श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अधिक प्रबल प्रमाण साधुसंतोंका अनुभव है। बहुत प्राचीन सिद्ध पुरुषोंके अनुभव तो प्रसिद्ध हैंही उनके, संबंधमें और क्या कहें ? किंतु बिलकुल अभीके प्रसिद्ध भगवद्भक्त तुकाराम महाराजनेभी इस परमावधिकी स्थितिका वर्णन आलंकारिक भाषामें बड़ी खूबीसे धन्यतापूर्वक इस प्रकार किया है, कि "मैं अपनी मृत्यु अपनी आँखोंसे देख ली; वहभी एक अनुपम उत्सवही था" (तु. गा. ३५७९) । व्यक्त अथवा सगुण ब्रह्मकी उपासनासे, ध्यानके द्वारा धीरे धीरे बढ़ता हुआ उपासक अंतमें "अहं ब्रह्मास्मि" (बृ. १. ४. १०) - मैंही ब्रह्म हूँ-की स्थितिमें जा पहुँचता है; और ब्रह्मात्मैक्यस्थितिका उसे साक्षात्कार होने लगता है। फिर उसमें वह इतना मग्न हो जाता है, कि इस बातकी ओर उसका ध्यानभी नहीं जाता, कि मैं किस स्थितिमें हूँ; अथवा किसका अनुभव कर रहा हूँ। इस स्थितिमें जागृति बनी रहती है, अतः इस अवस्थाको न तो स्वप्न कह सकते हैं; और न सुषुप्ति । यदि जागृति कहें तो इसमें जागृत द्वैतके अवस्थामें सामान्य रीतिसे होनेवाले सब व्यवहार रुक जाते हैं, इस- लिये स्वप्न, सुषुप्ति (नींद) अथवा जागृति - इन तीनों व्यावहारिक अवस्थाओंसे बिलकुलही भिन्न यह चौथी अथवा तुरीय अवस्था है - इस प्रकार शास्त्रोंमें कहा गया है। इस स्थितिको प्राप्त करनेके लिये पातंजलयोगशास्त्रकी दृष्टिसे मुख्य साधन निर्विकल्प समाधियोग लगाना है, जिसमें द्वैतका जरासाभी लवलेश नहीं रहता ! और यही कारण है, कि जो गीतामें (गी. ६. २०-२३) कहा है कि इस निर्विकल्प समाधि- योगको अभ्याससे प्राप्त कर लेनेमें मनुष्यको उकताना नहीं चाहिये । यही ब्रह्मात्मैक्य स्थिति ज्ञानकी पूर्णावस्था है। क्योंकि जब संपूर्ण जगत् ब्रह्मरूप अर्थात् एकही हो चुका, तब गीताके ज्ञानक्रियावाले इस लक्षणकी पूर्णता हो जाती है, कि "अविभक्तं विभक्तेषु" - अनेकत्वकी एकता करनी चाहिये - और फिर इसके आगे किसीकोभी अधिक ज्ञान हो नहीं सकता। इसी प्रकार नामरूपसे परे इस अमृतत्वका जहाँ मनुष्यको अनुभव हुआ, कि जन्म-मरणका चक्करभी आप-ही-से छूट जाता है। क्योंकि जन्म- मरण तो नामरूपोंमेंही है; और यह मनुष्य पहुँच जाता है उन नामरूपोंसे परे (गीता ८. २१) । इसीसे तुकाराम महाराजने इस स्थितिका नाम 'मरणका मरण' रख छोड़ा है। और इसी कारणसे याज्ञवल्क्य इस स्थितिको अमृतत्वकी सीमा या परा- काष्ठा कहते हैं। यही जीवन्मुक्तावस्था है। पातंजलयोगसूत्र और अन्य स्थानोंमेंभी वर्णन है, कि इस अवस्थामें आकाशगमन आदि कुछ अपूर्व अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं (पातंजलसूत्र ३. १६-५५); और इन्हींको पानेके लिये कितनेही मनुष्य योगाभ्यासकी धुनमें लग जाते हैं। परंतु योगवासिष्ठप्रणेता कहते हैं, कि आकाशगमन प्रभृति सिद्धियाँ न तो ब्रह्मनिष्ठ-स्थितिका साध्य है और न उसका कोई भागही। अतः जीवन्मुक्त पुरुष इन सिद्धियोंको पा लेनेका उद्योग नहीं करता; और बहुधा उसमें ये देखीभी नहीं जातीं (यो. ५. ८९) । इसी कारण इन सिद्धियोंका उल्लेख न तो योगवासिष्ठमेंही है और न गीतामेंभी किया है। वसिष्ठने रामसे स्पष्ट