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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

उपयोग अद्वैत सिद्धान्तके लिये कियाही नहीं जा सकता। बापसे लड़का पैदा हो, तो कहेंगे, कि वह बापके गुणपरिणामसे हुआ है। परंतु पिता एकही व्यक्ति है; और जब कभी वह बच्चेका, कभी जवानका और कभी बुड्ढेका स्वांग बनाये हुए दीख पड़ता है, तब हम सदैव देखा करते हैं, कि इस व्यक्तिमें और इसके अनेक स्वांगोंमें गुणपरिणामरूपी कार्यकारणभाव नहीं रहता। ऐसेही जब निश्चित हो जाता है, कि सूर्य एकही है; तब पानीमें आँखोंको दिखाई देनेवाले उसके प्रतिबिंबको हम भ्रम कह देते हैं, और उसे गुणपरिणामसे उपजा हुआ दूसरा सूर्य नहीं मानते। इसी प्रकार दूरबीनसे किसी ग्रहके यथार्थ स्वरूपका निश्चय हो जानेपर, ज्योतिःशास्त्र स्पष्ट कह देता है, कि उस ग्रहका जो स्वरूप निरी आँखोंसे दीख पड़ता है, वह दृष्टिकी कमजोरी है और उसके अत्यंत दूरीपर रहनेके कारण निरा दृश्य उत्पन्न हो गया है। इससे प्रकट हो गया, कि कोईभी बात नेत्र आदि इंद्रियोंको प्रत्यक्ष गोचर हो जानेसेही स्वतंत्र और सत्य वस्तु मानी नहीं जा सकती। फिर इसी न्यायका अध्यात्मशास्त्रमें उपयोग करके यदि यह कहें तो क्या हानि है, कि ज्ञानचक्षुरूप दूरबीनसे जिसका निश्चय कर लिया गया है, वह निर्गुण परब्रह्मही सत्य है। और ज्ञानहीन चर्मचक्षुओंको जो नामरूप गोचर होता है, वह इस परब्रह्मका कार्य नहीं है - वह तो इंद्रियोंकी दुर्बलतासे उपजा हुआ निरा भ्रम अर्थात् मोहात्मक दृश्य है। यहाँपर यह आक्षेपही नहीं फबता, कि निर्गुणसे सगुण उत्पन्न नहीं हो सकता। क्योंकि दोनों वस्तुएँ एकही श्रेणीकी नहीं हैं। इनमें एक तो सत्य है; और दूसरी है सिर्फ दृश्य। एवं अनुभव यह है, कि मूलमें एकही सत्य वस्तु रहने- परभी देखनेवाले पुरुषके दृष्टिभेदसे, अज्ञानसे अथवा नज़रबंदीसे उस एकही वस्तुके दृश्य बदलते रहते हैं। उदाहरणार्थ, कानोंको सुनाई देनेवाले शब्द और आँखोंसे दिखाई देनेवाले रंग - इन्हीं दो गुणोंको लीजिये। इनमेंसे कानोंको जो शब्द या आवाज़ सुनाई देती है, उसकी सूक्ष्मतासे जांच करके आधिभौतिकशास्त्रियोंने पूर्णतया सिद्ध कर दिया है, कि 'शब्द' या तो वायुकी लहरें हैं या गति है। और अब सूक्ष्म शोध करनेसे निश्चय हो गया है, कि आँखोंमे दीख पड़नेवाले लाल, हरे, पीले, आदि रंगभी मूलमें एकही सूर्यप्रकाशके विकार हैं; और सूर्यप्रकाश स्वयं एक प्रकारकी गतिही है। जब कि 'गति' मूलमें एकही है, पर कान उसे शब्द और आँखें उसे रंग बतलाती हैं, तब यदि इसी न्यायका उपयोग कुछ अधिक व्यापक रीतिसे सारी इंद्रियोंके लिये किया जावे, तो सभी नामरूपोंकी उत्पत्तिके संबंधमें सत्कार्यवादकी सहायताके बिना ठीकही ठीक उपपत्ति इस प्रकार लगाई जा सकती है, कि किसीभी एक अविकार्य वस्तुपर मनुष्यकी भिन्न भिन्न इंद्रियाँ अपनी अपनी ओरसे शब्दरूप आदि अनेक नामरूपात्मक गुणोंका 'अध्यारोप' करके नाना प्रकारके दृश्य उपजाया करती हैं। परंतु यह आवश्यक नहीं है, कि मूलकी एकही वस्तुमें ये दृश्य, ये गुण अथवा ये नामरूप हों ही। और इसी अर्थको सिद्ध करनेके लिये

२४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र रस्सीमें सर्पका अथवा सीपमें चाँदीका भ्रम होना, या आँखमें उँगली डालनेसे एकके दो पदार्थ दीख पड़ना अथवा अनेक रंगोंके चश्मे लगानेपर एकही पदार्थका रंग-बिरंगा दीख पड़ना आदि अनेक दृष्टान्त वेदान्तशास्त्रमें दिये जाते हैं। मनुष्यकी इंद्रियाँ उससे कभी छूट नहीं जाती हैं। इस कारण जगत्‌के नामरूप अथवा गुण उसके नयनपथमें गोचर तो अवश्यही होंगे; परंतु यह नहीं कहा जा सकता, कि इंद्रियवान् मनुष्यकी दृष्टिसे जगत्‌का जो सापेक्ष स्वरूप दीख पड़ता है, वही इस जगत्‌के मूलका अर्थात् निरपेक्ष और नित्य स्वरूप है। मनुष्यकी वर्तमान इंद्रियोंकी अपेक्षा यदि उसे न्यूनाधिक इंद्रियाँ प्राप्त हो जावें, तो यह सृष्टि उसे जैसे आजकल दीख पड़ती है, वैसेही न दीखती रहेगी। और यदि यह ठीक है, तो जब कोई पूछे, कि द्रष्टाकी – देखनेवाले मनुष्यकी – इंद्रियोंकी अपेक्षा न करके यह बतलाओ, कि सृष्टिके मूलमें जो तत्त्व है, उसका नित्य और सत्य स्वरूप क्या है ? तब यही उत्तर देना पड़ता है, कि वह मूलतत्त्व है तो निर्गुण; परंतु मनुष्यको सगुण दिखलाई देता है – यह मनुष्यकी इंद्रियोंका धर्म है; न कि मूलवस्तुका गुण। आधिभौतिकशास्त्रमें उन्हीं बातोंकी जाँच होती है, कि जो इंद्रियोंको गोचर हुआ करती हैं। और यही कारण है, कि वहाँ इस ढंगके प्रश्न होतेही नहीं। परंतु मनुष्य और उसकी इंद्रियोंके नष्टप्राय हो जानेसे यह नहीं कह सकते, कि ईश्वरभी नष्ट हो जाता है; अथवा मनुष्यको वह अमुक प्रकारका दीख पड़ता है। इसलिये उसका त्रिकालाबाधित नित्य और निरपेक्ष स्वरूपभी वही होना चाहिये। अतएव जिस अध्यात्मशास्त्रमें यह विचार करना होता है, कि जगत्‌के मूलमें वर्तमान सत्यका मूलस्वरूप क्या है; उसमें मानवी इंद्रियोंकी सापेक्षदृष्टि छोड़ देनी पड़ती है; और केवल ज्ञानदृष्टिसे अर्थात् जितना हो सके उतना बुद्धिसेही अंतिम विचार करना पड़ता है। ऐसा करनेसे इंद्रियोंको गोचर होनेवाले सभी गुण आपही आप छूट जाते हैं। और यह सिद्ध हो जाता है, कि, ब्रह्मका नित्य स्वरूप इंद्रियातीत अर्थात् निर्गुण एवं सबसे श्रेष्ठ है। परंतु अब प्रश्न होता है, कि जो निर्गुण है, उसका वर्णन करेगाही कौन ? और किस प्रकार करेगा ? इसीलिये अद्वैत वेदान्तमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि परब्रह्मका अंतिम अर्थात् निरपेक्ष और नित्य स्वरूप निर्गुण तो हैही, पर अनि- र्वाच्यभी है; और इसी निर्गुण स्वरूपमें मनुष्यको अपनी इंद्रियोंके योगसे सगुण दृश्यकी झलक दीख पड़ती है। अब यहाँ प्रश्न होता है, कि निर्गुणको सगुण करनेकी यह शक्ति इंद्रियोंने पा कहाँसे ली ? इसपर अद्वैतवेदान्तशास्त्रका यह उत्तर है कि मानवी ज्ञानकी गति यहींतक है। इसके आगे उसकी गुज़र नहीं। इसलिये यह इंद्रियोंका अज्ञान है; और निर्गुण परब्रह्ममें सगुण जगत्‌का दृश्य दीखना यह उसी अज्ञानका परिणाम है। अथवा यहाँ इतनाही निश्चित अनुमान करके निश्चित हो जाना पड़ता है, कि इंद्रियाँभी परमेश्वरकी सृष्टिकीही हैं। इस कारण यह सगुण सृष्टि (प्रकृति) निर्गुण परमे- श्वरकीही एक 'दैवी माया' है (गीता ७. १४)। पाठकोंकी समझमें अब गीताके

अध्यात्म २४१ इस वर्णनका तत्त्व आ जावेगा, कि केवल इंद्रियोंसे देखनेवाले अप्रबुद्ध लोगोंको परमे- श्वर व्यक्त और सगुण दीख पड़े तोभी उसका सच्चा और श्रेष्ठ स्वरूप निर्गुण है और उसको ज्ञानदृष्टिसे जाननेमेंही ज्ञानकी परमावधि है ( गीता ७. १४, २४, २५ ) । इस प्रकार निर्णय तो कर दिया, कि परमेश्वर मूलमें निर्गुण है, और मनुष्यकी इंद्रियोंको उसीमें सगुण सृष्टिका विविध दृश्य दीख पड़ता है; फिरभी इस बातका थोड़ा-सा स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है, कि उक्त सिद्धान्तमें निर्गुण शब्दका अर्थ क्या समझा जावे। यह सच है, कि हवाकी लहरोंपर शब्दरूप आदि गुणोंका अथवा सीपपर चाँदीका जब हमारी इंद्रियां अध्यारोप करती हैं, तब हवाकी लहरोंमें शब्द- रूप आदिके अथवा सीपमें चाँदीके गुण नहीं होते। परंतु यद्यपि उनमें अध्यारोपित गुण न हों; तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि उनसे भिन्न गुण, मूल पदार्थोंमें होंगेही नहीं। क्योंकि हम प्रत्यक्ष देखते हैं, कि यद्यपि सीपमें चाँदीके गुण नहीं हैं, तोभी चाँदीके गुणोंके अतिरिक्त और दूसरे गुण उसमें रहते होंगेही। इसीसे अब यहाँ एक और शंका होती है - कि इंद्रियोंने अपने अज्ञानसे मूलब्रह्मपर जिन गुणोंका अध्या- रोप किया था, वे गुण ब्रह्ममें नहीं हैं - इस प्रकार न होंगे तो क्या और दूसरे गुण परब्रह्ममें न होंगे ? यदि मान लो, कि यदि कहें; तो फिर वह निर्गुण कहाँ रहा ? किंतु कुछ और अधिक सूक्ष्म विचार करनेसे ज्ञात होगा, कि यदि मूल ब्रह्ममें इंद्रियोंके द्वारा अध्यारोपित गुणोंके अतिरिक्त और दूसरे गुण होंभी; तो हम उन्हें मालूम कैसे कर सकेंगे ? क्योंकि गुणोंको मनुष्य अपनी इंद्रियोंसेही तो जानता है; और जो गुण इंद्रियोंको अगोचर हैं, वे जानेही नहीं जाते। सारांश, इंद्रियोंके द्वारा अध्यारोपित गुणोंके अतिरिक्त परब्रह्ममें यदि और कुछ दूसरे गुण हों, तो उनको जान लेना हमारी सामर्थ्यके बाहर है; और जिन गुणोंको जान लेना हमारे काबूमें नहीं, उनको परब्रह्ममें माननाभी न्यायशास्त्रकी दृष्टिसे योग्य नहीं है। अतएव गुण शब्दका “ मनुष्यको ज्ञात होनेवाले गुण ” अर्थ करके वेदान्ती लोग सिद्धान्त किया करते हैं, कि ब्रह्म 'निर्गुण' है। न तो अद्वैत वेदान्तही यह कहता है; और न कोई दूसराभी कह सकेगा, कि मूल परब्रह्म-रूपमें ऐसा गुण या ऐसी शक्ति भरीही नहीं होगी, कि जो मनुष्यके लिये अतर्क्य है, बल्कि यह तो पहलेही बतला दिया है, कि वेदान्ती लोगभी इंद्रियोंके उक्त अज्ञान अथवा मायाको उसी मूल परब्रह्मकी एक अतर्क्य शक्ति कहा करते हैं। त्रिगुणात्मक माया अथवा प्रकृति कोई दूसरी स्वतन्त्र वस्तु नहीं है, किंतु एक- रूप निर्गुण ब्रह्मपरही मनुष्यकी इंद्रियां अज्ञानसे सगुण दृश्योंका अध्यारोप किया करती हैं। इसी मतको 'विवर्तवाद' कहते हैं। अद्वैत वेदान्तके अनुसार यह उपपत्ति इस बातकी हुई, कि जब निर्गुण ब्रह्म एकमात्रही मूलतत्त्व है, तब नाना प्रकारका सगुण जगत् पहले दिखाई कैसे देने लगा ? कणादप्रणीत न्यायशास्त्रमें असंख्य परमाणु जगतके मूलकारण माने गये हैं; और नैयायिक इन परमाणुओंको सत्य मानते हैं। गी. र. १६

२४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इसलिये उन्होंने निश्चय किया है, कि जहां इन असंख्य परमाणुओंका संयोग होने लगा, वहाँ सृष्टिके अनेक पदार्थ बनने लगते हैं। परमाणुओंके संयोगका आरंभ होनेपर, इस मतसे सृष्टिका निर्माण होता है। इसलिये इसको 'आरंभवाद' कहते हैं। परंतु नैयायिकोंके असंख्य परमाणुओंके मतको सांख्यमार्गवाले नहीं मानते। वे कहते हैं, कि जड सृष्टिका मूल कारण "एकरूप, सत्य और त्रिगुणात्मक प्रकृतिही" है। एवं इस त्रिगुणात्मक प्रकृतिके गुणोंके विकाससे अथवा परिणामसे व्यक्त सृष्टि बनती है। इस मतको 'गुणपरिणामवाद' कहते हैं। क्योंकि इसमें यह प्रतिपादन किया जाता है, कि एक मूल सगुण प्रकृतिके गुणविकाससेही सारी व्यक्त सृष्टि पैदा हुई है। किंतु इन दोनों वादोंको अद्वैती वेदान्ती स्वीकार नहीं करते। परमाणु असंख्य हैं; इसलिये अद्वैत मतके अनुसार वे जगतका मूल हो नहीं सकते; और रह गई प्रकृति। सो यद्यपि वह एक हो, तोभी उसके पुरुषसे भिन्न और स्वतंत्र होनेके कारण अद्वैत सिद्धान्तके यह द्वैतभी विरुद्ध है। परंतु इस प्रकार इन दोनों वादोंको त्याग देनेसे इस बातकी कोई न कोई उपपत्ति देनी होगी, कि एक निर्गुण ब्रह्मसे सगुण सृष्टि कैसे उपजी है। क्योंकि, सत्कार्यवादके अनुसार निर्गुणसे सगुण उत्पन्न हो नहीं सकता। इसपर वेदान्ती कहते हैं, कि सत्कार्यवादके इस सिद्धान्तका उपयोग वहीं होता है, जहां कार्य और कारण दोनों वस्तुएँ सत्य हों, परंतु जहाँ मूल वस्तु एकही है, और जहाँ उसके भिन्न भिन्न दृश्यभी पलटते हैं, वहाँ इस न्यायका उपयोग नहीं होता। क्योंकि हम सदैव देखते हैं, कि एकही वस्तुके भिन्न भिन्न दृश्योंका दीख पड़ना उस वस्तुका धर्म नहीं है; किंतु द्रष्टा – देखनेवाले पुरुषके – दृष्टिभेदके कारण ये भिन्न भिन्न दृश्य उत्पन्न हो सकते हैं।* इसी न्यायका उपयोग निर्गुण ब्रह्म और सगुण जगतके लिये करनेपर कहेंगे, कि ब्रह्म तो निर्गुण है; पर मनुष्यके इंद्रियधर्मके कारण उसीमें सगुणत्वकी झलक उत्पन्न हो जाती है। यह विवर्तवाद है। विवर्तवादमें यह मानते हैं, कि एकही मूल सत्य द्रव्यपर अनेक असत्य अर्थात् सदा बदलते रहनेवाले दृश्योंका अध्यारोप होता है; और गुणपरिणामवादमें पहलेसेही दो सत्य द्रव्य मान लिये जाते हैं, जिनमेंसे एकके गुणोंका विकास होकर जगतकी नाना गुणयुक्त अन्यान्य वस्तुएँ उपजती रहती हैं। रस्सीमें सर्पका भास होना विवर्त है; और नारियलकी रेशोंसे रस्सी बन जाना अथवा दूधसे दही बन जाना गुणपरिणाम है। इसी कारण 'वेदान्त- सार' नामक ग्रंथकी एक आवृत्तिमें इन दोनों वादोंके लक्षण इस प्रकार बतलाये गये हैं :-

  • अंग्रेजीमें इस! अर्थको व्यक्त करना हो, तो यों कहेंगे :- “ appearances are the results of subjective conditions, viz. the senses of the obser- ver and not of the thing itself. ”

अध्यात्म २४३ यस्तात्त्विकोऽन्यथाभावः परिणाम उदीरितः । अतात्त्विकोऽन्यथाभावो विवर्तःस उदीरितः ॥ "किसी मूल वस्तुसे जब तात्त्विक अर्थात् सचमुचही दूसरे प्रकारकी वस्तु बनती है, तब उसको ( गुण ) परिणाम कहते हैं। और जब ऐसा न होकर मूलवस्तुही कुछ- की-कुछ ( अतात्त्विक ) भासने लगती है, तब उसे विवर्त कहते हैं" ( वे. सा. २१ ) । आरंभवाद नैयायिकोंका है, गुणपरिणामवाद सांख्योंका है और विवर्तवाद अद्वैती वेदान्तियोंका है। अद्वैती वेदान्ती परमाणु या प्रकृति इन दोनों सगुण वस्तुओंको निर्गुण ब्रह्मसे भिन्न और स्वतंत्र नहीं मानते, परंतु फिर यह आक्षेप होता है, कि सत्कार्य- वादके अनुसार निर्गुणसे सगुणकी उत्पत्ति होना असंभव है। इस आक्षेपको दूर करनेके लियेही ही विवर्तवाद निकला है। परंतु इसीसे कुछ लोग जो यह समझ बैठे हैं, कि वेदान्ती लोग गुणपरिणामवादका कभी स्वीकार नहीं करते हैं; अथवा आगे कभी न करेंगे, वह उनकी भूल है। अद्वैत मतपर सांख्यमतवालोंका अथवा अन्यान्य द्वैतमत- वालोंकाभी जो यह मुख्य आक्षेप रहता है, कि निर्गुण ब्रह्मसे सगुण प्रकृतिका अर्थात् मायाका उद्गम होही नहीं सकता; सो वह आक्षेप कुछ अपरिहार्य नहीं है। विवर्त- वादका मुख्य उद्देश्य इतनाही दिखला देना है, कि एकही निर्गुण ब्रह्ममें मायाके अनेक दृश्योंका हमारी इंद्रियोंको दीख पड़ना संभव है। वह उद्देश्य सफल हो जानेपर - अर्थात् जहाँ विवर्तवादसे यह सिद्ध हुआ, कि एक निर्गुण परब्रह्ममेंही त्रिगुणात्मक सगुण प्रकृतिके दृश्यका दीख पड़ना शक्य है; वहाँ - वेदान्तशास्त्रको यह स्वीकार करनेमें कोईभी हानि नहीं, कि इस प्रकृतिका अगला विस्तार गुणपरिणामसे हुआ है। अद्वैत वेदान्तका मुख्य कथन यही है, कि स्वयं मूल प्रकृति एक दृश्य है -सत्य नहीं है। जहाँ प्रकृतिका दृश्य एक बार दिखाई देने लगा, वहाँ फिर इन दृश्योंसे आगे चल- कर निकलनेवाले दूसरे दृश्योंको स्वतंत्र न मानकर, अद्वैत वेदान्तको यह मान लेनेमें कुछभी आपत्ति नहीं है कि एक दृश्यके गुणोंसे दूसरे दृश्यके गुण और दूसरेसे तीसरे आदिके इस प्रकार नानागुणात्मक दृश्य उत्पन्न होते हैं। अतएव यद्यपि गीतामें भगवाननें बतलाया है, कि "यह प्रकृति मेरीही माया है" ( गीता ७. १४; ४. ६ ), फिरभी गीतामेंही यह कह दिया है, कि ईश्वरके द्वारा अधिष्ठित ( गीता ९. १० ) इस प्रकृतिका अगला विस्तार "गुणा गुणेषु वर्तन्ते" ( गीता ३. २८; १४. २३ ) इस न्यायसेही होता रहता है। इससे ज्ञात होता है, कि विवर्तवादके अनुसार मूल निर्गुण परब्रह्ममें एक बार मायाका दृश्य उत्पन्न हो चुकनेपर इस मायिक दृश्यकी अर्थात् प्रकृतिके अगले विस्तारकी - उपपत्तिके लिये गुणोत्कर्षका तत्त्व गीताकोभी मान्य हो चुका है। जब समूचे दृश्य जगतकोही एक बार मायात्मक दृश्य कह दिया, तब यह कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, कि इन दृश्योंके अन्याय रूपोंके लिये गुणो- त्कर्षके जैसे कुछ नियम होनेही नहीं चाहिये । वेदान्तियोंको यह अस्वीकार नहीं है, कि मायात्मक दृश्यका विस्तारभी नियमबद्धही रहता है। उनका तो इतनाही कहना

२४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र है, कि मूल प्रकृतिके समान ये नियमभी मायिकही हैं; और परमेश्वर इन सब मायिक नियमोंका अधिपति है। वह इनसे परे है; और उसकी सत्तासेही इन निय- मोंको नियमत्व अर्थात् नित्यता प्राप्त हो गई है। दृश्यरूपी सगुण अतएव विनाशी प्रकृतिमें ऐसे नियम बना देनेकी सामर्थ्य नहीं रह सकती, कि जो त्रिकालमेंभी अबाधित रहें। यहां तक जो विवेचन किया गया है, उससे ज्ञात होगा, कि जगत्, जीव और परमेश्वर – अथवा अध्यात्मशास्त्रकी परिभाषाके अनुसार माया (अर्थात् मायासे उत्पन्न किया हुआ जगत्), आत्मा और परब्रह्मका स्वरूप क्या है? एवं इनका पर- स्पर-संबंध क्या है? अध्यात्मदृष्टिसे जगतकी सभी वस्तुओंके दो वर्ग होते हैं, ‘नामरूप’ और नामरूपोंसे आच्छादित 'नित्य तत्त्व'। इनमेंसे नामरूपोंकोही सगुण माया अथवा प्रकृति कहते हैं। परंतु नामरूपोंको निकाल डालनेपर जो ‘नित्य द्रव्य’ बच रहता है, वह निर्गुणही रहना चाहिये। क्योंकि कोईभी गुण बिना नामरूपोंके रह नहीं सकता। यह नित्य और अव्यक्त तत्त्वही परब्रह्म है; और मनुष्यकी दुर्बल इंद्रियोंको इस निर्गुण परब्रह्ममेंही सगुण माया उपजी हुई दीख पड़ती है। यह माया सत्य पदार्थ नहीं है। परब्रह्मही सत्य अर्थात् त्रिकालमेंभी अबाधित और कभीभी न पलटनेवाली वस्तु है। दृश्य सृष्टिके नामरूप और उनसे आच्छादित परब्रह्मके स्वरूपसंबंधी ये सिद्धान्त हुए; अब इसी न्यायसे मनुष्यका विचार करें, तो सिद्ध होता है, कि मनुष्यकी देह और इंद्रियां दृश्य सृष्टिके अन्यान्य पदार्थोंके समान नामरूपात्मक अर्थात् अनित्य मायाके वर्गकी हैं; और इन देहेंद्रियोंसे ढँका हुआ आत्मा नित्यस्वरूपी परब्रह्मकी श्रेणीका है; अथवा ब्रह्म और आत्मा एकही हैं। इस अर्थसे बाह्य सृष्टिको स्वतंत्र, सत्य पदार्थ न माननेवाले अद्वैत-सिद्धान्तका और बौद्ध-सिद्धान्तका भेद अब पाठकोंके ध्यानमें आही गया होगा। विज्ञानवादी बौद्ध मानते हैं, कि बाह्यसृष्टिही नहीं है। वे ज्ञानमात्रकोही सत्य मानते हैं। और वेदान्तशास्त्री बाह्य सृष्टिके नित्य बदलते रहनेवाले नामरूपकोही असत्य मानकर यह सिद्धान्त करते हैं, कि इस नाम- रूपके मूलमें और मनुष्यकी देहमें–दोनोंमें–एकही आत्मरूपी, नित्य द्रव्य भरा हुआ है। एवं यह एकरूप आत्मतत्त्वही अंतिम सत्य है। सांख्यमतवालोंने ‘अविभक्तं विभक्तेषु’के न्यायसे सृष्ट पदार्थोंकी अनेकताके एकीकरणको जड़ प्रकृति भरके लियेही स्वीकार कर लिया है। परंतु वेदान्तियोंने सत्कार्यवादकी बाधाको दूर करके निश्चय किया है, कि जो “पिंडमें है वही ब्रह्मांडमें है।” इस कारण अब सांख्योंके असंख्य पुरुषोंका और प्रकृतिका एकही परमात्मामें अद्वैतसे या अविभागसे समावेश हो गया है। शुद्ध आधिभौतिक पंडित हेकेल अद्वैती है सही; पर वह अकेली जड़ प्रकृतिमेंही चैतन्यकाभी संग्रह करता है। और वेदान्त, जड़को प्रधानता न देकर यह सिद्धान्त स्थिर करता है, कि दिक्कालोंसे अमर्यादित, अमृत, और स्वतंत्र चिद्रूपी परब्रह्मही सारी सृष्टिका मूल है। हेकेलके जड़ अद्वैतमें और अध्यात्मशास्त्रके अद्वैतमें यह अत्यंत

अध्यात्म २४५ महत्त्वपूर्ण भेद है। अद्वैत वेदान्तके यही सिद्धान्त गीतामें हैं; और एक पुराने कविने समग्र अद्वैत वेदान्तके सारका वर्णन यों किया है :- श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः । ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ॥ “ करोड़ों ग्रंथोंका सार आधे श्लोकमें बतलाता हूँ :- (१) ब्रह्म सत्य है, (२) जगत् अर्थात् जगतके सभी नामरूप मिथ्या अथवा नाशवान् हैं; और (३) मनुष्यका आत्मा एवं ब्रह्म मूलमें एकही हैं - दो नहीं।" इस श्लोकका 'मिथ्या' शब्द यदि किसीके कानोंमें चुभता हो, तो वह बृहदारण्यक उपनिषदके अनुसार इसके तीसरे चरण - “ब्रह्मामृतं जगत्सत्यं "का - पाठांतर खुशीसे करलें; परंतु पहलेही बतला चुके हैं, कि इससे भावार्थ नहीं बदलता है। फिरभी कुछ वेदान्ती इस बातको लेकर निरर्थक झगड़ते रहते हैं, कि समूचे दृश्य जगत्के अदृश्य किंतु नित्य परब्रह्मरूपी मूल तत्त्वको सत् (सत्य) कहें या असत् (असत्य-अनृत) । अतएव इसका यहाँ थोड़ा-सा स्पष्टीकरण किये देते हैंः कि इस विवादका सच्चा बीज (जड़) क्या है। सत् या सत्य इस एकही शब्दके दो भिन्न भिन्न अर्थ होते हैं, इसी कारण यह झगड़ा मचा हुआ है। और यदि ध्यानसे देखा जावे, कि प्रत्येक पुरुष इस 'सत्' शब्दका किस अर्थमें उपयोग करता है, तो कुछभी गड़बड़ नहीं रह जाती । क्योंकि यह भेद तो सभीको एक-सा मंजूर है, कि ब्रह्म अदृश्य होने परभी नित्य है; और नामरूपात्मक जगत् दृश्य होनेपरभी पल-पलमें बदलनेवाला है। इस सत् या सत्य शब्दका व्यावहारिक अर्थ है :- (१) आँखोंके आगे अभी प्रत्यक्ष दीख पड़नेवाला - अर्थात् व्यक्त (फिर कल उसका दृश्य स्वरूप चाहे बदले, चाहे न बदले); और दूसरा अर्थ है :- (२) वह अव्यक्त स्वरूप, जो आँखोंसे भलेही न दीख पड़े पर जो सदैव एक-सा रहता है। और जो कभी बदलता नहीं है। इनमेंसे पहला अर्थ जिनको संमत है, वे आँखोंसे दिखाई देनेवाले नामरूपात्मक जगतको सत्य कहते हैं; और परब्रह्मको इसके विरुद्ध अर्थमें अर्थात् आँखोंसे न दीख पड़ने- वाला अतएव असत् अथवा असत्य कहते हैं। उदाहरणार्थ, तैत्तिरीय उपनिषदमें दृश्य सृष्टिके लिये 'सत्' और जो दृश्य सृष्टिसे परे है, उसके लिये 'त्यत्' (अर्थात् जो कि परे है) अथवा 'अनृत' (आँखोंको न दीख पड़नेवाला) शब्दोंका उपयोग करके ब्रह्मका वर्णन इस प्रकार किया है, कि जो कुछ मूलमें या आरंभमें था, वही द्रव्य “सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च । विज्ञानं चाविज्ञानं च । सत्यं चानृतं च ।" (तै. २. ६) - सत् (आँखोंसे दीख पड़नेवाला) और त्यत् (जो परे है), वाच्य और अनिर्वाच्य साधार और निराधार; ज्ञात और अविज्ञात (अज्ञेय), सत्य और अनृत - इस प्रकार द्विधा बना हुआ है। परंतु इस प्रकार ब्रह्मको 'अनृत' कहनेसे अनृतका अर्थ झूठ या असत्य नहीं होता है, क्योंकि

२४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आगे चलकर तैत्तिरीय उपनिषदमें ही कहा है, कि “यह अमृत, ब्रह्म जगत्की ‘प्रतिष्ठा’ अथवा आधार है। इसे और दूसरे आधारकी अपेक्षा नहीं है। एवं जिसने इसको जान लिया, वह अभय हो गया” इस वर्णनसे स्पष्ट हो जाता है, कि शब्दभेदके कारण भावार्थमें कुछ अंतर नहीं होता है। ऐसेही अंतमें कहा है, कि “असद्वा इदमग्र आसीत्” - यह सारा जगत् पहले असत् (ब्रह्म) था; और ऋग्वेदके (१०. १२९. ४) वर्णनके अनुसार आगे चलकर उसीसे सत् यानी नाम- रूपात्मक व्यक्त जगत् निकला है (तै. २. ७)। इससेभी स्पष्ट हो जाता है, कि यहाँ पर ‘असत्’ शब्दका प्रयोग “अव्यक्त अर्थात् आँखोंसे न दीख पड़नेवाले” के अर्थमेंही हुआ है; और वेदान्तसूत्रोंमें (वे. सू. २. १. १७) में बादरायणाचार्यने उक्त वचनोंका ऐसाही अर्थ किया है। किंतु जिन लोगोंको ‘सत्’ अथवा ‘सत्य’ शब्दका यह अर्थ - आँखोंसे न दीख पड़नेपरभी सदैव स्थिर रहनेवाला अथवा टिकाऊ - (ऊपर बतलाये हुए अर्थोंमेंसे दूसरा अर्थ) संमत है, वे उस अदृश्य परब्रह्मकोही सत् या सत्य कहते हैं, कि जो कभी नहीं बदलता; और नामरूपात्मक मायाको असत् यानी असत्य अर्थात् विनाशी कहते हैं। उदाहरणार्थ, छांदोग्यमें वर्णन किया गया है, कि “सदेव सौम्येदमग्र आसीत् कथमसतः सज्जायेत” - पहले यह सारा जगत् सत् (ब्रह्म) था, जो असत् है यानी हैही नहीं, उससे सत् यानी जो विद्यमान् है - मौजूद है - कैसे उत्पन्न होगा (छां. ६. २. १, २)। फिरभी छांदोग्य उप- निषदमेंही इस परब्रह्मके लिये एक स्थानपर अव्यक्तके अर्थमें ‘असत्’ शब्द प्रयुक्त हुआ है (छां. ३. १९. १)।* एकही परब्रह्मको भिन्न भिन्न समयों और अर्थोंमें एक बार ‘सत्’, तो एक बार ‘असत्’; यों परस्पर-विरुद्ध नाम देनेकी यह गड़बड़ - अर्थात् वाच्य अर्थके एकही होनेपरभी निरा शब्दवाद मचवानेमें सहायक - प्रणाली आगे चलकर रुक गई। और अंतमें इतनीही एक परिभाषा स्थिर हो गई है, कि ब्रह्म सत् या सत्य यानी सदैव स्थिर रहनेवाला है; और दृश्य सृष्टि असत् अर्थात् नाशवान् है। भगवद्गीतामें यही अंतिम परिभाषा मानी गई है; और इसीके अनुसार दूसरे अध्यायमें (गीता २. १६-१८) कह दिया है, कि परब्रह्म सत् और अविनाशी है। एवं नामरूप असत् अर्थात् नाशवान् हैं; और वेदान्तसूत्रोंकाभी ऐसाही मत है। फिरभी दृश्य सृष्टिको ‘सत्’ कहकर परब्रह्मको ‘असत्’ या ‘त्यत्’ (वह = परेका) कहनेकी तैत्तिरीयोपनिषदवाली उस पुरानी परिभाषाका नामो- निशाँ अबभी बिलकुल जाता नहीं रहा है। पुरानी परिभाषासे इतना भली भाँति

  • अध्यात्मशास्त्रवाले अंग्रेज ग्रंथकारोंमेंभी इस विषयमें मतभेद है, कि (real) अर्थात् सत् शब्द जगत्‌के दृश्य (माया)के लिये उपयुक्त हो; अथवा वस्तुतत्त्व (ब्रह्म)के लिये। कांट दृश्यको सत् (real) समझकर वस्तुतत्त्वको अविनाशी मानता है; पर हेकेल और ग्रीनप्रभृति दृश्यको असत् (unreal) समझकर वस्तुतत्त्वको सत् (real) कहते हैं।

अध्यात्म २४७ स्पष्टीकरण हो जाता है, कि गीताके "ॐ तत् सत्" ब्रह्मनिर्देशका (गीता १७. २३) मूल अर्थ क्या रहा होगा। यह 'ॐ' गुढाक्षररूपी वैदिक मंत्र है। उपनिषदोंमें इसका अनेक रीतियोंसे व्याख्यान किया गया है (प्र. ५; मां. ८-१२; छां. १. १)। 'तत्' यानी वह अथवा दृश्य सृष्टिसे परे, दूर स्थिर रहनेवाला, अनिर्वाच्य तत्त्व है; और 'सत्'का अर्थ है आंखोंके सामनेवाली दृश्य सृष्टि। इस संकल्पका अर्थ यह है कि ये तीनों मिलकर सब ब्रह्मही है। और इसी अर्थमें भगवान्ने गीतामें कहा है, कि 'सदसच्चाहमर्जुन' (गीता ९.१९) - सत् यानी परब्रह्म और असत् अर्थात् दृश्य सृष्टि, दोनों मैंही हूँ। तथापि जब कि गीतामें कर्मयोगही प्रतिपाद्य है, तब सत्रहवें अध्यायके अंतमें प्रतिपादन किया है, कि निम्न अर्थके इस ब्रह्मनिर्देशसेभी कर्मयोगका पूर्ण समर्थन होता है। 'ॐ तत्सत्' के 'सत्' शब्दका अर्थ लौकिक दृष्टिसे भला अर्थात् सद्बुद्धिसे किया हुआ अथवा वह कर्म है, कि जिसका अच्छा फल मिलता है; और तत्का अर्थ है इसके परेका या फलाशा छोड़कर किया हुआ कर्म है। संकल्पमें जिसे 'सत्' कहा है, वह दृश्य सृष्टि यानी कर्मही हैं (अगला प्रकरण देखो)। अतः इस ब्रह्मनिर्देशका यह कर्मप्रधान अर्थ मूल अर्थसे सहजही निष्पन्न होता है। ॐ तत्सत्, नेति नेति, सच्चिदानंद और 'सत्यस्य सत्यं'के अतिरिक्त औरभी कुछ ब्रह्मनिर्देश उपनिषदोंमें हैं; परंतु उनको यहां इसलिये नहीं बतलाया, क्योंकि गीताका अर्थ समझनेमें उनका उपयोग नहीं हैं। जगत्, जीव और परमेश्वरके (परमात्मा) परस्पर संबंधका इस प्रकार निर्णय हो जानेपर गीतामें भगवान्ने जो कहा है, कि "जीव मेराही 'अंश' है" (गीता १५. ७) और "मैंही एक 'अंश'से सारे जगतमें व्याप्त हूँ" (गीता १०. ४२) - एवं बादरायणाचार्यनेभी वेदान्तसूत्रोंमें (वे. सू. २. ३. ४३; ४. ४. १९) में यही बात कही है- अथवा पुरुषसूक्तमें जो "पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपाद- स्यामृतं दिवि" यह वर्णन है, उसके 'पाद' या 'अंश' शब्दके अर्थका निर्णयभी सहजही हो जाता है। परमेश्वर या परमात्मा यद्यपि सर्वव्यापी है, तथापि वह निरवयव एकरूप और नामरूपरहित है। अतएव उसे काट नहीं सकते (अच्छेद्य); और उसमें विकारभी नहीं होता (अविकार्य); और इसलिये उसके अलग अलग विभाग या टुकड़े नहीं हो सकते (गीता २. २५)। अतएव चारों ओर ठसाठस भरे हुए इस एकरूप परब्रह्मका और मनुष्यके शरीरमें निवास करनेवाले आत्माका भेद बतलानेके लिये यद्यपि व्यवहारमें ऐसा कहना पड़ता है, कि "शारीर आत्मा" परब्रह्मका ही 'अंश' है; तथापि 'अंश' या 'भाग' शब्दका अर्थ "काटकर अलग किया हुआ टुकड़ा" या "अनारके अनेक दानोंमेंसे एक दाना" नहीं है; किंतु तात्त्विक दृष्टिसे उसका अर्थ यह समझना चाहिये, कि जैसे घरके भीतरका आकाश या घड़े का आकाश (मठाकाश या घटाकाश) एकही सर्वव्यापी आकाशका 'अंश'

२५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उसे सुन कर 'वाह !' 'वाह !' कहते हुए सिर हिलानेवाले या किसी नाटकके दर्शकोंके समान "एक बार फिरसे - वन्स मोर" कहनेवाले बहुतेरे होंगे (गीता २. २९; क. २. ७)। परंतु जैसा कि ऊपर कह आये हैं - जो मनुष्य अंतर्बाह्य शुद्ध अर्थात् साम्यशील हो गया हो - वही सच्चा आत्मनिष्ठ है; और उसीको मुक्ति मिलती है; न कि कोरे पंडितको - चाहे वह कितनाही बहुश्रुत और बुद्धिमान् क्यों न हो ? उपनिषदोंमें स्पष्ट कहा है, कि "नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन" (क. २. २२; मुं. ३. २. ३)। और इसी प्रकार तुकाराम महाराजभी कहते हैं - "यदि तू पंडित होगा, तो तू पुराण-कथा कहेगा; परंतु तू यह नहीं जान सकता, कि, "मैं कौन हूँ" (तु. गा. २५९९)। देखिये हमारा ज्ञान कितना संकुचित है। 'मुक्ति मिलती है' - ये शब्द सहजही हमारे मुखसे निकल पड़ते हैं। मानो यह मुक्ति आत्मासे कोई भिन्न वस्तु है ! ब्रह्म और आत्मा एक है - यह ज्ञान होनेके पहले द्रष्टा और दृश्य जगत्में भेद था सही; परंतु हमारे अध्यात्मशास्त्रने निश्चित करके रखा है, कि जब ब्रह्मात्मैक्यका पूरा ज्ञान हो जाता है, तब आत्मा ब्रह्ममें मिल जाता है और ब्रह्मज्ञानी पुरुष आपही ब्रह्मरूप हो जाता है। इस आध्यात्मिक अवस्थाकोही 'ब्रह्मनिर्वाण' मोक्ष कहते हैं। यह ब्रह्मनिर्वाण किसीसे किसीको दिया नहीं जाता। यह किसी दूसरे स्थानसे आता नहीं या इसकी प्राप्तिके लिये किसी अन्य लोकमें जानेकीभी आवश्यकता नहीं। पूर्ण आत्मज्ञान जब और जहां होगा, उसी क्षण और उसी स्थानपर मोक्ष धरा हुआ है। क्योंकि मोक्ष तो आत्माहीकी मूल शुद्धावस्था है। वह कुछ निराली स्वतंत्र वस्तु या स्थल नहीं। शिवगीता (१३. ३२) में यह श्लोक है :- मोक्षस्य न हि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमेव वा। अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः ॥ अर्थात् "मोक्ष कोई ऐसी वस्तु नहीं, कि जो किसी एक स्थानमें रखी हो; अथवा यहभी नहीं, कि उसकी प्राप्तिके लिये किसी दूसरे गांव या प्रदेशको जाना पड़े ! वास्तवमें हृदयकी अज्ञानग्रंथिका नाश हो जानेकोही मोक्ष कहते हैं।" इसी प्रकार अध्यात्मशास्त्रसे निष्पन्न होनेवाला यही अर्थ भगवद्गीताके "अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्" (गीता ५. २६) - जिन्हें पूर्ण आत्मज्ञान हुआ है, उन्हें ब्रह्मनिर्वाणरूपी मोक्ष आप-ही-आप प्राप्त हो जाता है; तथा "यः सदा मुक्त एव स." (गीता ५. २८) इस श्लोकमें वर्णित है; और "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" - जिसने ब्रह्म जाना, वह ब्रह्मही हो जाता है (मुं. ३. २. ९) - इत्यादि उपनिषद्ववाक्योंमेंभी वही अर्थ वर्णित है। मनुष्यके आत्माकी ज्ञानदृष्टिसे जो यह पूर्णावस्था होती है, उसीको 'ब्रह्मभूत' (गीता १८. ५४) या 'ब्राह्मी स्थिति' कहते हैं (गीता २. ७२) और स्थितप्रज्ञ (गीता २. ५५-७२),

भक्तिमान्, (गीता १२. १३-२०), या त्रिगुणातीत (गीता १४. २२-२७) पुरुषोंके विषयमें भगवद्गीतामें जो वर्णन हैं, वेभी इसी अवस्थाके हैं। यह नहीं समझना चाहिये, कि जैसे सांख्यवादी 'त्रिगुणातीत' पदसे प्रकृति और पुरुष दोनोंको स्वतंत्र मानकर पुरुषके केवलपन या 'कैवल्य'को मोक्ष मानते हैं, वैसाही मोक्ष गीताकोभी संमत है। किंतु गीताका अभिप्राय है, कि अध्यात्मशास्त्रमें कही गई ब्राह्मी अवस्था - "अहं ब्रह्मास्मि" - मैंही ब्रह्म हूँ (बृ. १. ४. १०) - कभी भक्तिमार्गसे, तो कभी चित्तनिरोधरूप पातंजलयोगमार्गसे और कभी गुणागुण- विवेचनरूप सांख्यमार्गसेभी प्राप्त होती है। इन मार्गोंमेंसे अध्यात्मविचार केवल बुद्धिगम्य मार्ग है। इसलिये गीतामें कहा है, कि सामान्य मनुष्योंको परमेश्वर स्वरूपका ज्ञान होनेके लिये भक्तिही सुगम साधन है। इस साधनका विस्तारपूर्वक विचार हमने आगे चलकर तेरहवें प्रकरणमें किया है। साधन कुछभी हो; इतनी बात निर्विवाद है, कि ब्रह्मात्मैक्यका अर्थात् सच्चे परमेश्वरस्वरूपका ज्ञान होना, संसार सब प्राणियोंमें एकही आत्मा पहचानना और उसी भावके अनुसार बर्ताव करनाही अध्यात्मज्ञानकी परमावधि है; तथा यह अवस्था जिसे प्राप्त हो जाय, वही पुरुष धन्य तथा कृतकृत्य होता है। यह पहलेही बतला चुके हैं, कि केवल इंद्रियसुख पशुओं और मनुष्योंमें एकही समान होता है। इसलिये मनुष्यजन्मकी सार्थकता अथवा मनुष्यकी मनुष्यता ज्ञानप्राप्तिहीमें होती है। सब प्राणियोंके विषयमें काया-वाचा-मनसे सदैव ऐसीही साम्यबुद्धि रखकर अपने सब कर्मोंको करते रहनाही नित्यमुक्तावस्था, पूर्णयोग या सिद्धावस्था है। इस अवस्थाके जो वर्णन गीतामें हैं, उनमेंसे बारहवें अध्यायवाले भक्तिमान् पुरुषके वर्णनपर टीका करते हुए ज्ञानेश्वर* महाराजने अनेक दृष्टान्त देकर ब्रह्मभूत पुरुषकी साम्यावस्थाका अत्यंत मनोहर और चटकीला निरूपण किया है। और यह कहनेमें कोई हर्ज नहीं कि इस निरूपणमें गीताके चारों स्थानोंमें वर्णित ब्राह्मी अवस्थाका सार आ गया है; यथा :- "हे पार्थ ! जिसके हृदयमें विषमताका नामतक नहीं है, जो शत्रु और मित्र दोनोंको समानही मानता है; अथवा हे पांडव ! दीपकके समान जो इस बातका भेदभाव नहीं जानता, कि यह मेरा घर है, इसलिये यहाँ प्रकाश करूँ; और वह पराया घर है, इसलिये वहाँ अंधेरा करूँ। बीज बोनेवाले पर और पेड़ काटनेवालेपरभी वृक्ष जैसे समभावसे छाया करता है"; इत्यादि (ज्ञा. १२. १८)। इसी प्रकार "पृथिवीके समान वह इस बातका भेद बिलकुल नहीं जानता, कि उत्तमको ग्रहण करना चाहिये और अधमका त्याग करना चाहिये।

  • ज्ञानेश्वर महाराजके 'ज्ञानेश्वरी' ग्रंथका हिंदी अनुवाद श्रीयुत रघुनाथ माधव भगाडे, बी. ए., सबजज्ज, नागपूरने किया है; और वह ग्रंथ उन्हींसे मिल सकता है।

२५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जैसे कृपालु प्राण इस बातको नहीं सोचता, कि राजाके शरीरको चलाऊँ और रंकके शरीरको गिराऊँ; जैसे जल यह भेद नहीं करता, कि गोकी तृषा बुझाऊँ और व्याघ्रके लिये विष बनकर उसका नाश करूँ, वैसेही सब प्राणियोंके विषयमें जिसकी एकसी मित्रता है, जो स्वयं कृपाकी मूर्ति है, और जो 'मैं' और 'मेरा'का व्यवहार नहीं जानता और जिसे सुखदुःखका भानभी नहीं होता" इत्यादि (ज्ञा. १२ १३)। अध्यात्मविद्यासे जो कुछ अंतमें प्राप्त करना है, वह यही है। उपर्युक्त विवेचनसे विदित होगा, कि सारे मोक्षधर्मके मूलभूत अध्यात्मज्ञानकी परंपरा हमारे यहाँ उपनिषदोंसे लगाकर ज्ञानेश्वर, तुकाराम, रामदास, कबीर- दास, सूरदास, तुलसीदास इत्यादि आधुनिक साधु-पुरुषोंतक किस प्रकार अव्याहत चली आ रही है। परंतु उपनिषदोंकेभी पहले यानी अत्यंत प्राचीन कालमेंभी हमारे देशमें इस ज्ञानका प्रादुर्भाव हुआ था; और तबसे क्रमक्रमसे आगे उपनिषदोंके विचारोंकी उन्नति होती चली गई है। यह बात पाठकोंको भलीभाँति समझा देनेके लिये ऋग्वेदका एक प्रसिद्ध सूक्त भाषांतरसहित यहाँ अंतमें दिया गया है, जो उपनिषदान्तर्गत ब्रह्मविद्याका आधारस्तंभ है। सृष्टिके अगम्य मूलतत्त्व और उससे विविध दृश्य सृष्टिकी उत्पत्तिके विषयमें जैसे विचार इस सूक्तमें प्रदर्शित किये गये हैं, वैसे प्रगल्भ, स्वतंत्र और मूल तककी खोज करनेवाले तत्त्वज्ञानके मार्मिक विचार अन्य किसीभी धर्मके मूल ग्रंथमें दिखाई नहीं देते। इतनाही नहीं, किंतु ऐसे अध्यात्मविचारोंसे परिपूर्ण और इतना प्राचीन लेखभी अबतक कहीं उपलब्ध नहीं हुआ है। इसलिये अनेक पश्चिमी पंडितोंने धार्मिक इतिहासकी दृष्टिसेभी इस सूक्तको अत्यंत महत्त्वपूर्ण जान कर आश्चर्यचकित हो अपनी अपनी भाषाओंमें इसका अनुवाद यह दिखलानेके लिये किया है, कि मनुष्यके मनकी प्रवृत्ति इस नाशवान् और नामरूपात्मक सृष्टिके परे नित्य और अचिंत्य ब्रह्मशक्तिकी ओर सहजही कैसे झुक जाया करती है। यह ऋग्वेदके दसवें मंडलका १२९ वाँ सूक्त है; और इसके प्रारंभिक शब्दोंसे इसे 'नासदीय सूक्त' कहते हैं। यही सूक्त तैत्तिरीय ब्राह्मणमें (तै. ब्रा. २. ८. ९) लिया गया है; और महाभारतांतर्गत नारायणीय या भागवत धर्ममें इसी सूक्तके आधारपर यह बात बतलाई गई है, कि भगवानकी इच्छासे पहले पहल सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई (महा. शां. ३४२. ८)। सर्वानुक्रमणिकाके अनुसार इस सूक्तका ऋषि परमेष्टि प्रजापति है; और देवता परमात्मा है; तथा इसमें त्रिष्टुप् वृत्तके यानी ग्यारह अक्षरोंके चार चरणोंकी सात ऋचाएँ हैं। 'सत्' और 'असत्' शब्दोंके दो दो अर्थ होते हैं। अतएव सृष्टिके मूल द्रव्यको 'सत्' कहनेके विषयमें उपनिषत्कारोंके जिस मतभेदका उल्लेख पहले हम इस प्रकरणमें कर चुके हैं, वही मतभेद ऋग्वेदमेंभी पाया जाता है। उदाहरणार्थ, इस मूलकारणके विषयमें कहीं तो यह कहा है, कि "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (ऋ. १. १६४. ४६) अथवा "एकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति" (ऋ. १०. ११४. ५)-

अध्यात्म २५३

वह एक और सत् यानी सदैव स्थिर रहनेवाला है; परंतु उसीको लोग अनेक नामोंसे पुकारते हैं। और कहीं कहीं इसके विरुद्ध यहभी कहा है, कि “ देवानां पूर्व्य युगेऽसतः सदजायत ” (ऋ. १०. ७२. ७) - देवताओंकेभी पहले असतसे अर्थात् अव्यक्तसे 'सत्' अर्थात् व्यक्त सृष्टि उत्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त, किसी-न- किसी एक दृश्य तत्त्वसे सृष्टिकी उत्पत्ति होनेके विषयमें ऋग्वेदहीमें भिन्न भिन्न अनेक वर्णन पाये जाते हैं। जैसे सृष्टिके आरंभमें मूल हिरण्यगर्भ था। अमृत और मृत्यु दोनों उसकीही छायाएं हैं; और आगे उसीसे सारी सृष्टि निर्मित हुई है (ऋ. १०. १२१. १, २)। पहले विराड्रूपी पुरुष था; और उससे यज्ञके द्वारा सारी सृष्टि उत्पन्न हुई (ऋ. १०. ९०)। पहले पानी (आप) था। उसमें प्रजापति उत्पन्न हुआ (ऋ. १०. ७२. ६; १०. ८२. ६)। ऋत और सत्य पहले उत्पन्न हुए, फिर रात्रि (अंधकार) और उसके बाद समुद्र (पानी), संवत्सर इत्यादि उत्पन्न हुए (ऋ. १०. १९०. १)। ऋग्वेदमें वर्णित इन्हीं मूल द्रव्योंका आगे अन्यान्य स्थानोंमें इस प्रकार उल्लेख किया गया है। जैसे :-(१) जलका, तैत्तिरीय ब्राह्मणमें “ आपो वा इदमग्रे सलिलमासीत् ” - यह सब पहले पतला पानी था (तै. ब्रा. १. १. ३. ५)। (२) असतका, तैत्तिरीय उपनिषदमें “ असद्वा इदमग्र आसीत् ” - यह पहले असत् था (तै. २. ७)। (३) सतका, छांदोग्यमें “ सदेव सौम्येदमग्र आसीत् ” - यह सब पहले सतही था (छां. ६. २)। अथवा (४) आकाशका, “आकाशः परायणम् ” - आकाशही सब बातोंका मूल है (छां. १. ९); (५) मृत्युका, बृहदारण्यकमें “नैवेह किंचनाग्र आसीन्मृत्यु- नैवेदमावृतमासीत् ” - पहले यह कुछभी न था, मृत्युसे सब आच्छादित था (बृह. १. २. १); और (६) तमका, मैत्र्युपनिषदमें “तमो वा इदमग्र आसीदेकम् ”

  • पहले यह सब अकेला तम (तमोगुणी, अंधकार) था - आगे उससे रज और सत्त्व हुआ (मै. ५. २) - अंतमें इन्हीं वेदवचनोंका अनुकरण करके मनुस्मृतिमें सृष्टिके आरंभका वर्णन इस प्रकार किया गया है :- आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ अर्थात् “ यह सब पहले तमसे यानी अंधकारसे व्याप्त था। भेदाभेद नहीं जाना जाता था इतना अगम्य और निद्रित था। फिर आगे इसमें अव्यक्त परमेश्वरने प्रवेश करके पहले पानी उत्पन्न किया ” (मनु. १. ५-८)। सृष्टिके आरंभके मूल द्रव्यके संबंधमें उक्त वर्णन या ऐसेही भिन्न भिन्न वर्णन नासदीय सूक्तके समयभी अवश्य प्रचलित रहे होंगे; और उस समयभी यही प्रश्न उपस्थित हुआ होगा, कि इनमेंसे कौन-सा मूलद्रव्य सत्य माना जावे ? अतएव उसके सत्यांशके विषयमें इस सूक्तके ऋषि यह कहते हैं, कि :-

२५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सूक्त अनुवाद नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं १. तब अर्थात् मूलारंभमें असत् नहीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् । था और सत्‌भी नहीं था ! अंतरिक्ष नहीं किमावरीवः कुह कस्य शर्म- था और उसके परेका आकाशभी न था । न्छम्भः किमासीद्गहनं गभीरम् ॥१॥ ( ऐसी अवस्थामें ) किसने ( किसपर ) आवरण डाला ? कहाँ ? किसके सुखके लिये ? अगाध और गहन जल ( भी ) कहाँ था ? * न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि २. तब मृत्यु अर्थात् मृत्युग्रस्त नाश- न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः । वान् दृश्य सृष्टि न थी, अतएव ( दूसरा ) आनीदवातं स्वधया तदेकम् । अमृत अर्थात् अविनाशी नित्य पदार्थ तस्माद्धान्यन्न परः किंचनास ॥२॥ ( यह भेद ) भी न था । ( इसी प्रकार ) रात्रि और दिनका भेद समझनेके लिये कोई साधन ( = प्रकेत ) न था। ( जो कुछ था ) वह अकेला एकही अपनी शक्ति ( स्वधा ) से वायुके बिना श्वोसोच्छ्वास लेता अर्थात् स्फूर्तिमान् होता रहा । इसके अतिरिक्त या इसके परे और कुछ भी न था। तम आसीत्तमसा गूढमग्रे- ३. जो ( यत् ) ऐसा कहा जाता है, प्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् । कि अंधकार था, आरंभमें यह सब अंध- तुच्छेनाभ्वपिहितं यदासीत् कारसे व्याप्त ( और ) भेदाभेदरहित तपसस्तन्महिनाऽजायतैकम् ॥३॥ जल था ( या ) आभु अर्थात् सर्वव्यापी ब्रह्म ( पहलेही ) तुच्छसे अर्थात् झूठी मायासे आच्छादित था, वह ( तत् ) मूलमें एक ( ब्रह्मही ) तपकी महिमासे ( आगे रूपांतरसे ) प्रकट हुआ था। †

  • ऋचा पहली – चौथे चरणमें 'आसीत् किम्' यह अन्वय करके हमने उक्त अर्थ दिया है; और उसका भावार्थ है, 'पानी तब नहीं था' ( तै. ब्रा. २. २. ९) । † ऋचा तीसरी – कुछ लोग इसके प्रथम तीन चरणोंको स्वतंत्र मानकर उनका ऐसा विधानात्मक अर्थ करते हैं, कि सृष्टिके आरंभमें "अंधकार, अंधकारसे व्याप्त पानी, या तुच्छसे आच्छादित आभु ( पोलापन ) था।" परंतु हमारे मतसे यह भूल है। क्योंकि पहली दो ऋचाओंमें जब कि ऐसी स्पष्ट उक्ति है, कि मूलारंभमें

अध्यात्म २५५ कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥ ४. इसके मनका जो रेत अर्थात् बीज प्रथमतः निकला, वही आरंभमें काम ( अर्थात् सृष्टि निर्माण करनेकी प्रवृत्ति या शक्ति ) हुआ । ज्ञाताओने अंतःकरणमें विचार करके बुद्धिसे निश्चित किया, कि ( यही ) असत्में अर्थात् मूल परब्रह्ममें सत्का का यानी विनाशी दृश्यसृष्टिका ( पहला ) संबंध है । तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषां अधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत् । रेतोधा आसन् महिमान आसन् स्वधा अवस्तात् प्रयतिः परस्तात् ॥५॥ ५. ( यह ) रश्मि या किरण या धागा इनमें आड़ा फैल गया; और यदि कहें, कि यह नीचे था, तो यह ऊपरभी था। ( इनमेंसे कुछ ) रेतोधा अर्थात् बीजप्रद हुए; और ( बढ़कर ) बड़ेभी हुए । उन्हींकी स्वशक्ति इस ओर रही; और प्रयति अर्थात् प्रभाव उस ओर ( व्याप्त ) रहा । को अद्धा वेद क इह प्र वोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः । अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेना- थ को वेद यत आबभूव ॥६॥ ६. ( सत्का ) यह विसर्ग यानी पसारा किससे या कहाँसे आया ? यह ( इससे अधिक ) प्र यानी विस्तारपूर्वक यहाँ कौन कहेगा ? इसे कौन निश्चया- त्मक जानता है ? देवभी इस ( सत् सृष्टिके ) विसर्गके पश्चात् हुए हैं। फिर वह जहांसे ( उत्पन्न ) हुई, उसे कौन जानेगा ? कुछभी न था; तब उसके विपरीत इसी सूक्तमें यह कहा जाना संभव नहीं, कि मूलारंभमें अंधकार या पानी था । अच्छा; यदि वैसा अर्थ करेंगे; तो तीसरे चरणके यत् शब्दको निरर्थक मानना होगा । अतएव तीसरे चरणके 'यत्'का चौथे चरणके 'तत्'से संबंध लगाकर, ( जैसा कि हमने ऊपर किया है ) अर्थ करना आवश्यक है। “ मूलारंभमें पानी वगैरह पदार्थ थे " ऐसा कहनेवालोंको उत्तर देनेके लिये इस सूक्तमें यह ऋचा आई है। और इसमें ऋषिका उद्देश्य यह बतलानेका है, कि तुम्हारे कथनानुसार मूलमें तम, पानी इत्यादि पदार्थ न थे; किंतु एक ब्रह्मकाही आगे यह सब विस्तार हुआ है। 'तुच्छ' और 'आभु' ये शब्द एक दूसरेके प्रतियोगी हैं। अतएव तुच्छ के विपरीत 'आभु' शब्दका अर्थ बड़ा या समर्थ होता है; और ऋग्वेदमें जहाँ अन्य दो स्थानोंमें इस शब्दका प्रयोग हुआ है, वहाँ सायणाचार्यनेभी

२५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न दधे। यो अस्याध्यक्षःपरमे व्योमन् सो अंग वेद यदि वा न वेद ॥७॥ ७. (सत्का) यह विसर्ग अर्थात् फैलाव जहाँसे हुआ अथवा निर्मित किया गया या नहीं किया गया-उसे परम आकाशमें रहनेवाला इस सृष्टिका जो अध्यक्ष (हिरण्यगर्भ) है, वही जानता होगा; या न भी जानता हो ! (कौन कह सके ?) सारे वेदान्तशास्त्रका रहस्य यही है, कि नेत्रोंको या सामान्यतः सब इंद्रियोंको गोचर होनेवाले विकारी और विनाशी नामरूपात्मक अनेक दृश्योंके फंदेमें फँस न रह कर ज्ञानदृष्टिसे यह जानना चाहिये, कि इस दृश्यके परे कोई न कोई एक और अमृत तत्त्व है। इस मक्खनके गोलेकोही पानेके लिये उक्त सूक्तके ऋषिकी बुद्धि एकदम दौड़ पड़ी है, इससे यह स्पष्ट दीख पड़ता है, कि उसका अंतर्ज्ञान कितना तीव्र था। मूलारंभमें अर्थात् सृष्टिके सारे पदार्थोंके उत्पन्न होनेके पहले जो कुछ था, वह सत् था या असत्; मृत्यु था या अमर; आकाश था या जल; प्रकाश था या अंधकार ? - ऐसे अनेक प्रश्न करनेवालोंके साथ वादविवाद न करते हुए, उक्त ऋषि सबके आगे दौड़ कर यह कहता है, कि सत् और असत्, मर्त्य और अमर, अंधकार और प्रकाश, आच्छादन करनेवाला और आच्छादित, सुख देनेवाला और उसका अनुभव करनेवाला द्वैतकी यह परस्परसापेक्ष भाषा दृश्य सृष्टिकी उत्पत्तिके अनंतरकी है; अतएव सृष्टिके इन द्वंद्वोंके उत्पन्न होनेके पूर्व अर्थात् जब "एक और दूसरा" यह भेदही न था, तब कौन किसे आच्छादित करता ? इसलिये आरंभहीमें इस सूक्तका ऋषि निर्भय होकर यह कहता है, कि मूलारंभके एकरूप द्रव्यको सत् या असत्, आकाश या जल, प्रकाश या अंधकार, अमृत या मृत्यु, इत्यादि कोईभी परस्पर-सापेक्ष नाम देना उचित नहीं। जो कुछ था, वह इन सब पदार्थोंसे विलक्षण था और वह अकेलाही चारों ओर अपनी अपरंपार शक्तिसे स्फूर्तिमान् था। उसके साथ या उसे आच्छादित करनेवाला अन्य कुछभी न था। दूसरी ऋचामें 'आनीत्' क्रियापदके 'अन्' धातुका अर्थ है श्वासोच्छ्वास लेना या स्फुरण होना; और 'प्राण' शब्दभी उसी धातुसे बना है। परंतु जो न सत् है और न असत्, उसके विषयमें कौन कह सकता है, कि वह सजीव प्राणियोंके समान श्वासोच्छ्वास लेता था ? और श्वासोच्छ्वासके लिये वहाँ वायुही कहाँ है ? अतएव उसका यही अर्थ किया है (ऋ. १०. २७. १, ४)। पंचदशीमें (चित्र. १२९, १३०) तुच्छ शब्दका उपयोग मायाके लिये किया गया है (नृसिं. उत्त. ९)। अर्थात् 'आभु'का अर्थ पोलापन न होकर 'परब्रह्म' ही होता है। ("सर्वं आः इदम्" -यहाँ आः (अ + अस्) अस् धातुका भूतकाल है; और इसका अर्थ 'आसीत्' होता है।

अध्यात्म २५७ 'आनीत्' पदके साथही - 'अवातं' = विना वायुके, और 'स्वधया' = स्वयं अपनीही, महिमासे - इन दोनों पदोंको जोड़कर "सृष्टिका मूल तत्त्व जड़ नहीं था" यह अद्वैता- वस्थाका अर्थ द्वैतकी भाषा में बड़ी युक्तिसे इस प्रकार बतलाया है, कि "वह अकेला बिना वायुके केवल अपनी ही शक्तिसे श्वासोच्छ्वास लेता या स्फूर्तिमान् होता था!" इसमें बाह्य दृष्टिसे जो विरोध दिखाई देता है, वह द्वैती भाषाकी अपूर्णतासे उत्पन्न हुआ है। 'नेति नेति' 'एकमेवाद्वितीयम्' या "स्वे महिम्नि प्रतिष्ठितः" (छां. ७. २४. १)। - अपनीही महिमासे अर्थात् अन्य किसीकी अपेक्षा न रखते हुए अकेलाही रहनेवाला - इत्यादि परब्रह्मके जो वर्णन उपनिषदोंमें पाये जाते हैं, वेभी उपरोक्त अर्थकेही द्योतक हैं। सारी सृष्टिके मूलारंभमें चारों ओर जिस एक अनिर्वाच्य तत्त्वके स्फुरण होनेकी बात इस सूक्तमें कही गई है, वही तत्त्व सभी दृश्य सृष्टिका प्रलय होनेपरभी निःसंदेह शेष रहेगा। अतएव गीतामें इसी परब्रह्मका कुछ पर्यायसे इस प्रकार वर्णन किया है, कि "सब पदार्थोंका नाश होनेपरभी जिसका नाश नहीं होता" (गीता ८. २०) और आगे इसी सूक्तके अनुसार स्पष्ट कहा है, कि "वह सत्भी नहीं है; और असत्भी नहीं है" (गीता १३. १२)। परंतु प्रश्न यह है, कि जब सृष्टिके मूलारंभमें निर्गुण ब्रह्मके सिवा और कुछभी न था; तो फिर वेदोंमें जो ऐसे वर्णन पाये जाते हैं, कि "आरंभमें पानी, अंधकार, या आभु और तुच्छकी जोड़ी थी" उनकी क्या व्यवस्था होगी? अतएव तीसरी ऋचामें कविने कहा है, कि - सृष्टिके आरंभमें अंधकार था या अंधकारसे आच्छादित पानी था, या आभु (ब्रह्म) और उसको आच्छादित करनेवाली माया (तुच्छ), ये दोनों पहलेसेही थे - इत्यादि) जितने वर्णन हैं वे सब उस समयके हैं, जब कि अकेले मूल परब्रह्मके तपमहात्म्यसे उसका विविध रूपोंसे फैलाव हो गया था। ये वर्णन मूलारंभकी स्थितिके नहीं हैं। इस ऋचाके शब्दसे तप मूल ब्रह्मकी ज्ञानमय विलक्षण शक्ति विवक्षित है; और उसीका वर्णन चौथी ऋचामें किया गया है (मुं. १. १. ९)। "एतावान् अस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पूरुषः" (ऋ. १०. ९०. ३)। इस न्यायसे, सारी सृष्टिही जिसकी महिमा कहलाई, उस मूल द्रव्यके विषयमें यह कहना आवश्यक नहीं है, कि वह इन सबके परे, सबसे श्रेष्ठ और भिन्न है। परंतु दृश्य वस्तु और द्रष्टा, भोक्ता और भोग्य, आच्छादन करनेवाला और आच्छाद्य, अंधकार और प्रकाश, मर्त्य और अमर इत्यादि सारे द्वैतोंको इस प्रकार अलग कर यद्यपि यह निश्चय किया गया, कि केवल एक निर्मल चिद्रूपी विलक्षण परब्रह्मही मूलारंभमें था; तथापि जब यह बतलानेका समय आया, कि इस अनिर्वाच्य, निर्गुण, अकेले एक तत्त्वसे आकाश, जल इत्यादि द्वंद्वात्मक विनाशी सगुण नामरूपात्मक विविध सृष्टि या इस सृष्टिकी मूलभूत त्रिगुणात्मक प्रकृति कैसे उत्पन्न हुई, तब तो प्रस्तुत ऋषिनेभी मन, काम, असत् और सत् जैसी द्वैती भाषाकाही उपयोग किया है और अंतमें गी. र. १७

२५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र स्पष्ट कह दिया है, कि यह प्रश्न मानवी बुद्धिकी पहुँचसे बाहर है। चौथी ऋचामें मूल ब्रह्मकोही ‘असत्’ कहा है; परंतु उसका अर्थ ‘कुछ नहीं’ यह नहीं मान सकते । क्योंकि दूसरीही ऋचामें स्पष्ट कहा है, कि ‘वह है’। न केवल इसी सूक्तमें, किंतु अन्यत्रभी व्यावहारिक भाषाको स्वीकार करकेही ऋग्वेद और वाजसनेयी संहिताओंमें गहन विषयोंका विचार निम्न प्रश्नोंके द्वारा किया गया है। (ऋ. १०. ३१. ७; १०. ८१. ४; वाज. सं. १७. २०) – जैसे दृश्य सृष्टिको यज्ञकी उपमा देकर प्रश्न किया है, कि इस यज्ञके संपन्न करनेके लिये आवश्यक घृत, समिधा इत्यादि सामग्री प्रथम कहाँसे आई ? (ऋ. १०. १३०. ३) अथवा घरका दृष्टान्त लेकर प्रश्न किया है कि मूल एक निर्गुणसे, नेत्रोंको प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाली आकाश- पृथ्वीकी इस भव्य इमारतको बनानेके लिये लकड़ी (मूल प्रकृति) कैसे मिली ? – “किं स्विद्वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः ।” इन प्रश्नोंका उत्तर उपर्युक्त सूक्तकी चौथी और पाँचवीं ऋचामें जो कुछ कहा गया, है उससे अधिक दिया जाना संभव नहीं है (वाज. सं. ३३. ७४); और वह उत्तर यही है, कि उस अनिर्वाच्य अकेले ब्रह्महीके मनमें सृष्टि निर्माण करनेका ‘काम’-रूपी तत्त्व किसी-न-किसी तरह उत्पन्न हुआ; और वस्त्रके धागोंके समान या सूर्य- प्रकाशके समान उसीकी शाखाएँ तुरंत नीचे, ऊपर और चहुँ ओर फैल गईं। तथा सत्‌का सारा फैलाव हो गया – अर्थात् आकाश-पृथ्वीकी यह भव्य इमारत बन गई। उपनिषदोंमें इस सूक्तके अर्थको इस प्रकारही प्रकट किया गया है, कि “सोऽकामयत। बहु स्यां प्रजायेयेति ।” (तै. २. ६; छां. ६. २. ३) – उस पर- ब्रह्मकोही अनेकरूप होनेकी इच्छा हुई (बृ. १. ४); और अथर्व वेदमेंभी ऐसा वर्णन है, कि इस सारी दृश्य सृष्टिके मूलभूत द्रव्यसेही पहले पहल ‘काम’ हुआ (अथर्व. ९. २. १९)। परंतु इस सूक्तकी विशेषता यह है, कि निर्गुणसे सगुणकी असत्‌से सत्‌की, निर्द्वंद्वसे द्वंद्वकी अथवा असंगसे संगकी उत्पत्तिका प्रश्न मानवी बुद्धिके लिये अगम्य समझकर सांख्योंके समान केवल तर्कवश हो मूल प्रकृतिकोही या उसके सदृश किसी दूसरे तत्त्वको स्वयंभू और स्वतंत्र नहीं माना है। किंतु इस सूक्तका ऋषि कहता है, कि जो बात समझमें नहीं आती, उसके लिये साफ़ साफ़ कह दो, कि यह समझमें नहीं आती। परंतु उसके लिये शुद्ध बुद्धिसे और आत्मप्रतीतिसे निश्चित किये गये अनिर्वाच्य ब्रह्मकी योग्यताको दृश्य सृष्टिरूप मायाकी योग्यताके बराबर मत समझो; और न परब्रह्मके विषयमें अपने अद्वैत- भावकोही छोड़ो। इसके सिवा यहभी सोचना चाहिये कि, यद्यपि प्रकृतिको एक भिन्न त्रिगुणात्मक स्वतंत्र पदार्थ मानभी लिया जावे; तथापि इस प्रश्नका उत्तर तो दिया नहीं जा सकता, कि उसमें सृष्टिको निर्माण करनेके लिये प्रथमतः बुद्धि (महान्) या अहंकार कैसे उत्पन्न हुआ ? और, जब कि यह दोष कभी टलही नहीं सकता है, तो फिर प्रकृतिको स्वतंत्र मान लेनेमें क्या लाभ है ?

अध्यात्म २४९ सिर्फ़ इतना कहो, कि यह बात समझमें नहीं आती. कि मूल ब्रह्मसे प्रकृति अर्थात् सत् कैसे निर्मित हुआ। इसके लिये प्रकृतिको स्वतंत्र पण लेनेकी कुछ आवश्यकता नहीं है। मनुष्यकी बुद्धिकी कौन कहे, परंतु देवताओंकी दिव्य बुद्धिसेभी मत्की उत्पत्तिका रहस्य समझमें आ जाना संभव नहीं। क्योंकि देवताभी दृश्य सृष्टिके आरंभ होनेपर उत्पन्न हुए हैं; उन्हें पिछला हाल क्या मालूम ? ( गीता १०. २.)। परंतु ऋग्वेदमेंही कहा है, कि हिरण्यगर्भ देवताओंसेभी बहुत प्राचीन और श्रेष्ठ है और आरंभमें वह अकेलाही “ भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ” ( ऋ. १०. १२१. १ ) – और सारी सृष्टिका 'पति' अर्थात् राजा या अध्यक्ष था। फिर उसे यह बात क्योंकर मालूम न होगी ? और यदि उसे मालूम होगी; तो फिर कोई पूछ सकता है, कि इस बातको दुर्बोध या अगम्य क्यों कहते हो ? अतएव उस सूक्तके ऋषिने पहले तो उक्त प्रश्नका यह औपचारिक उत्तर दिया है, कि “ हाँ, वह इस बातको जानता होगा।” परंतु अपनी बुद्धिसे ब्रह्मदेव- केभी ज्ञान-सागरकी थाह लेनेवाले इस ऋषिने आश्चर्यसे साशंक हो अंतमें तुरंतही कह दिया है, कि “ अथवा न भी जानता हो ! कौन कह सकता है ? क्योंकि वहभी सत्‌हीकी श्रेणीमें है। इसलिये 'परम' कहलानेपरभी 'आकाश' हीमें रहनेवाले जगतके इस अध्यक्षको सत्, असत्, आकाश और जलकेभी पूर्वकी बातोंका ज्ञान निश्चित रूपसे कैसे हो सकता है ?” परंतु यद्यपि यह बात समझमें नहीं आती, कि एक 'असत्' अर्थात् अव्यक्त और निर्गुण द्रव्यहीके साथ विविध नामरूपात्मक सत्‌का अर्थात् मूल प्रकृतिका संबंध कैसे हो गया ? तथापि मूल ब्रह्मके एकत्वके विषयमें ऋषिने अपने अद्वैत भावको डिगने नहीं दिया है। यह इस बातका एक उत्तम उदाहरण है, कि सात्त्विक श्रद्धा और निर्मल प्रतिभाके बलपर मनुष्यकी बुद्धि अचिंत्य वस्तुओंके सघन वनमें सिंहके समान निर्भय होकर कैसे संचार किया करती है और वहाँकी अतर्क्य बातोंका यथाशक्ति कैसे निश्चय किया करती है। यह सच- मुचही आश्चर्य तथा गौरवकी बात है, कि ऐसा सूक्त ऋग्वेदमें पाया जाता है ! हमारे देशमें इस सूक्तकेही विषयका आगे ब्राह्मणोंमें ( तैत्ति. ब्रा. २. ८. ९), उपनिषदों और अनंतरके वेदान्तशास्त्रके ग्रंथोंमें सूक्ष्म रीतिसे विवेचन किया गया है; और पश्चिमी देशोंमेंभी अर्वाचीन कालके कांट इत्यादि तत्त्वज्ञानियोंनेभी उसीका अत्यंत सूक्ष्म परीक्षण किया है। परंतु स्मरण रहे, कि उक्त सूक्तमें इस ऋषिकी पवित्र बुद्धिमें जिन परम सिद्धान्तकी स्फूर्ति हुई है, वेही सिद्धान्त आगे प्रतिपक्षि- योंको विवर्त-वादके समान उचित उत्तर देकर औरभी दृढ, स्पष्ट या तर्कदृष्टिसे निःसंदेह किये गये हैं। इसके परे अभीतक न कोई बढ़ा है और न बढ़नेकी विशेष आशाही की जा सकती है । अध्यात्म-प्रकरण समाप्त हुआ। अब आगे चलनेके पहले 'केसरी'की चालके अनुसार उस मार्गका कुछ निरीक्षण हो जाना चाहिये, कि जो यहाँतक चल

आये हैं। कारण यह है, कि यदि इस प्रकार सिंहावलोकन न किया जावे, तो विषया- नुसंधानके चूक जानेसे संभव है, कि और किसी अन्य मार्गमें संचार होने लगे। ग्रंथारंभमें पाठकोंका विषयमें प्रवेश कराके कर्मजिज्ञासाका संक्षिप्त स्वरूप बतलाया है; और तीसरे प्रकरणमें यह दिखलाया है, कि कर्मयोगशास्त्रही गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है; अनंतर चौथें, पाँचवें और छठे प्रकरणमें सुखदुःख-विवेकपूर्वक यह बतलाया है, कि कर्मयोगशास्त्रकी आधिभौतिक उपपत्ति एकदेशीय तथा अपूर्ण है; और आधिदैविक उपपत्ति लँगड़ी है। फिर, कर्मयोगकी आध्यात्मिक उपपत्ति बतलानेके पहले - यह जाननेके लिये, कि आत्मा किसे कहते हैं - छठे प्रकरणमेंही पहले - क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार और आगे सातवें तथा आठवें प्रकरणमें सांख्यशास्त्रां- तर्गत द्वैतके अनुसार क्षर-अक्षर विचार किया गया है। और फिर इस प्रकरणमें, इस विषयका निरूपण किया गया है, कि आत्माका स्वरूप क्या है ? तथा पिंड और ब्रह्मांडमें दोनों ओर एकही अमृत और निर्गुण आत्मतत्त्व किस प्रकार ओत- प्रोत और निरंतर व्याप्त है। इसी प्रकार यहभी निश्चित किया गया है, कि ऐसा समबुद्धि-योग प्राप्त करके - कि सब प्राणियोंमें एकही आत्मा है - और उसे सदैव जागृत रखनाही आत्मज्ञानकी और आत्मसुखकी पराकाष्ठा है। और फिर यह बतलाया गया है, कि अपनी बुद्धिको इस प्रकार शुद्ध आत्मनिष्ठ अवस्थामें पहुँचा देनेमेंही मनुष्यका मनुष्यत्व अर्थात् नर-देहकी सार्थकता या मनुष्यका परम पुरुषार्थ है। इस प्रकार मनुष्यजातिके आध्यात्मिक परम साध्यका निर्णय हो जानेपर कर्मयोगशास्त्रके इस मुख्य प्रश्नकाभी निर्णय आप-ही-आप हो जाता है, कि संसारमें हमें प्रतिदिन जो व्यवहार करने पड़ते हैं, वे किस नीतिसे किये जावें ? अथवा जिस शुद्ध बुद्धिसे उन सांसारिक व्यवहारोंको करना चाहिये, उसका यथार्थ स्वरूप क्या है ? क्योंकि अब यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि ये सारे व्यवहार उसीसे किये जाने चाहिये, जिससे कि वे परिणाममें ब्रह्मात्मैक्यरूप समबुद्धिके पोषक या अविरोधी हों। भगवद्गीतामें कर्मयोगके इसी आध्यात्मिक तत्त्वका उपदेश अर्जुनको किया गया है। परंतु कर्मयोगका प्रतिपादन केवल इतनेहीसे पूरा नहीं होता। क्योंकि कुछ लोगोंका कहना है, कि नामरूपात्मक सृष्टिके व्यवहार आत्म- ज्ञानके विरुद्ध हैं, अतएव ज्ञानी पुरुष उनको छोड़ दें। और यदि यही बात सत्य हो, तो संसारके सारे व्यवहार त्याज्य समझें जायेंगे; और फिर कर्म-अकर्मशास्त्रभी निरर्थक हो जावेगा ! अतएव इस विषयका निर्णय करनेके लिये कर्मयोगशास्त्रमें ऐसे प्रश्नोंकाभी विचार अवश्य करना पड़ता है, कि कर्मके नियम कौनसे हैं ? और उनका परिणाम क्या होता है ? अथवा बुद्धिकी शुद्धता होनेपरभी व्यवहार अर्थात् कर्म क्यों करना चाहिये ? भगवद्गीतामें ऐसा विचार कियाभी गया है। संन्यास-मार्गवाले लोगोंको इन प्रश्नोंका कुछभी महत्त्व नहीं जान पड़ता; अतएव ज्योंही भगवद्गीताका वेदान्त या भक्तिका निरूपण समाप्त हुआ, त्योंही प्रायः वे