श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यात्म २३५ कह दिया है, कि ये चमत्कार तो मायाके खेल हैं; यह ब्रह्मविद्या नहीं है। कदाचित् ये सच्चेभी हों। हम यह नहीं कहते, कि ये सच्चे होंगेही नहीं। जो हो; इतना तो निर्विवाद है, कि यह ब्रह्मविद्याका विषय नहीं है। अतएव, ये सिद्धियाँ मिलें तो, और न मिलें तोभी इनकी परवाह न करनी चाहिये । ब्रह्मविद्याशास्त्रका कथन है, कि इनकी इच्छा अथवा आशाभी न करके मनुष्यको वही प्रयत्न करते रहना चाहिये, कि जिनसे प्राणिमात्रमें ‘एक-आत्मा'वाली परमावधिकी ब्रह्मनिष्ठ स्थिति प्राप्त हो जावे । ब्रह्मज्ञान आत्माकी शुद्ध अवस्था है। वह कुछ जादू, करामात या चमत्कार नहीं है। इस कारण इन सिद्धियोंसे - इन चमत्कारोंसे - ब्रह्मज्ञानके गौरवका बढ़ना तो दूर, किंतु उसके गौरवके - उसकी महत्ताके - ये चमत्कार प्रमाणभी नहीं हो सकते । पक्षी तो पहलेभी आकाशमें उड़ते थे; पर अब विमानोंवाले लोगभी आकाशमें उड़ने लगे हैं, किंतु सिर्फ इसी गुणके होनेसे कोई इनकी गिनती ब्रह्मवेत्ताओंमें नहीं करता । और तो क्या; जिन पुरुषोंको ये आकाशगमन आदि सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, उनमेंसे कुछ ‘मालतीमाधव' नाटकवाले अघोरघंटके समान क्रूर और घातकीभी हो सकते हैं। ब्रह्मात्मैक्यरूप आनंदमय स्थितिका अनिर्वाच्य अनुभव किसी दूसरेको पूर्णतया बतलाया नहीं जा सकता । क्योंकि जब उसके संबंधमें दूसरेको बतलाने लगेंगे, तब 'मैं-तू' वाली द्वैतकीही भाषासे काम लेना पड़ेगा; और इस द्वैती भाषामें अद्वैतका समस्त अनुभव व्यक्त करते नहीं बनता । अतएव उपनिषदोंमें इस परमावधिकी स्थितिके जो वर्णन हैं; उन्हेंभी अधूरे या गौण समझना चाहिये । और जब ये वर्णन गौण हैं, तब सृष्टिकी उत्पत्ति एवं रचना समझानेके लिये अनेक स्थानोंपर उपनिषदोंमें जो निरे द्वैती वर्णन पाये जाते हैं, उन्हेंभी गौणही मानना चाहिये । उदाहरण लीजिये; उपनिषदोंमें दृश्य सृष्टिकी उत्पत्तिके विषयमें ऐसे वर्णन हैं, कि आत्मस्वरूपी, शुद्ध, नित्य, सर्वव्यापी और अविकारी ब्रह्महीसे आगे चलकर हिरण्यगर्भ नामक सगुण पुरुष या आप (पानी) प्रभृति सृष्टिके व्यक्त पदार्थ क्रमशः निर्मित हुए; अथवा परमेश्वरने इन नामरूपोंकी रचना करके फिर जीवरूपसे उनमें प्रवेश किया (तै. २. ६; छां. ६. २, ३; बृ. १. ४. ७), ये सब द्वैतपूर्ण वर्णन अद्वैतदृष्टिसे यथार्थ नहीं हो सकते । क्योंकि ज्ञानगम्य, निर्गुण परमेश्वरही जब चारों ओर भरा हुआ है, तब तात्त्विक दृष्टिसे यह कहनाही निर्मूल हो जाता है, कि एकने दूसरेको पैदा किया । परंतु साधारण मनुष्योंको सृष्टिकी रचना समझा देनेके लिये व्यावहारिक अर्थात् द्वैतकी भाषाही तो एक साधन है। इस कारण व्यक्त सृष्टिकी अर्थात् नामरूपकी उत्पत्तिके वर्णन उपनिषदोंमें उसी ढंगके मिलते हैं, जैसा कि ऊपर एक उदाहरण दिया गया है। तोभी उसमें अद्वैतका तत्त्व बनाही रहता है; और अनेक स्थानोंमें यह कह दिया है, कि इस प्रकार द्वैती व्यावहारिक भाषा वर्तने परभी मूलमें अद्वैत सच्चाही है। देखिये, अब निश्चय हो चुका है, कि सूर्य घूमता नहीं है, स्थिर है,