श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यात्म २४९ सिर्फ़ इतना कहो, कि यह बात समझमें नहीं आती. कि मूल ब्रह्मसे प्रकृति अर्थात् सत् कैसे निर्मित हुआ। इसके लिये प्रकृतिको स्वतंत्र पण लेनेकी कुछ आवश्यकता नहीं है। मनुष्यकी बुद्धिकी कौन कहे, परंतु देवताओंकी दिव्य बुद्धिसेभी मत्की उत्पत्तिका रहस्य समझमें आ जाना संभव नहीं। क्योंकि देवताभी दृश्य सृष्टिके आरंभ होनेपर उत्पन्न हुए हैं; उन्हें पिछला हाल क्या मालूम ? ( गीता १०. २.)। परंतु ऋग्वेदमेंही कहा है, कि हिरण्यगर्भ देवताओंसेभी बहुत प्राचीन और श्रेष्ठ है और आरंभमें वह अकेलाही “ भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ” ( ऋ. १०. १२१. १ ) – और सारी सृष्टिका 'पति' अर्थात् राजा या अध्यक्ष था। फिर उसे यह बात क्योंकर मालूम न होगी ? और यदि उसे मालूम होगी; तो फिर कोई पूछ सकता है, कि इस बातको दुर्बोध या अगम्य क्यों कहते हो ? अतएव उस सूक्तके ऋषिने पहले तो उक्त प्रश्नका यह औपचारिक उत्तर दिया है, कि “ हाँ, वह इस बातको जानता होगा।” परंतु अपनी बुद्धिसे ब्रह्मदेव- केभी ज्ञान-सागरकी थाह लेनेवाले इस ऋषिने आश्चर्यसे साशंक हो अंतमें तुरंतही कह दिया है, कि “ अथवा न भी जानता हो ! कौन कह सकता है ? क्योंकि वहभी सत्हीकी श्रेणीमें है। इसलिये 'परम' कहलानेपरभी 'आकाश' हीमें रहनेवाले जगतके इस अध्यक्षको सत्, असत्, आकाश और जलकेभी पूर्वकी बातोंका ज्ञान निश्चित रूपसे कैसे हो सकता है ?” परंतु यद्यपि यह बात समझमें नहीं आती, कि एक 'असत्' अर्थात् अव्यक्त और निर्गुण द्रव्यहीके साथ विविध नामरूपात्मक सत्का अर्थात् मूल प्रकृतिका संबंध कैसे हो गया ? तथापि मूल ब्रह्मके एकत्वके विषयमें ऋषिने अपने अद्वैत भावको डिगने नहीं दिया है। यह इस बातका एक उत्तम उदाहरण है, कि सात्त्विक श्रद्धा और निर्मल प्रतिभाके बलपर मनुष्यकी बुद्धि अचिंत्य वस्तुओंके सघन वनमें सिंहके समान निर्भय होकर कैसे संचार किया करती है और वहाँकी अतर्क्य बातोंका यथाशक्ति कैसे निश्चय किया करती है। यह सच- मुचही आश्चर्य तथा गौरवकी बात है, कि ऐसा सूक्त ऋग्वेदमें पाया जाता है ! हमारे देशमें इस सूक्तकेही विषयका आगे ब्राह्मणोंमें ( तैत्ति. ब्रा. २. ८. ९), उपनिषदों और अनंतरके वेदान्तशास्त्रके ग्रंथोंमें सूक्ष्म रीतिसे विवेचन किया गया है; और पश्चिमी देशोंमेंभी अर्वाचीन कालके कांट इत्यादि तत्त्वज्ञानियोंनेभी उसीका अत्यंत सूक्ष्म परीक्षण किया है। परंतु स्मरण रहे, कि उक्त सूक्तमें इस ऋषिकी पवित्र बुद्धिमें जिन परम सिद्धान्तकी स्फूर्ति हुई है, वेही सिद्धान्त आगे प्रतिपक्षि- योंको विवर्त-वादके समान उचित उत्तर देकर औरभी दृढ, स्पष्ट या तर्कदृष्टिसे निःसंदेह किये गये हैं। इसके परे अभीतक न कोई बढ़ा है और न बढ़नेकी विशेष आशाही की जा सकती है । अध्यात्म-प्रकरण समाप्त हुआ। अब आगे चलनेके पहले 'केसरी'की चालके अनुसार उस मार्गका कुछ निरीक्षण हो जाना चाहिये, कि जो यहाँतक चल