श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआये हैं। कारण यह है, कि यदि इस प्रकार सिंहावलोकन न किया जावे, तो विषया- नुसंधानके चूक जानेसे संभव है, कि और किसी अन्य मार्गमें संचार होने लगे। ग्रंथारंभमें पाठकोंका विषयमें प्रवेश कराके कर्मजिज्ञासाका संक्षिप्त स्वरूप बतलाया है; और तीसरे प्रकरणमें यह दिखलाया है, कि कर्मयोगशास्त्रही गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है; अनंतर चौथें, पाँचवें और छठे प्रकरणमें सुखदुःख-विवेकपूर्वक यह बतलाया है, कि कर्मयोगशास्त्रकी आधिभौतिक उपपत्ति एकदेशीय तथा अपूर्ण है; और आधिदैविक उपपत्ति लँगड़ी है। फिर, कर्मयोगकी आध्यात्मिक उपपत्ति बतलानेके पहले - यह जाननेके लिये, कि आत्मा किसे कहते हैं - छठे प्रकरणमेंही पहले - क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार और आगे सातवें तथा आठवें प्रकरणमें सांख्यशास्त्रां- तर्गत द्वैतके अनुसार क्षर-अक्षर विचार किया गया है। और फिर इस प्रकरणमें, इस विषयका निरूपण किया गया है, कि आत्माका स्वरूप क्या है ? तथा पिंड और ब्रह्मांडमें दोनों ओर एकही अमृत और निर्गुण आत्मतत्त्व किस प्रकार ओत- प्रोत और निरंतर व्याप्त है। इसी प्रकार यहभी निश्चित किया गया है, कि ऐसा समबुद्धि-योग प्राप्त करके - कि सब प्राणियोंमें एकही आत्मा है - और उसे सदैव जागृत रखनाही आत्मज्ञानकी और आत्मसुखकी पराकाष्ठा है। और फिर यह बतलाया गया है, कि अपनी बुद्धिको इस प्रकार शुद्ध आत्मनिष्ठ अवस्थामें पहुँचा देनेमेंही मनुष्यका मनुष्यत्व अर्थात् नर-देहकी सार्थकता या मनुष्यका परम पुरुषार्थ है। इस प्रकार मनुष्यजातिके आध्यात्मिक परम साध्यका निर्णय हो जानेपर कर्मयोगशास्त्रके इस मुख्य प्रश्नकाभी निर्णय आप-ही-आप हो जाता है, कि संसारमें हमें प्रतिदिन जो व्यवहार करने पड़ते हैं, वे किस नीतिसे किये जावें ? अथवा जिस शुद्ध बुद्धिसे उन सांसारिक व्यवहारोंको करना चाहिये, उसका यथार्थ स्वरूप क्या है ? क्योंकि अब यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि ये सारे व्यवहार उसीसे किये जाने चाहिये, जिससे कि वे परिणाममें ब्रह्मात्मैक्यरूप समबुद्धिके पोषक या अविरोधी हों। भगवद्गीतामें कर्मयोगके इसी आध्यात्मिक तत्त्वका उपदेश अर्जुनको किया गया है। परंतु कर्मयोगका प्रतिपादन केवल इतनेहीसे पूरा नहीं होता। क्योंकि कुछ लोगोंका कहना है, कि नामरूपात्मक सृष्टिके व्यवहार आत्म- ज्ञानके विरुद्ध हैं, अतएव ज्ञानी पुरुष उनको छोड़ दें। और यदि यही बात सत्य हो, तो संसारके सारे व्यवहार त्याज्य समझें जायेंगे; और फिर कर्म-अकर्मशास्त्रभी निरर्थक हो जावेगा ! अतएव इस विषयका निर्णय करनेके लिये कर्मयोगशास्त्रमें ऐसे प्रश्नोंकाभी विचार अवश्य करना पड़ता है, कि कर्मके नियम कौनसे हैं ? और उनका परिणाम क्या होता है ? अथवा बुद्धिकी शुद्धता होनेपरभी व्यवहार अर्थात् कर्म क्यों करना चाहिये ? भगवद्गीतामें ऐसा विचार कियाभी गया है। संन्यास-मार्गवाले लोगोंको इन प्रश्नोंका कुछभी महत्त्व नहीं जान पड़ता; अतएव ज्योंही भगवद्गीताका वेदान्त या भक्तिका निरूपण समाप्त हुआ, त्योंही प्रायः वे