श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र एक दूसरेको देखता था, सूंघता था, सुनता था और जानता था। परंतु जब सभी आत्ममय हो गया (अर्थात् आप-पर भेदही न रहा) तब कौन किसको देखेगा, सूंघेगा, सुनेगा और जानेगा? अरे ! जो स्वयं ज्ञाता अर्थात् जाननेवाला है, उसीको जाननेवाला और दूसरा कहाँसे लाओगे?" इस प्रकार सभी आत्मभूत या ब्रह्मभूत हो जानेपर वहाँ भीति, शोक अथवा सुखदुःख आदि द्वंद्वभी रह कहाँ सकते हैं? (ईश. ७) क्योंकि, जिससे डरना है या जिसका शोक करना है, वह तो अपनेसे - हमसे - जुदा होना चाहिये; और ब्रह्मात्मैक्यका अनुभव हो जानेपर इस प्रकारकी किसीभी भिन्नताको अवकाशही नहीं मिलता। इसी दुःखशोक-विरहित अवस्थाको 'आनंदमय' नाम देकर तैत्तिरीय उपनिषद् (तै. २. ८; ३. ६) में कहा है, कि यह आनंदही ब्रह्म है। किंतु यह वर्णनभी गौणही है। क्योंकि आनंदका अनुभव करनेवाला अब रहही कहाँ जाता है? अतएव बृहदारण्यक उपनिषदमें (बृ. ४. ३. ३२) कहा है, कि लौकिक आनंदकी अपेक्षा आत्मानंद कुछ विलक्षणही होता है। ब्रह्मके वर्णनमें 'आनंद' शब्द आया करता है। उसकी गौणतापर ध्यान देकर अन्य स्थानोंमें ब्रह्मवेत्ता पुरुषका अंतिम वर्णन ('आनंद' शब्दको हटाकर) इतनाही किया जाता है, "ब्रह्म भवति य एवं वेद" (बृ. ४. ४. २५)। अथवा "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" (मुं. ३. २. ९) - जिसने ब्रह्मको जान लिया, वह ब्रह्मही हो गया। उपनिषदोंमें (बृ. २. ४. १२; छां. ६. १३) इस स्थितिके लिये यह दृष्टान्त दिया गया है, कि नमककी डली जब पानीमें घुल जाती है, तब जिस प्रकार यह भेद नहीं रहता कि इतना भाग खारे पानीका है और इतना भाग मामूली पानीका है - उसी प्रकार ब्रह्मात्मैक्यका ज्ञान हो जानेपर सब ब्रह्ममय हो जाता है। किंतु श्री तुकाराम महाराजने (कि "जिनकी कहै नित्य वेदान्त वाणी") इस खारे पानीके दृष्टान्तके बदले गुड़ का यह मीठा दृष्टान्त देकर अपने अनुभवका वर्णन किया है :- 'गूंगे का गुड़' है भगवान्, बाहरभीतर एक समान। किसका ध्यान करूँ सविवेक ? जल-तरंगसे हैं हम एक ॥
- तु. गा. ३६२७ इसीलिये कहा जाता है, कि परब्रह्म इंद्रियोंको अगोचर और मनकोभी अगम्य होने- परभी स्वानुभवगम्य है, अर्थात् अपने अपने अनुभवसे जाना जाता है। परब्रह्मकी जिस अज्ञेयताका वर्णन किया जाता है, वह 'ज्ञाता और ज्ञेय'वाली द्वैती स्थिति है; 'अद्वैत-साक्षात्कार'वाली स्थिति नहीं। जबतक यह बुद्धि बनी है, कि मैं अलग हूँ और दुनिया अलग है, तबतक कुछभी क्यों न किया जाय, ब्रह्मात्मैक्यका पूरा ज्ञान होना संभव नहीं। किंतु नदी यदि समुद्रको निगल नहीं सकती - उसको अपनेमें लीन नहीं कर सकती - तो जिस प्रकार समुद्रमें गिरकर नदी तद्रूप हो जाती है, उसी प्रकार