भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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अध्यात्म २५३

वह एक और सत् यानी सदैव स्थिर रहनेवाला है; परंतु उसीको लोग अनेक नामोंसे पुकारते हैं। और कहीं कहीं इसके विरुद्ध यहभी कहा है, कि “ देवानां पूर्व्य युगेऽसतः सदजायत ” (ऋ. १०. ७२. ७) - देवताओंकेभी पहले असतसे अर्थात् अव्यक्तसे 'सत्' अर्थात् व्यक्त सृष्टि उत्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त, किसी-न- किसी एक दृश्य तत्त्वसे सृष्टिकी उत्पत्ति होनेके विषयमें ऋग्वेदहीमें भिन्न भिन्न अनेक वर्णन पाये जाते हैं। जैसे सृष्टिके आरंभमें मूल हिरण्यगर्भ था। अमृत और मृत्यु दोनों उसकीही छायाएं हैं; और आगे उसीसे सारी सृष्टि निर्मित हुई है (ऋ. १०. १२१. १, २)। पहले विराड्रूपी पुरुष था; और उससे यज्ञके द्वारा सारी सृष्टि उत्पन्न हुई (ऋ. १०. ९०)। पहले पानी (आप) था। उसमें प्रजापति उत्पन्न हुआ (ऋ. १०. ७२. ६; १०. ८२. ६)। ऋत और सत्य पहले उत्पन्न हुए, फिर रात्रि (अंधकार) और उसके बाद समुद्र (पानी), संवत्सर इत्यादि उत्पन्न हुए (ऋ. १०. १९०. १)। ऋग्वेदमें वर्णित इन्हीं मूल द्रव्योंका आगे अन्यान्य स्थानोंमें इस प्रकार उल्लेख किया गया है। जैसे :-(१) जलका, तैत्तिरीय ब्राह्मणमें “ आपो वा इदमग्रे सलिलमासीत् ” - यह सब पहले पतला पानी था (तै. ब्रा. १. १. ३. ५)। (२) असतका, तैत्तिरीय उपनिषदमें “ असद्वा इदमग्र आसीत् ” - यह पहले असत् था (तै. २. ७)। (३) सतका, छांदोग्यमें “ सदेव सौम्येदमग्र आसीत् ” - यह सब पहले सतही था (छां. ६. २)। अथवा (४) आकाशका, “आकाशः परायणम् ” - आकाशही सब बातोंका मूल है (छां. १. ९); (५) मृत्युका, बृहदारण्यकमें “नैवेह किंचनाग्र आसीन्मृत्यु- नैवेदमावृतमासीत् ” - पहले यह कुछभी न था, मृत्युसे सब आच्छादित था (बृह. १. २. १); और (६) तमका, मैत्र्युपनिषदमें “तमो वा इदमग्र आसीदेकम् ”

  • पहले यह सब अकेला तम (तमोगुणी, अंधकार) था - आगे उससे रज और सत्त्व हुआ (मै. ५. २) - अंतमें इन्हीं वेदवचनोंका अनुकरण करके मनुस्मृतिमें सृष्टिके आरंभका वर्णन इस प्रकार किया गया है :- आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ अर्थात् “ यह सब पहले तमसे यानी अंधकारसे व्याप्त था। भेदाभेद नहीं जाना जाता था इतना अगम्य और निद्रित था। फिर आगे इसमें अव्यक्त परमेश्वरने प्रवेश करके पहले पानी उत्पन्न किया ” (मनु. १. ५-८)। सृष्टिके आरंभके मूल द्रव्यके संबंधमें उक्त वर्णन या ऐसेही भिन्न भिन्न वर्णन नासदीय सूक्तके समयभी अवश्य प्रचलित रहे होंगे; और उस समयभी यही प्रश्न उपस्थित हुआ होगा, कि इनमेंसे कौन-सा मूलद्रव्य सत्य माना जावे ? अतएव उसके सत्यांशके विषयमें इस सूक्तके ऋषि यह कहते हैं, कि :-
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