श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्यात्म २३३ परब्रह्ममें निमग्न होनेसे मनुष्यको उसका अनुभव हो जाया करता है; और उसकी परब्रह्म-स्थिति हो जाती है, कि "सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" (गीता ६. २९) – सब प्राणी मुझमें हैं; और मैं सबमें हूँ। केन उपनिषद्में बड़ी खूबीके साथ परब्रह्मके स्वरूपका विरोधाभासात्मक वर्णन इस अर्थको व्यक्त करनेके लिये किया गया है, कि पूर्ण परब्रह्मका ज्ञान केवल अपने अनुभवपर ही निर्भर है। वह वर्णन इस प्रकार है : "अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्" (केन. २. ३) – जो कहते हैं, कि हमें परब्रह्मका ज्ञान हो गया है, उन्हें उसका ज्ञान नहीं हुआ है; और जिन्हें जानही नहीं पड़ता कि हमने उसको जान लिया; उन्हेंही वह ज्ञान हुआ है। क्योंकि, जब कोई कहता है, कि मैंने परमेश्वरको जान लिया, तब उसके मनमें वह द्वैतबुद्धि उत्पन्न हो जाती है, कि मैं (ज्ञाता) जुदा हूँ; और मैंने जिसे जान लिया, वह (ज्ञेय) ब्रह्म अलग है। अतएव उसका ब्रह्मात्मैक्यरूपी अद्वैती अनुभव उस समय उतनाही कच्चा और अपूर्ण होता है। और यह उसके अपने मुखहीसे सिद्ध होता है कि उसने सच्चे ब्रह्मवेद जानाही नहीं है। इसके उल्टे जब 'मैं' (ज्ञाता) और 'ब्रह्म' (ज्ञेय) यह द्वैती भेद नष्ट हो जाता है तब ब्रह्मात्मैक्यका पूर्ण अनुभव हो जाता है। फलतः उसके मुँहसे ऐसी भाषाका निकलनाही संभव नहीं रहता, कि "मैंने उसे (अर्थात् अपनेसे भिन्न और कुछ) जान लिया।" अतएव इस स्थितिमें, अर्थात् जब कोई ज्ञानी पुरुष यह बतलानेमें असमर्थ है, कि मैं ब्रह्मको जान गया; तब कहना पड़ता है, कि उसे ब्रह्मका ज्ञान हो गया है। इस प्रकार द्वैतका बिलकुल लोप होकर परब्रह्ममें ज्ञाताका सर्वथा रँग जाना, लयपा लेना, बिलकुल घुल जाना, अथवा एकजीव हो जाना सामान्य रूपतः तो दुष्कर दीख पड़ता है; परंतु हमारे शास्त्रकारोंने अनुभवसे निश्चय किया है, कि एका-एक दुर्घट प्रतीत होनेवाली 'निर्वाण' स्थिति, अभ्यास और वैराग्यसे अंतमें मनुष्यको साध्य हो सकती है। 'मै'-पनरूपी द्वैतभाव उक्त स्थितिमें (अहं) नष्ट हो जाता है, मृत हो जाता है। अतएव कुछ लोग शंका किया करते हैं, कि यह तो आत्मनाशकाही एक तरीका है। किंतु ज्योंही यह समझमें आए कि यद्यपि इस स्थितिका अनुभव करते समय इसका वर्णन करते नहीं बनता है, परंतु पीछे उसका स्मरण हो सकता है, त्यांही उक्त शंका निर्मूल हो जाती है।* पर इसकी अपेक्षा और भी
- ध्यानसे और समाधिसे प्राप्त होनेवाली अद्वैतकी अथवा अभेदभावकी यह अवस्था nitrous-oxide gas नामक एक प्रकारकी रासायनिक वायुको सूँघनेसे प्राप्त हो जाया करती है। इसी वायुको 'लाफिंग गैस'भी कहते हैं। Will to Be- lieve and Other Essays on Popular Philosophy, by William James, pp. 294-298. परंतु यह नकली अवस्था है। समाधिमें जो अवस्था प्राप्त होती है, वह सच्ची और असली है। यही इन दोनोंमें महत्त्वका भेद है। फिरभी यहाँ उसका उल्लेख हमने इस लिये किया, कि इस कृत्रिम अवस्थाके प्रमाणसे अभेदावस्थाके अस्तित्वके विषयमें कुछभी वाद नहीं रह जाता।