श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यात्म २३७ होनेकाही सिद्धान्त दर्शाया है। अब और क्या बतलावे ? समस्त उपनिषदोंका बहुतसा भाग निकाल डाले बिना अथवा जान-बूझकर उसपर दुर्लक्ष किये बिना, उपनिषच्छास्त्रमें अद्वैतको छोड़ और कोई दूसरा रहस्य बतला देना संभवही नहीं है। परंतु ये वाद तो ऐसे हैं, कि जिनका कोई ओर-छोरही नहीं; तो फिर यहाँ हम इनकी विशेष चर्चा क्यों करें ? जिन्हें अद्वैतके अतिरिक्त अन्य मत रुचते हों, वे खुशीसे उन्हें स्वीकार कर लें। उन्हें रोकता कौन है। जिन उदार महात्माओंने उपनिषदोंमें अपना यह स्पष्ट विश्वास बतलाया है, कि “नेह नानास्ति किंचन” (बृ. ४. ४. १९; कठ. ४. ११) - इस सृष्टिमें किसीभी प्रकारकी अनेकता नहीं है, जो कुछ है, वह मूलमें सब 'एकमेवाद्वितीयम्' (छां. ६. २. २.) है; और जिन्होंने आगे यह वर्णन किया है, कि “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” - जिसे इस जगत्में नानात्व दीख पड़ता है, वह जन्ममरणके चक्करमें फँसता है - हम नहीं समझते, कि उन महात्माओंका आशय अद्वैतको छोड़ औरभी किसी अन्य प्रकारका हो सकेगा। परंतु अनेक वैदिक शाखाओंके अनेक उपनिषद् होनेके कारण जैसे इस शंकाको थोड़ीसी गुंजाइश मिल जाती है, कि कुल उपनिषदोंका तात्पर्य क्या एकही है ? वैसा हाल गीताका नहीं है। जब गीता एकही ग्रंथ है, तब प्रकटही है, कि उसमें एकही प्रकारके वेदान्तका प्रतिपादन होना चाहिये। और जो विचारने लगें, कि वह कौन-सा वेदान्त है ? तो यह अद्वैतप्रधान सिद्धान्त करना पड़ता है, कि “मव भूतोंका नाश हो जानेपरभी जो एकही स्थिर रहता है” (गीता ८. २०), वही यथार्थमें सत्य है। एवं देह और विश्वमें मिलकर सर्वत्र वही व्याप्त हो रहा है (गीता १३. ३१)। और तो क्या; आत्मौपम्यबुद्धिका जो नीतितत्त्व गीतामें बतलाया गया है, उसकी पूरी पूरी उपपत्तिभी अद्वैतको छोड़ दूसरे प्रकारकी वेदान्त दृष्टिसे नहीं लगती है। इससे कोई हमारा यह आशय न समझ लें, कि श्रीशंकराचार्यके समयमें अथवा उनके पश्चात् अद्वैतमतका पोषण करनेवाली जितनी युक्तियाँ निकली हैं; अथवा प्रमाण निकले हैं, वे सभी यच्चयावत् गीतामें प्रतिपादित हैं। यहतो हमभी मानते हैं, कि द्वैत, अद्वैत और विशिष्टाद्वैत प्रभृति संप्रदायोंकी उत्पत्ति होनेसे पहलेही गीता बन चुकी है; और इसी कारणसे गीतामें किसीभी विशेष संप्रदायके युक्तिवादोंका समावेश होना संभव नहीं है। किंतु इस संमतिसे यह कहनेमें कोईभी बाधा नहीं आती, कि गीताका वेदान्त मामूली तौरपर शांकर- संप्रदायके ज्ञानानुसार अद्वैती है - द्वैती नहीं। इस प्रकार गीता और शांकर- संप्रदायमें तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे सामान्य मेल है सही; पर हमारा मत है, कि आचारदृष्टिसे गीता कर्मसंन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगको अधिक महत्त्व देती है। इस कारण गीताधर्म शांकरसंप्रदायसे भिन्न हो गया है। इसका विचार आगे किया जावेगा। प्रस्तुत विषय तत्त्वज्ञानसंबंधी है। इसलिये यहाँ इतनाही कहना है, कि गीता और शांकरसंप्रदायमें - दोनोंमें - यह तत्त्वज्ञान एकही प्रकारका