श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र स्पष्ट कह दिया है, कि यह प्रश्न मानवी बुद्धिकी पहुँचसे बाहर है। चौथी ऋचामें मूल ब्रह्मकोही ‘असत्’ कहा है; परंतु उसका अर्थ ‘कुछ नहीं’ यह नहीं मान सकते । क्योंकि दूसरीही ऋचामें स्पष्ट कहा है, कि ‘वह है’। न केवल इसी सूक्तमें, किंतु अन्यत्रभी व्यावहारिक भाषाको स्वीकार करकेही ऋग्वेद और वाजसनेयी संहिताओंमें गहन विषयोंका विचार निम्न प्रश्नोंके द्वारा किया गया है। (ऋ. १०. ३१. ७; १०. ८१. ४; वाज. सं. १७. २०) – जैसे दृश्य सृष्टिको यज्ञकी उपमा देकर प्रश्न किया है, कि इस यज्ञके संपन्न करनेके लिये आवश्यक घृत, समिधा इत्यादि सामग्री प्रथम कहाँसे आई ? (ऋ. १०. १३०. ३) अथवा घरका दृष्टान्त लेकर प्रश्न किया है कि मूल एक निर्गुणसे, नेत्रोंको प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाली आकाश- पृथ्वीकी इस भव्य इमारतको बनानेके लिये लकड़ी (मूल प्रकृति) कैसे मिली ? – “किं स्विद्वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः ।” इन प्रश्नोंका उत्तर उपर्युक्त सूक्तकी चौथी और पाँचवीं ऋचामें जो कुछ कहा गया, है उससे अधिक दिया जाना संभव नहीं है (वाज. सं. ३३. ७४); और वह उत्तर यही है, कि उस अनिर्वाच्य अकेले ब्रह्महीके मनमें सृष्टि निर्माण करनेका ‘काम’-रूपी तत्त्व किसी-न-किसी तरह उत्पन्न हुआ; और वस्त्रके धागोंके समान या सूर्य- प्रकाशके समान उसीकी शाखाएँ तुरंत नीचे, ऊपर और चहुँ ओर फैल गईं। तथा सत्का सारा फैलाव हो गया – अर्थात् आकाश-पृथ्वीकी यह भव्य इमारत बन गई। उपनिषदोंमें इस सूक्तके अर्थको इस प्रकारही प्रकट किया गया है, कि “सोऽकामयत। बहु स्यां प्रजायेयेति ।” (तै. २. ६; छां. ६. २. ३) – उस पर- ब्रह्मकोही अनेकरूप होनेकी इच्छा हुई (बृ. १. ४); और अथर्व वेदमेंभी ऐसा वर्णन है, कि इस सारी दृश्य सृष्टिके मूलभूत द्रव्यसेही पहले पहल ‘काम’ हुआ (अथर्व. ९. २. १९)। परंतु इस सूक्तकी विशेषता यह है, कि निर्गुणसे सगुणकी असत्से सत्की, निर्द्वंद्वसे द्वंद्वकी अथवा असंगसे संगकी उत्पत्तिका प्रश्न मानवी बुद्धिके लिये अगम्य समझकर सांख्योंके समान केवल तर्कवश हो मूल प्रकृतिकोही या उसके सदृश किसी दूसरे तत्त्वको स्वयंभू और स्वतंत्र नहीं माना है। किंतु इस सूक्तका ऋषि कहता है, कि जो बात समझमें नहीं आती, उसके लिये साफ़ साफ़ कह दो, कि यह समझमें नहीं आती। परंतु उसके लिये शुद्ध बुद्धिसे और आत्मप्रतीतिसे निश्चित किये गये अनिर्वाच्य ब्रह्मकी योग्यताको दृश्य सृष्टिरूप मायाकी योग्यताके बराबर मत समझो; और न परब्रह्मके विषयमें अपने अद्वैत- भावकोही छोड़ो। इसके सिवा यहभी सोचना चाहिये कि, यद्यपि प्रकृतिको एक भिन्न त्रिगुणात्मक स्वतंत्र पदार्थ मानभी लिया जावे; तथापि इस प्रश्नका उत्तर तो दिया नहीं जा सकता, कि उसमें सृष्टिको निर्माण करनेके लिये प्रथमतः बुद्धि (महान्) या अहंकार कैसे उत्पन्न हुआ ? और, जब कि यह दोष कभी टलही नहीं सकता है, तो फिर प्रकृतिको स्वतंत्र मान लेनेमें क्या लाभ है ?