श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र फिरभी बोलचालमें जिस प्रकार यही कहा जाता है, कि सूर्य निकल आया अथवा डूब गया; उसी प्रकार यद्यपि निश्चित है कि एकही आत्मस्वरूपी परब्रह्म चारों ओर अखंड भरा हुआ है; और वह अविकार्य है; तथापि उपनिषदोंमें ऐसीही भाषाके प्रयोग मिलते हैं, कि "परब्रह्मसे व्यक्त जगत्की उत्पत्ति हुई है।" इसी प्रकार गीतामेंभी यद्यपि भगवानने यह कहा है, कि "मेरा सच्चा स्वरूप अव्यक्त और अज है" (गीता ७. २५); तथापि उन्होंने कहा है, कि "मैं सारे जगत्को उत्पन्न करता हूँ (गीता ४. ६)। परंतु इन वर्णनोंके मर्मको बिना समझे-बूझे कुछ पंडित लोग इनको शब्दशः सच्चा मान लेते हैं; और फिर उन्हेंही मुख्य समझ कर यह सिद्धान्त किया करते हैं, कि द्वैत अथवा विशिष्टाद्वैत मतका उपनिषदोंमें प्रतिपादन है। वे कहते हैं; कि यदि यह मान लिया जाय, कि एकही निर्गुण ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त हो रहा है; तो फिर इसकी उपपत्ति नहीं लगती, कि इस अविकारी ब्रह्मसे विकारसहित नाशवान् सगुण पदार्थ कैसे निर्मित हो गये। क्योंकि नामरूपात्मका सृष्टिको यदि 'माया' कहें, तो निर्गुण ब्रह्मसे सगुण मायाका उत्पन्न होनाही तर्ककी दृष्टिसे शक्य नहीं है। इससे अद्वैतवाद लँगड़ा हो जाता है। इससे तो कहीं अच्छा यह होगा, कि सांख्यशास्त्रके मतानुसार प्रकृतिके सदृश नामरूपात्मक व्यक्त सृष्टिके किसी सगुण परंतु व्यक्त रूपको नित्य मान लिया जावे; और उस व्यक्त रूपके अभ्यंतरमें कोई दूसरा परब्रह्म रूप नित्यतत्त्व ऐसे ओतप्रोत भरा हुआ रखा जावे, जैसः कि पेंचकी नलीमें भाफ रहती है (बृ. ३. ७)। एवं उन दोनोंमें वैसीही एकता मानी जावे, जैसी कि दाड़िम या अनारके फलकी भीतरी दानोंके साथ रहती है। परंतु हमारे मतमे उपनिषदोंके तात्पर्यका ऐसा विचार करना योग्य नहीं है। उपनिषदोंमें कहीं कहीं द्वैती और कहीं कहीं शुद्ध अद्वैती वर्णन पाये जाते हैं। सो यह सही है कि इन दोनोंकी कुछ-न-कुछ एकवाक्यता करनी चाहिये; परंतु अद्वैतवादको मुख्य समझने और जब निर्गुण ब्रह्म सगुण होने लगता है, तब उतनेही समयके लिये मायिक द्वैतकी स्थिति प्राप्त हुई जाती है इस प्रकार मान लेनेसे सब वचनोंकी जैसी व्यवस्था लगती है, वैसी व्यवस्था द्वैत पक्षको प्रधान माननेसे लगती नहीं है। उदाहरण लीजिये; 'तत् त्वमसि' इस वाक्यके पदोंका अन्वय द्वैती मतानुसार कभीभी ठीक नहीं लगता। तो क्या इस अड़चनको द्वैतमतवालोंने समझही नहीं पाया? नहीं, समझा ज़रूर है। तभी तो वे उक्त महावाक्यका जैसा- तैसा अर्थ लगा कर अपने मनको समझा लेते हैं। 'तत्त्वमसि' को द्वैतवाले इस प्रकार सुलझाते हैं-तत्त्वम् = तस्य त्वम् - अर्थात् उसका तू है, कि जो कोई तुझसे भिन्न है; तू वही नहीं है। परंतु जिसको संस्कृतका थोड़ा-साभी ज्ञान है; और जिसकी बुद्धि आग्रहमें बँध नहीं गई है वह तुरंत ताड़ लेगा, कि यह खींचातानीका अर्थ ठीक नहीं है। कैवल्य उपनिषद् (कै. १. १६) में, तो "स त्वमेव त्वमेव तत्" इस प्रकार 'तत्' और 'त्वम्'को उलट-पलट कर उक्त महावाक्यके अद्वैतप्रधान