्रकृतिको अनादि और स्वतंत्र मान कर, इस प्रश्नको हल कर लिया है। किंतु यदि इस प्रकार सगुण प्रकृतिको स्वतंत्र मान लें, तो जगत्के मूलतत्त्व दो हुए जाते हैं। और ऐसा करनेसे उस अद्वैत मतमें बाधा आती है, कि जिसका उक्त अनेक कारणोंके द्वारा पूर्णतया निश्चय कर लिया गया है। यदि सगुण प्रकृतिको स्वतंत्र नहीं मानते हैं, तो यह बतलाते नहीं बनता, कि एकही मूल निर्गुण द्रव्यसे नानाविध सगुण सृष्टि कैसे उत्पन्न हो गई। क्योंकि सत्कार्यवादका सिद्धान्त यह है, कि निर्गुणसे सगुण - अर्थात् जो कुछभी नहीं है, उससे और कुछ - का उपजना शक्य नहीं है; और यह सिद्धान्त अद्वैतवादियोंकोभी मान्य हो चुका है। इसलिये दोनोंही ओर अड़चन है। फिर यह उलझन सुलझे कैसे ? बिना अद्वैतको छोड़ेही निर्गुणसे सगुणकी उत्पत्ति होनेका मार्ग बतलाना चाहिये; और सत्कार्यवादकी दृष्टिमे वह तो रुका हुआ-साही है। कठिन पेंच है - ऐमीवैसी उलझन नहीं है। और तो क्या ? कुछ लोगोंकी समझमें अद्वैत सिद्धान्तके माननेमें यही ऐसी अड़चन है, जोकि सबसे बड़ी पेचीदा और कठिन है। इसी अड़चनमे छटककर वे द्वैतको अंगीकार करने लिया करते हैं। किंतु अद्वैती पंडितोंने अपनी बुद्धिके द्वारा इस विकट अड़चनके फंदेसे छूटनेके लियेभी एक युक्ति- संगत बेजोड़ मार्ग ढूंढ़ लिया है। वे कहते हैं, कि सत्कार्यवाद अथवा गुणपरिणाम- वादके सिद्धान्तका उपयोग तब होता है, जब कार्य और कारण, दोनों एकही श्रेणीके अथवा एकही वर्गके होते हैं; और इस कारण अद्वैती वेदान्तीभी इसे स्वीकार कर लेंगे, कि सत्य और निर्गुण ब्रह्ममे मत्य और सगुण मायाका उत्पन्न होना शक्य नहीं है। परंतु यह स्वीकृति उस समयकी है, जब कि दोनों पदार्थ सत्य हों; पर जहाँ एक पदार्थ मत्य है, और दूसरा उसका सिर्फ दृश्य है, वहाँ सत्कार्य- वादका उपयोग नहीं होता। सांख्यमतवाले 'पुरुषके समानही प्रकृति 'को स्वतंत्र : और सत्य पदार्थ मानते हैं। यही कारण है, जो वे निर्गुण पुरुषसे सगुण प्रकृतिकी उत्पत्तिका विवेचन सत्कार्यवादके अनुसार कर नहीं सकते। किंतु अद्वैत वेदान्तका सिद्धान्त यह है, कि माया अनादि बनी रहे; फिरभी वह सत्य और स्वतंत्र नहीं है। वह तो गीताके कथनानुसार 'मोह', 'अज्ञान', अथवा "इंद्रियोंको दिखाई देनेवाला दृश्य" है। इसलिये सत्कार्यवादसे जो आक्षेप निष्पन्न हुआ था, उसका